कचोटता है नैतिकता का पुल

अभय तिवारी
अभय तिवारी
‘…क्योंकि नगर वधुएं अखबार नहीं पढ़तीं’ : बनारस और रंडियों का रिश्ता इतना पुराना है कि उसकी दखल कहावतों में भी हो गई है। फिर रंडियों से जुड़े मामले हमेशा दिलचस्प होते हैं। न सिर्फ़ इसलिए कि वे हमारे स्वभाव की मूल वृत्ति से जुड़ा व्यापार करती हैं बल्कि इसलिए भी कि एक आम शरीफ़ आदमी को उनके जीवन के बारे में अधिक कुछ मालूम नहीं होता। जिज्ञासा अलबत्ता ज़रूर होती है।

मंटो जैसे लेखक की सफलता के पीछे एक बड़ा राज़ यह भी था कि वो उन मसलों पर अपनी क़लम चलाते थे जो हाशिये पर पड़े लोगों से तअल्लुक रखते थे और जिनके बारे में मालूमात पढ़ने वालों में कम होती थी। कहानी दिलचस्प है कई नज़रियों से। एक तो यही कि ये वेश्याओं के बारे में है और वो भी बनारस की। दूसरे ये कि लेखक ने वेश्याओ के मामले को महज़ वेश्याओं के मामले की तरह नहीं बरता है। वह पूरे समाज का मामला है और समाज के मुख़्तलिफ़ तबक़ों की तस्वीर कहानी में बनती है या यूँ कहें कि बनती-बिगड़ती है।

तीसरे ये कि कहानी में कोई नायक-नायिका नहीं है। एक घटनाक्रम है और उसकी जटिलताओं के समूचेपन को बनाए रखने की कोशिश करता हुआ उसका बयान है। किसी एक पात्र या चरित्र के प्वाइन्ट ऑफ़ व्यू के चकल्लस में आप नहीं उलझे और न ही किसी चरित्र के आत्मालाप में। अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो एकाध मौक़ो पर प्रकाश ही उसका एक अपवाद है।

ये बात आप की कहानी की ताक़त है कि आप ने एक मामले के कई सारे पहलुओं को गिरफ़्त में लिया है लेकिन दूसरी नज़र से ये भी लगता है कि पढने वालों को किसी एक धुरी की कमी महसूस हो सकती है; तेज़ी से बदलते हुए घटनाक्रम में वो जिस पर वापस लौट सकें और पूरे मामले का जाइज़ा ले सकें।

निजी तौर पर मुझे आप की कहानी में और भी अधिक रस आता अगर आपने इसकी गति को थोड़ा मद्धम और ठहरीला कर दिया होता। इतने सारे दिलचस्प चरित्रों को और क़रीब से जानने और उनके साथ अधिक समय गुज़ारने की इच्छा होती है। फिर भी बाद के हिस्से डीटेल्ड हैं और उनमें संवाद भी काफ़ी हैं जबकि पहले कुछ भाग सरपट चाल से चलते हैं। प्वांट ऑफ़ व्यू वाली बात भी बाद के हिस्सो में साफ़ है कि प्रकाश का ही है। पहले कभी ऐसा लगा कि कुछ भाग अंतरात्मा की प्रमुखता में लिखे गए हैं।

आख़ीर आते-आते कहानी की रंगत गहरी हो जाती है और मोरैल्टी ब्रिज की परिकल्पना बड़ी सनसनीखेज़ मगर एक सम्भावित सच्चाई की तरह कचोटती है।

अभय तिवारी लेखक और फिल्मकार हैं। कानपुर की पैदाइश। इलाहाबाद और दिल्ली में शिक्षा। बरसों से मुम्बई में – फ़िल्म और टीवी के बीच। खुदमुख्तारी और मजूरी के बीच; रोज़गार, सरोकार और बेकार की चिन्ताओं के बीच। हाल में बनाई लघु फिल्म ‘सरपत’ काफी चर्चा में रही। ‘निर्मल-आनंद’ नाम का ब्लाग चलाते हैं।

