इंडिया टुडे के सीनियर एडिटर श्‍यामलाल यादव को लेकर चर्चाएं

इंडिया टुडे के सीनियर एडिटर श्‍यामलाल यादव को लेकर दिल्‍ली की मीडिया में कई तरह की चर्चाएं और अफवाहें फैली हुई हैं. कहा जा रहा है कि श्‍यामलाल इंडिया टुडे से रिजाइन देकर ज्‍यादा बड़े पद और पैकेज पर इंडियन एक्‍सप्रेस ज्‍वाइन करने जा रहा है. जितने मुंह उतनी बातें कही जा रही हैं. कोई कह रहा है कि इंडिया टुडे के बदले माहौल में वे अपने को असहज पा रहे थे. किसी का कहना है कि वे कुछ बदलाव चाहते थे इसलिए इंडिया टुडे छोड़ने जा रहे हैं.

इस संदर्भ में जब भड़ास4मीडिया ने श्‍यामलाल यादव से संपर्क किया तो उन्‍होंने इन सूचनाओं को महज कोरा अफवाह करार देते हुए कहा कि वे कहीं नहीं जा रहे हैं. वे इंडिया टुडे के साथ ही हैं. मुझे भी इन अफवाहों और चर्चाओं ने हतप्रभ किया है. गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही श्‍यामलाल यादव कीव में हुए खोजी पत्रकारिता सम्‍मेलन से वापस लौटे हैं. उल्‍लेखनीय है कि नई मैनेजमेंट के आने के बाद से कई पुराने साथी इंडिया टुडे ग्रुप छोड़ चुके हैं.

इंडिया टुडे से विदा हो गए ए‍सोसिएट एडिटर ओम सर्राफ

: आबिद मंसूरी ने प्रज्ञा से इस्‍तीफा दिया : नाराज नीरज सक्‍सेना अवकाश पर : ढाई दशक की लम्‍बी सेवा के बाद इंडिया टुडे से ओम सर्राफ विदा हो गए. वे एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत थे. ओम सर्राफ तीन साल पहले ही इंडिया टुडे से रिटायर हो चुके थे, परन्‍तु प्रबंधन ने इनके अनुभव तथा सेवाओं को देखते हुए इन्‍हें एक्‍सटेंशन दिया था.

ओम इंडिया टुडे के लांचिंग टीम के सदस्‍य थे. इन्‍होंने सब एडिटर के रूप में इंडिया टुडे ज्‍वाइन किया था. इन दिनों ये यूपी तथा उत्‍तराखंड का प्रभार देख रहे थे. इंडिया टुडे ज्‍वाइन करने से पहले ये जनसत्‍ता को भी अपनी सेवाएं दे रहे थे. मूल रूप से जम्‍मू-कश्‍मीर के निवासी ओम सर्राफ डेढ़ दशक तक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में भी मीडिया प्रभारी के रूप में सक्रिय रहे. बताया जा रहा है कि ओम सर्राफ के काम की जिम्‍मेदारी अब मुहम्‍मद वकार और मनीषा पांडेय को सौंप दी गई है. अब ये दोनों ही यूपी तथा उत्‍तराखंड डेस्‍क की जिम्‍मेदारी संभालेंगे.

प्रज्ञा से खबर है कि आबिद मंसूरी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे पीसीआर में कार्यरत थे. बताया जा रहा है कि आबिद चैनल के अंदर की स्थिति से परेशान थे. वे पिछले साढ़े तीन साल से प्रज्ञा के साथ जुड़े़ हुए थे. आबिद अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. प्रज्ञा से पहले भी वो कई चैनलों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

हिंदुस्‍तान, एटा से खबर है कि ब्‍यूरोचीफ के रवैये से नाराज स्ट्रिंगर नीरज सक्‍सेना ने 31 अक्‍टूबर तक अवकाश ले लिया है. नीरज ने मेल भेजकर ब्‍यूरोचीफ की शिकायत प्रधान संपादक शशि शेखर, वेस्‍ट यूपी के प्रभारी केके श्रीवास्‍तव से की है. हालांकि नीरज ने इस्‍तीफा नहीं दिया है, परन्‍तु उनका कहना है कि वे अब वरिष्‍ठों के निर्देश के बाद ही लौटेंगे. हालांकि दूसरी तरफ से जो खबर आ रही है वह यह है कि ब्‍यूरोचीफ अनुज शर्मा द्वारा किसी बात के लिए मना करने पर नीरज नाराज हो गए थे तथा अभद्र व्‍यवहार कर दिया था. इसके बाद दोनों लोगों के बीच विवाद हो गया.

हिंदी विश्वविद्यालय : तीन कुलपति और तेरह झगड़े-घपले

यह दास्तां देश के एक ऐसे अजीबो-गरीब विश्वविद्यालय की है, जिसके अब तक तीन कुलपति हुए हैं. लेकिन विडंबना है कि तीनों ही एक-दूसरे पर संस्थान को बीमार बनाने का आरोप लगा रहे हैं. महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पहले कुलपति और मूर्धन्य साहित्यकार अशोक वाजपेयी आरोप लगाते हैं, ”मेरे वक्त शुरू हुए काम को आगे बढ़ाने के बजाए दूसरे कुलपति जी. गोपीनाथन ने बंद करने में अपना समय लगाया.”

लेकिन पेशे से आईपीएस और शौक से साहित्यकार मौजूदा कुलपति विभूति नारायण राय विवि के पिछड़ने का ठीकरा वाजपेयी के ही सिर फोड़ते हैं. वे कहते हैं, ”वाजपेयी ने जमीन अधिग्रहण में ही पांच साल गंवा दिए और उनके वक्त शैक्षणिक स्टॉफ तक की नियुक्ति नहीं हो सकी क्योंकि वे कभी वर्धा जाते ही नहीं थे. जिससे हम पिछड़ गए.” खुद राय यहां तक कहने लगे हैं, ”साहित्य जगत में यह बहस हो कि क्यों न इस विवि को बंद कर दिया जाए.”

महात्मा गांधी के सपनों को साकार करने को बना देश का एकमात्र हिंदी विवि अपने कुलपतियों की मनमानी की वजह से ही आज बदहाल है. वाजपेयी ने दिल्ली में रहकर संस्थान चलाने की कोशिश की, तो गोपीनाथन वर्धा जाकर भी संस्थान को विवादों में उलझा आए. अब तीसरे कुलपति राय के वक्त तो काल्पनिक पदों पर निश्चित वेतन के साथ नियुक्तियों की भरमार  हो गई है.

वाजपेयी शैक्षणिक नियुक्तियां नहीं कर पाए, तो गोपीनाथन ने 11 अवैध नियुक्तियां कीं, राय ने भी सात अवैध नियुक्तियां की हैं. जिसकी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और मंत्रालय भी पुष्टि करता है. कहा जाता है कि आज भी अगर कोई राय की खास पसंद हैं, तो यूजीसी की मंजूरी के बिना उसे मनमाफिक वेतन और पद मिल जाता है.

विवि के 14 साल के इतिहास में इमारतें और छात्रावास बने हैं, लेकिन साल भर के भीतर ही कई नई इमारतें खस्ताहाल हो गईं. राय ने निर्माण के ठेके खास तौर से यूपी समाज कल्याण निर्माण निगम को दिए, जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार के मुकदमे अदालतों में लंबित हैं. हालांकि यूपी कैडर के आइपीएस राय गृह प्रदेश पर मेहरबानी के आरोप से इनकार करते हैं, लेकिन गुणवत्ता की कमी पर लाचारी दिखाते हैं, ”हम बड़े अधिकारियों को लगातार चिट्ठी लिखते हैं.”

