नवज्‍योति को झटका, पूर्व पत्रकार से साढ़े तीन लाख की वसूली का दावा खारिज

: नवज्योति ने 917 दस्तावेज पेश किए थे और 18 हजार रुपए कोर्ट फीस दी थी : अदालत के एक फैसले से दैनिक नवज्योति को जोरदार झटका लगा है। बगैर किसी लिखित अनुबंध या नियुक्ति पत्र के संवाददाताओं से समाचारों के साथ विज्ञापन, सर्कुलेशन आदि काम लेने का अखबारों का मनमाना रवैया भी इस फैसले से अदालत के रिकॉर्ड पर उजागर हुआ है।

पाक मंत्री अजमेर में कर गए आम सभा, ना गुप्तचरों को भनक ना प्रशासन को पता

: सरहदी इलाकों के दस हजार से ज्यादा लोग अजमेर के तीन सितारा होटल पहुंचे : अजमेर : पाकिस्तान के एक मंत्री ने अजमेर की तीन सितारा होटल में आम सभा कर ली। भारत-पाक सरहदी इलाके से आए करीब दस हजार लोग इस सभा में शामिल हुए। इस सार्वजनिक आयोजन की अनुमति तो दूर प्रशासन, पुलिस और गुप्तचर महकमे को इसकी भनक तब लगी जब सभा खत्म हो गई।

पेजमेकर्स का टोटा : अजमेर में पत्रिका की हालत पतली

राजस्थान पत्रिका का अजमेर कार्यालय पेजमेकर्स की कमी का शिकार हो चला है। रोजाना यहां 25-30 पृष्ठ तैयार या अल्टर किए जाते हैं और पेजमेकर सिर्फ दो हैं। हाल ही में तीन पेजमेकर इस्तीफा देकर जा चुके हैं। नए पेज मेकरों की तलाश हो रही है परंतु इनका मिलना आसान नहीं है। संपादकीय विभाग से जुडे़ साथी इन हालात के लिए पत्रिका प्रबंधन को जिम्मेदार मान रहे हैं।

चुनाव हुए नहीं थे और भास्कर ने रलावता को बना दिया छात्र संघ अध्यक्ष

पत्रकारिता के नैतिक कर्त्तव्य कहें या आचरणों में से एक है गलत खबर छप जाने पर उसका खंडन छापकर खेद जताना। गलती मानने को कई अपने आत्म सम्मान से जोड़ बैठते हैं और इसी के चलते खंडन छापना भी अपने सम्मान को ठेस पहुंचना मान लेते हैं, भले ही इससे अखबार की प्रतिष्ठा पर दांव पर लग जाए। दैनिक भास्कर, अजमेर भी शायद इसी भावना का शिकार हो चला है।

राजस्थान में नए अखबारों की अफवाहों का दौर, जो निकले वे भी नाकाम रहे

उत्तर प्रदेश हो मध्य प्रदेश, उत्तरांचल, हिमाचल हो या बिहार इन सभी हिन्दी भाषी बाहुल्य प्रदेशों में किसी ना किसी नए हिन्दी अखबार का पदार्पण और पुरानों में विस्तार के नाम पर वर्चस्व की जंग मची रहती है। यह तब है जब इन प्रदेशों की स्थानीय भाषाएं भी व्यापक प्रभावी हैं।

पत्रिका स्‍वागत कक्ष : सदव्‍यवहार की शुरुआत अपने दफ्तर से करें गुलाब कोठारी

rajendra hadaनियमित पत्रकारिता से किनारा करने के पौने तीन साल बाद परसों यानी 29 जुलाई को एक अखबार के दफ्तर जाने का संयोग बना। स्वागत कक्ष पर ही जो माहौल था और जिस अनुभव से गुजरा उसके बाद भीतर जाने की इच्छा नहीं रही और बाहर से ही लौट आया। समयानुकूल परिवर्तन, नवीनतम बदलावों और कॉर्पोरेट कलचर के नाम पर अखबार के दफ्तरों का जो हाल हो गया है, उससे लगा क्या वास्तव में अखबारों की पहुंच अब आम आदमी तक है।

‘पत्रकारों को जो पूरा वेतन नहीं देते, उन अखबारों का विज्ञापन बंद करें’

‘पत्रकारों को जो पूरा वेतन नहीं देते, उन अखबारों का विज्ञापन बंद करें।’  तकरीबन बारह साल पहले राज्यसभा में सांसद ओंकार सिंह लखावत ने सरकार के सामने यह मुद्दा उठाया था। सांसद संजय निरूपम ने इसका पुरजोर समर्थन किया परंतु हालात आज भी जस के तस हैं। उस समय मनिसाना आयोग की सिफारिशों को लागू करने को लेकर बहस जारी थी। इसके बाद और नए वेतन बोर्ड आ गए।

पत्रकारों के बंगले भी होंगे जमींदोज!