अनिल यादव, अब ऐतराज भी सुनिए

दयानंद पांडेयकहानी का साजन तो उस पार था : माफ़ करिए डियर अनिल यादव क्योंकि ”…क्योंकि नगर वधुएं अखबार नहीं पढतीं” को लेकर अभी तक आप प्रार्थना सुन रहे थे, अब ऐतराज़ भी सुनिए। अव्वल तो इस विषय की स्थापना ही बसियाई हुई है। आप जानिए कि आज की नगर वधुएं अखबार ही नहीं, इंटरनेट भी बांचती हैं। यकीन न हो तो आप कुछ साइटों पर जाइए, बाकायदा उनकी प्रोफ़ाइल की भरमार है, किसिम-किसिम की फ़ोटो, व्योरे और देश, शहर सहित। डालर फूंकिए और इस नरक में कूद जाइए।

चैटिंग में भी आप को यह नगर वधुएं मिल जाएंगी। नेट पर भी और मोबाइल चैट में भी। नगर वधुएं अब हाइटेक हो चुकी हैं कि सिस्टम ने बना दिया है, दोनों ही बातें हैं। अखबारों में मित्र बनाने के विज्ञापन का रैकेट भी इन्हीं नगर वधुओं का विस्तार है। इस छल-कपट में लुटे-पिटे लोग बहुतेरे मिल जाएंगे। रही बात मंडुवाडीह की तो सुनते हैं मंडुवाडीह का शिवदासपुर तो अब भी आबाद है। कोई बिल्डर, कोई सिस्टम अभी हिला नहीं पाया है। खैर। कहानी पर आते हैं।

विषय निश्चित ही तलवार की धार पर चलने वाला है। और अच्छी बात यह है कि अनिल ने इसे शुचितावादियों के आक्रमण से बचा लिया है। मतलब इसे अश्लीलता की रेखा भी नहीं छूने दी है, बस एक कविताई को छोड़ कर। पर दिक्कत यह है कि इस बहाने कई मह्त्वपूर्ण चीज़ें गुम हो गई हैं। बहुतेरे लोग जानते हैं- रांड़-सांड़-संन्यासी की काशी को। और कि वहां नगर वधुओं को बसाने में  कुछ राजाओं और पंडों का खासा योगदान भी। अनिल उनको भी फ़्लैशबैक के बहाने बांच सकते थे, नहीं बांचे। बांचे होते तो इस कथा में काशी का वैभव और उस वैभव में नगर वधुओं का लगा पैबंद और भी लोमहर्षक बयान लेकर उपस्थित होता।

आज़ादी के तुरंत बाद १९४७ में जब पंडित नेहरू ने देश भर में वेश्यालयों को शहर से बाहर करने की मुहिम शुरू की थी तब काशी का चौक कैसे बचाने के लिए लोग सामने आए, खासकर कुछ संगीत की दुनिया के लोग। दालमंडी की उपकथा भी जुड़ सकती थी, फिर कैसे बसा मंडुवाडीह! वगैरह-वगैरह का जोड़-घटाना इस कथा को और समृद्ध बना सकता था।

जाने क्यों यह कहानी पढ़ते समय एक फ़िल्मी गाना भी लगातार याद आता रहा- नदी नारे न जाओ श्याम पैंया परूं ! इसी गाने में एक बंद है- बीच धारे जो जाओ तो जइबै करो, उस पारे न जाओ श्याम पैयां परूं! तो कुल मुश्किल यही है कि अनिल इस कहानी में नदी के किनारे-किनारे ही घूमे-घुमाए हैं। न बीच धारे गए-ले गए हैं, न उस पार ले गए हैं। ले जाना चाहिए था। क्योंकि कहानी का साजन तो उस पार ही था। जो उसे मिला नहीं। कहानी अधूरी रह गई।