इस अंतरराष्ट्रीय विवि में हिंदी पट्टी की राजनीति घुस चुकी है और छात्रों को अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की इजाजत नहीं है. छात्रों के बीच राय कोतवाल कहकर पुकारे जाते हैं. हाल ही में निष्कासित एक छात्र उत्पल कांत अनीस कहते हैं, ”राय विवि को ठकुराई वाले के अंदाज में चलाते हैं, जहां झुकने वालों को  रोटी मिलती है और अड़ने वालों का सिर कलम कर दिया जाता है.”

गांधी की कर्मस्थली वर्धा में 1997 में  स्थापित यह संस्थान वित्तीय अनियमितता, भाई-भतीजावाद, यौन उत्पीड़न और जातिवाद की वजह से विवादों का केंद्र बन गया है. अब तक इस पर तकरीबन 200 करोड़ रु. खर्च हो चुके हैं. नौवीं पंचवर्षीय योजना में विवि को योजनागत खर्र्च के लिए आवंटित 18 करोड़ रु. में से वाजपेयी ने सिर्फ छह करोड़ 40 लाख रु. ही खर्च किए.

दसवीं योजना में आवंटित 41 करोड़, 91 लाख रु. में से गोपीनाथन ने 34 करोड़, 63 लाख रु. खर्च किए. फिर 11वीं योजना में 66 करोड़ रु. का आवंटन हुआ और राय दावा करते हैं, ”हमने सारे पैसे खर्च कर दिए हैं और यूजीसी से 20 करोड़ रु. का अतिरिक्त आवंटन कराया है.” इसके अलावा गैर-योजनागत खर्च के लिए अलग से आवंटन होता है. लेकिन इतने खर्च के बावजूद  इस विवि का हाल बेहाल है.

जबकि हिंदी के साथ ही उर्दू के लिए हैदराबाद में बना मौलाना आजाद राष्ट्रीय विवि विकास के मामले में इस  विवि को एक दशक पीछे छोड़ता दिख रहा है. लेकिन राय की झुंझ्लाहट इस तुलना पर बढ़ जाती है और वे कहते हैं, ”उर्दू तो हिंदी से छोटी भाषा है, लेकिन उसका बजट ज्यादा क्यों है. विश्व हिंदी सम्मेलन विदेश मंत्रालय क्यों कराता है, जिसे हिंदी की समझ नहीं है.”

कुलपति राय को उर्दू के ज्यादा बजट पर एतराज है, वे हिंदी सम्मेलन का आयोजन अपने हाथ में चाहते हैं और महिला लेखिकाओं को चरित्र प्रमाण पत्र देने में खास रुचि दिखाते हैं. पिछले दिनों उन्हें महिला लेखिकाओं के खिलाफ अपनी एक अभद्र टिप्पणी के लिए माफी मांगकर अपनी कुर्सी बचानी पड़ी थी. लेकिन विवि की गलतियों को सुधारने में उनकी कोई रुचि नहीं दिखती. इंडिया टुडे से बातचीत में वे कहते हैं,  ”मैं मनुष्य हूं और मुझ्से भी कई गलतियां हुई हैं, जिनको लेकर विवाद है. छिनाल प्रकरण मेरी मूर्खता थी.” लेकिन अगले ही पल वे चुनौती देते हैं, ”अगर मेरी ओर से किए गए काम अवैध हैं, तो लोग कोर्ट जाएं.”

ऐसी ही मनमर्जी मनमानियों की वजह से ही 14 साल के सफर में इस विवि के पास उपलब्धियों के नाम पर खस्ताहाल नई इमारतों के सिवा कुछ नहीं है, लेकिन विवादों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि उपन्यासों की एक श्रृंखला तैयार हो जाए. इससे विवि को आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तो दूर, देश के साहित्य जगत में भी मुकम्मल जगह नहीं मिल पाई है. वाजपेयी कहते हैं, ”यह अंतरराष्ट्रीय विवि आज सही मायने में आंचलिक बनकर रह गया है.” लेकिन राय कहते हैं, ”वाजपेयी ने इसे मैकमिलन हाउस बनाने की कोशिश की, तो गोपीनाथन ने अकादमिक गतिविधियों का केंद्र. इसलिए यह रूटीन विश्वविद्यालय बन गया है.”

हाल ही में  रिपब्लिकन पार्टी ऑफ  इंडिया के विदर्र्भ सचिव अशोक मेश्राम ने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मानव संसाधन विकास मंत्री, यूजीसी और प्रमुख राजनैतिक दलों के नेताओं को चिट्ठी लिखी है, जिसमें राय पर अवैध नियुक्ति करने, घोटाले, अवैध डिग्री आवंटन और अपने पसंदीदा लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए नामांकन के नियम बदलने के आरोप हैं.

इस शिकायत के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रपति सचिवालय ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय से स्पष्टीकरण मांगा है और मंत्रालय ने 12 अगस्त के पत्र के जरिए विवि से जवाब तलब किया है. मेश्राम की शिकायत के मद्देनजर एक पूर्व छात्र संजीव चंदन ने 4 अक्तूबर को सूचना के हक के तहत पीएमओ और मंत्रालय से कार्रवाई का पूरा ब्यौरा मांगा है. लेकिन इसके बावजूद राय के हौसले पस्त होते नहीं दिख रहे और हाल ही में उन्होंने कई गैर स्वीकृत पद सृजित कर अपनी पसंद के लोगों को नियुक्त किया है.

विवि की दुर्दशा और कुलपतियों की निरंकुशता की जानकारी के बावजूद मंत्रालय और यूजीसी कुंभकर्णी नींद सो रहे हैं. सूचना के अधिकार के तहत हासिल दस्तावेजों में यूजीसी और मंत्रालय भी 18 नियुक्तियों को अवैध मानते हैं. लेकिन इन्हें अभी तक यह दलील देते हुए मंत्रालय ने रद्द नहीं कराया है कि इससे मुकदमेबाजी बढेगी. अब राय कहते हैं, ”अगर मंत्रालय आदेश दे तो मैं ये नियुक्तियां रद्द कर दूंगा.” अधिकांश नियुक्तियों को या तो कार्य परिषद की मंजूरी नहीं मिली है, तो कुछ में विजिटर नॉमिनी ने असहमति नोट लगा रखा है. कुछ नियुक्तियों में तो न्यूनतम योग्यता को भी दरकिनार कर दिया गया है.

हालांकि राय किसी भी नियुक्ति को अवैध नहीं मानते. उधर इन मामलों पर मंत्रालय को कोई अधिकारी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है. उनकी दलील है कि मंत्रालय का काम सिर्फ फंड मुहैया कराना है, निगरानी का काम यूजीसी का है. लेकिन यूजीसी में संबंधित अधिकारी संयुक्त सचिव के.पी. सिंह से संपर्क साधा गया, तो उन्होंने आयोग के सचिव से संपर्क करने को कह दिया. लेकिन सचिव डॉ. एन.ए. का.जमी भी अपनी जिम्मेदारी से भागती दिखीं और उन्होंने अनियमितताओं पर कार्रवाई तो दूर, बात करने से भी साफ मना कर दिया.

लैप्सड पदों पर नियुक्ति के लिए यूजीसी की अनुमति के बिना राय ने कई पद भरे हैं और कुछ नई िनयुक्तियों का विज्ञापन भी दिया है. वे कहते हैं, ”अगर किसी पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो चुकी हो, तो वह लैप्सड नहीं होता.” कुछ आरक्षित श्रेणी के पद सामान्य कोटे से भी भरे गए हैं. राय पर भाई-भतीजावाद का भी आरोप है.

