पत्रकार संजय द्विवेदी को वांगमय पुरस्कार

भोपाल : पत्रकारिता शिक्षक, पत्रकार एवं लेखक संजय द्विवेदी को उनकी नई किताब ‘मीडिया नया दौर नई चुनौतियां ’ के लिए इस वर्ष का वांगय पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गयी है। स्व. हजारीलाल जैन की स्मृति में प्रतिवर्ष किसी गैर साहित्यिक विधा पर लिखी गयी किताब पर यह सम्मान दिया जाता है।

संवेदनात्मक विषय पर सनसनी न फैलाएं

: संजय द्विवेदी की पुस्तक का लोकार्पण समारोह : प्रभात झा बोले- खबर की कोई विचारधारा नहीं होती : भोपाल। पत्रकारिता सदैव मिशन है, यह कभी प्रोफेशन नही बन सकती। रोटी कभी राष्ट्र से बड़ी नहीं हो सकती। मीडिया के हर दौर में लोकतंत्र की पहरेदारी का कार्य अनवरत जारी रहा है। उक्त आशय के वक्तव्य वरिष्ठ पत्रकार एवं सांसद प्रभात झा ने व्यक्त किए। वे संजय द्विवेदी की पुस्तक ‘मीडिया: नया दौर नई चुनौतियां’ के लोकार्पण पर बोल रहे थे।

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना होने के मायने

[caption id="attachment_18094" align="alignleft" width="94"]सर्वेश्वर जीसर्वेश्वर जी[/caption]: जयंती (15 सितंबर, 1927) एवं पुण्यतिथि (23 सितंबर, 1983) पर विशेष : सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का समूचा व्यक्तित्व एक आम आदमी की कथा है। एक साधारण परिवार में जन्म लेकर अपनी संघर्षशीलता से असाधारण बन जाने की कथा इसी सर्वेश्वर परिघटना में छिपी है। वे आम आदमी से लगते थे पर उनके मन में बड़ा बनने का सपना बचपन से पल रहा था। वे हमेशा संघर्षों की भूमि पर चलते रहे, पर न झुके न टूटे न समझौते किए।

संजय द्विवेदी को प्रज्ञारत्न सम्मान

बिलासपुर। पत्रकार एवं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी को प्रज्ञारत्न सम्मान से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पिछले दिनों बिलासपुर के राधवेंद्र राव सभा भवन में आयोजित समारोह में छत्तीसगढ़ विधानसभा के अध्यक्ष धरमलाल कौशिक ने प्रदान किया।

विचार को समर्पित रहा उनका जीवन

रामशंकर अग्निहोत्री: श्रद्धांजलि : रामशंकर अग्निहोत्री ने मन, वचन और कर्म से निभाया एक ध्येयनिष्ठ पत्रकार होने का धर्म :  भरोसा नहीं होता कि कोई विचार किसी को इतनी ताकत दे सकता है कि वह उसी के सहारे पूरी जिंदगी काट ले। लेकिन दुनिया ऐसे ही दीवानों से बेहतर बनती है। यह दीवानगी ही किसी को खास बना जाती है।

इलेक्ट्रानिक मीडिया को धंधेबाजों से बचाइए

संजय द्विवेदीमीडिया में आकर, कुछ पैसे लगाकर अपना रूतबा जमाने का शौक काफी पुराना है किंतु पिछले कुछ समय से टीवी चैनल खोलने का चलन जिस तरह चला है उसने एक अराजकता की स्थिति पैदा कर दी है। हर वह आदमी जिसके पास नाजायज तरीके से कुछ पैसे आ गए हैं, वह टीवी चैनल खोलने या किसी बड़े टीवी चैनल की फ्रेंचाइजी लेने को आतुर है। पिछले कुछ महीनों में इन शौकीनों के चैनलों की जैसी गति हुयी है और उसके कर्मचारी- पत्रकार जैसी यातना भोगने को विवश हुए हैं, उससे सरकार ही नहीं सारा मीडिया जगत हैरत में है। एक टीवी चैनल में लगने वाली पूंजी और ताकत साधारण नहीं होती किंतु मीडिया में घुसने के आतुर नए सेठ कुछ भी करने को आमादा दिखते हैं। अब इनकी हरकतों की पोल एक-एक कर खुल रही है। रंगीन चैनलों की काली कथाएं और करतूतें लोगों के सामने हैं, उनके कर्मचारी सड़क पर हैं। भारतीय टेलीविजन बाजार का यह अचानक उठाव कई तरह की चिंताएं साथ लिए आया है।

