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अन्‍ना का एकांत और ब्रेकिंग न्‍यूज

रालेगण लौटते अन्ना हजारे के बारे में पल-पल की खबरें देते टेलीविजन रिपोर्टर क्या उनके एकांत में दाखिल होकर उनकी सबसे बड़ी ताकत, उनकी सहजता पर ही चोट नहीं कर रहे थे? ब्रेकिंग न्यूज – भारतीय खबरिया चैनलों की स्क्रीन पर अब हर दूसरे पल ये दो अक्षर को समेटे एक रंगीन पट्टी उभार लेती है. चैनल की कोशिश रहती है कि ज्यादा से ज्यादा बार वे कैसे इसे अपनी स्क्रीन पर ला सकें. ब्रेकिंग न्यूज का जुमला इतनी बार स्क्रीन पर दस्तक देता है कि एक आम दर्शक के लिए एक सामान्य खबर और बड़ी खबर का अंतर धुंधला पड़ जाता है.

रालेगण लौटते अन्ना हजारे के बारे में पल-पल की खबरें देते टेलीविजन रिपोर्टर क्या उनके एकांत में दाखिल होकर उनकी सबसे बड़ी ताकत, उनकी सहजता पर ही चोट नहीं कर रहे थे? ब्रेकिंग न्यूज – भारतीय खबरिया चैनलों की स्क्रीन पर अब हर दूसरे पल ये दो अक्षर को समेटे एक रंगीन पट्टी उभार लेती है. चैनल की कोशिश रहती है कि ज्यादा से ज्यादा बार वे कैसे इसे अपनी स्क्रीन पर ला सकें. ब्रेकिंग न्यूज का जुमला इतनी बार स्क्रीन पर दस्तक देता है कि एक आम दर्शक के लिए एक सामान्य खबर और बड़ी खबर का अंतर धुंधला पड़ जाता है.

ब्रेकिंग न्यूज- सभी खबरों को ढांपती और उनपर हावी होती एक और सिर्फ़ एक खबर. टेलीविजन की दुनिया में खबरों का एक विशिष्ट व्याकरण है. इसी व्याकरण में ब्रेकिंग न्यूज एक अहम हिस्सा है. दरअसल, खबरों को परदे पर उतारने से पहले ही पूरे सोच-विचार के साथ सिलसिलेवार सजा दिया जाता है. लेकिन अचानक कोई एक खबर इतनी ताकत के साथ दस्तक देती है कि ठीक उसी क्षण उसका दिखाई देना सबसे अहम बन जाता है. यह वो क्षण होता है जब खबरों के पहले से तय सिलसिले को तोड़ कर उस एक खबर की ओर मुड़ना पड़ता है. टेलीविजन की परिभाषाओं में खबरों के पूर्व नियोजित चक्र को तोड़ देने की अहमियत रखनेवाली खबर ही ब्रेकिंग न्यूज है. ठीक यहीं इम्तिहान होता है खबर दिखानेवाले के विवेक का. यहीं उसे तय करना होता है कि वह किस घटना को इतनी अहमियत दे, किसे इस लायक माने कि खबरों के पूर्व-नियोजित चक्र को तोड़ कर दिखाने का फ़ैसला लिया जा सके. एक बार पूर्व-नियोजित चक्र टूटा नहीं कि जिम्मेदारी बन जाती है उस खास खबर को एक तय मुकाम तक लाकर छोड़ने की.

लेकिन जब चैनल हर दूसरे पल समाचारों के पूर्व-नियोजित सिलसिले को तोड़ने की कोशिश करे, तो क्या होगा? क्या होगा जब आप खबरों की बिक्री के बाजार में टिके रहने के लिए समाचार का आकलन उसके अंदरूनी महत्व के आधार पर न करें, बल्कि इस आधार पर करने लगें कि क्या उसे नाटकीय बना कर ब्रेकिंग न्यूज के ढांचे में दिखाया जा सकता है या नहीं. खबर को सबसे पहले और सबसे ज्यादा बेचने की हड़बड़ी में हर खबर को तकनीक के बल पर नाटकीयता के साथ पेश करके ब्रेकिंग न्यूज में तब्दील किया जाता है. यहीं वो बारीक लकीर मिट जाती है, जो किसी व्यक्ित के निजी और सार्वजनिक जीवन को दो हिस्सों में बांटती है. ब्रेकिंग न्यूज दिखाने की हड़बड़ी में समाचार चैनल खबर बनते शख्स की जिंदगी में बहुत दूर तक दाखिल हो जाते हैं. इस हद तक कि जिस शख्स की सबसे बड़ी ताकत उसकी सहजता हो, अपनी हड़बड़ी में वे उसी सहजता पर चोट कर बैठते हैं.