विवि में प्रोफेसर अनिल अंकित राय, जो कुलपति के रिश्तेदार माने जाते हैं, पर नकल कर चोरी की किताब लिखने का आरोप है. लेकिन राय कहते हैं, ”हमने जांच बिठाई थी, लेकिन मंत्रालय ने हमें लिखा कि  जिसके कॉपीराइट का उल्लंघन हुआ है, वह कोर्ट जाए. उसके बाद मैंने जांच बंद कर दी.” उधर विवि के दलित एवं आदिवासी अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. एल. कारुण्यकारा राय पर जातिवाद का आरोप लगाते हुए कहते हैं, ”राय एक सेक्युलर, जातिवादी और दलित, महिला, पिछड़ा, अल्पसंख्यक विरोधी व्यक्ति हैं.” उनके खिलाफ वे अनुसूचित जाति आयोग में भी शिकायत दर्र्ज करा चुके हैं.

राय कहते हैं, ”अब विवि आकार लेता दिख रहा है.” लेकिन वाजपेयी कहते हैं, ”विवि अपने मकसद में सफल नहीं हो पाया. वहां ऐसा कोई नहीं, जिसका नाम लेने पर बड़ी हस्ती होने का एहसास हो और हिंदी की प्रतिष्ठा, बौद्धिक संपदा, अकादमिक जीवन में कोई बढ़ोतरी हुई हो.”

इस संस्थान की अनियमितताओं पर सरकार-यूजीसी की खामोशी और भूल-सुधार की बजाए कुलपति की लोगों को कोर्ट जाने की चुनौती देना विवि को अंतरराष्ट्रीय पहचान नहीं दिला सकता. जरूरत है कि व्यापक जांच कर गलतियों को सुधारा जाए, ताकि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी भाषा को सम्मिलित कराने और राष्ट्रभाषा के बारे में गांधी के सपनों को साकार किया जा सके.

विवादों का विश्वविद्यालय

सरकारी दस्तावेज में 18 नियुक्तियां अवैध, कार्रवाई नही.

पीएमओ, मंत्रालय, यूजीसी की जानकारी में गड़बड़ियां.

14 साल में करीबन 200 करोड़ रु. खर्च हो चुके.

अपनों को उपकृत करने में अवैध नियुक्तियों की भरमार.

तीन साल से कोई पूर्ण कार्यपरिषद नहीं.

तीनों कुलपति एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ रहे.

नई इमारतें भी खस्ता हालत में.

दलित प्रोफेसर को बिना जांच के नोटिस.

संतोष कुमार की यह स्‍टोरी इंडिया टुड़े,‍ हिंदी में छप चुकी है. इसे वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

गासिप- राज चेंगप्पा लेंगे एमजे अकबर की जगह!

भाई लोग लगता है एमजे अकबर को इंडिया टुडे से विदा करा के ही मानेंगे. एक सज्जन ने भड़ास4मीडिया को एक मेल भेजकर लगभग भविष्यवाणी कर दी है कि एमजे अकबर की जगह इंडिया टुडे के नए एडिटर इन चीफ के रूप में राज चेंगप्पा ज्वाइन करने वाले हैं. राज चेंगप्पा पहले भी इंडिया टुडे में वरिष्ठ पद पर रहे हैं. इन दिनों वे द ट्रिब्यून, चंडीगढ़ के एडिटर हैं.

पत्र भेजने वाले ने अपना नाम न छापने को कहा है, इसलिए उनके नाम की जगह एक्सवाईजेड लिख दिया गया है. पत्र पढ़िए लेकिन उसके पहले यह जान लीजिए कि एमजे अकबर अभी भी इंडिया टुडे में हैं और कहा जा रहा है कि इस अक्टूबर महीने में उनका एक महीने का कांट्रैक्ट खत्म होने वाला है. अगर प्रबंधन रीन्यू कर देता है तो समझिए गासिप खत्म, एमजे का इंडिया टुडे में राज जारी. और, अगर रीन्यू नहीं होता है तो समझिए गासिप के सिर-पैर थे. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

Yaswantzee

I, xyz, am a regular reader of your website. I got a lot from your venture. This is quite helpful for those who r seeking career in Media. As per my information it is likely that Raj Chengappa will replace M J Akbar as the India Today editor. Raj Chengappa was with the India Today till Prabhu Chawla was there. Currently Raj Chengappa is the Editor of the Chandigarh based newspaper the Tribune. He is one of the five Editors alongwith Alok Mehta, M K Razdan, Kumar Ketkar, T N Ninan who met the Prime Minister in his first interaction with the editors.

I hope this is an important story for the Bhadas4media.com. This information is from reliable source. If possible then skip my name.

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एमजे अकबर का कांट्रैक्ट खत्म होने वाला है!

एमजे अकबर को लेकर मीडिया में अटकलों का दौर शुरू हो गया है. एमजे अकबर ने जब इंडिया टुडे समूह ज्वाइन किया था, तब भी एक कोने से यह चर्चा उड़ायी गई थी कि वे बस दो तीन महीने के मेहमान हैं. अब फिर उनको लेकर चर्चा फैलाई गई है कि एमजे अकबर का कार्यकाल इस माह खत्म हो रहा है, उनका एक साल का कांट्रैक्ट था, जो इसी अक्टूबर में खत्म हो रहा है.

इस आधार पर लोग चर्चा फैलाए हुए हैं कि एमजे अकबर के कांट्रैक्ट को प्रबंधन रीन्यू नहीं कर रहा है. वहीं, एमजे से जुड़े कुछ लोगों का कहना है कि अरुण पुरी को फिलहाल एमजे का विकल्प नजर नहीं आ रहा इसलिए वे एमजे को कांटीन्यू करेंगे.  जो लोग उनको लेकर अफवाह फैला रहे हैं, वे किन्हीं न किन्हीं वजहों से उनसे चिढ़ते हैं, इसी कारण मौका देखकर एमजे को हिलाने या बदनाम करने की कोशिश की जाती है. सच्चाई चाहे जो हो, लेकिन इन दिनों इंडिया टुडे में काम करने वाले यही चर्चा करते फिर रहे हैं कि एमजे के लिए अक्टूबर महीना आखिरी होगा या उनकी पारी आगे भी बढ़ेगी.

द संडे स्‍टैंडर्ड के सीनियर एडिटर बने सुभाष मिश्र

लखनऊ से खबर है कि ‘इंडिया टुडे’ से नाता तोड़ने वाले वरिष्‍ठ पत्रकार सुभाष मिश्र ने द न्‍यू इंडियन एक्‍सप्रेस ग्रुप का मैगजीन ‘द संडे स्‍टैंडर्ड’ ज्‍वाइन कर लिया है. उन्‍हें यहां भी सीनियर एडिटर और यूपी का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. सुभाष मिश्र पिछले डेढ़ दशक से इंडिया टुडे के साथ जुड़े हुए थे. प्रभु चावला से उनकी नजदीकी के चलते ही इंडिया टुडे के नए प्रबंधन ने उनका तबादला विशाखापट्टनम कर दिया था, जिसके बाद उन्‍होंने संस्‍थान छोड़ दिया.

सुभाष मिश्र एक बार फिर प्रभु चावला की टीम से जुड़ गए हैं. खबर है कि उन्‍हें यूपी में द न्‍यू इंडियन एक्‍सप्रेस की जिम्‍मेदारी भी सौंपी गई है. द न्‍यू इंडियन एक्‍सप्रेस ग्रुप के चीफ एडिटर प्रभु चावला हैं. माना जा रहा है कि प्रभु चावला ने ही सुभाष मिश्र को अपने साथ जोड़ा है. सुभाष मिश्र की यूपी की राजनीति में अच्‍छी पकड़ है. कई एक्‍सक्‍लूसिव खबरें भी उन्‍होंने इंडिया टुडे के लिए ब्रेक की हैं.

