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निर्मल के आत्मबल से प्रभावित हुईं थीं अर्चना

[caption id="attachment_16974" align="alignnone" width="505"]निर्मल पांडेय, मेघना कोठारी और सुरेंद्र अग्निहोत्रीनिर्मल पांडेय, मेघना कोठारी और सुरेंद्र अग्निहोत्री[/caption]

‘सुर ना सधे क्या गाऊं मैं…’ फिल्म ‘बसन्त बहार’ का यह गीत गाते-गाते निर्मल पाण्डेय शास्त्रीय राग ‘बसन्त बहार’ में ऐसे डूबे कि उन्हें होश ही नही रहा कि किसी धारावाहिक के सेट पर हैं और उन्हें अपना रोल प्ले करने जाना है। लखनऊ में वर्ष 2003 को निर्मल पाण्डेय अभिनेत्री मेघना कोठारी के साथ एक धारावाहिक की शूटिंग करने आये कि पुरानी यादें एक बार फिर ताजी हो गईं। पूना फिल्म संस्थान से फिल्म रसास्वाद पाठ्यक्रम करने के बाद जब मैं मुबई पहुंचा तो अभिनेता राजा बुन्देला ने निर्मल से मुलाकात करायी। विक्रम मल्लाह के रूप में बुन्देलखण्ड के मिथकीय चरित्र को निभाकर शोहरत हासिल करने वाले निर्मल की जब यश चौहान ने प्रशंसा की तो लगा वाकई किसी कलाकार से मिलना हो रहा है।

निर्मल पांडेय, मेघना कोठारी और सुरेंद्र अग्निहोत्री

निर्मल पांडेय, मेघना कोठारी और सुरेंद्र अग्निहोत्री

‘सुर ना सधे क्या गाऊं मैं…’ फिल्म ‘बसन्त बहार’ का यह गीत गाते-गाते निर्मल पाण्डेय शास्त्रीय राग ‘बसन्त बहार’ में ऐसे डूबे कि उन्हें होश ही नही रहा कि किसी धारावाहिक के सेट पर हैं और उन्हें अपना रोल प्ले करने जाना है। लखनऊ में वर्ष 2003 को निर्मल पाण्डेय अभिनेत्री मेघना कोठारी के साथ एक धारावाहिक की शूटिंग करने आये कि पुरानी यादें एक बार फिर ताजी हो गईं। पूना फिल्म संस्थान से फिल्म रसास्वाद पाठ्यक्रम करने के बाद जब मैं मुबई पहुंचा तो अभिनेता राजा बुन्देला ने निर्मल से मुलाकात करायी। विक्रम मल्लाह के रूप में बुन्देलखण्ड के मिथकीय चरित्र को निभाकर शोहरत हासिल करने वाले निर्मल की जब यश चौहान ने प्रशंसा की तो लगा वाकई किसी कलाकार से मिलना हो रहा है।

वे मन से भी निर्मल थे। फिल्मों में रहते हुये भी अपनापन और मित्रता को सदा याद करते रहे। जब लखनऊ में धारावाहिक की शूटिंग अम्बेडकर पार्क के पास होनी थी तो तत्कालीन एल.डी.ए. की सचिव ने अनुमति पत्र पर जब कोई निर्णय नहीं लिया तो निर्देशक के लाख डरने के बावजूद भी निर्मल शूटिंग के लिये तैयार हो गये। निर्मल में गजब का आत्मबल था। उसी आत्मबल से प्रभावित होकर इसी धारावाहिक में काम करने आयीं अर्चना उनकी जीवन संगिनी बन गईं।

पिछले माह निर्मल लखनऊ के एक माल में मेरे एक मित्र को मिल गये तो उन्होंने निर्मल को मेरी याद दिलायी। निर्मल ने स्वयं फोन नम्बर लेकर देर रात फोन किया और काफी देर तक बातें कीं। स्टेज पर ‘अन्धायुग’ फिर से प्रस्तुत करने की रूपरेखा बताते हुये कहा कि अब मेरा दिल नहीं लगता फिल्मों में, मुझे तो अपनी मिट्टी की सोंधी महक, पहाड़ों के झरने से निकलती कल-कल आवाज बुला रही है। मैं फिर लौट जाना चाहता हूं उस लोक दुनिया में जहां सिर्फ अपनापन है।

निर्मल को संगीत से बड़ा गहरा लगाव था। उन्होंने पहाड़ के न जाने कितने लोक गायकों की विलुप्त शैलियों को अंगीकार कर लिया था। इन शैलियों-गायकी को एलबम के माध्यम से दुनिया के सामने लाना चाहते थे। सुर-राग और रस के एकनिष्ठ साधक निर्मल का असमय जाना हम लोगों के लिए एक गहरे दर्द से गुजरने जैसा है। निर्मल के लिये कहने को तो इस दिल में कितनी सारी बाते है… बस इतना ही कहूंगा कि… राह दिखाती सदा रहेंगी याद तुम्हारी बातें। वैसे, इस दुनिया में तो आना-जाना हर पल होता रहता है पर जो अच्छा काम करके जाता है, जग उसी के लिए तो रोता है।

-सुरेंद्र अग्निहोत्री

लखनऊ

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0 Comments

  1. अमित गर्ग

    February 19, 2010 at 3:48 pm

    प्रिय सुरेन्द्र जी.
    यूँ तो इस पल बिन बोले ही बहुत कुछ कहा जा सकता है और कहा भी जा रहा है. बहुत सारे लोग अपनी-अपनी भावनाओं को शब्द दे रहे हैं. मैं सिर्फ एक गीत की पंक्तियों से अपनी भावना व्यक्त करना चाहता हूं.

    …इंसान मरा करते हैं, विश्वास नहीं मरता है, सपने सच हो जाते हैं, हर दुआ काम आती है, ये बंधन तो प्यार का बंधन है…!

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