माफ़ करिए मित्रों, मैं अपनी बात कहने के लिए एक पाठक के पत्र की याद करना चाहता हूं। बहुत पहले संभवतः १९८२ में दिनमान पत्रिका में कवि समीच्छक विनोद भारद्वाज ने दिल्ली में चल रहे देह व्यापार पर एक आमुख कथा लिखी थी और बताया था कि ऐसी भी लडकियां हैं जो एक रात के दस हज़ार रूपए लेती हैं। तब का दस हज़ार आज  दस लाख रूपए में इस देह बाज़ार में बदल चुका जानिए। बहुत लोगों की तब साल भर की तनख्वाह भी साल भर की दस हज़ार रूपए नहीं होती थी। खैर तब एक पाठक ने दिनमान को चिट्ठी लिख कर कहा था कि ठीक है लडकियां एक रात के दस हज़ार रूपए लेती हैं पर वह हैं कौन लोग जो एक रात के दस हज़ार रूपए खर्च कर देते हैं? और अनुरोध किया था कि कृपया इन लोगों के बारे में भी एक स्टोरी छापें।

दिनमान ने उस पाठक का पत्र तो छाप दिया लेकिन उस के अनुरोध पर खामोशी मिली। एक पूंजीवादी पत्रिका में वैसे भी हिम्मत की कमी होती है, कैसे छापती भला उन सफ़ेदपोशों के बारे में जो एक रात के दस हज़ार किसी देह पर लुटा देते थे। उन लोगों के बारे में, जिन पर सिस्टम टिका है, न्यौछावर है ! पत्रिका और पत्रकार न सही पर एक कहानीकार तो यह काम कर ही सकता है। अनिल यादव तो कर ही सकते थे। उन के पास भाषा भी थी, हिम्मत भी। पर जाने क्यों वह नदी के किनारे-किनारे ही टहल-टहला कर छुट्टी ले बैठे? एक डीआईजी इस सिस्टम में क्या होता है? बच्चों के खेलने वाले साइकिल के टायर से ज़्यादा कुछ नहीं। उसकी हैसियत ही क्या होती है? काशी जैसे नगर में?

कहानी इस बात की चुगली ज़रूर खाती है कि अब पूरा शहर ही वेश्यालय में तब्दील हो चला है। सच यह है कि दुनिया के सारे शहर अपनी पूरी उपस्थिति में अब वेश्यालयों में तब्दील हैं। यह ठेकेदारी, यह मैनेजमेंट बिना औरतबाज़ी के चलता ही नहीं। यह राजनीति, यह फ़िल्म, यह समाज भी नहीं चलता। अब लोग दो ही चीज़ देखते हैं। या तो क्रिकेट या लड़कियों का डांस। कहानी में निचले दर्जे की लगभग रिटायर और बूढी वेश्याओं की यातना के तार ज़रूर ठीक से छुए गए हैं, उनकी उधड़ी तिरूपन दिखाई भी देती है। बिल्डरों और सत्ता की सीवन भी उसी तरह जो उधेड़ी होती तो बात में और ताब आया होता। सी. अंतरात्मा की यातना की कैफ़ियत को भी और कातना चहिए था। एक रिपोर्टर सारे तथ्य हाथ में होने के बावजूद किसी दबाववश सही खबर नहीं, लिख छाप सकता। जैसा कि यहां फ़ोटोग्राफ़र प्रकाश के साथ होता भी है और कि वह लांछन भी भोगता है। पर एक कहानीकार? सब कुछ जान कर भी? (यहीं आचार्य चतुरसेन शास्त्री की गोली की याद आ जाती है। फासिस्ट आलोचकों की साज़िश भले चतुरसेन शास्त्री को खारिज़ करती रहे पर नारी विमर्श पर हिंदी में इस से सशक्त उपन्यास या कथा अभी भी दुर्लभ है। गोली मतलब दासी। बंधुआ। पीढी दर पीढी की बंधुआ दासी। छुपे शब्दों में लगभग वेश्या। राजाओं और उनके कारिंदों के लिए। जब धारावाहिक रूप से गोली साप्ताहिक हिंदुस्तान में छपी थी तब चतुरसेन शास्त्री पर दबाव, धमकी और लांछन सभी अपनी पूरी ताकत के साथ उपस्थित थे। ब्लैकमेलर तक कहा गया था उन्हें। पर वह झुके नहीं थे)