आखिरकार टूट ही गया इंडिया टुडे से सुभाष मिश्र का नाता

लखनऊ से खबर आ रही है कि इंडिया टुडे से सीनियर एडिटर सुभाष मिश्र का नाता टूट गया है. प्रभु चावला के खास माने जाने वाले सुभाष मिश्र का तबादला प्रबंधन ने मार्च में विशाखापट्टनम के लिए की दिया था, लेकिन वे वहां नहीं गए. पत्‍नी के स्‍वास्‍थ्‍य को कारण बताते हुए उन्‍होंने प्रबंधन से लखनऊ छोड़ पाने में असमर्थता जता दी थी. पर उन्‍होंने अब वहां ज्‍वाइन नहीं किया था.

खबर है कि अब उनका इंडिया टुडे नाता पूरी तरह टूट गया है. वे पिछले डेढ़ दशक से इंडिया टुडे को लखनऊ में अपनी सेवाएं दे रहे थे. 1995 में इंडिया टुडे ज्‍वाइन करने बाद लगातार तरक्‍की करते करते सीनियर एडिटर बन गए थे. हिंदी के साथ अंग्रेजी में भी उनका नाम जाता था. सत्‍ता के गलियारों में उनकी खूब धमक थी. अब यह पता नहीं चल पाया है कि उन्‍होंने इस्‍तीफा दिया है या संस्‍थान ने उन्‍हें बाहर किया है. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करेंगे इसकी जानकारी भी नहीं मिल पाई है.

तो इसलिए कनिमोझी की वकालत कर रहे थे एमजे अकबर!

पिछले दिनों भड़ास4मीडिया पर इंडिया टुडे में प्रकाशित एमजे अकबर का संपादकीय प्रकाशित किया गया था, जिसके जरिए पाठकों को बताया गया कि किस तरह एक बड़े नाम वाला संपादक एमजे अकबर अपने करियर के उत्तरार्ध में आकर भ्रष्टाचारियों पर रहम किए जाने की कुतार्किक वकालत कर रहा है. उस लेख को आप इस हेडिंग… एमजे अकबर बेशर्मी से कर रहे हैं कनिमोली की वकालत…. पर क्लिक करके फिर से पढ़ सकते हैं.

एक पाठक ने उस लेख के प्रकाशित होने के बाद भड़ास4मीडिया को सूचित किया कि दरअसल कनिमोझी की वकालत यूं ही नहीं है बल्कि एक बड़े गेम प्लान के तहत एमजे अकबर की मजबूरी और लायबिल्टी भी है. इस पाठक का कहना है- ”दरअसल एमजे अकबर जिस द संडे गार्डियन अखबार को चलाते हैं उसमें कुख्यात वकील राम जेठमलानी चेयरमैन या बोर्ड आफ डायरेक्टर्स या संचालकों में हैं. यह बात खुलेआम है. और, राम जेठमलानी हमेशा ऐसे केस हाथ में लेते हैं जिसमें उनको माल बहुत तगड़ा मिलता है. जैसे उन्होंने जेसिका लाल का मर्डर करने वाले मनु शर्मा का केस लड़ा.

इन दिनों कुख्यात कनिमोझी के केस को लड़ रहे हैं. कनिमोझी और उनके बाप के पास पैसे की कमी तो है नहीं. सो उन्होंने राम जेठमलानी के घर को न सिर्फ पैसे से भर डाला बल्कि अतिरिक्त पैसे भी दे डाले कि मीडिया इस तरह मैनेज किया जाए ताकि कनिमोझी के पक्ष में एक भावनात्मक माहौल तैयार हो सके. जाहिर है, द संडे गार्डियन को भी कुछ माल मिला होगा और बजरिए राम जेठमलानी मिला होगा. तो ऐसे में संडे गार्जियन के मालिक एमजे अकबर की मजबूरी हो जाती है कि वे कनिमोझी के पक्ष में माहौल तैयार करें. पर दुर्भाग्य यह कि वे माहौल बजाय अपने अखबार से बनाने के, उस इंडिया टुडे ग्रुप का इस्तेमाल करके बना रहे हैं जिसने उदार होकर उन्हें इस शर्त पर भी अपने यहां काम करने की छूट दे दी कि वे अपना अखबार द संडे गार्डियन निकालते-चलाते हुए भी यहां काम कर सकते हैं.

अब यहां दो सवाल उठते हैं. क्या अरुण पुरी और इंडिया टुडे की डील एमजे अकबर व राम जेठमलानी के जरिए करुणानिधि व कनिमोझी से हो गई है या अरुण पुरी को भनक तक नहीं है, लेकिन उनके बैनर व ब्रांड का दुरुपयोग शुरू हो गया. सच्चाई क्या है, ये तो अरुण पुरी ज्यादा अच्छे से जानेंगे पर इन दिनों मीडिया की गली में कस कर शोर है कि इंडिया टुडे के संपादकीय की नीयत में खोट है…”

एमजे अकबर बेशर्मी से कर रहे हैं कनिमोली की वकालत!

इण्डिया टुडे के ताज़ा अंक में एमजे अकबर का जो संपादकीय छपा है, उसमें उन्होंने बड़ी बेशर्मी से कनिमोली को जेल से छोड़े जाने की वकालत की है. भड़ास4मीडिया के एक पाठक ने एमजे अकबर द्वारा लिखित संपादकीय को टाइप कराकर भडा़स के पास भेजा है. इसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है. आप भी पढ़ें और बताएं कि क्या वाकई इस आलेख से यह मैसेज निकलता है कि एमजे कनिमोली को जेल से छोड़े जाने की बात कह रहे हैं. -एडिटर

ज़मानत गवांतेनामो में नहीं मिलती

-एमजे अकबर-

क्या खूब कहा है किसी ने कि अमीर आपसे और हमसे अलग हैं. उनके पास ज्यादा दौलत है. लेकिन बात हिन्दुस्तान की हो तो कुछ यूँ कहेंगे: उनके पास ज्यादा वकील हैं. तो क्या इसका मतलब ये कि वे ज्यादा बड़े अपराधी भी हैं? क़ानून तो अपनी राह चलेगा. इस बारे में कैसी बहस. लेकिन अगर क़ानून बहस का विषय बन जाय तो क्या होगा?

न्याय महज़ निर्णय भर नहीं है. न्याय एक समूची प्रक्रिया है. अगर प्रक्रिया में ही खामियां होगी तो निर्णय बेदाग़ कैसे हो सकता है? अदालतें भी इस बात को मानती हैं और ‘किसी को निशाना बनाए जाने’ और मीडिया के मुकदमों में अन्तर्निहित विषमता के खिलाफ चेताती भी हैं. सभ्य समाज में न्याय सबूतों और विधि पर टिका होता है, निजी और सामूहिक भावनाओं पर नहीं. न्याय का बुनियादी सिद्धांत है: जब तक अपराध साबित नहीं हो जाता, आप निर्दोष हैं. सही के न दिखने भर से तो कोई गलत सिद्ध नहीं होता. जनहित की अवधारणा का मूल आधार ही यह है कि जो कानूनी सहायता लेने में सक्षम नहीं हैं, उनकी मदद करना ताकि वे भी मुकदमें में अपना बचाव कर सकें. पुलिस की चार्जशीट तो सिर्फ मुकदमें की शुरुआत है, उसका नतीज़ा नहीं.

