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लव स्टोरी या सामाजिक बीमारी?

[caption id="attachment_15010" align="alignleft"]देशपाल सिंह पंवारदेशपाल सिंह पंवार[/caption]मीडिया असली हीरो ढूंढे : ‘दिन में ही जुगनुओं को पकड़ने की जिद करें, बच्चे हमारे दौर के चालाक हो गए’  -परवीन शाकिर। देश में लोकराज है। अधिकारों का साज है। सबको नाज है। होना भी चाहिए। पर ये कौन सा काज है? क्यों लोकलाज नासाज है? क्यों संस्कारों पर गाज है? क्यों कल को मिटाता आज है? क्यों यमराज का राज है? लोकतंत्र में आजादी के ये कौन-से मायने निकाले जा रहे हैं? सावन की फुहार की बजाय क्यों गरम बयार के पंखे झुलाए जा रहे हैं? समाज के तपने में हाथ तापने की गलत सोच पर भी क्यों सीने फुलाए जा रहे हैं? आखिर ये कौन सा संसार और कैसा प्यार? सारी हदें पार। शर्मोहया तार-तार। संस्कारों की हार। रिश्तों पर वार। अपने बेजार। मानवता शर्मसार। ये कहां आ गए हैं हम? हक के नाम पर, मनमर्जी के नाम पर गोत्र में प्यार व शादी की जिद करने वाले बालक की आंखों में शर्म नहीं दिख रही है,  न पालक धर्म की राह पर जाते नजर आ रहे हैं।

देशपाल सिंह पंवारमीडिया असली हीरो ढूंढे : ‘दिन में ही जुगनुओं को पकड़ने की जिद करें, बच्चे हमारे दौर के चालाक हो गए’  -परवीन शाकिर। देश में लोकराज है। अधिकारों का साज है। सबको नाज है। होना भी चाहिए। पर ये कौन सा काज है? क्यों लोकलाज नासाज है? क्यों संस्कारों पर गाज है? क्यों कल को मिटाता आज है? क्यों यमराज का राज है? लोकतंत्र में आजादी के ये कौन-से मायने निकाले जा रहे हैं? सावन की फुहार की बजाय क्यों गरम बयार के पंखे झुलाए जा रहे हैं? समाज के तपने में हाथ तापने की गलत सोच पर भी क्यों सीने फुलाए जा रहे हैं? आखिर ये कौन सा संसार और कैसा प्यार? सारी हदें पार। शर्मोहया तार-तार। संस्कारों की हार। रिश्तों पर वार। अपने बेजार। मानवता शर्मसार। ये कहां आ गए हैं हम? हक के नाम पर, मनमर्जी के नाम पर गोत्र में प्यार व शादी की जिद करने वाले बालक की आंखों में शर्म नहीं दिख रही है,  न पालक धर्म की राह पर जाते नजर आ रहे हैं।

न ही मीडिया असली कर्म की कमाई खा रहा है। नेता रूपी चालक से न पहले कोई आस थी,  न आज है। वे कल भी भ्रम में थे, आज ज्यादा हैं। कल क्या होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है-बापू को नमन और चमन का पतन। ऐसे में सामाजिक ताने-बाने के संकरे होते रास्ते कितनी देर और कितनी दूर साथ लेकर चल पाएंगे? आज यह सवाल हर समय मथ रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र में सबको तमाम हक हैं। प्यार पर भी बंदिशें नहीं हैं। तय उम्र के बाद शादी पर भी रोक नहीं है, लेकिन इस हक का मतलब हद पार करना नहीं है। असली दिक्कत यही है कि हक की किताब तो बांच ली गई पर हद को न तो जानने की कोशिश की गई, न समझने की। मानना तो दूर की बात है। जहां-जहां हद पर हक का पलड़ा झुका, वहां यही हुआ, जोआज हरियाणा में हो रहा है। सारे देश में हो रहा है। लाख टके का सवाल यही है कि कंधे पर लैपटाप, कान पर मोबाइल, आंख पर चश्मा लगाकर चलने वाली ये कौम क्या प्यार की कहानी का सारा फिल्माकंन दिल व घर की चाहरदीवारी से बाहर सड़क पर करना चाहती है? संविधान की किस धारा में ये अधिकार मिला है कि लिहाफ सड़क पर बिछाया जाएगा? मां-बाप की इज्जत को सरेआम उछाला जाएगा? बहन (गांव की लड़की) को बीवी बनाया जाएगा? समाज और संविधान की किस धारा में लिखा है और कहां से ये हक मिला है कि बालक पल में अपने पालक को ही नालायक का दर्जा दे डालें? आजादी के ये मायने तो नहीं थे। सवाल यह भी है कि संविधान की किस धारा में किसी भी शख्स, किसी भी गोत्र, किसी भी खाप को खून बहाने की आजादी मिली है, चाहे वो अपनो का ही क्यों न हो? मूंछ के सवाल पर समाज और कानून को हलाल नहीं किया जा सकता। वैसे ये एक सामाजिक समस्या है, इसे न तो कोई गोत्र, न कोई खाप, न कोई राजनीतिक दल, न कानून की कोई धारा इस हांके से हांक सकती, जो आज हरियाणा के हर गांव-गली और कूंचों में लगाया जा रहा है। यह एक संवेदनशील मामला है। नेतागिरी जितना दूर रहेगी, उतना ही अच्छा। मानवाधिकारों का डंका पीटने वालों को भी तह में जाना होगा। हल्ले से ये ठीक नहीं होगा। सख्ती से इसे दबाया नहीं जा सकता। किसी सजा से भी इसका समाधान नहीं निकलने वाला। घर-गांव, गोत्र और खाप वालों को भी निष्कासन से आगे की हद नहीं लांघनी चाहिए। गांव से निकालने के फैसले के पीछे समाज को बचाने का तर्क दिया जा सकता है लेकिन कानून को हाथ में लेने और किसी को मारने का अधिकार न किसी शख्स को है, न किसी समाज को है, न किसी गोत्र को है, न किसी खाप और सर्वखाप को। 