अखबार का प्रबंधन अब अखबार को पाठकों के लिए नहीं, अपने विज्ञापनदाताओं, अपनी तिजोरी, और अपने एसोसिएट्स के लिए छापता है, यह हकीकत भी उभर कर सामने नहीं आ पाई है इस कहानी में। कुल मिला कर यह जो व्यवस्था नाम की वेश्या है, अनिल यादव उस को उजाड़ नहीं पाए हैं। तोड़-फोड़ तो खूब की है पर वह जो कहते हैं कि सीधी चोट, वह इस कहानी में अनुपस्थित दिखती है। और यह जो भडास4मीडिया के संपादक हैं यशवंत सिंह, कंडोम गुरु का काम कर गए हैं। सेक्स में कंडोम को मैं स्पीड ब्रेकर मानता हूं। सारा मज़ा सत्यानाश कर देता है। इस कहानी को छोटी-छोटी किश्तों में परोस कर यशवंत सिंह ने यही किया। स्पीड ब्रेकर का काम। एक साथ दे सकते थे। ज़्यादा से ज़्यादा दो किश्त। गनीमत बस यही रही कि जल्दी-जल्दी दिए। महीनों नहीं लगाया। लगाते तो निरोध गुब्बारा हो जाता।

डियर अनिल यादव फिर भी बधाई तलवार की धार पर चढ़ कर यह कहानी कहने के लिए। बस थोड़ी जल्दबाज़ी से बचना चाहिए था और कि चटकीली हेडिंग की पैकेजबाज़ी से भी। आमीन!

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. उनसे संपर्क dayanand.pandey@yahoo.com या फिर 09335233424 के जरिए किया जा सकता है.

आदमी से स्टोरी हो गए लोगों की कहानी

सिद्धेश्वर सिंह
सिद्धेश्वर सिंह
इस कहानी को एकाधिक बार पढ़ने बाद अब जब कि कुछ गुनने का समय आया है तब लग रहा है कहानी की काया के बीच इतना कुछ और इतनी तरह से कुछ-कुछ बुना गया है उसके रेशे को उधेड़ने के अब तक जो कुछ भी ज्ञान कथा साहित्य के आचार्यों व सर्जकों द्वारा तैयार पोथी-पतरा के जरिए अपने तईं विद्यमान है उसमें ‘अनुभव की प्रामाणिकता’, ‘भोगा हुआ यथार्थ, ‘शाब्दिक जीवन प्रतिबिम्ब’, ‘अँधेरे में एक चीख’  जैसे सूत्र वाक्य कथा के खुलासे के बाबत कुछ खास मदद करते जान नहीं पड़ते हैं।

सूत्र वाक्यों की उदात्तता पर शंका इसलिए भी है सूत्रकारों तथा उन्हें बरतने के कार्य व्यापार में लगे देहधारियों  के जीवन – जगत का यथार्थ अब कोई जादुई बिम्ब नहीं  रह गया है। आज हर अभिव्यक्ति चाक्षुष है – दृश्य और श्रव्य की निरन्तरता में घटित होती हुई। न चाहते भी हरेक दृश्य को देखना है और हर आवाज को सुनना है, यह जानते – बूझते हुए कि निरर्थकता को निरर्थक मानना ही सार्थक होने की जिद जैसी कोई चीज है जिसका होना सार्वजनिक संसार में अक्सर द्युतिमान करता दीखता है किन्तु निज के एकांत आईने में दैन्य व दारिद्र्य की छवि ही दिखलाता  है।

