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सिर्फ नौकरी नहीं, आंख भी है पत्रकारिता

[caption id="attachment_17109" align="alignleft"]अशोक पांडेयअशोक पांडेय[/caption]पत्रकार लिखेंगे नई सदी का साहित्य : कहानी लेखन के (अगर अनिल यादव की इस रचना को अपनी सुविधा भर के लिए सिर्फ कहानी कहा जाए तो) तमाम स्थापित मूल्यों को चुनौती देती नगरवधुओं की यह अतियथार्थवादी तिलिस्मी दास्तान अपने कथ्य के कारण बहुत महत्वपूर्ण है।

अशोक पांडेयपत्रकार लिखेंगे नई सदी का साहित्य : कहानी लेखन के (अगर अनिल यादव की इस रचना को अपनी सुविधा भर के लिए सिर्फ कहानी कहा जाए तो) तमाम स्थापित मूल्यों को चुनौती देती नगरवधुओं की यह अतियथार्थवादी तिलिस्मी दास्तान अपने कथ्य के कारण बहुत महत्वपूर्ण है।

इस कहानी का स्थापत्य इसे और भी ज़्यादा ज़रूरी बनाता है. क्या ज़रूरी है कि कोई कहानी सिर्फ़ एक या दो लोगों की या एक गांव या शहर की कहानी हो? हिन्दी भाषा का दुर्भाग्य रहा है कि एकांगी कहानियों या एकायामी कहानियों की भरमार के चलते हमारी गऊ पट्टी में अच्छा और सामयिक पढ़ने की तमीज़ तक विकसित नहीं हो सकी. फ़िक्शन को उसके बंधे-बंधाए खाके से बाहर निकालने की ज़रूरत को हमसे भी ग़रीब लातीन अमेरिकी देशों को तब महसूस हो गई थी जब मनोहर कहानियां हमारे यहां निकलना शुरू हुई थी. क्या वजह है कि हमारे यहां लोकप्रिय उपन्यास-कहानियों के नाम पर गिनाने को राग दरबारी, कसप और मैला आंचल के बाद याददाश्त को कुरेदना चालू करना होता है?

ऊपर मैंने एक शब्द का सायास प्रयोग किया था- सामयिकता. भयानक तेज़ रफ़्तार से लगातार बदलते समय को आज के उत्तर भारतीय सन्दर्भ में पकड़ पाने की ताब यदि किसी में हो सकती है तो उस व्यक्ति को पत्रकार होना चाहिए. ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है. लातीन अमेरिका और अरब संसार के देशों से पिछले तीन चार दशकों से निकले क्लासिक्स को ग़ौर से देखें तो आप पाएंगे कि उनके रचनाकार अपने शुरुआती जीवन में छोटे क़स्बों में बतौर पत्रकार काम कर चुके थे- चाहे वे महान गाब्रीएल गार्सिया मारकेज़ हों चाहे मारीयो वार्गास योस्सा या सादी यूसुफ़.

नगरवधुओं की त्रासदी को रेकॉर्ड करती अनिल यादव की यह कहानी (जिसे असल में मैं लघु उपन्यास कहना पसन्द करूंगा) यदि सिर्फ़ नगरवधुओं भर की कहानी होती तो उस पर किसी भी तरह की बात करना मेरे लिए सम्भव नहीं होता. इस कथा में कई सारी सामूहिक त्रासदियां हैं और कई सारी व्यक्तिगत त्रासदियां भी. अगर यह छवि और प्रकाश जैसे एक जोड़े के घनघोर एकाकीपन भरे संघर्ष का चिट्ठा है, विस्थापन के कगार तलक पहुंचा दी गई नगरवधुओं के जीवन का बारीक सन्धान है तो समाज में राजनीति और अफ़सरशाही की शह पर फैलाए जा रहे तमाम कोढ़ों को उघाड़ने का जोख़िमभरा प्रयास भी.

एक प्रेमग्रस्त प्रेस फ़ोटोग्राफ़र, कुछ वेश्याएं, बड़े पुलिस अफ़सर, एक आत्महत्या, महिलावादी एनजीओ, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे राजनेता और एक इलाकाई अख़बार का दफ़्तर- एक अच्छी ख़बर बनाने के वास्ते सबसे उम्दा संसाधन माने जा सकते हैं ये सारे तत्व. लेकिन इन्हीं तत्वों का अन्वेषण करने पर ख़बर से बड़ा क्या बनाया जा सकता है, यह कहानी हमारे सामने एक नज़ीर रखती है.