विलाप मत कीजिए, संकल्प लीजिए

संजय द्विवेदीहिंदी दिवस पर विशेष (2) :  राष्ट्रभाषा के रूप में खुद को साबित करने के लिए आज वस्तुतः हिंदी को किसी सरकारी मुहर की जरूरत नहीं है। उसके सहज और स्वाभाविक प्रसार ने उसे देश की राष्ट्रभाषा बना दिया है। वह अब सिर्फ संपर्क भाषा नहीं है, इन सबसे बढ़कर वह आज बाजार की भाषा है, लेकिन हर 14 सितंबर को हिंदी दिवस के अवसर पर होने वाले आयोजनों की भाषा पर गौर करें तो यूँ लगेगा जैसे हिंदी रसातल को जा रही है। यह शोक और विलाप का वातावरण दरअसल उन लोगों ने पैदा किया है, जो हिंदी की खाते तो हैं, पर उसकी शक्ति को नहीं पहचानते। इसीलिए राष्ट्रभाषा के उत्थान और विकास के लिए संकल्प लेने का दिन ‘सामूहिक विलाप’ का पर्व बन गया है।

माखनलाल में जनसंचार के एचओडी बने संजय

संजय द्विवेदी ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष का पदभार संभाल लिया है। संजय की राजनीतिक विश्लेषक एवं मीडिया विशेषज्ञ के तौर पर खास पहचान है। वे दैनिक भास्कर- भोपाल एवं बिलासपुर, हरिभूमि-रायपुर, नवभारत-मुंबई, इंडिया इन्फो डाट काम-मुंबई, स्वदेश-रायपुर एवं भोपाल, न्यूज चैनल – जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ आदि संस्थाओं में स्थानीय संपादक, समाचार संपादक, एडिटर इनपुट एवं एंकर, कंटेट अस्सिटेंट, उप संपादक जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं।

”कालिख पोत ली हमने अपने मुंह पर”

संजय द्विवेदीइस लूट में हम सब शामिल थे। यह चोरी की बात नहीं थी, डकैती की शक्ल अख्तियार कर चुकी थी। पहले चुपचाप एकाध साथी की नीयत बिगड़ती थी, वह कुछ ले-देकर किनारे हो जाता था, अपनी थोड़ी सी बदनामी के साथ। पर इस बार तस्वीर बदली हुयी थी। मीडिया के संस्थान खुद लूट पर उतारू थे। वे राजनीति के सामने खड़े होकर उनके भ्रष्टाचार में अपना हिस्सा मांग रहे थे। जिस तरह की बातें और जैसे ताने मीडिया ने इस बार सुने हैं, वैसा कभी अतीत में होता दिखाई-सुनाई नहीं दिया। अचानक हम इतने पतित हो गए, यह मान लेना भी ठीक नहीं होगा। यह एक ऐसी गिरावट थी, जो धीरे-धीरे हुयी और आज जब इतने विकृत रूप में सामने आई है तो यह सोचना मुश्किल है कि आखिर हम अपना मुंह कहां छिपाएं।

हिंदी की खाने वाले स्क्रिप्ट अंग्रेजी में क्यों लिखते हैं?