अगर द्रमुक नेता कनिमोली ज्योतिषियों से सलाह-मशविरा करती तो जान पातीं इस वक्त इनके सितारे गर्दिश में हैं. 2009 की गर्मियों में वे चेन्नई में रानी थी और दिल्ली में राजकुमारी. आज वे चेन्नई में पराजित हैं और दिल्ली में सबसे ज्यादा हाई प्रोफाइल कैदी. लेकिन जेल में वे बतौर आरोपी हैं, न कि बतौर दोषी. दोनों में ज़मीन आसमान का फर्क है. अगर न्याय प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें दोषी पाया जाता है तो न्यायाधीशों को उन्हें क़ानून के मुताबिक़ जेल का दरवाजा दिखा देना चाहिए. लेकिन जब तक यह फैसला नही हो जाता, वे निर्दोष हैं. इस दौरान कानूनी हिरासत किन्ही विशेष कारणों से और निश्चित व मामूली अवधि के लिए ही हो सकती है. लेकिन लग रहा है मानो सीबीआई इस हिरासत को बेमियादी बढाने की मांग कर रही है और उसकी मांग पूरी भी हो रही है. यह अन्याय है.

भारत संविधान से चलता है, संविधान, जो सबको जीवन और आज़ादी की गारंटी देता है.जमानत थोड़े समय (शुक्र है कि लोकतंत्र में सत्ता थोड़े समय के लिए होती है) के लिए सत्ता भोग रहे लोगों का दिया उपहार नहीं, हमारा हक है. वरना तो हम पुलिसिया तंत्र से एक ही कदम पीछे हैं, जहां ताकतवर की सनक और मर्जी से किसी भी नागरिक को पकड़ कर सलाखों के पीछे डाला जा सकता है. इसके पहले भी आपातकाल में यह हो चुका है. हमने सोचा था कि ऐसा दुबारा नहीं होगा.

सीबीआई चाहती है कि वह 2 जी घोटाले के सभी आरोपियों को अनंत काल के लिए जेल में बंद कर दे. यह जानते हुए भी कि उसकी पूछताछ का काम या तो खत्म हो चुका है या खत्म हो जाना चाहिए. अदालतें दो वज़ह गिनाते हुए इसे मान भी रही है. पहला है ‘मामले की गंभीरता.’ यह गलत है क्यूंकि यहाँ आरोप की गंभीरता है, अपराध की नहीं. अपराध तो अभी सिद्ध होना बाकी है. जो कुछ हुआ, उसके बारे में कई अधिक मत हैं. सरकार की आधिकारिक राय, जैसा कि टेलीकाम मंत्री कपिल सिब्बल ने संसद में कहा कि इससे सरकार को कोई नुकसान नहीं हुआ है. सभी चाहते हैं कि भ्रष्टाचार खत्म हो और होना भी चाहिए. लेकिन क्या इस कोशिश में हम न्याय व्यवस्था को तहस-नहस कर देंगे?

सीबीआई चुन-चुन कर निशाना बना रही है. इस बात के सबूत हैं कि कांग्रेस के मंत्रियों की 2 जी लाइसेंस जारी करने के फैसले में सहभागिता थी, लेकिन उनमें से किसी के खिलाफ कारवाई नहीं की गयी जबकि द्रमुक के खिलाफ न तो कोई प्रशाशनिक नियंत्रण है और न कोई वैधानिक रोक. लेकिन जनता के बेकाबू गुस्से को शांत करने के लिए उसे बलि का बकरा बना दिया गया. जमानत से इनकार की दूसरी आधिकारिक वज़ह यह बतायी गयी मुमकिन है, आरोपी सबूतों से छेड़-छाड करे या संभावित गवाहों पर दबाव डाले. जांच शुरू होने के काफी समय बाद तक ए. राजा और कनिमोली आज़ाद थे. अगर उन्होंने उस वक्त सबूतों से छेड़छाड नहीं की या गवाहों को धमकाया नहीं तो अब वे ऐसा कैसे कर सकते हैं? यह आरोप निहायत ही कमज़ोर है और बिना किसी टेके टिक नहीं सकता.

भारतीय अदालतें ज़मानत के अधिकार को मानती हैं. पाकिस्तान भेजी गयी गृह मंत्री पी. चिदंबरम की वांछित ‘आतंकवादियों’ की ‘मशहूर 50’ सूची में दर्ज वज्लुल कमर खान को भी महाराष्ट्र में ज़मानत मिली. आप चाहे जैसे न्यायिक गंभीरता और गहराई का आकलन कर लें, लेकिन आतंकवाद भ्रष्टाचार से भी कहीं ज्यादा चिंतनीय है. किसी ने भी राजा या कनिमोली को आतंकवादी नहीं कहा. तो फी क्या वज़ह है कि आतंकवाद के आरोपी को तो जमानत दे देनी चाहिए, लेकिन उन्हें नहीं? महत्वपूर्ण शख्सियतें भी हर जगह मुश्किलों में फसती हैं. पुलिस शायद ही कभी उनके साथ विनम्र होती है, उनकी किताब में ऐसा कोई शब्द ही नहीं. लेकिन क़ानून आरोपी के अधिकारों का सम्मान करता है.

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व निदेशक डोमिनिक स्ट्रास-कान को विमान से धरा गया, छोटी सी कोठरी में रखा गया, और बिना दाढी बनाए, मरियल सी हालत में केमरों के सामने लाया गया.उनके खिलाफ होटल की नौकरानी के साथ यौन छेड़छाड़ समेत सात आरोप लगाए गए. अब वे जमानत पर हैं. हाल में अमेरिकी अरबपति राज राजरत्नम को इनसाइडर ट्रेडिंग के लिए सज़ा दी गयी तो वे वित्तीय भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गए. लेकिन न्यूयार्क की पुलिस ने फैसले से पहले उन्हें जेल में नहीं डाला.

इस आज़ाद दुनिया में एक ही जेल है, जहां जमानत नहीं मिलती: ग्वांतेनामो जो सभी संदिग्ध आतंकवादियों के लिए अमेरिका का कैदखाना है. शुक्र है, अभी हम ऐसी मनहूस हालत में नहीं पहुंचे. लेकिन बहुत सी मंजिलों की और जाने वाला रास्ता, यहाँ तक कि नरक को जाने वाला भी नेक इरादों से होकर गुजर सकता है.

इंडिया टुडे ग्रुप प्रकाशित करेगा लाइफ स्‍टाइल पत्रिका ‘रॉब रिपोर्ट’

मशहूर अमेरिकी लाइफ स्‍टाइल पत्रिका ‘रॉब रिपोर्ट’  अब भारत से भी प्रकाशित होगा. इसके लिए इंडिया टुडे ग्रुप ने अमेरिकी कंपनी कर्टको मीडिया के साथ समझौता किया है. यह मैगजीन उच्‍च वर्ग को ध्‍यान में रखकर लांच किया जा रहा है. इस मासिक पत्रिका का एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर गोविंद धर को बनाया गया है. इंग्‍लैंड से शिक्षित गोविंद धर फिलहाल फ्रीलांसिंग जर्नलिस्‍ट के रूप में कई कंपनियों से जुड़े हुए थे. इसके पहले वे टर्निंग प्‍वाइंट, मिंट, एचटी, खलीज टाइम्‍स  और कंटेंट स‍िंडिकेट से भी विभिन्‍न रुपों में जुड़े रहे हैं.

पत्रिका के बारे में जानकारी देते हुए इंडिया टुडे ग्रुप के चेयरमैन अरुण पुरी ने कहा कि भारत तेजी से विकास कर रहा है. इसको ध्‍यान में रखकर हम इस पत्रिका को लांच कर रहे हैं. इसकी शुरुआत 35 हजार कॉपियों के साथ की जा रही है. कंपनी ने इस मैगजीन का कवर प्राइस नहीं रखा है. यह मैगजीन सलेक्‍टेड पाठकों को फ्री ऑफ कॉस्‍ट दिया जाएगा.

इस योजना का खुलासा करते हुए इंडिया टुडे ग्रुप के पब्लिशिंग डाइरेक्‍टर मैल्‍कम डी मिस्‍त्री ने कहा कि हमने काफी विचार विमर्श के बाद देश के 35 हजार महत्‍वपूर्ण लोगों की एक सूची तैयार की है. इन्‍हीं लोगों को हम अपनी पत्रिका भेजेंगे और वे अगर सहमत होंगे तो हम उन्‍हें लगातार यह पत्रिका भेजेंगे. यह पत्रिका एडवरटीजमेंट बेस्‍ड रिवेन्‍यू मॉडल पर आध‍ारित होगा.