अन्ना हजारे की खबरों से जुड़ी घटनाओं में हम इस सच को बखूबी पढ़ सकते हैं. अन्ना के अनशन के शुरुआती दिन से लेकर सेहत के बारे में जारी हुए ओखरी मेडिकल बुलेटिन तक उनकी सार्वजनिक छवि से जुड़े सरोकार पूरे हो गये थे. हमेशा के लिए न सही, तात्कालिक तौर पर ऐसा कहा जा सकता है. अन्ना की सेहत के बारे में जारी ओखरी बुलेटिन के बाद से उनका निजी जीवन शुरू हो रहा था. वे कहीं जाना चाह रहे थे, किसी से मिलना चाह रहे थे और यह सब उनके निजी जीवन का हिस्सा था. अन्ना का मौन, योग या एकांत किसी चैनल के लिए उस घड़ी तक खबर नहीं हो सकता, जब तक इसका असर राजनीतिक-सामाजिक दायरे में न पड़ता हो. ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी चला कर क्या समाचार चैनल उनके एकांत में दखल नहीं दे रहे थे?

आखिर अन्ना के लिए उनका एकांत ही सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है, जहां भीड़ के बीच भी अकेले वे खुद से संवाद करते दिखायी देते हैं. बुधवार शाम कैमरे सहजता और एकांत से उभरने वाली अन्ना की इसी ताकत पर हमला कर रहे थे. अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद हवाई जहाज में सवार होने और अपने घर रालेगन सिद्धि तक वे उनकी छोटी से छोटी हरकत दर्ज करने में जुटे थे. अन्ना अस्पताल के किस दरवाजे से निकले, अन्ना की फ्लाइट का नाम और नंबर क्या है, अन्ना किस नंबर सीट पर बैठे हैं, हमारा रिपोर्टर उससे कितनी सीट दूर बैठा है, पायलट ने कैसे उनका अभिवादन किया, यात्रियों ने कैसे नारे लगाये, दर्शकों तक ऐसी हर गैरजरूरी सूचना पहुंचाई जा रही थी. कैमरे की पहुंच में न आ पा रही जानकारियां आवाज और शब्दों की शक्ल में स्क्रीन पर परोसी जा रही थी.

और अपने निजी जीवन में बिना किसी अनुमति के दाखिल होते समाचार चैनलों की इस कोशिश पर अन्ना हैरत में थे. पुणे से कारों का कारवां जब रालेगन पहुंचा तो कार के शीशे के पीछे दोनों हाथ जोड़ अभिवादन करते अन्ना के चेहरे पर उनकी स्वाभाविक मुस्कान नहीं थी. पूरी तरह स्वस्थ न होने का असर भी कहा जा सकता है, कुछ थकान भी रही होगी. अपने गांव पहुंचकर अन्ना में फ़िर उसी सहजता को पा लेने की चाह रही होगी. लेकिन टीवी कैमरे अन्ना की इस बैचेनी को नहीं भांप रहे थे. वे अन्ना के एकांत को भेदने में जुटे थे.

लेखक नरेंद्र पाल सिंह पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. उनका यह लेख प्रभात खबर में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

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0 Comments

  1. puran chand

    September 3, 2011 at 3:06 pm

    कुत्तेपन की हद पार कर गए टीवी रिपोर्टर !

    अन्ना सो रहे थे, और किंग फिशर के प्लेन में जिस तरह की कुत्ती हरकत वो टीवी
    रिपोर्टर कर रहा था, सामने होता तो सचमुच उसकी छितर-परेड करता .

    अमेरिका में तो सरऊ को सिक्योरिटी वाले हथकड़ी लगा देते .

    प्लेन में सवार लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहा था, वो हरामजादा !

    इन साले पल-पल की खबरें देने वाले पिल्लों का बस चले तो अन्ना का हगते हुए
    फोटो दिखा दें .

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