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हिंदी विश्वविद्यालय : तीन कुलपति और तेरह झगड़े-घपले

यह दास्तां देश के एक ऐसे अजीबो-गरीब विश्वविद्यालय की है, जिसके अब तक तीन कुलपति हुए हैं. लेकिन विडंबना है कि तीनों ही एक-दूसरे पर संस्थान को बीमार बनाने का आरोप लगा रहे हैं. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पहले कुलपति और मूर्धन्य साहित्यकार अशोक वाजपेयी आरोप लगाते हैं, ”मेरे वक्त शुरू हुए काम को आगे बढ़ाने के बजाए दूसरे कुलपति जी. गोपीनाथन ने बंद करने में अपना समय लगाया.”

यह दास्तां देश के एक ऐसे अजीबो-गरीब विश्वविद्यालय की है, जिसके अब तक तीन कुलपति हुए हैं. लेकिन विडंबना है कि तीनों ही एक-दूसरे पर संस्थान को बीमार बनाने का आरोप लगा रहे हैं. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पहले कुलपति और मूर्धन्य साहित्यकार अशोक वाजपेयी आरोप लगाते हैं, ”मेरे वक्त शुरू हुए काम को आगे बढ़ाने के बजाए दूसरे कुलपति जी. गोपीनाथन ने बंद करने में अपना समय लगाया.”

लेकिन पेशे से आईपीएस और शौक से साहित्यकार मौजूदा कुलपति विभूति नारायण राय विवि के पिछड़ने का ठीकरा वाजपेयी के ही सिर फोड़ते हैं. वे कहते हैं, ”वाजपेयी ने जमीन अधिग्रहण में ही पांच साल गंवा दिए और उनके वक्त शैक्षणिक स्टॉफ तक की नियुक्ति नहीं हो सकी क्योंकि वे कभी वर्धा जाते ही नहीं थे. जिससे हम पिछड़ गए.” खुद राय यहां तक कहने लगे हैं, ”साहित्य जगत में यह बहस हो कि क्यों न इस विवि को बंद कर दिया जाए.”

महात्मा गांधी के सपनों को साकार करने को बना देश का एकमात्र हिंदी विवि अपने कुलपतियों की मनमानी की वजह से ही आज बदहाल है. वाजपेयी ने दिल्ली में रहकर संस्थान चलाने की कोशिश की, तो गोपीनाथन वर्धा जाकर भी संस्थान को विवादों में उलझा आए. अब तीसरे कुलपति राय के वक्त तो काल्पनिक पदों पर निश्चित वेतन के साथ नियुक्तियों की भरमार  हो गई है.

वाजपेयी शैक्षणिक नियुक्तियां नहीं कर पाए, तो गोपीनाथन ने 11 अवैध नियुक्तियां कीं, राय ने भी सात अवैध नियुक्तियां की हैं. जिसकी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और मंत्रालय भी पुष्टि करता है. कहा जाता है कि आज भी अगर कोई राय की खास पसंद हैं, तो यूजीसी की मंजूरी के बिना उसे मनमाफिक वेतन और पद मिल जाता है.

विवि के 14 साल के इतिहास में इमारतें और छात्रावास बने हैं, लेकिन साल भर के भीतर ही कई नई इमारतें खस्ताहाल हो गईं. राय ने निर्माण के ठेके खास तौर से यूपी समाज कल्याण निर्माण निगम को दिए, जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार के मुकदमे अदालतों में लंबित हैं. हालांकि यूपी कैडर के आइपीएस राय गृह प्रदेश पर मेहरबानी के आरोप से इनकार करते हैं, लेकिन गुणवत्ता की कमी पर लाचारी दिखाते हैं, ”हम बड़े अधिकारियों को लगातार चिट्ठी लिखते हैं.”

इस अंतरराष्ट्रीय विवि में हिंदी पट्टी की राजनीति घुस चुकी है और छात्रों को अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की इजाजत नहीं है. छात्रों के बीच राय कोतवाल कहकर पुकारे जाते हैं. हाल ही में निष्कासित एक छात्र उत्पल कांत अनीस कहते हैं, ”राय विवि को ठकुराई वाले के अंदाज में चलाते हैं, जहां झुकने वालों को  रोटी मिलती है और अड़ने वालों का सिर कलम कर दिया जाता है.”

गांधी की कर्मस्थली वर्धा में 1997 में  स्थापित यह संस्थान वित्तीय अनियमितता, भाई-भतीजावाद, यौन उत्पीड़न और जातिवाद की वजह से विवादों का केंद्र बन गया है. अब तक इस पर तकरीबन 200 करोड़ रु. खर्च हो चुके हैं. नौवीं पंचवर्षीय योजना में विवि को योजनागत खर्र्च के लिए आवंटित 18 करोड़ रु. में से वाजपेयी ने सिर्फ छह करोड़ 40 लाख रु. ही खर्च किए.