राजेंद्र हाड़ा अजमेर। अफसर, पत्रकार, राजनेता और जमीन के दलालों की मिलीभगत से हुए एक बडे़ जमीन घोटाले में सरकार की टेढ़ी निगाह से अजमेर नगर निगम के मेयर कमल बाकोलिया समेत दैनिक नवज्योति के स्थानीय संपादक ओम माथुर और दैनिक भास्कर के संतोष गुप्ता जैसे प्रभावशाली पत्रकारों के बंगले भी धूल धूसरित होने की नौबत आ गई है। यह जमीन घोटाला अजमेर के बच्चे-बच्चे की जुबान पर है परंतु आज तक किसी अखबार ने इसे उजागर करने का साहस नहीं किया।

”भारतीय मीडिया गुलाम मा‍नसिकता का शिकार”

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका, ‘पाथेय कण’  में भारतीय मीडिया को अंग्रेजी गुलाम मानसिकता का शिकार बताया गया है। 16 मई 2011 के इस अंक में इंग्लैंड के राजकुमार की शादी की खबर को लेकर संपादकीय लिखा गया है जो इस तरह है-

फोटो ‘हींचते’ हैं मेरे शहर के फोटो पत्रकार क्योंकि फोटो हर कीमत पर, भले ही ‘मैनेज’ कर

राजेंद्र हाड़ासन् 1999 की एक रात कुछ पत्रकारों को सूचना मिली कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अजमेर आ रहे हैं। गहलोत कुछ माह पहले ही पहली बार मुख्यमंत्री बने थे और ‘सुशासन’ लाने के कारण ज्यादातर दौरे रेलगाड़ी से किया करते थे। रेल आने का समय रात करीब दो-ढाई बजे का था। एक संवाददाता, फोटोग्राफर के साथ रेलवे स्टेशन जा पहुंचा।

बाजार-बिजनेस के घनचक्कर में नपुंसक हुए अखबार और पत्रकार

उनका नाम जाहिर करना उचित नहीं है क्योंकि मामला उनके बच्चे के भविष्य का है। इतना जान लीजिए कि वे मीडिया मैनेजमेंट से जुडे़ हैं और दैनिक भास्कर तथा राजस्थान पत्रिका प्रबंधन में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। कुछ और भी अखबारों को पटरी पर दौड़ाने में मददगार रहे हैं। भ्रष्टाचार उन्हें भी वैसे ही बेचैन किए रहता है जैसे कई भड़ासियों को करता है। पिछले दिनों वे मीडिया की उपेक्षा के कड़े अनुभव से गुजरे। व्यथित दिल से उन्होंने अपने को यह सारा किस्सा सुना डाला।

भाजपा ने गैरकानूनी ढंग से संचालित न्यूज चैनल के संपादक को बनाया प्रचार मंत्री

अजमेर के पूर्व सांसद एवं भारतीय जनता पार्टी के शहर जिला अध्यक्ष रासा सिंह रावत ने अपनी कार्यकारिणी में गैर-कानूनी तरीके से चले रहे एक न्यूज चैनल ‘स्वामी न्यूज’  के संपादक कंवल प्रकाश किशनानी को अपना जिला प्रचार मंत्री बनाया है। दिलचस्प पहलू यह है भाजपा के संविधान में प्रचार मंत्री नामक किसी पद का कोई प्रावधान नहीं है। प्रवक्ता का पद होता है, वही प्रचार का काम देखता है और प्रवक्ता का यह पद वरिष्ठ उपाध्यक्ष अरविंद यादव को दिया जा चुका है।

अशोक गहलोत की बेटी को आठ करोड़ का फ्लैट एक करोड़ में देकर उपकार का बदला चुकाया!

[caption id="attachment_18543" align="alignleft" width="71"]राजेंद्र हाड़ा राजेंद्र हाड़ा [/caption]बीते कल यानी शनिवार 16 अप्रैल की रात 9 बजे आईबीएन7 पर एक एक्सक्लूसिव खबर चल रही थी। इतवार 17 अप्रैल की सुबह के राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, टाइम्स ऑफ इंडिया के सारे पृष्ठ पलट डाले। कहीं एक लाइन नहीं छपी थी। बड़ा विस्मय हुआ। फिर न्यूज चैनल देखा आईबीएन7 पर खबर दोहराई जा रही थी, बाकी कहीं यह नजर नहीं आई।

पत्रिका की ‘अहिंसक आक्रामकता’ और भास्‍कर का ‘टॉक शो’