संजय द्विवेदीमीडिया की दुनिया में इन दिनों भाषा का सवाल काफी गहरा हो गया है। मीडिया में जैसी भाषा का इस्तेमाल हो रहा है उसे लेकर शुद्धता के आग्रही लोगों में चिंता व्याप्त है। चिंता हिंदी की है और उस हिंदी की जिसका हमारा समाज उपयोग करता है। बार-बार ये बात कही जा रही है कि हिंदी में अंग्रेजी की मिलावट से हिंदी अपना रूप-रंग-रस और गंध खो रही है। सो हिंदी को बचाने के लिए एक हो जाइए। हिंदी हमारी भाषा के नाते ही नहीं, अपनी उपयोगिता के नाते भी आज बाजार की सबसे प्रिय भाषा है। आप लाख अंग्रेजी के आतंक का विलाप करें, काम तो आपको हिंदी में ही करना है, ये मरजी आपकी कि आप अपनी स्क्रिप्ट देवनागरी में लिखें या रोमन में। यह हिंदी की ही ताकत है कि वह सोनिया गांधी से लेकर कैटरीना कैफ- सबसे हिंदी बुलवा ही लेती है। उड़िया न जानने के आरोप झेलनेवाले नेता नवीन पटनायक भी हिंदी में बोलकर ही अपनी अंग्रेजी न जानने वाली जनता को संबोधित करते हैं। इतना ही नहीं, प्रणव मुखर्जी की सुन लीजिए, वे कहते हैं कि वे प्रधानमंत्री नहीं बन सकते क्योंकि उन्हें ठीक से हिंदी बोलनी नहीं आती।

राजेंद्र माथुर : हिंदी पत्रकारिता के नायक

पुण्यतिथि (9 अप्रैल, 1991) पर विशेष

आजादी के बाद की हिंदी पत्रकारिता में उन जैसा नायक खोजे नहीं मिलता। राजेंद्र माथुर सही अर्थों में एक ऐसे लेखक, विचारक और संपादक के रूप में सामने आते हैं जिसने हिंदी पत्रकारिता को समकालीन विमर्श की एक सार्थक भाषा दी। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को वह ऊंचाई दी जिसका वह एक अरसे से इंतजार कर रही थी। राष्ट्रीय एवं वैश्विक संदर्भों में जिस तरह से उन्होंने हिंदी को एक सामर्थ्य का बोध कराया वह उल्लेखनीय है। 7 अगस्त, 1935 को मध्य प्रदेश के धार जिले की बदनावर तहसील में जन्मे राजेंद्र माथुर की प्राथमिक शिक्षा धार में ही हुई। इंदौर से उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। श्री माथुर को अंग्रेजी साहित्य और दर्शन में बहुत रूचि थी।

यह सुधार समझौतों वाली मुझको भाती नहीं ठिठोली

माखनलाल चतुर्वेदीपं. माखनलाल चतुर्वेदी की जयंती पर विशेष (4 अप्रैल, 1889)

हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसा नाम हैं जिसे छोड़कर हम पूरे नहीं हो सकते। उनकी संपूर्ण जीवनयात्रा, आत्मसमर्पण के खिलाफ लड़ने वाले की यात्रा है। रचना और संघर्ष की भावभूमि पर समृद्ध हुयी उनकी लेखनी में अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध का जज्बा न चुका, न कम हुआ। वस्तुतः वे एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहे थे और कोई मोर्चा ऐसा न था, जहां उन्होंने अपनी छाप न छोड़ी हो।

संजय ने माखनलाल में रीडर के रूप में ज्वाइन किया

संजय द्विवेदीसंजय द्विवेदी ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के जन संचार विभाग में बतौर रीडर ज्वाइन किया है। संजय इससे पहले जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ न्यूज चैनल के ‘एडिटर इनपुट’ हुआ करते थे। इस न्यूज चैनल से हटने के बाद उन्होंने नागपुर से आ रहे अखबार राष्ट्रप्रकाश में बतौर डिप्टी एडिटर ज्वाइन किया। इसी दौरान उन्हें माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में नियुक्ति हो जाने की सूचना मिली। संजय ने पत्रकारिता की बजाय पत्रकारिता शिक्षण को ज्यादा बेहतर समझा।