मैं  यह सबकुछ अनिल यादव की कहानी ‘क्योंकि नगरवधुयें अख़बार नहीं पढ़तीं‘ के सिलसिले में कह रहा हूँ जिसमें सतही तौर पर  तो वर्णनात्मकता का  प्राधान्य है हिन्दी के पुराने खेवे के कथाकारों के यहाँ आम बात थी और हिन्दी कथा साहित्य  के विचार व शिल्प की सरिता में ढेर सारा पानी बह जाने के बाद भी अब तक कारगर औज़ार बनी हुई है। कहानीकार ने इस औज़ार की गर्द व जंग को खरोंच – पोंछकर जिस तरीके से इस्तेमाल किया है व मात्र वर्णनात्मकता नहीं वरन  आज की शब्दावली में कहें तो मल्टीमीडिया प्रेजेंटेशन का एक अच्छा और उत्कॄष्ट उदाहरण है। इस कहानी का कथातत्व या कथानक एक ऐसी दुनिया है जो  हमारे सामने रोज बनती है। इस  दुनिया में तात्कालिकता जल्दबाजी का पर्याय नहीं है और न ही सफलता कोई तिरस्करणीय कर्म। यहाँ सब कुछ वह और वैसा ही है जैसा उसे होना है , हो जाना है। यह वर्तमान का विधान है -अतीत और आगत को मुँह बिराता, ठेंगा दिखाता हुआ। यह सुखद है और संतोष का विषय भी कि एक युवा कथाकार वर्तमान के इस वितान को उसी कालखंड में, उसी जमीन पर, उसी भाषा में और बहुत सपाट होकर करें तो उसी काशी में रच रहा है जहाँ रहते हुए धूमिल ने ‘वसन्त’ शीर्षक कविता की अंतिम पंक्तियों कहा था कि –

सौन्दय में स्वाद का मेल

जब नहीं मिलता

कुत्ते महुवे के फूल पर

मूतते हैं।

‘क्योंकि नगर वधुयें अख़बार नहीं पढ़ती’ में पात्र हैं, घटनायें हैं, कथानक का आरम्भ, उत्थान, व अवसान है किन्तु कोई चरमोत्कर्ष नहीं। यहाँ सब कुछ चीन्हा हुआ है। नया कुछ भी नहीं। न कोई नया पात्र , न कोई नई घटना। यह उस भयावह समय की कथा है, उस उर्वर प्रदेश की भी, जहाँ नया कुछ भी नहीं है, जहाँ कुछ नया चाहने की कोई नई उम्मीद भी नहीं। जहाँ  नया न होने की निरर्थकता से उपजती हुई कोई नई ऊब व निराशा भी नहीं जिसके बरक्स कुछ कहने के लिए नई भाषा के नए तेवर, नए मुहावरों के ईजाद की बात की जाय। यही वजह हो सकती है कथाकार ने वर्णनात्मकता को बरतने में किंचित नयापन भले ही दिखाया हो लेकिन  कहानी को कहने की शैली में कहा है। यह एक ऐसी कहानी  है जिसका पूर्वकथन तथा पूर्वापरकथन कहीं कोई कोई रहस्य नहीं रचता। यह एक ऐसी कहानी है जिसमें हिन्दी कहानी के कलेवर में लम्बे समय से इस्तेमाल की जाने वाली  चेख़वियन शैली वाली पूँछ में छिपा डंक मार कर आश्चर्य से भर नहीं देती। हिन्दी कहानी के नए – पुराने इतिहास और आलोचना की किताबों बताए गए सूत्रवाक्यों का सायास नकार इस कहानी में हो यह कहना सही नहीं होगा। इसमें वे सब हैं लेकिन वैसे नहीं जैसे कि वे होते बताए जाते रहे हैं, कथाकार का यह आग्रह भी नहीं जान पड़ता कि उन्हें ऐसा होना चाहिए। कथाकार को लगता है कि वे अब ऐसे हो गए हैं तमाम अकादेमिक और आलोचकीय मेड़ों और बाड़ों के बावजूद।