गाब्रीएल गार्सिया मारकेज़ ने एक इन्टरव्यू में कहा था कि यदि अपने अख़बार में वे यह लिखते कि उन्होंने कल शाम कुछ हाथियों को उड़ते हुए देखा तो कोई उनकी बात पर यक़ीन न करता. इसके बरअक्स यदि वे लिखते कि कल शाम छः बजकर दस मिनट पर उन्होंने मुख्य बाज़ार के ऊपर पैंसठ हाथी उड़ते हुए देखे तो यह ‘घटना’ उनके अख़बार के पहले पन्ने पर छप सक सकती थी. सतत क्षय और ह्रास की तरफ़ जा रहे हमारे समाज की विसंगतियों और विद्रूपताओं को पकड़ पाने को आवश्यक रचनात्मक साधन सबसे प्रचुर मात्रा में एक पत्रकार के पास ही हो सकते हैं. ख़बरों की आयु बहुत कम होती है लेकिन जिन तत्वों से ये ख़बरें निकलती हैं उनका असर समाज में बड़ी देर तक रहता है. रात रात भर एक ख़बर की तलाश करता एक सजग पत्रकार दरअसल समाज के गूढ़तम रहस्यों से रूबरू हो रहा होता है. दुर्भाग्यवश ज़्यादातर पत्रकार इसे नौकरी भर समझने लगते हैं.

ख़बर और रचना में यहीं से फ़र्क बनना शुरू होता है. इधर हिन्दी साहित्य में तेज़ी से पत्रकारिता प्रेरित रचनाओं ने आना शुरू कर दिया है. यह एक अच्छी ख़बर है. दीगर है कि इनमें से अधिकांश लेखक के फ़र्स्ट हैंड अनुभव की या वांछित रचनाशीलता की कमी की वजह से दोयम दर्ज़े की होती हैं. लेकिन एकाध उल्लेखनीय रचनाएं भी देखने को मिली हैं. ‘कटरे की चौदह साल की रुकुमिनी की खण्डित गद्यकथा’ को दर्ज़ करती अतुलनीय कविता के माध्यम से वीरेन डंगवाल आपको बताते हैं कि कैसे एक सजग पत्रकार-रचनाकार एक अलग रास्ता तय करता हुआ क्या-क्या कर सकता है. अनिल यादव की इस कहानी के भाग्यशाली शुरुआती पाठकों में एक होने के बाद मेरा विश्वास और भी दृढ़ हुआ था कि इक्कीसवीं सदी का साहित्य असल में पत्रकारिता और मीडिया से ही निर्देशित होना है.

यह यक़ीन आज भी क़ायम है.

लेखक अशोक पांडे करीब सौ किताबों का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद कर चुके हैं. कवि हैं. अच्छे पर्वतारोही रहे हैं. हलद्वानी में रहते हैं. कबाड़खाना ब्लाग के माडरेटर हैं.

अनिल यादव की कहानी ”…क्योंकि नगर वधुएं अखबार नहीं पढ़तीं” को पढ़ने के लिए नीचे (कमेंट आप्शन के ठीक नीचे) दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें.

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0 Comments

  1. kamta

    March 16, 2010 at 8:00 am

    भइया, अशोक जी के यकीन पर अपना यकीन कत्‍तई नहीं है। अपनी बात को पॉजिटिव वे में कहने की कोशिश करते हैं। कहानीकारी अनिल यादव, जिनके प्रसंग में पांडेय जी ने लिखा है कि इक्कीसवीं सदी का साहित्य असल में पत्रकारिता और मीडिया से ही निर्देशित होना है, खुद प्रकारांतर से कह-लिख चुके हैं कि समाज के कटु यथार्थ को देखने की नजर उन्हें जनता, आंदोलन और मार्क्सुवादी विश्व –दृष्टि से मिली है।
    अनिल ने जिन प्रत्यकक्ष जीवनानुभवों को कहानी में पिरोया है उस तरह के या उससे मिलते-जुलते अनुभव तो प्राय: सभी क्राइम रिपोर्टरों के पास होते हैं लेकिन सजग-मानव प्रेम से लबरेज नजर नहीं होती। हां, अगर यह कहा जाये कि 21 वीं सदी के मीडियाकर्मी विश्वनदृष्टि के रूप में मार्क्स वाद को अंगीकार करने की ओर प्रवृत्त होंगे तब तो उनकी बात मानने लायक होगी। मार्क्सस ने लिखा है, अपनी समस्ति कमजोरियों समेत मनुष्य मुझे प्याररा है और अनिल के लेखन में यह बात पुरजोर ढंग से देखने को मिलती है उनका घोषित राजनीतिक स्टैंमड चाहे जो भी हो।

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