राजेंद्र हाड़ा भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की जंग को अखबारों ने भी भुनाने में कसर नहीं छोड़ी। यह और बात है कि इससे वे उस बिल्ली समान नजर आ रहे हैं जो सौ-सौ चूहे खाकर हज करने निकलती है। दैनिक भास्कर, अजमेर ने एक कार्यक्रम किया जिसे नाम दिया ‘रीडर्स टॉक शो’ जिसमें रीडर्स की जगह ज्यादातर अखबारों के वेल विशर्स या छपास रोगी जुटाए गए। कई चेहरे वे थे जो शहर में भ्रष्टाचार के लिए पहचाने जाते हैं।

अजमेर में पत्रकारों का जमीनी घोटाला

[caption id="attachment_18543" align="alignleft" width="71"]राजेंद्र हाड़ा राजेंद्र हाड़ा [/caption]मार्च-अप्रैल 2002 में अजमेर में एक खेल शुरू हुआ। जमीनों का खेल। इसके मुख्य किरदार थे पत्रकार! नौ साल होने जा रहे हैं खेल आज भी जारी है। मुख्य किरदार आज भी पत्रकार ही हैं। ईमानदारी, सच्चाई, निष्पक्षता की मिसाल बने अजमेर के इन पत्रकारों में से कुछ तो पांच-पांच भूखंडों के स्वामी हो चुके हैं। अगर जांच हो जाए तो अपना दावा है कि मुंबई का आदर्श सोसायटी घोटाला भी पीछे रह जाए। भूखंड पाने के लिए ‘पत्रकार’ शब्द की परिभाषाएं तक बदल दी गईं।

मीडिया की मर्यादा के लिए संवैधानिक संस्था जरूरी

रामबहादुर जी: इंटरव्यू : रामबहादुर राय (वरिष्‍ठ एवं नामचीन पत्रकार) : रामबहादुर राय का नाम हिन्दी पत्रकारिता में ना केवल एक पत्रकार के रूप में बल्कि अच्छे व्यक्ति के रूप में भी बड़े ही सम्मान एवं आदर के साथ लिया जाता है। लेखन, समाचारों पर पकड़ के साथ उनकी सादगी, आचरण और विद्वता की मिसाल दी जा सकती है। जनसत्ता और नवभारत टाइम्स में उन्होंने राजनीतिक रिपोर्टिंग की जो मिसाल कायम की वह हिन्दी पत्रकारिता के जगत में मील का पत्थर साबित हो चुकी है।

कोठारी जी, क्‍यों झुठला रहे हैं पेड न्‍यूज का सच

आदरणीय श्रीयुत् गुलाब जी कोठारी, प्रधान संपादक, राजस्थान पत्रिका, जयपुर, सादर प्रणाम,  भड़ास के माध्यम से आपको यह पत्र लिख रहा हूं। उचित रहेगा यह कहूं कि अपनी भावनाएं आप तक पहुंचा रहा हूं। भड़ास के माध्यम से ही क्यों, इसकी वजह है जो मैं अगली पंक्तियों में स्पष्ट करने जा रहा हूं। इससे पहले सीधे मुद्दे पर आता हूं। रविवार 9 जनवरी 2011 को पत्रिका के अजमेर संस्करण के मुख पृष्ठ पर एक समाचार था, ‘बडे़ अखबारों में पेड न्यूज शर्मनाक- ठकुरता, पेड न्यूज में राजस्थान पत्रिका का नाम नहीं’। यह समाचार राजस्थान पत्रिका और भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित पंडित झाबरमल्ल शर्मा स्मृति व्याख्यान का कवरेज था।

भास्कर की नीति- ‘इस्तेमाल करो और फेंक दो’

[caption id="attachment_18543" align="alignleft" width="71"]राजेंद्र हाड़ाराजेंद्र हाड़ा[/caption]: भास्कर के लिए पहले गुंडे से लडे़, अब अकेले ही कानून से जूझ रहे हैं : अजमेर। दोस्तो यह कहानी है कृतघ्नता की पराकाष्ठा की। दुनिया का सबसे तेज बढ़ता अखबार दैनिक भास्कर जिन कुछ कारणों से तेजी से बढ़ रहा है, उनमें से एक कारण है ‘इस्तेमाल करो और फेंक दो’ की नीति का पक्षधर होना। क्या आप यकीन मानेंगे कि भास्कर को अजमेर में जमाने के लिए जिन पत्रकारों और कर्मचारियों ने एक कुख्यात गुंडे की बंदूकों, तलवारों, डंडों का सामना किया और मुकदमे-पुलिस के झमेले में उलझे, उसी कारण उपजे एक मुकदमे में पैरवी से भास्कर ने ‘हमारा क्या लेना-देना’ कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया।