विवाद पैदा करना और उन विवादों को हवा देना प्रसिद्ध आलोचक और प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष नामवर सिंह की पुरानी आदत है। लखनऊ में आयोजित प्रगतिशील आंदोलन की 75वीं सालगिरह के मौके पर भी उन्होंने यही किया। देश के विभिन्न हिस्सों से आये लेखकों को सुनना उन्हें मंजूर नहीं था।
वे या तो उद्घाटन के समय अवतरित हुए या फिर समापन पर और जब सामने आये तो कुछ उपदेश दिया या कुछ चिकोटी काटने वाले अन्दाज में खरी-खोटी सुनाई। जन संस्कृति मंच, राही मासूम रज़ा एकेडमी तथा अलग दुनिया ने इनके द्वारा प्रगतिशील लेखक संघ के हीरक जयन्ती समारोह में कही बातों पर कड़ी आपति जताई है तथा कहा है कि दलित व स्त्री लेखन तथा आरक्षण के सम्बन्ध में उनके विचार दलित व स्त्री विरोधी हैं।
जसम के संयोजक कौशल किशोर, राही मासूम रज़ा एकेडमी के महामंत्री रामकिशोर, अलग दुनिया के केके वत्स, नाटककार राजेश कुमार, कवि भगवान स्वरूप कटियार ने अपने संयुक्त बयान में कहा है कि प्रगतिशील आंदोलन हमेशा से महिलाओं, दलितों, समाज के कमजोर वर्गों के लिए संघर्ष करके तथा उन्हें नायकत्व प्रदान करके ही आगे बढ़ा है। प्रगतिशील साहित्य हाशिए पर खड़े शोषितों, उत्पीड़ितों की पीड़ा, संघर्ष और उनकी मुक्ति की प्रबल आकांक्षा का साहित्य है। ऐसे में नामवर जी द्वारा प्रलेस की हीरक जयन्ती के अवसर पर व्यक्त विचार प्रगतिशील आंदोलन को न सिर्फ कमजोर करेगा बल्कि उसकी विश्वसनीयता के लिए भी संकट पैदा करेगा। नामवर जी के इस तरह के विचारों से अन्ततः ब्राहमणवादी पितृसत्ताक सोच को ही बढ़ावा मिलेगा।
बयान में आगे कहा गया है कि नामवार जी का यह कथन कि मौजूदा दलित व स्त्री लेखन जिस ‘भोगे हुए यथार्थ’ को मान्यता देता है, यदि उसे मान लिया जाय तो सारा प्रगतिशील लेखन खारिज हो जाता है। नामवर जी की यह टिप्पणी दलित व स्त्री लेखन का सरलीकरण है। दलित आंदोलन और स्त्री आंदोलन हमारे देश की जटिल सामाजिक संरचना व यथार्थ की देन है। प्रगतिशील आंदोलन का यह कार्यभार है कि वह समाज के जनतांत्रिकरण की प्रक्रिया में इस आंदोलन के साथ संवाद स्थापित करे तथा इनके साथ एकताबद्ध हो।
बयान में यह भी कहा गया है कि नामवर जी का यह कथन कि भारत को चीन ने तीन तरफ से घेर रखा है तथा इससे भारत के लिए खतरा बढ़ गया है, यह नामवर जी का अंधराष्ट्रवाद है। सच्चाई तो यह है कि भारत के लिए वास्तविक़ खतरा देश के अमेरीकीकरण से है तथा देश के शासकों द्वारा अपनाई जा रही अमरीकापरस्त व अमीरपरस्त नीतियों से है, जिससे न सिर्फ भारत की साम्राज्यवादियों पर निर्भरता बढ़ी है बल्कि इसने देश की आजादी व संप्रभुता के लिए भी गंभीर संकट पैदा किया है। क्या इस सच्चाई को नकारा जा सकता है कि हमारे देश का शासक वर्ग अमेरीकी शह पर इस महाद्वीप में क्षेत्रीय महाशक्ति की महत्वकांक्षा पाले हुए है।
समारोह में आये कई लेखकों ने भी नामवर जी के दलित व स्त्री विरोधी विचारों की आलोचना की थी। जसम के संयोजक कौशल किशोर ने इसका स्वागत किया है कहा है कि नामवर जी के विचार एक प्रवृति है जो बहुत से प्रगतिशील लेखकों में मिलते है। इनके विरुद्ध संघर्ष चलाकर ही प्रगतिशील व जनवादी सांस्कृतिक आंदोलन को आगे बढ़ाया सकता है। प्रेस रिलीज












कुमार सौवीर, लखनऊ
October 13, 2011 at 8:38 am
कृपया ध्यान दें, जन संस्कृति मंच भी और प्रगतिशील लेखक संघ भी।
जब आप लोगों का यह झगड़ा यानी कुकुर-झौंझौं खत्म हो जाए, तो बताइयेगा जरूर। जाहिर है कि उसके बाद ही आप लोग कुछ लिख पायेंगे, और मैं तथा आम पाठक, आप लोगों के विचारों को सकारात्मक शब्दों में पढ़ना चाहता है।
लेकिन मुझमें प्रतीक्षा का माद्दा भी है और सहनशक्ति भी।
आपके बीच के झगड़े के दौरान बीच में किये गये इस हस्तक्षेप के लिए क्षमा चाहता हूं। कृपया अन्यथा न लें।
धन्यवाद।
prashant
October 14, 2011 at 5:37 pm
चीन से खतरा नहीं, अमेरिका से खतरा! बहुत खूब! बासठ का युद्ध अमेरिका से हुआ होगा, इतिहास में चीजों को दुरुस्त कराइये.