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हिंदुस्तान : कौशांबी में बंटा प्रतापगढ़ का अखबार

कई खबरें रिपीट : धनतेरस के दिन पटाखे फोड़ने के लिए स्टाफ से जबरन वसूले गए रुपये : इलाहाबाद से बी4एम के एक सुधी पाठक (जाहिर है, वो पत्रकार ही होंगे) ने एक पत्र भेजा है। पत्र को पढ़कर लग रहा है कि वे जरूर हिंदुस्तान, इलाहाबाद में कार्यरत होंगे। उन्होंने हिंदुस्तान, इलाहाबाद के अंदर की कई घटनाओं-बातों को लाइव तरीके से पेश किया है। इसे पढ़ते हुए एहसास होता है कि जैसे आप खुद भी हिंदुस्तान, इलाहाबाद के आफिस में बैठे हों और सब कुछ आपकी आंखों के सामने हो रहा हो। पत्र भेजने वाले महोदय ने दावा किया है कि घटनाएं पूरी तरह सही हैं, चाहें तो अपने स्तर से पता करा लें। बी4एम की छानबीन में भी ये मामले सही पाए गए हैं। हां, यह जरूर है कि लेखन में थोड़ी बहुत अतिरंजना है पर ‘रवि-कवि’ के मामले में इतना तो चलता है। लीजिए, पत्र पढ़िए…। -एडिटर, भड़ास4मीडिया

कई खबरें रिपीट : धनतेरस के दिन पटाखे फोड़ने के लिए स्टाफ से जबरन वसूले गए रुपये : इलाहाबाद से बी4एम के एक सुधी पाठक (जाहिर है, वो पत्रकार ही होंगे) ने एक पत्र भेजा है। पत्र को पढ़कर लग रहा है कि वे जरूर हिंदुस्तान, इलाहाबाद में कार्यरत होंगे। उन्होंने हिंदुस्तान, इलाहाबाद के अंदर की कई घटनाओं-बातों को लाइव तरीके से पेश किया है। इसे पढ़ते हुए एहसास होता है कि जैसे आप खुद भी हिंदुस्तान, इलाहाबाद के आफिस में बैठे हों और सब कुछ आपकी आंखों के सामने हो रहा हो। पत्र भेजने वाले महोदय ने दावा किया है कि घटनाएं पूरी तरह सही हैं, चाहें तो अपने स्तर से पता करा लें। बी4एम की छानबीन में भी ये मामले सही पाए गए हैं। हां, यह जरूर है कि लेखन में थोड़ी बहुत अतिरंजना है पर ‘रवि-कवि’ के मामले में इतना तो चलता है। लीजिए, पत्र पढ़िए…। -एडिटर, भड़ास4मीडिया


लगता है धनतेरस और दिवाली का त्योहार हिन्दुस्तान, इलाहाबाद को रास नहीं आया। गुरुवार की शाम से शुरू हुई घटनाएं शुक्रवार की सुबह तक जारी रहीं। शुक्रवार की सुबह कौशांबी के एडिशन में प्रतापगढ़ का अखबार भेजा गया। सुबह से पाठकों के फोन आने लगे। पहले तो लगा की बंडल गलत चला आया होगा। जब सारे सेंटरों की हालत पता चली तो सभी परेशान। पूरे कौशांबी में प्रतापगढ़ का अखबार बांटा जा रहा था। कौशांबी के कर्मचारियों ने जब इलाहाबाद आफिस में इस गड़बड़ी की खबर दी तो बताया गया कि मैनेजमेंट का फैसला है। टेक्निकल गड़बडिय़ों के कारण ऐसा किया गया। कौशांबी का एडिशन प्रिंट होने के समय इमेजसेटर खराब हो गया था इसलिए प्रतापगढ़ एडिशन को ही और ज्यादा छाप कर कौशांबी में भेज दिया गया। मतलब, अखबार गलती से नहीं, जानबूझ कर भेजा गया। अरे, इमेजसेटर खराब था तो अखबार छापते ही नहीं। कौशांबी के रीडर्स को प्रतापगढ़ का अखबार देने की क्या जरूरत थी? कई बार हुआ है कि मशीन की खराबी या टैक्सी की प्राब्लम से अखबार नहीं बंटा। यह पहली बार हुआ है कि मशीन की खराबी के कारण एक एडिशन का अखबार जानबूझ कर दूसरे एडिशन में भेजा गया। यह तो थी इलाहाबाद एडिशन के डाक की बात।

अब सिटी एडिशन की चर्चा। यहाँ भी गजब हो गया। शनिवार के ही सिटी एडिशन में यहां नौ खबरें रिपीट थीं। जो खबर पेज छह पर लीड है, वही पेज नौ पर भी लीड बनी है। पेज छह पर लीड के बगल में जो खबर छपी है, वही खबर पेज नौ पर लीड में इनसेट लगी है। यही नहीं, तीन खबरें पेज छह पर छोटी छपी हैं तो उन्हीं को पेज नौ पर खूब बढ़ा कर छापा गया है। इस रिपिटेशन पर सुबह की मीटिंग में भी बहसबाजी हुई। सभी एक दूसरे पर दोष मढ़ रहे थे। हालांकि चर्चा यह है कि इन दिनों यहाँ अखबार के अंदर गुटबाजी अपने चरम पर है। पिछले दिनों एक अदने से एसओ द्वारा यहाँ के प्रिंसिपल करेस्पांडेंट और रेजीडेंट एडिटर को भेजी गई नोटिस के भड़ास4मीडिया पर आने के बाद से कुछ लोगों को  लगता है कि यह आफिस के ही लोगों की कारस्तानी है। तभी से यहां गुटबाजी और तेज हो गई है।

इससे पहले यहां हुई चंदा वसूली में भी गुटबाजी हावी रही। मैनेजमेंट के लोगों का बुधवार को मूड कर गया कि धनतेरस की शाम में पटाखे बजाए जाएं। अब सवाल था कि पैसे कहां से आएंगे। फैसला हुआ कि जिस बिल्डिंग में आफिस है, उसी की छत पर पटाखे फोड़े जाएं और बिल्डिंग मालिक से पांच-सात हजार चंदा ले लिया जाए। बिल्डिंग मालिक ने पैसे कम दिए तो फैसला हुआ कि क्यों न कर्मचारियों से ही वसूली की जाए। अब मैनेजमेंट और वो भी फाइनेंस व एकाउंट विभाग के लोग चंदा मांगेंगे तो कर्मचारियों की क्या मजाल की चंदा न दें। एडिटोरियल के कर्मचारियों को छोड़ कर अन्य विभागों के कर्मचारियों ने तो रोते-गाते सौ-सौ रुपये का चंदा दे दिया। एडिटोरियल में जब वसूली शुरू हुई तो विरोध होने लगा। तब इन्हें बताया गया की रेजीडेंट एडिटर ने भी पैसे दिए हैं इसलिए आपको भी देना पड़ेगा। इस पर कुछ स्टाफर लोगों ने तो दे दिया, ज्यादातर लोगों ने देने से साफ इनकार कर दिया। अब जितना पैसा ये लोग जुटाना चाहते थे, उतना नहीं जुट पाया तो स्ट्रिंगरों से वसूली शुरू की गई। इन लोगों से जबरिया पैसे लिए गए। इतना ही नहीं, यूनिवर्सिटी के कुछ छात्र जो इंटर्नशिप को आए हैं, उनसे भी सौ-सौ रुपये लिए गए।


 

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