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आत्मकथ्य : रायपुर – एक अलग स्वाद का शहर (3)

रायपुर आना मेरे लिए आत्मिक और मानसिक रूप से बहुत राहत देने वाला साबित हुआ। छत्तीसगढ़ की फिजाओं में मैंने खुद को बहुत सहज पाया। जितना प्यार और आत्मीयता मुङो रायपुर में मिली, उसने मुझे बांध सा लिया। 1996 का रायपुर शायद दिल्ली से न दिखता रहा हो, लेकिन उसकी मिठास और उसका अपनापन याद आता है। आज का रायपुर जब 2008 की देहरी पर खड़े होकर देखता हूं, तो बहुत बदल गया है। शायद इस शहर का राजधानी बन जाना और राजपुत्रों का हमारे करीब आ जाना इस शहर की तासीर को धीरे-धीरे बदल रहा है। 1996 का रायपुर एक बड़े गांव का अहसास कराता था, जहां लगभग सारे परिचित से चेहरे दिखते थे। बहुत सारे पारा-मोहल्ले में बसा हुआ रायपुर एक अलग ही स्वाद का शहर दिखता था। 

रायपुर आना मेरे लिए आत्मिक और मानसिक रूप से बहुत राहत देने वाला साबित हुआ। छत्तीसगढ़ की फिजाओं में मैंने खुद को बहुत सहज पाया। जितना प्यार और आत्मीयता मुङो रायपुर में मिली, उसने मुझे बांध सा लिया। 1996 का रायपुर शायद दिल्ली से न दिखता रहा हो, लेकिन उसकी मिठास और उसका अपनापन याद आता है। आज का रायपुर जब 2008 की देहरी पर खड़े होकर देखता हूं, तो बहुत बदल गया है। शायद इस शहर का राजधानी बन जाना और राजपुत्रों का हमारे करीब आ जाना इस शहर की तासीर को धीरे-धीरे बदल रहा है। 1996 का रायपुर एक बड़े गांव का अहसास कराता था, जहां लगभग सारे परिचित से चेहरे दिखते थे। बहुत सारे पारा-मोहल्ले में बसा हुआ रायपुर एक अलग ही स्वाद का शहर दिखता था। 

लखनऊ, भोपाल के तेज जीवन ने थोड़ा थकाया-पकाया जरूर रहा होगा, मुझे लगा मैं अपनी बस्ती’ में आ गया हूं। धीरे-धीरे सरकता हुआ शहर, आज के मुख्यमंत्री आवास तक सिमटा हुआ शहर, आज जिस तरह अपने आकार से, भीड़ से, गाडिय़ों के प्रेशर हार्न से आतंकित करता है तो मुझे वह पुराना रायपुर बार-बार याद आता है। आज जिस बंगले में प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हैं, इसी बंगले में कभी कलेक्टर डीपी तिवारी रहा करते थे। उस समय यहां कमिश्नर रहे जेएल बोस हों या उस समय के एसपी संजय राणा, सभी याद आते हैं। अधिकारी भी तब आज के अधिकारियों जैसे नहीं थे। रायपुर सबको अपने जैसा बना लेता था। रायपुर का गुरुत्वाकर्षण अब मुझे कमजोर होता दिख रहा है। अब लोग रायपुर को अपने जैसा बनाने में लगे हैं। ब्राम्हणपारा में रहने वाले लोग हों या पुरानी बस्ती के बाशिंदे, वे इस बदलते शहर को मेरी तरह ही भौंचक निगाहों से देख रहे हैं। शहर में अचानक उग आए मेगा मॉल्स, बंद होते सिनेमाघर उनकी जगह लेता आईनाक्स, सडक़ किनारे से गायब होते पेड़, गायब होती चिडिय़ों की चहचहाहट, तालाब को सिकोड़ते हुए लोग, ढेर सी लालबत्तियां और उसमें गुम होते इंसान। रायपुर में रहते हुए रायपुर के समाज जीवन में सक्रिय अनेक साहित्यकारों, पत्रकारों से उस समय ही ऐसे रिश्ते बने, जो मुंबई जाकर भी खत्म नहीं हुए। शायद रिश्तों की यह डोर मुझे फिर से छत्तीसगढ़ खींच लाई।

इन मुंबई

1997 में मुंबई से नवभारत का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। नवभारत, छत्तीसगढ़ का बहुत प्रतिष्ठित दैनिक है। उन दिनों बबन प्रसाद मिश्र, नवभारत, रायपुर के प्रबंध संपादक थे। उनकी कृपा और आशीर्वाद से मुङो नवभारत, नागपुर के संपादक और मालिक विनोद माहेश्वरी ने मुंबई संस्करण में काम करने का अवसर दिया। जब मैं मुंबई पहुंचा तो यहां भी मेरे कई दोस्त और सहयोगी पहले से ही मौजूद थे। इन दिनों स्टार न्यूज, दिल्ली में कार्यरत रघुवीर रिछारिया उस समय नवभारत, मुंबई में ही थे। वे स्टेशन पर मुङो लेने आए और संयोग ऐसा बना कि मुंबई के तीन साल हमने साथ-साथ ही गुजारे। यहां जिंदगी में गति तो बढ़ी पर उसने बहुत सारी उन चीजों को देखने और समझने का अवसर दिया, जिसे हम एक छोटे से शहर में रहते हुए महसूस नहीं कर पाते।