सबको ये समझने की भी जरूरत है कि ऐसे मामले क्यों होते हैं? कोई एक-दो गोत्र हों तो ऐसी दिक्कतें शायद ही पैदा हों, लेकिन हरियाणा, राजस्थान, यूपी और देश के विभिन्न हिस्सों में जाटों के चार वंश और 2700 से ज्यादा गोत्र हैं। दिन-रात का साथ है। ऐसे में गांव स्तर पर संस्कार विहीन बच्चों से गलती हो जाती है। यहां शादी कानून की नजर में चाहे जायज ठहराई जा सकती हो लेकिन समाज और नैतिकता की कसौटी पर इसे सही नहीं माना जा सकता। स्कूल-कालेज में पढ़ते समय गोत्र जैसी बातें युवा पीढ़ी को बेमायने नजर आने लगती हैं। प्रेमिका की कसौटी पर खरा उतरने के वास्ते सारे संस्कार बौने लगने लगते हैं। क्या ये जायज है? यह एक मनोवैज्ञानिक पहलू और सामाजिक बहस का संवेदनशील मुद्दा है जिसे चंद शब्दों से न तो जताया जा सकता, न ही कोई रास्ता निकाला जा सकता है। जहां तक गोत्र का सवाल है तो यह एक संस्कृत टर्म है। वैदिक राह पर चलने वालों ने इसे पहचाना तथा सामाजिक मान-सम्मान कायम रखने के वास्ते शुरू किया था। महर्षि पाणिनी ने लिखा था-उपत्यं प्रौत्रं प्रभृति गौत्रम। पहले किसी खास इंसान, जगह, भाषा और ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर गोत्र बनते गए। जहां कोई महान शख्स हुआ, उसके नाम पर गोत्र बन गया। रजवाड़ों के जाने के बाद वंश व गोत्र बढ़ने का ये सिलसिला थमा है। हां, यह जरूर है कि जैसे जाति और वंश नहीं बदल सकते, उसी तरह गोत्र भी नहीं बदल सकते। एक वंश में एक से ज्यादा गोत्र हो सकते हैं लेकिन एक गोत्र में एक से ज्यादा वंश नहीं हो सकते। जैसे चौहान वंश में 116 गोत्र हैं। जिस समय ये परंपरा शुरू हुई थी तो उसी समय ये बंदिशें लागू हो गई थीं कि समान गोत्र में शादी नहीं हो सकती। इसके पीछे सामाजिक और वैज्ञानिक कारण थे। वंश की सेहत और नैतिक मूल्यों की रक्षा के तर्क थे। मानव धर्मशास्त्र के चैप्टर-3 और श्लोक 5 में भी कहा गया है- अस पिण्डा च या मातुर गौत्रा च या पितु:, सा प्रशस्ता द्विजातीनां दार, कर्माणि मैथुने। यानि बाप के गोत्र और मां की छह पीढ़ियों के गोत्र में लड़की की शादी जायज नहीं। हिंदुओं में शादी का जो परंपरागत प्रावधान है वो भी यही कहता है कि चार गोत्र का खास ख्याल रखो- यानि मां, पिता, पिता की मां और मां की मां (नानी) के गोत्र में शादी वर्जित है। हरियाणा में जिस पर हल्ला हो रहा है, वह इसी हदके उल्लंघन का नतीजा है। सब जानते हैं कि भारत गांवों में बसता है। गांवों का सारा ताना-बाना आज इसी वजह से मजाबूत है क्योंकि वहां हर लड़की बहन और हर लड़का भाई समझा और माना जाता है, चाहे वो किसी भी जात का क्यों ना हो? दिन-रात ताऊ और चाचा कहने वालों की बेटियों को क्या