श्रीमान जी हम लोग हरियाणा के एक रीजनल चैनल इंडिया न्यूज हरियाणा की दुखी आत्माएं यानी प्रजातंत्र के चौथे खम्भे के पत्रकार हैं. समाज मैं हमारा अच्छा वजूद है. लोगों में अच्छी पकड़ है यानी जहाँ जाओ वाह वाह होती है, पर वास्तव में हमें जहाँ हाथ लगाओ वहीं दर्द है, तो जान लें कि प्रतिष्ठा को बरकरार रखने के लिए चैनल से इसलिए जुड़े थे कि समाज सेवा के साथ घर की सेवा भी हो जाएगी, लेकिन नदी किनारे बैठे हैं कि कभी तो लहर आयगी. पर लगता है कि जब आयेगी तो सुनामी बन आयेगी.
हमारे कई दुःख हैं. सबसे पहला सुबह जब हमारी नींद नहीं खुलती है और हम मीठे-मीठे सपने ले रहे होते हैं तभी हमारे सपने में नहीं हकीकत में एक सड़ी सी कर्कश आवाज वाली मैडम की आवाज सुनाई देती है, जिसे छोटी आतंकी कहा जाये तो गलत नहीं होगा क्यों कि हरियाणे की जाटनी है तो बेअदबी तो खून और विरासत में मिली है. यही कारण है कि उसने कभी हम लोगों से अदब से बोलना तो सीखा नहीं. हमेशा तू तड़ाक. इतना आतंक तो स्कूल के ज़माने में मास्टर जी से नहीं रहा, जितना इस जाटनी से लगता है. खैर, यदि हमारी हैसियत होती तो ऐसी घर की मेहरी भी (कामवाली बाई) न रखते, लेकिन मज़बूरी का नाम महात्मा गाँधी.
फ़ोन उठाते ही कोई दुआ सलाम नहीं बन्दूक से निकली गोली की तरह उसका सवाल होता है कि क्या कर रहे हो? पता नहीं उन्हें समझ नहीं या ज्यादा ही समझ है कि हम बच्चों को जब रात को जो होम वर्क दिया है वहीं तो करेंगे ना, बच्चों की जान लेगी क्या तूं. बागड़ बिल्ली से किसी तरह जान छूटी तो आ जाती है उससे भी बड़ी आतंकी लादेन की अम्मा यानी तथाकथित प्रभारी, जो हम पर है भारी. रोजाना भारी-भारी आदेश बेटे क्या कर रहे हो? रात वाली खबरें बनीं या नहीं? भई कमाल है हमारे पास कोई अलादीन का चिराग है क्या कि अभी दिन नहीं शुरू हुआ और हम बच्चों को जब रात को जो होम वर्क दिया था उसे हमने पूरा कर लिया!
चलो उससे जान बची कि अम्मा काम कर रहे हैं, करने तो दे. दो बजते ही ड्यूटी चेंज. अक्सर हीरो होंडा का रिश्तेदार अपनी नम्बर बनाओ राजनीति करेगा. क्या कर रहे हो? अरे हांडा साहब करने तो दो क्यों हमारी वाट लगा रहे हो? सारा दिन फ़ोन फ़ोन फ़ोन और जवाबदेही. काश बेस फ़ोन का जमाना होता तो लाइनमैन को सौ का पत्ता देकर फ़ोन ही ख़राब करवा देते, पर साला मोबाइल तो ख़राब नहीं होता गुम ही होता है. मामला यहीं ख़तम नहीं होता उसके बाद भी डेस्क हमारी लेनी करके रखता है, खबर भेजो. ये निपटा तो डंडा कभी खास खबर करो, कभी आम खबर, रही सही कसर हल्ला बोल आप की आवाज यानी सारा दिन हमे चैन से नहीं रहने देना और शांति भंग कर रखनी है.
किसी तरह शाम हुई तो फिर कल क्या करोगे का डंडा. कंपनी ने अख़बार शुरू कर दी तो अगले दिन छपने वाली खबरें एडवांस में कर के दो. अरे साले चूतियों अख़बार वाले ने टेबल स्टोरी करी और दाग दी. प्रिंट वाले फुद्दों की हर खबर टीवी में कैसे आ सकती है. न कोई वर्जन दे न कोई बताये, लेकिन तुम्हारा दबाव की बॉस को क्या कहूं. उनका आदेश है. खबर बनाओ जैसे मर्जी. तो ठीक है करो चूतियापा साला दिन तो बीत गया महीने भी बीते जा रहे हैं. सारा दिन गाड़ी का तेल पानी, मोबाइल फ़ोन, इन्टरनेट के खर्चे जेब से कब तक करें. अगर हम टाटा-बिरला-अम्बानी के भाई-भतीजे होते तो तुम्हारी क्यों सुनते? अपना साम्राज्य खड़ा करते.
एक साल होने को आया पर मानदेय का कुछ पता नहीं. मार्केट में हमलोगों के पास सबूत के तौर पर सिर्फ डंडी यानी की माइक आईडी है और कोई अन्य पहचान पत्र नहीं है. मालिको की पूरी कृपा के साथ कोई मानदेय नहीं मिलता, लेकिन हम पर काम का पूरा दबाव रहता है. इतना ही नहीं हर ब्रेकिंग का सबसे पहले विजुवल्स टोटल, एमएच वन, हरियाणा न्यूज़ से भी पहले भेजने का डंडा रहता है, लेकिन तनख्वाह बारे में कोई बात मत करे, का फंडा अपनाया जाता है. हमने सारी रात रामायण सुनाई सुबह पूछते हैं सीता किसका बाप था? चैनल के आकाओं हम कब तक यूं ही रहेंगे. साल बीतने को आया पगार कब मिलेगी? हमारी हालत उन प्रबंधकों जैसे है कि तुम्हारी तनख्वाह पचास हजार है लेकिन मिलेगी कहाँ से उसकी चिंता तुम खुद करो.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.












SANTOSH TIWARI kauriram
August 13, 2011 at 12:52 pm
bura hua
ramu
August 13, 2011 at 1:38 pm
bada dard hai bhai…
KUMAR
August 13, 2011 at 2:49 pm
BHAI JAHRKHAN KA BHI YAHI HAL HAI //// 4000 KAROD KE MALIK HONE KA DAVA KARNE WALI COMPONY NE YANHA JAN SE STRINGERO KO ABHI TAK EK PAISA NAHI DIYA HAI ? PUCHNE POAR KAHA JATA HAI KI DO DINO ME PAYMENT CHALA JAYEGA ……………
mukeshkulshreshtha
August 14, 2011 at 8:57 am
dr. ny kaha hy kaya patrkarita karo kayo jamany ko kharab karty ho socho kuch apanhy liy