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दुख-दर्द

उड़ने से पहले कटे पंख : नौ वर्ष बाद भी पहेली है प्रेस छायाकार सीमा की आत्‍महत्‍या

मुंगेर। भड़ास4मीडिया डाट काम के आगमन के पूर्व तक देश में अखबारों से जुड़ी कई सनसनीखेज और लोमहर्षक घटनाएं घटती रहीं और घटनाएं समय के अन्तराल में बिना हलचल पैदा किए दफन हो गईं। परन्तु कुछ घटनाएं कई ऐसे प्रश्न छोड़ गईं जिसका उत्तर समय मांग रहा है। ऐसी ही सनसनीखेज और दुखःद घटना दैनिक हिन्दुस्तान के मुंगेर कार्यालय से जुड़ी है।

मुंगेर। भड़ास4मीडिया डाट काम के आगमन के पूर्व तक देश में अखबारों से जुड़ी कई सनसनीखेज और लोमहर्षक घटनाएं घटती रहीं और घटनाएं समय के अन्तराल में बिना हलचल पैदा किए दफन हो गईं। परन्तु कुछ घटनाएं कई ऐसे प्रश्न छोड़ गईं जिसका उत्तर समय मांग रहा है। ऐसी ही सनसनीखेज और दुखःद घटना दैनिक हिन्दुस्तान के मुंगेर कार्यालय से जुड़ी है।

वर्ष 2002 में 17 दिसंबर की शाम मुंगेर कोतवाली थानान्तर्गत मंगल बाजार मोहल्ले में मां दुर्गा मंदिर के नजदीक अपने घर में हिन्दुस्तान की ‘प्रेस छायाकार‘ सुश्री सीमा कुमारी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। वह स्नातक के प्रथम वर्ष की छात्रा थी। भागलपुर संस्करण के स्थानीय संपादक महेश खरे ने विधिवत साक्षात्कार के उपरांत उसे मुंगेर कार्यालय में छायाकार के रूप में काम करने की मौखिक स्वीकृति दी थी। वह मुंगेर मुख्यालय और आसपास की प्रमुख घटनाओं की तस्वीर खींचती और कैमरा लेकर भागलपुर ट्रेन से जाती और निगेटिव से पॉजिटिव बनवाकर रंगीन फोटो हिन्दुस्तान प्रेस में पहुंचा देती थी, जहां स्कैनिंग कर मुंगेर संस्करण के लिए वह फोटो छपता था।

ट्रेन से अकेले जाना और अकेले रात में लौटना उसकी दिनचर्या बन गयी थी। शासन राष्‍ट्रीय जनता दल का था। उस समय की कानून व्यवस्था में 60 किलोमीटर की ट्रेन यात्रा कितना जोखिम भरा था, कोई सहज ही अंदाज कर सकता है, परन्तु वह अकेले यात्रा करती थी। पत्रकारिता उसकी हावी बन चुकी थी। दैनिक ‘हिन्दुस्तान‘ के भागलपुर संस्करण में उसके फोटो उसके नाम से छपने लगे। संपादक महेश खरे और संपादकीय वरिष्ठ सदस्य हरीश पाठक के स्नेह से सीमा की कीर्त्ति जिले की सीमा को पार कर गई। जितनी उसकी लोकप्रियता बढ़ती गई, उसके ईष्यालु दुश्मनों की संख्या भी लगातार बढ़ती चली गईं।

पंख को काट दिया गया : अचानक वर्ष 2002 के अगस्त माह में हिन्दुस्तान प्रबंधन की प्रमुख शोभना भरतीया (नई दिल्ली) के आदेश से बिहार के उपाध्यक्ष योगेश चन्द्र अग्रवाल ने सीमा को काम से हटा दिया। स्थानीय संपादक महेश खरे मूक दर्शक बने रहे। पत्रकारिता के क्षेत्र में उंचाइयां छूने को निकली एक अति पिछड़ी जाति कुर्मी की लड़की के मानो पंख को काट दिया गया। वह उदास और निराश रहने लगी। वह अपने सगे-संबंधियों से कहती रहती थी- ‘अब हम कभी पत्रकारिता में नहीं लौट सकेंगे।’ इसी उदासी और निराशा में सीमा ने 17 दिसंबर को फांसी लगाकर आत्म हत्या कर ली। पिछड़ा राज्य बिहार में जब मुफस्सिल क्षेत्रों में बन्दूकें गरजती थीं, पत्रकारिता जगत में मुफस्सिल क्षेत्र में कदम रखने वाली इस लड़की का अकाल अंत हो गया। उसकी मौत पहेली बन गई। ऐसी पहेली जो नौ वर्षों के बाद भी पहेली रह गई। मीडिया की घटना की जांच करने का साहस विरले को ही है।