बहू बनाया जा सकता है? ऐसा होना सामाजिक और नैतिक मूल्यों का पतन नहीं है? जब-जब इस हद को लांघा जाएगा, जाहिर सी बात है कि समाज में उथल-पुथल होगी और अमूमन कड़वे नतीजे ही सामने आएंगे। जिस प्यार व शादी से अगर रिश्ते टूटते हों, समाज बिखरता हो, परिवार बेइज्जत होता हो, खून बहता हो तो उसे  प्यार कैसे माना जा सकता है? प्यार तो बलिदान मांगता है। यहां तो वो खून बहा रहा है। जाटों में अमूमन जर, जोरू और जमीन के ही विवाद होते हैं। प्यार व शादी के विवाद कई बार गोत्र में नहीं सुलझ पाते। गांव पंचायतों में नहीं निपट पाते। न्याय के वास्ते इससे ऊपर खाप हैं और फिर आखिरी सर्व खाप। यानि हरियाणा की सर्व खाप। ऐसे मामलों में ज्यादातर हुक्का-पानी बंद और गांव से निष्कासन के ही फैसले आते हैं। खाप का इतिहास बेहद पुराना है। आन-बान-शान के लिए मर मिटने का। अतीत से आज तक इसे सामाजिकप्रशासन का दर्जा मिला हुआ है। कुछ गांवों को मिलकर खाप बनती हैं। जैसे 84 गांव की खाप। एक गोत्र एक ही खाप में रह सकता है। पंचायतें जब मामले नहीं निपटा पातीं तो वे खाप में जाते हैं और जब दो खाप में पेंच फंस जाते हैं तो फिर हरियाणा की सर्व खाप तय करती है। इसके सारे फैसले माने जाते हैं। कई बार उन्हें कानून की अदालतों में चुनौती दे दी जाती है। लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता और इतिहास गवाह है कि इस व्यवस्था से हमलावरों के खिलाफ तमाम जंग लड़ी और जीती गई तथा सामाजिक झगड़े सर्वखाप स्तर पर निपटते रहे। चाहे वह मुल्तान में हंसके खिलाफ जंग हो, मोहम्मद गौरी के खिलाफ तारोरी की जंग हो या अलाउद्दीन खिलजी के खिलाफ हिंडन और काली नदी की जंग हो या फिर 1398 में तैमूर के खिलाफ जंग हो। सबमें खाप व सर्वखाप ने निर्णायक रोल अदा किया। इतिहास बेहद लंबा चौड़ा है। चंद शब्दों में समेटना आसान नहीं पर, सच यही है कि सर्वखाप के सामने तब दुश्मन होते थे, अब अपने हैं। चाहे जितना समय बदल गया हो खाप और सर्व खाप की महत्ता इस समाज में आज भी उतनी ही है। इससे छेड़छाड़ के नतीजे ज्यादा खराब हो सकते हैं। इस व्यवस्था को बनाने का श्रेय आर्यसमाज को ही जाता है। जिसकी संस्कारों की मजबूत नींव पर यह बुलंद इमारत खड़ी हुई थी। जिसे हिलाने की कोशिशें होती रहती हैं। युवा पीढ़ी को यह तय करना ही होगा कि क्या भाई-बहन और मां-बाप से बढ़कर भी प्यार है? यह भी तय हो जाना चाहिए कि क्या प्यार कौम, समाज और राज्य से भी बढ़कर है? इस युवा पीढ़ी को गौरवशाली इतिहास का एहसास कराना भी जरूरी है ताकि वो उस पर नाज करे। गाज गिराने वाला साज न बजाए। प्यार करो पर हद में। हद से बाहर भद्द ही पिटेगी। चाहे जात जो भी हो, धर्म जो भी हो।

