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दुख-दर्द

‘क्रिसमस गिफ्ट नहीं चाहिए पापा, तुम लौट आओ’

अशोक उपाध्याय की मौत से जर्नलिस्ट स्तब्ध हैं। कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। आखिर किस तनाव ने अशोक उपाध्याय की जान ले ली? तनाव तो था, यह तो तय बात है। अशोक के लिए घातक सिद्ध हुआ उनका तनाव न शेयर करने की आदत और अंतर्मुखी व्यक्तित्व। वे उतना ही बोलते थे, जितना जरूरी होता था। नोएडा के सेक्टर 11 स्थित मेट्रो हास्पिटल में पिता अशोक के शव के पास उनका 11 साल का बेटा रोते हुए कह रहा था… पापा, मुझे क्रिसमस गिफ्ट नहीं चाहिए, बस तुम लौट आओ…. पापा प्लीज, बस तुम लौट आओ, मुझे कोई गिफ्ट नहीं चाहिए…..। उनकी पत्नी रो रहीं थीं… मित्तल ने मार दिया….। पत्नी और बेटे की रुलाई व बातें देख-सुन आसपास खड़े वीओआईकर्मियों की आंखें नम हो गईं। पिछले एक साल से वीओआई में जिस तरह अव्यवस्था रही, सेलरी नहीं मिली, बेरोजगारी के कई महीने झेलने पड़े, भुगतान नहीं मिला, बकाया के लिए मिले चेक बाउंस हुए, पीएफ के लिए पैसे काटे गए पर एकाउंट में जमा ही नहीं किया गया… उसने सैकड़ों वीओआई कर्मियों को अंदर से तोड़कर रख दिया।

अशोक उपाध्याय की मौत से जर्नलिस्ट स्तब्ध हैं। कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। आखिर किस तनाव ने अशोक उपाध्याय की जान ले ली? तनाव तो था, यह तो तय बात है। अशोक के लिए घातक सिद्ध हुआ उनका तनाव न शेयर करने की आदत और अंतर्मुखी व्यक्तित्व। वे उतना ही बोलते थे, जितना जरूरी होता था। नोएडा के सेक्टर 11 स्थित मेट्रो हास्पिटल में पिता अशोक के शव के पास उनका 11 साल का बेटा रोते हुए कह रहा था… पापा, मुझे क्रिसमस गिफ्ट नहीं चाहिए, बस तुम लौट आओ…. पापा प्लीज, बस तुम लौट आओ, मुझे कोई गिफ्ट नहीं चाहिए…..। उनकी पत्नी रो रहीं थीं… मित्तल ने मार दिया….। पत्नी और बेटे की रुलाई व बातें देख-सुन आसपास खड़े वीओआईकर्मियों की आंखें नम हो गईं। पिछले एक साल से वीओआई में जिस तरह अव्यवस्था रही, सेलरी नहीं मिली, बेरोजगारी के कई महीने झेलने पड़े, भुगतान नहीं मिला, बकाया के लिए मिले चेक बाउंस हुए, पीएफ के लिए पैसे काटे गए पर एकाउंट में जमा ही नहीं किया गया… उसने सैकड़ों वीओआई कर्मियों को अंदर से तोड़कर रख दिया।

जिनके चेहरों पर कभी रौनक व हंसी-खुशी हुआ करती थी, वे उदास व मलिन होते गए। अशोक उपाध्याय के साथ भी यही सब कुछ हुआ। वे औरों की तरह अपनी भड़ास कहीं निकालते नहीं थे। न तो शोर मचाते थे, न चिल्लाते थे, न दोस्ती-यारी में गप्पेबाजी करते थे। काम से काम। तनाव के क्षणों में वे सिगरेट पीते थे। सिगरेट पीने के लिए वे कई बार वीओआई आफिस से बाहर निकलते। सूत्रों के मुताबिक अशोक जी के परिवार में उनके एक भाई हैं जो मुंबई में रहते हैं। और कोई नहीं है परिवार में। सारा कुछ उन्हीं को देखना करना था। पत्नी गाजियाबाद के इंदिरापुरम में स्थित कैंब्रिज स्कूल में पढ़ाती हैं। उनका भी कांट्रैक्ट दिसंबर महीने में खत्म हो रहा है। इसका भी तनाव अशोक को था। आज सुबह जब बेचैनी और गर्मी होने की शिकायत के बाद खुद ही वे अपनी कार में जाकर लेट गए तो उनकी शिफ्ट की रत्ना नामक लड़की उनको तलाशते हुए बाहर आई। सुबह की शिफ्ट के इंचार्ज कल्याण कुमार जब आफिस पहुंचे तो उन्हें चार्ज अशोक उपाध्याय से लेना था पर अशोक नहीं मिले। उन्हें बताया गया कि अशोक जी जा चुके हैं। पर रत्ना ने बताया कि वे अपनी कार में लेटे हैं और आवाज लगाने पर कुछ बोल भी नहीं रहे हैं।

कल्याण कुमार ने जाकर मौके पर देखा तो अशोक बेसुध पड़े हुए थे। मेट्रो हास्पिटल के डाक्टरों द्वारा अशोक जी को मृत घोषित करने के बाद उनके परिवार को सूचित किया गया। आफिस की गाड़ी उनके घर गई और पत्नी वे बेटे को लेकर हास्पिटल पहुंची। अशोक जी को जानने वाले कहते हैं कि आर्थिक दिक्कत से उपजे तनाव, काम का बोझ, परिवार की चिंता… इन्हीं सब वजहों ने मिल-जुलकर अशोक जी को मौत की कगार पर पहुंचा दिया और अंततः उनके प्राण पखेरू हो गए। अब बड़ा सवाल उनके परिवार के भरण-पोषण और बेटे की परवरिश व पढ़ाई-लिखाई की है। वीओआई के निदेशक अमित सिन्हा से जब इस बारे में बात की गई तो उन्होंने कहा कि अशोक जी को जितनी भी सेलरी मिलती थी, उतनी उनकी पत्नी को मिला करेगी। तात्कालिक तौर पर पांच लाख रुपये उनके परिजनों को वीओआई की तरफ से दिया जाएगा। अमित के मुताबिक अशोक जी की मौत पर अभी तक भरोसा नहीं हो पा रहा है। उनके व्यक्तित्व व व्यवहार से मैं बहुत प्रभावित रहा। किसी से उनको शिकायत नहीं थी और न किसी की उन्होंने कभी शिकायत की। हम लोग अशोक जी के परिवार को अपने परिवार का हिस्सा बना लेंगे। उनका कोई भी दुख हम सभी का दुख रहेगा। किसी भी मोड़ पर उनके परिवार को जो भी मदद चाहिए, हम हर समय उपलब्ध रहेंगे। फिलहाल तो मैं इतना ही कहना चाहूंगा।

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