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और उनकी पत्रकारिता

संजय द्विवेदी ने यह आलेख इस टिप्पणी के साथ भेजा है…हिंदी के मान्य पत्रकार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के विषय में आज की पीढ़ी बहुत कम जानती है। मुझे उम्मीद है यह लेख भड़ास के पाठकों को पसंद आएगा।  अगले महीने सर्वेश्वर जी कि जन्मतिथि और पुण्यतिथि दोनो है। ऐसे में यह आलेख एक सच्ची श्रद्धांजलि है। -संपादक, भड़ास4मीडिया 


इतिहास पुरूष  सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जन्मतिथि- 15 सितंबर 1927  पुण्यतिथि- 23 सितंबर 1983

पने तीखे तेवरों से सम्पूर्ण भारतीय प्रेस जगत को चमत्कृत करने वाले सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की उपलब्धियां बड़े महत्व की हैं।

एक्सक्लूसिव और ब्रेकिंग के बीच तड़पती खबरें

संजय द्विवेदी– संजय द्विवेदी –

खबरिया चैनलों की होड़ और गलाकाट स्पर्धा ने खबरों के मायने बदल दिए हैं। खबरें अब सिर्फ सूचनाएं नहीं देती, वे एक्सक्लूसिव में बदल रही हैं। हर खबर का अब ब्रेकिंग न्यूज में बदल जाना सिर्फ खबर की कलरिंग भर का मामला नहीं है। दरअसल, यह उसके चरित्र और प्रस्तुति का भी बदलाव है । खबरें अब निर्दोष नहीं रहीं। वे अब सायास हैं,  कुछ सतरंगी भी।

पत्रकारिता शिक्षा के ये परचूनिए : एक विश्लेषण

[caption id="attachment_13733" align="alignright"]Sanjay DiwediSanjay Diwedi[/caption]-संजय द्विवेदी- 

पिछले कुछ सालों में तकनीक-संचार के साधनों की तीव्रता ने दुनिया के मीडिया का चेहरा-मोहरा बहुत बदल दिया है। मीडिया में पेशेवर अंदाज़ व आकर्षक प्रस्तुति की माँग प्राथमिक हो गई है। यह अब शब्दों की बेचारी दुनिया नहीं रही, यहाँ शब्द पीछे हैं, उसके साथ जुड़ा है एक बेहद चमकीला अर्थतंत्र।

बसंत कुमार तिवारी- रचना और संघर्ष का सफरनामा

Basant Tiwariकलम की साधना में जिंदगी गुजारने वाले  बसंत कुमार तिवारी पर वरिष्ठ पत्रकार संजय द्विवेदी का आलेख…

बसंत कुमार तिवारी एक ऐसे साधक पत्रकार हैं, जिन्होंने निरंतर चलते हुए, लिखते हुए, धैर्य न खोते हुए, परिस्थितियों के आगे घुटने न टेकते हुए न सिर्फ विपुल लेखन किया है, वरन एक स्वाभिमानी जीवन भी जिया है। उनके जीवन में भी एक नैतिक अनुशासन दिखता है।

आत्मकथ्य : रायपुर – यादों की महक (अंतिम)

यादों की यही महक लिए हुए मैं थोड़े समय के बाद छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित होने वाले हरिभूमि से जुड़ गया। यह एक संयोग ही था कि मैं हरिभूमि के तब पंडरी स्थित कार्यालय में रमेश नैयर से मिलने के लिए आया हुआ था। वे छत्तीसगढ़ के अत्यंत सम्मानित पत्रकार और मुङो बहुत स्नेह करने वाले व्यक्ति हैं। स्वदेश, रायपुर में कार्य करते समय मेरा उनसे संपर्क आया था, जो उनकी आत्मीयता के नाते निरंतर सघन होता गया। श्री नैयर से इस मुलाकात के समय ही हिमांशु द्विवेदी से मेरी भेंट हुई। कैसे, क्या हुआ, लेकिन मैं मार्च, २००४ में हरिभूमि से जुड़ गया। इसके पूर्व हरिभूमि के संपादक के रूप में गिरीश मिश्र और एल.एन. शीतल कार्य कर चुके थे। अखबार को निकलते कुल डेढ़ साल हो गए थे और मैं तीसरा संपादक था।