किसी कहानी से यह माँग करना करना कि उसमें कोई याद रह जाने योग्य पात्र, याद रह जाने योग्य घटना और चकित कर देने योग्य  शिल्प हो  तो व संभवत: कोई कथा जैसी चीज हो जाय तो जाय हमारे समय व समाज के उस हिस्से की कहानी नहीं हो सकती जिसे हम सबने मिलजुल कर एक ‘स्टोरी’ में बदल दिया है और उसे रात के अँधेरे में छपकर सुबह का अख़बार बन जाना है, जिसे मिठास का भ्रम बनए रखने वाली चाय के साथ बाँचना है, यह जानते हुए कि इसमें नया कुछ भी नहीं है। हिन्दी कहा्नी का आज जो भी सृजनात्मक माहौल है उसमें ‘क्योंकि नगरवधुयें अख़बार नहीं पढ़तीं‘ एक अलग रचना के रूप में दिखाई देती है। यह अपने लम्बे कलेवर में खुद को पढ़वा ले जाने की क्षमता रखती है और यह कोई कम महत्वपूर्ण बात नहीं है।

‘क्योंकि नगरवधुयें अख़बार नहीं पढ़ती’ के बारे में मुझ जैसे एक सामान्य पाठक को बाकी तमाम पाठको के साथ यह अनुभव साझा करते हुए कहना है कि-  जरा सोचिए, अगर अख़बार पढ़ते हुए सचमुच का अख़बार लगे और कहानी पढ़ते हुए सचमुच की कहानी तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। अख़बार इस कहानी की काया में है और कहानी इसकी आत्मा में । हाँ , काया के बारे में कोई भ्रम नहीं किन्तु अगर आत्मा जैसी चीज होती है अथवा होनी चाहिए तो ..

ख़ैर, युवा कथाकार अनिल यादव को एक उम्दा कहानी के लिए बधाई !

हिन्दी के कवि, अनुवादक और आलोचक सिद्धेश्वर सिह उत्तराखण्ड के खटीमा नगर में राजकीय महाविद्यालय में हिन्दी पढ़ाते हैं. नैनीताल के डी एस बी कैम्पस से हिन्दी में महत्वपूर्ण शोध कर चुके सिद्धेश्वर “कर्मनाशा” नाम का ब्लाग भी संचालित करते हैं. उनका एक कविता संग्रह और अनुवाद की दो किताबें इस साल जल्द छप कर आने को हैं.

जहां रेडलाइट एरिया, वहां रेप नहीं!

पंकज
पंकज
….क्योंकि नगर वधुएं अखबार नहीं पढ़ती” को जब शुरू-शुरू में पढ़ा तो लगा, एक पत्रकार को अपने संस्मरण सहेजने की सहसा ही इच्छा जाग उठी है। आगे पढ़ता गया तो लगा- नहीं, ये सामान्य संस्मरण नहीं है। ये कड़ियां समाज के उस तबके की वेदना और सहनशीलता की परछाई हैं, जिनकी तरफ लोगों का ध्यान नहीं जाता।

कहना चाहिए कि मीडिया का भी ध्यान नहीं जाता। वेश्या के पेशे को तथाकथित सभ्य समाज में कभी भी दूसरे पेशों की तरह ना तो मान्यता मिली और ना ही सम्मान। जबकि, एक ज़माना वह भी था कि जब नवाबों के बेटों के चेहरों पर रेख निकलते ही उन्हें तवायफों के कोठे पर अदब और इल्म की तालीम के लिए भेजा जाता था। इस समाज की अपनी मजबूरियां हैं तो समाज के लिए इनका योगदान भी कमतर नहीं है। ये बात प्रमाणित भी है कि जिन शहरों में रेड लाइट एरिया होते हैं, वहां बलात्कार की घटनाएं नहीं के बराबर होती हैं। यौवन का अतिरेक स्खलित करने के लिए वेश्याओं को साधन माना जाता रहा है लेकिन जीवन के इस प्राकृतिक सहचर्य में इनका योगदान वैसे ही अलिखा रह जाता है, जैसे परिवार नियोजन में कंडोम का।