इस मैगजीन को फिलहाल पांच मेट्रो सिटी चेन्‍नई, बंगलुरू, कोलकाता, मुंबई और दिल्‍ली में उपलब्‍ध कराया जा रहा है. शीघ्र ही इसमें गोवा और जयपुर के लोगों को भी शामिल किया जाएगा. भारत में इस पत्रिका का आठवां अंतर्राष्‍ट्रीय संस्‍करण है. इसके पहले यह पत्रिका चीन, ब्राजील, रुस, टर्की, स्‍पेन, अमेरिका और पश्चिमी एशिया से प्रकाशित हो रहा है.

अपने कर्मियों को तीन को इंक्रीमेंट देगा अमर उजाला, इंडिया टुडे में इंक्रीमेंट

अमर उजाला ग्रुप के कर्मचारी जल्‍द ही खुश होने वाले हैं. प्रबंधन तीन मई को ग्रुप के समस्‍त कर्मचारियों को इंक्रीमेंट और प्रमोशन देने जा रहा है. कारपोरेट आफिस के सूत्रों ने बताया कि इसके लिए लगभग सभी कारवाईयां पूरी की जा चुकी हैं. यूनिट हेड और संपादकों की रिपोर्ट तथा अप्रेजल के आधार पर इंक्रीमेंट की फाइनल कॉपी तैयार कर ली गई है. तीन को विधिवत सभी को लेटर इशु कर दिए जाएंगे.

प्रबंधन इनक्रीमेंट और प्रमोशन दे रहा है परन्‍तु अमर उजाला के कर्मचारी ज्‍यादा खुश नहीं दिख रहे हैं. इसके पीछे कारण बताया जा रहा है कंपनी की आर्थिक हालत. डीई शा का कर्ज चुकाते-चुकाते कंपनी की हालत खराब है. इसके बावजूद प्रबंधन अपने कर्मचारियों को निराश नहीं कर रहा है. नए कर्मचारियों पर यह इंक्रीमेंट लागू नहीं होगा. जो कर्मचा‍री एक साल पहले अमर उजाला टीम के हिस्‍सा बने हैं, उन्‍हें इस इंक्रीमेंट और प्रमोशन में शामिल किया जाएगा.

दूसरी तरफ इंडिया टुडे समूह भी अपने कर्मचारियों को इंक्रीमेंट का तोहफा दिया है. यह इंक्रीमेंट हिंदी-अंग्रेजी समेत सभी मैगजीनों में किया गया है. यहां पर इक्रीमेंट दस से लेकर बीस फीसदी के बीच हुआ है. ज्‍यादातर लोगों को बारह फीसदी का इंक्रीमेंट दिया गया है. इंक्रीमेंट मिलने के बाद कर्मचारी खुश हैं.

फरजंद अहमद के साथ इंडिया टुडे मैनेजमेंट ने अच्छा सुलूक नहीं किया

: कांट्रैक्ट रीन्यू न करने का फरमान :हिंदी पट्टी में इंडिया टुडे मैग्जीन के पर्याय बन चुके वरिष्ठ पत्रकार फरजंद अहमद के बारे में खबर मिल रही है कि संस्थान अब उन्हें एक्सटेंशन देने से मना कर रहा है. संभवतः 30 अप्रैल के बाद फरजंद अहमद इंडिया टुडे के साथ नहीं रहेंगे. सूत्रों के मुताबिक इंडिया टुडे में एमजे अकबर के आने के बाद से पुराने लोगों की विदाई का सिलसिला तेज हुआ है. मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में कई लोगों को इंडिया टुडे से कार्यमुक्त किया जा चुका है.

पर फरजंद अहमद के साथ भी संस्थान ऐसा सुलूक करेगा, यह किसी को उम्मीद न थी. पहले बिहार और फिर यूपी में अपनी लेखनी के जरिए इंडिया टुडे की खास पहचान बनाने वाले फरजंद अहमद अपने सादगीपूर्ण जीवन और सरोकारी पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. बताया जाता है कि प्रबंधन ने फरजंद अहमद को इतना मौका भी नहीं दिया है कि वे कहीं वैकल्पिक व्यवस्था कर सकें. इसके पीछे भी इंडिया टुडे प्रबंधन की एक खास चाल है. पिछले साल जब सभी लोगों के कांट्रैक्ट को रीन्यू किया गया तो उसमें से चुपके से वो वाला पार्ट हटा दिया गया जिसमें लिखा रहता है कि संस्थान या सामने वाला व्यक्ति, दोनों में से जो भी चाहे, तीन महीने पहले एक दूसरे को सूचित कर एक दूसरे से अलग हो सकता है. नई व्यवस्था में यह कर दिया गया है कि अगर कांट्रैक्ट रीन्यू नहीं होता है तो यह समझा जाए कि नौकरी गई.

सूत्रों के मुताबिक फरजंद अहमद को कांट्रैक्ट रीन्यू न किए जाने के बारे में जानकारी तब दी गई जब उन्होंने खुद अपनी तरफ से कई बार जानने-पता करने का प्रयास किया. उन दिनों जब फरजंद अहमद के पास दर्जन भर आफर दूसरे संस्थानों से हुआ करते थे, तब उन्होंने इंडिया टुडे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए कहीं और जाने से मना कर दिया था लेकिन संस्थान ने बदले में बेहद तंगदिली दिखाते हुए बिना बताए चुपके से उनका साथ छोड़ने का फैसला कर लिया. इस देश में मीडिया संस्थानो की बेरुखी और क्रूरता के लाखों किस्से में फरजंद अहमद का प्रकरण भी जुड़ गया है. इससे खासकर उन लोगों को होशियार हो जाना चाहिए जो अपने अपने संस्थानों के लिए जी-जान लगाकर काम करते हैं और अपने परिवार व अपने निजी जीवन की बलि चढ़ा देते हैं. ऐसे लोगों को जब अचानक पता चलता है कि उनके संस्थान ने बेहद क्रूरता के साथ उनसे अचानक नाता तोड़ने का फैसला कर लिया है तो वे कहीं के नहीं होते.

फरजंद अहमद के बारे में जानकारी मिली है कि वे पहले इंडिया टुडे के परमानेंट इंप्लाई के रूप में काम करते थे. इंडिया टुडे प्रबंधन ने 2001 में एक स्कीम शुरू की जिसमें कहा गया कि लोग चाहें तो फंड वगैरह अपना लेकर बढ़ी हुई सेलरी पर कनसलेंट बन सकते हैं. फरजंद अहमद ने फंड वगैरह का पूरा पैसा मिलते देख कनसलटेंट होने का फैसला कर लिया. अगर उन्हें आर्थिक दिक्कत न होती तो शायद वे कनसलटेंट होने का विकल्प नहीं चुनते. जो भी हो, लेकिन फरजंद अहमद के साथ इंडिया टुडे प्रबंधन ने जो सुलूक किया है, उसे कतई अच्छा नहीं कहा जा सकता और मीडिया संगठनों, खासकर यूपी के पत्रकार संगठनों को इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाना चाहिए.

जो भी नौकरी कहीं करता है, उसे एक दिन वहां से विदा होना ही पड़ता है लेकिन सवाल विदाई के तरीके का है. खासकर उन लोगों के साथ जिन्होंने अपने जीवन के कीमती समय को किसी संस्थान के साथ होम किया हो. उन्हें अगर संस्थान इज्जत और सहमति के साथ विदा नहीं करता, दुखी करके विदा करता है तो इसकी आह देर सबेर संस्थानों पर लगेगी ही, यह तय है, भले कोई माने या न माने. उपर वाले की लाठी जब पड़ती है तब आवाज नहीं होती. यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में इंडिया टुडे समेत पूरे टीवी टुडे ग्रुप की साख को जबरदस्त बट्टा लगा है.