मुंबई देश का सबसे बड़ा शहर ही नहीं है, वह देश की आर्थिक धडक़नों का भी गवाह है। यहां लहराता हुआ समुद्र, अपने अनंत होने की और आपके अनंत हो सकने की संभावना का प्रतीक है। यह चुनौती देता हुआ दिखता है। समुद्र के किनारे घूमते हुए बिंदास युवा एक नई तरह की दुनिया से रूबरू कराते हैं। तेज भागती जिंदगी, लोकल ट्रेनों के समय के साथ तालमेल बिठाती हुई जिंदगी, फुटपाथ किनारे ग्राहक का इंतजार करती हुई महिलाएं, गेटवे पर अपने वैभव के साथ खड़ा होटल ताज और धारावी की लंबी झुग्गियां…. मुंबई के ऐसे न जाने कितने चित्र हैं, जो आंखों में आज भी कौंध जाते हैं। सपनों का शहर कही जाने वाली इस मुंबई में कितनों के सपने पूरे होते हैं, यह तो नहीं पता, पर न जाने कितनों के सपने रोज दफन हो जाते हैं। यह किस्से हमें सुनने को मिलते रहते हैं। लोकल ट्रेन पर सवार भीड़ भरे डिब्बों से गिरकर रोजाना कितने लोग अपनी जिंदगी की सांस खो बैठते हैं इसका रिकार्ड शायद हमारे पास न हो, किंतु शेयर का उठना-गिरना जरूर दलाल स्ट्रीट पर खड़ी एक इमारत में दर्ज होता रहता है।

यहां देश के वरिष्ठतम पत्रकार और उन दिनों नवभारत टाइम्स के संपादक विश्वनाथ सचदेव से मुलाकात अब एक ऐसे रिश्ते में बदल गई है, जो उन्हें बार-बार छत्तीसगढ़ आने के लिए विवश करती रहती है। विश्वनाथ जी ने पत्रकारिता के अपने लंबे अनुभव और अपने जीवन की सहजता से मुझे बहुत कुछ सिखाया। उनके पास बैठकर मुझे यह हमेशा लगता रहा कि एक बड़ा व्यक्ति किस तरह अपने अनुभवों को अपनी अगली पीढ़ी को स्थानांतरित करता है। यहां नवभारत के समाचार संपादक के रूप में कार्यरत भूपेंद्र चतुर्वेदी का स्नेह भी मुझे निरंतर मिला। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी कर्मठता, काम के प्रति उनका निरंतर उत्साह मुझे प्रेरित करता है। उसी दौरान नवभारत परिवार से जुड़े सर्वश्री कमल भुवनेश, अरविंद सिंह, केसर सिंह बिष्ट, अजय भट्टाचार्य, विमल मिश्र, सुधीर जोशी, विनीत चतुर्वेदी जैसे न जाने कितने दोस्त बने, जो आज भी जुड़े हुए हैं। नवभारत में काम करने के अनेक अवसर मिले। उससे काम में विविधता और आत्मविश्वास की ही वृद्धि हुई। वैचारिकी नाम का एक साप्ताहिक पृष्ठ हमने लगातार निकाला, जिसकी खासी चर्चा होती रही। फिर कई फीचर पत्रिकाओं का ए-4 आकार में प्रकाशन पत्रकारिता का एक अलग अनुभव रहा। इसके साथ-साथ सिटी डेस्क की वर्किंग का अनुभव भी यहां मिला। यह अनुभव आपस में इतने घुले-मिले हैं कि जिसने एक पूर्ण पत्रकार बनाने में मदद ही की।

मुंबई में रहने के दौरान ही वेब पत्रकारिता का दौर शुरू हुआ, जिसमें अनेक हिंदी वेबसाइट का भी काम प्रारंभ हुआ। वेबदुनिया, रेडिफ डाटकाम, इन्फोइंडिया डाटकाम जैसे अनेक वेबसाइट हिंदी में भी कार्य करती दिखने लगीं। हिंदी जगत के लिए यह एक नया अनुभव था। हमारे अनेक साथी इस नई बयार के साथ होते दिखे, किंतु मैं साहस न जुटा पाया। कमल भुवनेश के बहुत जोर देने पर मैंने इन्फोइंडिया डाटकाम में चार घंटे की पार्टटाइम नौकरी के लिए हामी भरी। जिसके लिए मुझे कंटेन्ट असिस्टेंट का पद दिया गया। वेब पत्रकारिता का अनुभव मेरे लिए एक अच्छा अवसर रहा, जहां मैंने वेब पत्रकारिता को विकास करते हुए देखा। यह दौर लंबा न चल सका, क्योंकि इसी दौरान मेरी शादी भी हुई और शादी के एक महीने बाद दैनिक भास्कर, बिलासपुर में समाचार संपादक के रूप में नियुक्ति हो गई और मुझे छत्तीसगढ़ के दूसरे नंबर के शहर आ जाना पड़ा।

…जारी


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