निर्लज्जता की हद पार की दी हिन्दुस्तान ने : हिन्दुस्तान की प्रेस छायाकार सीमा कुमारी की मौत की खबर को दैनिक हिन्दुस्तान ने घटना की शाम अर्थात 17 दिसंबर, 2002 से अब तक एक पंक्ति में भी नहीं छापा। हिन्दुस्तान निर्लज्जता की हद पार कर दी। अन्य अखबारों दैनिक जागरण, आज और अन्य अखबारों ने भी इस मौत की खबर को तोड़-मरोड़ कर प्रकाशित किया। घटना कुछ ऐसी थी-‘एक मां की बेटी ने जान दे दी और मां कहने को तैयार नहीं थीं कि मृतका उसकी बेटी थी।’ उस तड़पती आत्मा पर कैसा बीता होगा, कोई अंदाज लगा सकता है। दैनिक हिन्दुस्तान में काम करनेवाले लोगों को इस घटना को स्मरण रखना होगा। धन्य है आजाद भारत का अखबार और उसका प्रबंधन।

तीन माह तक चला था आंदोलन : जिला विकास संघर्ष समिति के दर्जन कार्यकर्ताओं ने संयोजक नरेन्द्र कुमार कुशवाहा के नेतृत्व में मुंगेर मुख्यालय में तीन महानों तक धरना दिया था और सीमा आत्महत्या कांड की जांच सीबीआई से करानेकी मांग की थी, परन्तु तात्कालीन राजद सरकार ने मामले में कोई दिलचस्पी नहीं ली क्योंकि जांच देश के शक्तिशाली मीडिया हाउस मेसर्स हिन्दुस्तान टाइम्स लिमिटेड से जुड़ा था।

तत्कालीन पुलिस ने अखबार के दवाब में सीमा कुमारी की आत्महत्या के बाद दोषी के खिलाफ सबूत इकट्ठा करने के बदले उसके पिता सुरेश कुमार, जो बिहार राज्य विद्युत बोर्ड में कर्मचारी हैं, को अनेकों तरीकों से प्रताड़ित करने का काम किया। पुलिस प्रताड़ना ने सीमा कुमारी के पिता को आगे की कानूनी कार्रवाई करने से रोक दिया।

नीतीश कुमार भी मर्माहत थे : उस समय नीतीश कुमार भारत सरकर में केन्द्रीय रेल मंत्री थे। उनके नई दिल्ली स्थित आवास पर मुंगेर जिला संघर्ष समिति के संयोजक नरेन्द्र कुमार कुशवाहा ने जब प्रेस छायाकार सीमा कुमारी की आत्महत्या की खबर उन्हें दी, नीतीश कुमार भी मर्माहत हुए थे।

वह रहस्यमय पत्र : एक पत्र जिस पर मुंगेर हिन्दुस्तान कार्यालय के चार संवाददाताओं, एक छायाकार, एक कम्प्यूटर आपरेटर के हस्ताक्षर थे, सीमा की मौत का कारण बना। वह पत्र प्रबंधन और संपादकीय विभाग के वरीय पदाधिकारियों ने तैयार कराया था और सभी से हस्ताक्षर लेकर उपाध्यक्ष योगेश चन्द्र अग्रवाल से पुष्ट कराकर नई दिल्ली मुख्यालय भेज दिया था। यह पत्र सीमा आत्महत्या कांड का सूत्र है। यह पत्र अभी भी प्रबंधन के कब्जे में है। यदि जांच एजेंसी उस पत्र को कब्जे में लेकर पूछताछ शुरू करती है, तो यह उजागर हो जायेगा कि दैनिक हिन्दुस्तान में एक लड़की को कितना जलील कर निकाला गया और वह लड़की चार माह बाद आत्महत्या कर ली।

स्मारक बनानेकी मांग : मुंगेर के बुद्धिजीवियों ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इंसानी शैतानों से लड़ते-लड़ते शहीद होनेवाली बिहार की लड़की सीमा कुमारी की याद में पटना  में स्मारक बनानेकी मांग की है।

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट.

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