आत्मकथ्य : अथ श्री भास्कर कथा (4)

sanjay दैनिक भास्कर, बिलासपुर आने की कथा भी रोचक है। यहां भी स्वदेश के संपादक रहे हरिमोहन शर्मा ही मेरे पुन: भास्कर में प्रवेश का कारण बने। वे उन दिनों हिसार भास्कर के संपादक थे। उन्होंने मुझे पानीपत में जगदीश शर्मा जी से मिलने के लिए कहा। मैं पानीपत पहुंचा और श्री शर्मा से मिला। श्री शर्मा इन दिनों भास्कर समूह में उपाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने सद्व्यवहार और आत्मीयता से मुझे बहुत प्रभावित किया तथा साथ लेकर अगले दिन दिल्ली में भास्कर के प्रबंध संचालक सुधीर अग्रवाल से मुलाकात करवाई।

आत्मकथ्य : रायपुर – एक अलग स्वाद का शहर (3)

रायपुर आना मेरे लिए आत्मिक और मानसिक रूप से बहुत राहत देने वाला साबित हुआ। छत्तीसगढ़ की फिजाओं में मैंने खुद को बहुत सहज पाया। जितना प्यार और आत्मीयता मुङो रायपुर में मिली, उसने मुझे बांध सा लिया। 1996 का रायपुर शायद दिल्ली से न दिखता रहा हो, लेकिन उसकी मिठास और उसका अपनापन याद आता है। आज का रायपुर जब 2008 की देहरी पर खड़े होकर देखता हूं, तो बहुत बदल गया है। शायद इस शहर का राजधानी बन जाना और राजपुत्रों का हमारे करीब आ जाना इस शहर की तासीर को धीरे-धीरे बदल रहा है। 1996 का रायपुर एक बड़े गांव का अहसास कराता था, जहां लगभग सारे परिचित से चेहरे दिखते थे। बहुत सारे पारा-मोहल्ले में बसा हुआ रायपुर एक अलग ही स्वाद का शहर दिखता था। 

आत्मकथ्य : बनारस – आत्मा में उतरे राग-रंग (2)

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काशी में रहते हुए ऐसा बनारसी रंग चढ़ा, जो सिर चढक़र बोलता था। छात्र आंदोलनों से जुड़ा होने के नाते कई छात्र नेता और नेता अपने मित्रों की सूची में थे। यहां उस समय बीएचयू के अध्यक्ष रहे देवानंद सिंह और महामंत्री सिद्धार्थ शेखर सिंह से लेकर प्रदीप दुबे, जेपीएस राठौर, राजकुमार चौबे, दीपक अग्रवाल और मनीष खेमका जैसे न जाने कितने दोस्त बन गए। इनमें मैं अपने उस समय संरक्षक रहे डा. सुरेश अवस्थी को नहीं भूल सकता। वे बीएचयू में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक थे।

आत्मकथ्य : मुसाफिर हूं यारों…(1)

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हरिभूमि, रायपुर के स्थानीय संपादक संजय द्विवेदी अब जी न्यूज 24 घंटे छत्तीसगढ़ के डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोडयूसर (एडिटर इनपुट) बने हैं। इस बदलाव के समय में संजय ने अपने जीवन के उन क्षणों को याद किया है जिन्हें आमतौर पर लोग सफलता मिलने के बाद भूल-से जाते हैं। बचपन से लेकर छात्र जीवन तक की शहर दर शहर यात्रा, शिक्षक से लेकर अखबारवाला फिर टीवीवाला बनने की यात्रा…। इन यात्राओं में काफी कुछ ऐसा रहा जिसे संजय दिल से याद करते हैं,  हमेशा याद रखना चाहते हैं।