मंडुवाडीह की दास्तान समाज के एक ऐसे तबके की करुण गाथा है जिसको जवाबों की तलाश मे हाशिए पर किए जाने वाले रफ कार्य की तरह हमेशा से नज़रअंदाज़ किया जाता रहा। रात के अंधेरे में आबाद रहने वाली ऐसी बस्तियों में या फिर इन बस्तियों से लाई गई जवानी से अपने बढ़े हुए रक्तचाप को सामान्य करने की कोशिशें अधिकारी से लेकर नेता और आमतौर पर सफेदपोश कहे जाने वाले लोग बरसों से करते आ रहे हैं। लेकिन, जैसा नजदीकी चित्रण “नगर वधुएं अखबार नहीं पढ़ती” में इस तबके का इंसानी तौर से किया गया है, उसकी मिसाल कम ही देखने को मिलती है।

अनिल! ऐसे ही लिखते रहिए, हम सब पढ़ रहे हैं।

सादर,

पंकज शुक्ल

पत्रकार और फिल्मकार


दस कड़ियों में गुथी अनिल यादव द्वारा लिखी लंबी कहानी को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर एक-एक कर क्लिक कर पढ़ सकते हैं….

  1. लवली त्रिपाठी की आत्महत्या

  2. आप कौन सा मसाला खाती थीं मेमसाहेब

  3. मठ, खंजन चिड़िया, मिस लहुराबीर

  4. तो बहनों, धंधा बंद

  5. लड़की लाना बंद करो दाज्यू

  6. कंडोम बाबा की करूणा

  7. हवा-हवाई टीवी के लिए मैं चिन्मय चिलगोजा…

  8. महावर, आशिक का बैनर और पुतलियां

  9. हमारी दारू, हमारा मुर्गा, आंदोलन उनका

  10. मरियल क्लर्क, थ्रिल और पुराने रंडीबाज

सिर्फ नौकरी नहीं, आंख भी है पत्रकारिता

अशोक पांडेयपत्रकार लिखेंगे नई सदी का साहित्य : कहानी लेखन के (अगर अनिल यादव की इस रचना को अपनी सुविधा भर के लिए सिर्फ कहानी कहा जाए तो) तमाम स्थापित मूल्यों को चुनौती देती नगरवधुओं की यह अतियथार्थवादी तिलिस्मी दास्तान अपने कथ्य के कारण बहुत महत्वपूर्ण है।

इस कहानी का स्थापत्य इसे और भी ज़्यादा ज़रूरी बनाता है. क्या ज़रूरी है कि कोई कहानी सिर्फ़ एक या दो लोगों की या एक गांव या शहर की कहानी हो? हिन्दी भाषा का दुर्भाग्य रहा है कि एकांगी कहानियों या एकायामी कहानियों की भरमार के चलते हमारी गऊ पट्टी में अच्छा और सामयिक पढ़ने की तमीज़ तक विकसित नहीं हो सकी. फ़िक्शन को उसके बंधे-बंधाए खाके से बाहर निकालने की ज़रूरत को हमसे भी ग़रीब लातीन अमेरिकी देशों को तब महसूस हो गई थी जब मनोहर कहानियां हमारे यहां निकलना शुरू हुई थी. क्या वजह है कि हमारे यहां लोकप्रिय उपन्यास-कहानियों के नाम पर गिनाने को राग दरबारी, कसप और मैला आंचल के बाद याददाश्त को कुरेदना चालू करना होता है?

ऊपर मैंने एक शब्द का सायास प्रयोग किया था- सामयिकता. भयानक तेज़ रफ़्तार से लगातार बदलते समय को आज के उत्तर भारतीय सन्दर्भ में पकड़ पाने की ताब यदि किसी में हो सकती है तो उस व्यक्ति को पत्रकार होना चाहिए. ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है. लातीन अमेरिका और अरब संसार के देशों से पिछले तीन चार दशकों से निकले क्लासिक्स को ग़ौर से देखें तो आप पाएंगे कि उनके रचनाकार अपने शुरुआती जीवन में छोटे क़स्बों में बतौर पत्रकार काम कर चुके थे- चाहे वे महान गाब्रीएल गार्सिया मारकेज़ हों चाहे मारीयो वार्गास योस्सा या सादी यूसुफ़.