दसवीं योजना में आवंटित 41 करोड़, 91 लाख रु. में से गोपीनाथन ने 34 करोड़, 63 लाख रु. खर्च किए. फिर 11वीं योजना में 66 करोड़ रु. का आवंटन हुआ और राय दावा करते हैं, ”हमने सारे पैसे खर्च कर दिए हैं और यूजीसी से 20 करोड़ रु. का अतिरिक्त आवंटन कराया है.” इसके अलावा गैर-योजनागत खर्च के लिए अलग से आवंटन होता है. लेकिन इतने खर्च के बावजूद  इस विवि का हाल बेहाल है.

जबकि हिंदी के साथ ही उर्दू के लिए हैदराबाद में बना मौलाना आजाद राष्ट्रीय विवि विकास के मामले में इस  विवि को एक दशक पीछे छोड़ता दिख रहा है. लेकिन राय की झुंझ्लाहट इस तुलना पर बढ़ जाती है और वे कहते हैं, ”उर्दू तो हिंदी से छोटी भाषा है, लेकिन उसका बजट ज्यादा क्यों है. विश्व हिंदी सम्मेलन विदेश मंत्रालय क्यों कराता है, जिसे हिंदी की समझ नहीं है.”

कुलपति राय को उर्दू के ज्यादा बजट पर एतराज है, वे हिंदी सम्मेलन का आयोजन अपने हाथ में चाहते हैं और महिला लेखिकाओं को चरित्र प्रमाण पत्र देने में खास रुचि दिखाते हैं. पिछले दिनों उन्हें महिला लेखिकाओं के खिलाफ अपनी एक अभद्र टिप्पणी के लिए माफी मांगकर अपनी कुर्सी बचानी पड़ी थी. लेकिन विवि की गलतियों को सुधारने में उनकी कोई रुचि नहीं दिखती. इंडिया टुडे से बातचीत में वे कहते हैं,  ”मैं मनुष्य हूं और मुझ्से भी कई गलतियां हुई हैं, जिनको लेकर विवाद है. छिनाल प्रकरण मेरी मूर्खता थी.” लेकिन अगले ही पल वे चुनौती देते हैं, ”अगर मेरी ओर से किए गए काम अवैध हैं, तो लोग कोर्ट जाएं.”

ऐसी ही मनमर्जी मनमानियों की वजह से ही 14 साल के सफर में इस विवि के पास उपलब्धियों के नाम पर खस्ताहाल नई इमारतों के सिवा कुछ नहीं है, लेकिन विवादों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि उपन्यासों की एक श्रृंखला तैयार हो जाए. इससे विवि को आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तो दूर, देश के साहित्य जगत में भी मुकम्मल जगह नहीं मिल पाई है. वाजपेयी कहते हैं, ”यह अंतरराष्ट्रीय विवि आज सही मायने में आंचलिक बनकर रह गया है.” लेकिन राय कहते हैं, ”वाजपेयी ने इसे मैकमिलन हाउस बनाने की कोशिश की, तो गोपीनाथन ने अकादमिक गतिविधियों का केंद्र. इसलिए यह रूटीन विश्वविद्यालय बन गया है.”

हाल ही में  रिपब्लिकन पार्टी ऑफ  इंडिया के विदर्र्भ सचिव अशोक मेश्राम ने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मानव संसाधन विकास मंत्री, यूजीसी और प्रमुख राजनैतिक दलों के नेताओं को चिट्ठी लिखी है, जिसमें राय पर अवैध नियुक्ति करने, घोटाले, अवैध डिग्री आवंटन और अपने पसंदीदा लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए नामांकन के नियम बदलने के आरोप हैं.

इस शिकायत के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रपति सचिवालय ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय से स्पष्टीकरण मांगा है और मंत्रालय ने 12 अगस्त के पत्र के जरिए विवि से जवाब तलब किया है. मेश्राम की शिकायत के मद्देनजर एक पूर्व छात्र संजीव चंदन ने 4 अक्तूबर को सूचना के हक के तहत पीएमओ और मंत्रालय से कार्रवाई का पूरा ब्यौरा मांगा है. लेकिन इसके बावजूद राय के हौसले पस्त होते नहीं दिख रहे और हाल ही में उन्होंने कई गैर स्वीकृत पद सृजित कर अपनी पसंद के लोगों को नियुक्त किया है.

