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तबादला होने और सेलरी न मिलने से नाराज नवभारत के पत्रकार धरने पर

मध्य प्रदेश के ग्वालियर से प्रकाशित होने वाले नवभारत में घमासान चरम पर पहुंच गया है। इस अखबार की लुटिया डुबोने वाले सुमित माहेश्वरी का नाम पहले ही प्रिंट लाइन से गायब हो गया है। ग्वालियर में काम करने वाले स्टॉफ को 22 माह से वेतन नहीं मिली है और ऊपर से इनके सिर पर तबादले की तलवार लटका दी गई है। ऐसे में परेशान स्टॉफ ने प्रबंधन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए नवभारत के सिटी सेंटर स्थित दफ्तर के बाहर तंबू लगाकर धरना देना शुरू कर दिया है।

मध्य प्रदेश के ग्वालियर से प्रकाशित होने वाले नवभारत में घमासान चरम पर पहुंच गया है। इस अखबार की लुटिया डुबोने वाले सुमित माहेश्वरी का नाम पहले ही प्रिंट लाइन से गायब हो गया है। ग्वालियर में काम करने वाले स्टॉफ को 22 माह से वेतन नहीं मिली है और ऊपर से इनके सिर पर तबादले की तलवार लटका दी गई है। ऐसे में परेशान स्टॉफ ने प्रबंधन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए नवभारत के सिटी सेंटर स्थित दफ्तर के बाहर तंबू लगाकर धरना देना शुरू कर दिया है।

नवभारत ग्वालियर में हड़ताल करने की शुरुआत राकेश पाठक के कार्यकाल में हुई थी। जब मालिकों ने उनको ग्वालियर से मुख्यालय भोपाल बुलाया तो उन्हें लगा कि ग्वालियर में जमी-जमाई उनकी दुकान का क्या होगा। फिर उन्होंने जुलाई 2005 में नवभारत ग्वालियर में अपने चहेते साथियों के साथ मिलकर हड़ताल करवा दी। इसके बाद छह साल में नवभारत ग्वालियर में लगातार गिरता गया। आलम यह है हर रोज देर रात तक इस बात टेंशन नवभारत ग्वालियर प्रबंधन को रहता है कि अखबार छापने के लिए गुल्ला कहां से आएगा और प्लेट कहां से उधार मिल सकती है।

राकेश पाठक के बाद सुरेश सम्राट ने नवभारत ने कमान संभाली तो उन्हें भी इस साल की शुरुआत में उस समय प्रबंधन ने टाटा बोल दिया जब सुरेश सम्राट की टीम ही वेतन न मिलने से बागी हो गई और हड़ताल कर बैठी। इसके बाद से सुरेश सम्राट घर बैठ गए। ताजा हाल यह है कि नवभारत ग्वालियर की कमान श्याम पाठक ने संभाली है। हालांकि उनका नाम संपादक के रूप में नहीं जा रहा है। वे जागरण में रिपोर्टर थे। अब नवभारत के मालिकों यह भरोसा देकर आए हैं कि आप चिंता मत करो। पूरी यूनिट का खर्चा मैं निकालूंगा। आप तो मुझे बस संपादक बना दो। बच्चा पाठक के नाम से मशहूर श्याम पाठक के इस प्रस्ताव को मालिकों ने मानने में कतई देरी नहीं की और नवभारत ग्वालियर की डोर बच्चा पाठक के हाथों में सौंप दी।

बच्चा पाठक ने नवभारत में कदम रखने के साथ ही हंटर घुमाना शुरू कर दिया। वे जागरण की टीम अपने साथ लेकर नवभारत पहुंचे हैं। डीटीपी वाले भी और रिपोर्टर भी। इसलिए उन्होंने सबसे पहला काम वेतन की मांग कर रहे स्टॉफ की छंटनी करने का किया। डीटीपी और रिपोर्टर की छंटनी शुरू कर दी। किसी को जबलपुर भिजवा दिया तो किसी को सतना। बस फिर क्या था। इसके साथ ही बगावत और बुलंद हो गई। नवभारत के स्टॉफ को पिछले 22 माह से वेतन नहीं मिला है। छह माह में दो माह का वेतन मिलता है। कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने अपना करियर नवभारत के फेर में बर्बाद कर दिया। यह लोग जब बच्चा पाठक का निशाना बने तो रविवार की दोपहर तीन बजे नवभारत के गेट पर टेंट-तंबू लगाकर धरने पर बैठ गए। इनकी एक ही मांग है, हम गेट पर से तभी उठेंगे, जब हमारे एक-एक पैसे का हिसाब हो जाएगा।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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0 Comments

  1. dkjain

    September 5, 2011 at 4:55 pm

    navbharat ke malikan to barsho se yahi kar rahe hai.jisane bhi inka saath diya, ushi ko kam nikalane ka bad bahar ka rasata dikha diya jata hai.meri bhi ek sal ki selari or othrs paise abhi tak nahi de paye hain. shyampathak ke sath bhi yahi hal hoga.pathak bhi yah jante hai, pahale inke sath yah ho chuka hai. shayad ye bhool gaye hain.

  2. bijay singh

    September 6, 2011 at 5:22 pm

    navabharat me badi tabdili chahiye.aaj ke mahaoul; ko samajhne aur managemnet ko sambhalne wala vyakti chahiye jise patrakarita ki puri samajh ho,par wahn to ashutosh srivastav jaise log mathadhish baner hue hain,bantadhar to hoga hi..

  3. prakashkumar

    September 11, 2011 at 1:57 pm

    sharmaji aapko bdhai ummid hai ki aap navbharat ko or uchi per lejaage saath hi yah bhi chahta hoon ki navbharat indore ke jo patrakaro ka imandari ka rupya menegnent ne dkar rakha hai aap use bhi dene keliye menejment ko khange navbharat indore me menejment ne logo ki 34& 34 mahine kee selere nahi di hai jike karan logo ki halat kharab hai
    please sharma ji aao menejmenent ko bol ker logo kee salery dilwa de

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