एक और बात। यह कोई लैला-मजनूं का किस्सा भी नहीं है कि मीडिया इसे फिल्मी कहानी की तरह पेश करे। खासकर टीवी चैनल। इतिहास को पढ़े बिना, सामाजिक ढांचे को समझे बिना, गहराई में जाए बिना तालिबानी संसार… प्यार पर वार…. के ढोल बजाना जायज नहीं। सामाजिक बीमारी को लव स्टोरी बनाने की सोच सही नहीं। लोकतंत्र में मिले हक और देश के 21वीं सदी में होने के पाठ मीडिया में बैठे लोगों को फिर पढ़ लेने चाहिए ताकि आग में घी के काम से वे और बदनाम न हों। उनमें यह समझ जरूर होनी चाहिए कि हर धोतीधारी गंवार नहीं होता। हर जींस पहनने वाला देश व समाज की तरक्की का असली चेहरा और ठेकेदार नहीं होता। जिस देश की कल्चर और इतिहास की सारी दुनिया कायल हो, अपनाना चाहती हो, क्या उस देश में 500-700 रुपए की जींस से नैतिक मूल्यों का मूल्यांकन होगा? क्या इसी संस्कृति से देश की वर्तमान तस्वीर और कौम की सुनहरी तकदीर लिखी जाएगी? क्या टीवी चैनल पर बैठे मीडिया के साथी तालिबानी कल्चर को नहीं जानते? उस कल्चर में विस्तर पर बहन के अलावा सब जायज है, यहां ठीक उल्टा है। फिर ये तालिबानी चेहरे कैसे हुए? जिस तरह पूरे देश में प्यार पर वार होते हैं तो फिर इस सारे देश को क्या तालिबानी कहा जाना वाजिब होगा? अगर ये साथी इतिहास पढ़े होते तो अफगानिस्तान और तालिबान से राजस्थान, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रिश्तों को जरूर समझ जाते। समझा पाते। पर जिस कौम को अपना इतिहास मालूम न हो, उनके कथन से समाज में फैलते जहर का एहसास न हो वो जो मरजी हो बोल भी सकते हैं, दिखा भी सकते हैं। किसी गांव वाले से लगातार ये पूछना कि वो बालिग है तो उसने गोत्र में लव मैरिज क्यों नहीं की? गोत्र से बड़ा कानून है। कानून से हक मिला है। यानि गोत्र जाए चूल्हे में, लव मैरिज हो। अगर आज गोत्र की सीमा टूटी है, कल गांव की टूटेगी, परसों घर की। मीडिया ये कौन सा पाठ पढ़ा और सिखा रहा है? ये हक का दुरुपयोग नहीं तो और क्या है? यह हद का अतिक्रमण ही तो है। सवाल यह भी उठता है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया की नजर में तरक्की के क्या मापदंड हैं? सड़कों पर समलैंगिक जोड़ों की भरमार, बहन को छोड़ किसी भी लड़की से प्यार, सारी शर्मो हया तार-तार को अगर हम समाज व देश की तरक्की का परिचायक मानबैठे हैं तो फिर इस सवाल पर अब मंथन का समय आ गया है कि देश किस राह पर चलेगा, क्या ऐसी ही तरक्की हमें चाहिए, जहां लाज न हो? कड़वा सच यही है कि टीवी अपनी अपसंस्कृति को देश के हर इंसान में तलाशने और फैलाने में जुटा है। जहां ये नजर नहीं आती, उसे जो चाहे नाम दे दो। मीडिया को इस बात के जवाब तलाशने ही होंगे कि आखिर लव मैरिज ज्यादा विफल क्यों होती हैं? पुरातन शादी की व्यवस्था की सफलता अगर 90 फीसदी से ऊपर है तो लव मैरिज 50 फीसदी से नीचे क्यों है?  स क्यों की तह में जाओ, सबको समझाओ, फिर प्यार के बिगुल बजाओ। हमेशा की तरह हरियाणा के मसले पर भी मीडिया ने नासमझी का ही परिचय दिया है।

टीआरपी के लिए फिल्मी परदे के हीरो दिखाने की बजाय अगर मीडिया असली हीरो ढूंढे, पैदा करे तो इस समाज की भी टीआरपी बढ़ेगी, उसकी भी साख बढ़ेगी. आदर्श चेहरों से खाली इस साधु-संतों की धरती पर फिर बहार की फसल उगेगी। हक और हद की दोस्ती मजबूत होगी। न प्यार पर वार होंगे, ना हम शर्मसारहोंगे। मीडिया ये कर सकता है। अगर नहीं तो फिर आग में घी के रोल का फटा ढोल उसकी पोल खोल रहा है। आवाज अगर नहीं सुनाई दे रही है तो यह उनकी बदकिस्मती। 


लेखक देशपाल सिंह पंवार वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों दैनिक हरिभूमि, रायपुर के स्थानीय संपादक हैं। इनसे संपर्क करने के लिए आप [email protected] या 09303508100 का सहारा ले सकते हैं।  This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it

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