विवि की दुर्दशा और कुलपतियों की निरंकुशता की जानकारी के बावजूद मंत्रालय और यूजीसी कुंभकर्णी नींद सो रहे हैं. सूचना के अधिकार के तहत हासिल दस्तावेजों में यूजीसी और मंत्रालय भी 18 नियुक्तियों को अवैध मानते हैं. लेकिन इन्हें अभी तक यह दलील देते हुए मंत्रालय ने रद्द नहीं कराया है कि इससे मुकदमेबाजी बढेगी. अब राय कहते हैं, ”अगर मंत्रालय आदेश दे तो मैं ये नियुक्तियां रद्द कर दूंगा.” अधिकांश नियुक्तियों को या तो कार्य परिषद की मंजूरी नहीं मिली है, तो कुछ में विजिटर नॉमिनी ने असहमति नोट लगा रखा है. कुछ नियुक्तियों में तो न्यूनतम योग्यता को भी दरकिनार कर दिया गया है.

हालांकि राय किसी भी नियुक्ति को अवैध नहीं मानते. उधर इन मामलों पर मंत्रालय को कोई अधिकारी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है. उनकी दलील है कि मंत्रालय का काम सिर्फ फंड मुहैया कराना है, निगरानी का काम यूजीसी का है. लेकिन यूजीसी में संबंधित अधिकारी संयुक्त सचिव के.पी. सिंह से संपर्क साधा गया, तो उन्होंने आयोग के सचिव से संपर्क करने को कह दिया. लेकिन सचिव डॉ. एन.ए. का.जमी भी अपनी जिम्मेदारी से भागती दिखीं और उन्होंने अनियमितताओं पर कार्रवाई तो दूर, बात करने से भी साफ मना कर दिया.

लैप्सड पदों पर नियुक्ति के लिए यूजीसी की अनुमति के बिना राय ने कई पद भरे हैं और कुछ नई िनयुक्तियों का विज्ञापन भी दिया है. वे कहते हैं, ”अगर किसी पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो चुकी हो, तो वह लैप्सड नहीं होता.” कुछ आरक्षित श्रेणी के पद सामान्य कोटे से भी भरे गए हैं. राय पर भाई-भतीजावाद का भी आरोप है.

विवि में प्रोफेसर अनिल अंकित राय, जो कुलपति के रिश्तेदार माने जाते हैं, पर नकल कर चोरी की किताब लिखने का आरोप है. लेकिन राय कहते हैं, ”हमने जांच बिठाई थी, लेकिन मंत्रालय ने हमें लिखा कि  जिसके कॉपीराइट का उल्लंघन हुआ है, वह कोर्ट जाए. उसके बाद मैंने जांच बंद कर दी.” उधर विवि के दलित एवं आदिवासी अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. एल. कारुण्यकारा राय पर जातिवाद का आरोप लगाते हुए कहते हैं, ”राय एक सेक्युलर, जातिवादी और दलित, महिला, पिछड़ा, अल्पसंख्यक विरोधी व्यक्ति हैं.” उनके खिलाफ वे अनुसूचित जाति आयोग में भी शिकायत दर्र्ज करा चुके हैं.

राय कहते हैं, ”अब विवि आकार लेता दिख रहा है.” लेकिन वाजपेयी कहते हैं, ”विवि अपने मकसद में सफल नहीं हो पाया. वहां ऐसा कोई नहीं, जिसका नाम लेने पर बड़ी हस्ती होने का एहसास हो और हिंदी की प्रतिष्ठा, बौद्धिक संपदा, अकादमिक जीवन में कोई बढ़ोतरी हुई हो.”

इस संस्थान की अनियमितताओं पर सरकार-यूजीसी की खामोशी और भूल-सुधार की बजाए कुलपति की लोगों को कोर्ट जाने की चुनौती देना विवि को अंतरराष्ट्रीय पहचान नहीं दिला सकता. जरूरत है कि व्यापक जांच कर गलतियों को सुधारा जाए, ताकि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी भाषा को सम्मिलित कराने और राष्ट्रभाषा के बारे में गांधी के सपनों को साकार किया जा सके.

विवादों का विश्वविद्यालय

सरकारी दस्तावेज में 18 नियुक्तियां अवैध, कार्रवाई नही.

पीएमओ, मंत्रालय, यूजीसी की जानकारी में गड़बड़ियां.

14 साल में करीबन 200 करोड़ रु. खर्च हो चुके.

अपनों को उपकृत करने में अवैध नियुक्तियों की भरमार.

तीन साल से कोई पूर्ण कार्यपरिषद नहीं.

तीनों कुलपति एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ रहे.

नई इमारतें भी खस्ता हालत में.

दलित प्रोफेसर को बिना जांच के नोटिस.

संतोष कुमार की यह स्‍टोरी इंडिया टुड़े,‍ हिंदी में छप चुकी है. इसे वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

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0 Comments

  1. prashant

    October 17, 2011 at 4:10 pm

    अपनी स्टोरी भी छापो, बार बार यहां वहां से लेना ठीक नहीं.

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