उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं टीम अन्ना के महत्वपूर्ण सदस्य श्री प्रशांत भूषण पर हुए असभ्य शारीरिक हमले की मैं कठोर शब्दों में निंदा करता हूँ. भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में वैचारिक असहमति प्रकट करने के अनेक समाज-स्वीकृत एवं संविधान प्रदत्त उपकरण उपलब्ध हैं. मैं विचार की विभिन्नता और उसे उचित स्थान दिए जाने का सदैव पक्षधर रहा हूँ.
किन्तु कल प्रशांत भूषण जी द्वारा व्यक्त उनके एक निजी विचार के विरोध में कुछ युवको ने जो हिंसक कार्रवाही की, वह सांस्कृतिक, सामाजिक और संवैधानिक, तीनो रूप से अमान्य हैं. प्रत्येक व्यक्ति को अपनी निजता के दायरे में यह अधिकार है की वह आप से सहमत हो या असहमत हो. किन्तु अपनी असहमति के चलते वह हिंसा का सहारा ले, यह किसी भी प्रकार से स्वीकृत नहीं है.
अन्ना के अनशन के दौरान संपूर्ण भारत और भारत की सीमाओं से बाहर एक विराट जन-शक्ति ने जिस शालीनता के साथ अहिंसक आन्दोलन को प्रासंगिक बनाया है, वह पूरी दुनिया में अपने आप में एक अलग उदाहरण है. ऐसे हिंसक युवको को इस आन्दोलन से सीख लेनी चाहिए. संविधान के द्वारा दिए गए विचार की स्वतंत्रता के अपने मौलिक अधिकार का उपयोग करते हुए मैं यहाँ अपना यह निजी विचार व्यक्त करना आवश्यक समझता हूँ कि कश्मीर भारत का अक्षुन्न, अविछिन्न, अविभाज्य तथा आवश्यक अंग है. कश्मीर समस्या हमारे कुछेक राजनीतिक दलों के राजनैतिक नेताओं कि स्वार्थी राजनीति तथा भ्रामक दुष्प्रचार के साथ-साथ नीतिगत दुष्प्रवृत्तियों का घातक प्रतिफल है.
श्री प्रशान्त भूषण द्वारा कश्मीर समस्या का समाधान जनमत संग्रह द्वारा कराये जाने के विचार को मैं अव्यावहारिक, अवैधानिक, अनावश्यक तथा अनुचित समझता हूँ. कई लाख नागरिकों को बलपूर्वक तथा असह्य आतंक के साए में देश के अन्दर ही शरणार्थी बनाने को बाध्य करने, सहस्त्रो निर्दोषों की जघन्य हत्या करने तथा समस्त राज्य की शान्ति व्यवस्था नष्ट किये जाने के उपरांत जनमत संग्रह का विचार अतार्किक व पूर्णतः अव्यावहारिक है. अतः मेरे विचार में कश्मीर समस्या का हल ढूँढने के लिए समस्त राजनैतिक दलों, बुद्धिजीवियों , सभ्य समाज की संस्थाओ, संचार माध्यमो, तथा सामाजिक प्रशासनिक माध्यमो को समवेत विमर्श एवं प्रयास करने होंगे.
डा. कुमार विश्वास
3/1084, वसुंधरा, गाज़ियाबाद
09868220488












सत्यप्रकाश "आजाद"
October 13, 2011 at 1:30 pm
राष्ट्रवादी सोच..आपको सलाम..जय हिंद
Anil Pande
October 13, 2011 at 2:44 pm
डा. कुमार विश्वास,
किसी ने बताया कि आप छात्रों को हिंदी पढ़ाते हैं.
खुद क्या कोदो देकर पढाई की है ?
दूसरे पैरे में आपने ” हिंसक कार्रवाही” लिखा.
सही क्या है?
“कार्रवाही” या “कार्रवाई ” ?
यह “अक्षुन्न” क्या है ?
तीसरे पैरे की छठी लाइन में आपने लिखा, ….”निजता के दायरे में यह अधिकार है ” की” वह आप से सहमत हो या असहमत हो.
यहाँ ” कि” होगा , या “की” ?
अरे भाई भेष, और भाषा तो सुधार लो .
अब पब्लिक फिगर बन चुके हो .
क्या गली के लौंडों की तरह गले में ताबीज, गर्दन में दुपट्टा, और झंड फार्मेसी वाले झकाझक ” देहाती डिजाइनर” कुरते में आत्ममुग्ध होकर चहकते रहते हो .
थोड़ी संजीदगी दिखाओ, और थोड़ी पढाई करो.
टीवी से लेकर मंच तक बड़ा मानसिक टार्चर करते हो !
SACHIN DEV
October 13, 2011 at 5:58 pm
BAHUT ACCHI BAAT KHI AAPNE, AB YE ANNA KO BHI KAHNA CHAHIYE
sunil dwivedi
October 14, 2011 at 12:36 am
kumar ji..namstey… apkey vichar achey hai..salam….eskey alawa hindi bhale hi apkee na sudhrey…lakin hindustan sudharney me aap annaa k sath lage rahe…ye jayda jaruri hai.
prashant
October 14, 2011 at 5:27 pm
भैया, अनिल जी, क्यों डाक्टर साहब के पीछे पड़ गये हैं. अब आप यह भी कह सकते हैं कि कई जगह बिन्दी भी नहीं लगाई है, जैसे संस्थाओं, माध्यमों में. चलने दीजिये, बात तो सही कह रहे हैं कुमार साहब.