 

संघ के विरोध पर भागवत का नाम इंडिया टुडे वालों ने अपनी वेबसाइट से हटाया

नई दिल्ली : इंडिया टुडे समूह ने अपने कॉनक्लेव में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत को बुलाने की सूचना अपनी वेबसाइट से हटा ली है। संघ को ऐतराज था कि उनकी अनुमति के बगैर उनके नाम को क्यों जोड़ा गया। संघ ने मीडिया समूह से वेबसाइट से तत्काल नाम हटाने को कहा था। इंडिया टुडे समूह के 18 मार्च से हो रहे मीडिया कॉनक्लेव चैलेंज द पावरका 18 मार्च को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उद्घाटन करना था और 19 मार्च को संघ प्रमुख मोहन भागवत को कश्मीर मुद्दे पर र्चचा के लिए बुलाया गया था।

इसमें उनके साथ हुर्रियत के चेयरमैन मीरवाइज फारूक को भी भाग लेना था, लेकिन संघ प्रमुख ने यह कहकर मना कर दिया कि उनसे इस कार्यक्रम की कोई अनुमति नहीं ली गई। संघ ने जैसे ही वेबसाइट पर मोहन भागवत का नाम देखा तो संघ के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने मीडिया समूह के प्रमुख अरुण पुरी को मेलकर इसका विरोध जताया। बाद में मीडिया समूह की तरफ से एमजे अकबर ने वैद्य से संपर्क कर बताया कि भाजपा के राज्यसभा सदस्य तरुण विजय ने संघ प्रमुख के आने की अनुमति यह कहकर दी थी कि मेरी उनसे बात हो गई है। यह बात भी कई बार हुई, इसलिए मीडिया समूह पूरी तरह संतुष्ट था कि संघ प्रमुख के कहने के बाद ही तरुण विजय ने हरी झंडी दी होगी।

संघ ने साफ किया कि कोई भाजपा सांसद कैसे संघ प्रमुख को बुलाने का ठेका ले सकता है। बाद में संघ ने कड़ा रुख अपनाते हुए मीडिया समूह को बता दिया कि उस कार्यक्रम में संघ प्रमुख नहीं जाएंगे और उनके नाम को लेकर जो विवरण वेबसाइट पर डाला है उसे तत्काल हटाया जाए। मंगलवार को मीडिया समूह ने संघ प्रमुख का नाम वेबसाइट से हटा दिया।

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित राकेश आर्य की रिपोर्ट

इंडिया टुडे के एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर अभिजीत दासगुप्‍ता का निधन

अभिजीत वरिष्‍ठ पत्रकार तथा इंडिया टुडे के एक्‍जीक्‍यूटिव एडिटर अभिजीत दासगुप्‍ता का निधन हो गया है. वे थोड़े दिनों से बीमार थे. उनके निधन से उनके जानने वालों में शोक की लहर है. सहसा किसी को विश्‍वास नहीं हो रहा कि अभी तक ठीक ठाक रहे अभिजीत अब उनके बीच नहीं हैं. वे पिछले तीन दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय थे.

अभिजीत दासगुप्‍ता की इंटर तक की शिक्षा कोलकाता के ब्‍वॉयज स्‍कूल और बीए सेंट जेवियर्स कालेज से हुई थी. अभिजीत ने अपने करियर की शुरुआत 1982 में टेलीग्राफ के साथ ट्रेनी के रूप में की थी. उन्‍हें तिहरा प्रमोशन देकर टेलीग्राफ का नाइट एडिटर बना दिया गया. इसके बाद वे इंडियन एक्‍सप्रेस, संडे आब्‍जर्बर, फाइनेंसियल एक्‍सप्रेस, द पायनीयर को भी अपनी सेवाएं दीं. वे कोलकाता टाइम्‍स के लांचिंग एडिटर भी रहे. उन्‍होंने बंगाल के पूर्व मुख्‍यमंत्री ज्‍याति बसु की बांग्‍ला में लिखी किताब का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया था. जिसका मुख्‍यमंत्री ने 1998 के बुक फेयर में लोकार्पण किया था. दासगुप्‍ता अंग्रेजी के जानेमाने पत्रकार थे.

अरुण पुरी ने अपने संपादकों-रिपोर्टरों के हाथ-पांव बांधे!

राडिया टेपों के जरिए कई पत्रकारों के दागदार हो चुके दामन के बाद कई मीडिया हाउसों में प्रबंधन ने अपने पत्रकारों के लिए तरह-तरह की गाइडलाइंस जारी की हैं. अभी सूचना मिली है कि क्रिसमस के मौके पर अरुण पुरी ने अपने संपादकों और रिपोर्टरों को एक मेल कर क्या करें, क्या न करें टाइप की कई चीजें बताई हैं. अरुण पुरी के इस मेल पर कई तरह के विवाद उठ खड़े हो सकते हैं क्योंकि अगर इन गाइडलाइंस के आधार पर कोई रिपोर्टर काम करे तो वह पुष्ट न हो पा रही किसी सच्ची बड़ी खबर को नहीं दिखा सकता. आप भी अरुण पुरी द्वारा जारी पत्र को पढ़िए.

To:  All

From: Aroon Purie

In the age of Radiagate, where allegations are flying thick and fast, I would like to caution all of you in the interests of objectivity and protecting our credibility that we should make a full effort to get a response from the person against whom the allegations have been made.  I notice in today’s fevered atmosphere it is often being forgotten.

Remember, repeating someone’s defamatory statement by publishing/broadcasting it makes you just as liable as the person who has said it. Also, the fact that a person does not respond to your queries does not mean the person is guilty.  They are under no obligation to respond.  You can only go ahead and publish/broadcast if you have separate evidence to support your charges. If you cannot validate the allegations independently then it is better not to carry it or do it in a manner without naming the person. Truth, which will stand up to judicial scrutiny, is the best defence to libel.

And please note just by putting ‘alleged’ in front of defamatory statements does not absolve you from liability.  I often hear the defence,  “But everybody knows!”   We may know many things but if you can’t prove it, you can’t publish/broadcast it.  Meeting deadlines is also no excuse for unethical journalism.

As you know the India Today Group carries no agenda against any personality or organisations.  As we break more stories, I expect you to adhere to the highest standards of journalism to which we are all committed to.  In the end credibility will win.

A.P.

प्रभु चावला के बारे में अरुण पुरी का मेल

: प्रभु चावला का आज अंतिम कार्य दिवस होगा : एमजे अकबर का कद और काम बढ़ा : इंडिया टुडे हिंदी और अंग्रेजी वाले एमजे अकबर को रिपोर्ट करेंगे : मेल से कई तरह के बदलावों की आहट सूंघ रहे हैं लोग : To: All, Fm: Aroon Purie, Dear All : After a long career spanning 14 years in his second stint with the Group, Mr Prabhu Chawla has decided to move on and his last working day will be Friday, December 17, 2010.

Effective December 18, 2010, the Executive Editor of India Today – Hindi will report directly to Mr M.J. Akbar, while the three regional language editions in Tamil, Telegu and Malayalam will be placed under the supervision of Mr Ashok Damodaran, Managing Editor: Language Editions, who in turn will report to Mr M J Akbar. The business mandate will continue to be under Mr Malcolm Mistry’s charge, who reports into Mr Ashish Bagga. In addition, Mr Prabhu Chawla’s association with TV Today will also end on the same day.

Aroon Purie

सीधी बात; अरुण पुरी चोर है!

अरुण पुरी
अरुण पुरी
एक वेबसाइट है, स्लेट नाम से. उस पर ग्रेडी हेंड्रिक्स का सुपरस्टार रजनीकांत के उपर लिखा एक आर्टिकल 27 सितंबर 2010 को प्रकाशित हुआ. उस आर्टिकल के पहले दो पैरा को इंडिया टुडे के मालिक अरुण पुरी ने हूबहू उड़ा लिया और उसे 18 अक्टूबर वाले इंडिया टुडे के अंक में अपने संपादकीय के प्रथम दो पैरा के रूप में प्रकाशित कर दिया. कुछ लोगों की नजर इस चोरी पर गई तो उन्होंने कई वेबसाइटों को सूचित कर दिया.

केरल बेस्ड काउंटर मीडिया नामक एक वेबसाइट ने इस गोरखधंधे को उजागर किया. हिंदी की जनज्वार नामक चर्चित वैचारिक वेबसाइट ने भी इस चोरी के बारे में अपने यहां खबर प्रकाशित की. मुंबईबॉस नामक वेबसाइट ने भी इस गड़बड़झाले का अपने यहां खुलासा किया. मामला तूल पकड़ता देख अरुण पुरी को माफी मांगने को मजबूर होना पड़ा. उन्होंने अपने माफीनामे में कहा है कि वे अमेरिका में थे और व्यस्तता की वजह से अपने दिल्ली आफिस के वरिष्ठों से सुपरस्टार रजनीकांत पर संपादकीय के लिए कुछ इनपुट भेजने को कहा तो किसी ने दुर्भाग्य से किसी दूसरे जगह प्रकाशित आर्टिकल के एक-दो पैरे को उठाकर भेज दिया और वही प्रकाशित भी हो गया.

आइए, इस सनसनीखेज प्रकरण की सारी परतों को एक-एक कर जाने. पहले स्लेट वेबसाइट पर प्रकाशित ग्रेडी हेंड्रिक्स के लेख के प्रथम दो पैरे को पढ़ते हैं और उसके ठीक नीचे हैं इंडिया टुडे में प्रकाशित अरुण पुरी के संपादकीय का दो पैरा. दोनों को पढ़कर देखिए. चोरी साफ नजर आएगी. उसके बाद दिया गया है इंडिया टुडे समूह की ओर से जारी माफीनामा.

opening para of Hendrix’s piece: “Jackie Chan is the highest-paid actor in Asia, and that makes sense. Besides producing, directing, and starring in his own action movies since 1980, he’s earned millions in Hollywood with blockbusters like Rush Hour and The Karate Kid. But the No. 2 spot goes to someone who doesn’t make any sense at all. The second-highest-paid actor in Asia is a balding, middle-aged man with a paunch, hailing from the Indian state of Tamil Nadu and sporting the kind of moustache that went out of style in 1986. This is Rajinikanth, and he is no mere actor—he is a force of nature. If a tiger had sex with a tornado and then their tiger-nado baby got married to an earthquake, their offspring would be Rajinikanth. Or, as his films are contractually obligated to credit him, “SUPERSTAR Rajinikanth!”

इंडिया टुडे में प्रकाशित अरुण पुरी का संपादकीय
इंडिया टुडे में प्रकाशित अरुण पुरी का संपादकीय

opening para of Poorie’s editorial: “Jackie Chan is the highest-paid actor in Asia, and that makes sense. Besides producing, directing, and starring in his own action movies since 1980, he’s earned millions in Hollywood with blockbusters like Rush Hour and The Karate Kid. But the No. 2 spot goes to someone who doesn’t make any sense at all. The second-highest-paid actor in Asia is a balding, middle-aged man with a paunch, hailing from the Indian state of Tamil Nadu and sporting the kind of moustache that went out of style in 1986. This is Rajinikanth, and he is no mere actor—he is a force of nature. If a tiger had sex with a tornado and then their tiger-nado baby got married to an earthquake, their offspring would be Rajinikanth. Or, as his films are contractually obligated to credit him, “Superstar Rajinikanth!”

स्लेट का लेख और इंडिया टुडे में प्रकाशित संपादकीय, दोनों के शुरुआती पैरे एक ही हैं.
स्लेट का लेख और इंडिया टुडे में प्रकाशित संपादकीय, दोनों के शुरुआती पैरे एक ही हैं.

Comment by India Today Group Corporate Communications: “There was an unfortunate incident with the Letter from the Editor in the southern edition of India Today’s last issue. This was a mistake. We are printing an apology for it in the southern edition. Here is a preview for your information. Jet lag is clearly injurious to the health of journalism. I was in America, and still a bit bleary-eyed and sleep-deprived when we took an unusual decision: to split the cover. This is jargon for changing the cover for some editions; so while the content of the magazine remained the same worldwide, the cover that went to our readers in south India had displayed the phenomenal Rajinikanth, while our other readers saw Omar Abdullah on the cover. This meant writing two versions of ‘Letter from the Editor’. Not being an acknowledged expert on the delightful southern superstar, I asked Delhi for some inputs. Unfortunately, a couple of sentences lifted from another article were sent to me. An excuse is not an explanation. So, without any reservations, mea culpa. Apologies.'”

ये है अरूण पुरी का आंतरिक ई-मेल

एमजे अकबर को इंडिया टुडे और हेडलाइंस टुडे का एडिटोरियल डायरेक्टर बनाए जाने और प्रभु चावला को इंडिया टुडे मैग्जीन के गैर-अंग्रेजी संस्करणों का प्रभारी बनाए जाने संबंधी जो ईमेल ग्रुप के एडिटर इन चीफ अरूण पुरी ने जारी किया, उसकी एक प्रति भड़ास4मीडिया के भी पास है. पेश है, अरूण पुरी के मेल के प्रमुख अंश-

“It gives me great pleasure in announcing the formation of a brand new SBU (strategic business unit) within Living Media, which will become an independent company very soon, that will address the burgeoning opportunity of Indian language publishing and all related extensions in the Indian language domain. To begin with, all current India Today language brands will be assigned to this new SBU.

This new company will be placed under the leadership of Prabhu Chawla, who will be designated Editor (Languages) and CEO. Prabhu Chawla will report into a Board. Given the tremendous opportunity of this space and in view of his new responsibilities, Chawla will give up the editorship of India Today – English edition and India Today – international and all their related extensions.

“As editor of the magazine for the last 14 years he has done great work in turning it into a weekly from fortnightly and maintaining its position as India’s leading newsmagazine. He will also be consulting editor to Business Today.

“Prabhu’s new mandate will be to address the business and editorial opportunity of Indian language publishing in an aggressive and focused manner. His efforts will be directed towards growing the existing language publications and to launch many more new language publications in the future. In collaboration with ITGD (India Today Group Digital) he will be addressing digital opportunities in the language space as well.

“Prabhu will continue to be associated with Seedhi Baat in Aaj Tak and will spearhead the group’s initiative in setting up a media/journalism institute. He will also continue to lead the group’s content archival project and the library resources. This comes into effect from September 24th, 2010.

“It also gives me immense pleasure in announcing the appointment of  M. J. Akbar as editorial director of India Today (English) and India Today (international) and their related extensions.

“He will also have the additional charge as Editorial Director of Headlines Today.

“MJ, as he is popularly known in the industry needs no introduction, given his rich and long experience in launching, managing and leading several top print publications in the country. MJ comes on board effective September 24th, 2010 and will report to me.

“As you can see, these are significant changes in the editorial leadership of our group’s flagship brands, which I am sure will be transformed by them to meet the challenges of the fast changing world that we live in. They will explore new opportunities too.

“Please join me in wishing Prabhu and MJ the very best and I also seek your active support in making this a smooth and successful transition.”