नगरवधुओं की त्रासदी को रेकॉर्ड करती अनिल यादव की यह कहानी (जिसे असल में मैं लघु उपन्यास कहना पसन्द करूंगा) यदि सिर्फ़ नगरवधुओं भर की कहानी होती तो उस पर किसी भी तरह की बात करना मेरे लिए सम्भव नहीं होता. इस कथा में कई सारी सामूहिक त्रासदियां हैं और कई सारी व्यक्तिगत त्रासदियां भी. अगर यह छवि और प्रकाश जैसे एक जोड़े के घनघोर एकाकीपन भरे संघर्ष का चिट्ठा है, विस्थापन के कगार तलक पहुंचा दी गई नगरवधुओं के जीवन का बारीक सन्धान है तो समाज में राजनीति और अफ़सरशाही की शह पर फैलाए जा रहे तमाम कोढ़ों को उघाड़ने का जोख़िमभरा प्रयास भी.

एक प्रेमग्रस्त प्रेस फ़ोटोग्राफ़र, कुछ वेश्याएं, बड़े पुलिस अफ़सर, एक आत्महत्या, महिलावादी एनजीओ, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे राजनेता और एक इलाकाई अख़बार का दफ़्तर- एक अच्छी ख़बर बनाने के वास्ते सबसे उम्दा संसाधन माने जा सकते हैं ये सारे तत्व. लेकिन इन्हीं तत्वों का अन्वेषण करने पर ख़बर से बड़ा क्या बनाया जा सकता है, यह कहानी हमारे सामने एक नज़ीर रखती है.

गाब्रीएल गार्सिया मारकेज़ ने एक इन्टरव्यू में कहा था कि यदि अपने अख़बार में वे यह लिखते कि उन्होंने कल शाम कुछ हाथियों को उड़ते हुए देखा तो कोई उनकी बात पर यक़ीन न करता. इसके बरअक्स यदि वे लिखते कि कल शाम छः बजकर दस मिनट पर उन्होंने मुख्य बाज़ार के ऊपर पैंसठ हाथी उड़ते हुए देखे तो यह ‘घटना’ उनके अख़बार के पहले पन्ने पर छप सक सकती थी. सतत क्षय और ह्रास की तरफ़ जा रहे हमारे समाज की विसंगतियों और विद्रूपताओं को पकड़ पाने को आवश्यक रचनात्मक साधन सबसे प्रचुर मात्रा में एक पत्रकार के पास ही हो सकते हैं. ख़बरों की आयु बहुत कम होती है लेकिन जिन तत्वों से ये ख़बरें निकलती हैं उनका असर समाज में बड़ी देर तक रहता है. रात रात भर एक ख़बर की तलाश करता एक सजग पत्रकार दरअसल समाज के गूढ़तम रहस्यों से रूबरू हो रहा होता है. दुर्भाग्यवश ज़्यादातर पत्रकार इसे नौकरी भर समझने लगते हैं.

ख़बर और रचना में यहीं से फ़र्क बनना शुरू होता है. इधर हिन्दी साहित्य में तेज़ी से पत्रकारिता प्रेरित रचनाओं ने आना शुरू कर दिया है. यह एक अच्छी ख़बर है. दीगर है कि इनमें से अधिकांश लेखक के फ़र्स्ट हैंड अनुभव की या वांछित रचनाशीलता की कमी की वजह से दोयम दर्ज़े की होती हैं. लेकिन एकाध उल्लेखनीय रचनाएं भी देखने को मिली हैं. ‘कटरे की चौदह साल की रुकुमिनी की खण्डित गद्यकथा’ को दर्ज़ करती अतुलनीय कविता के माध्यम से वीरेन डंगवाल आपको बताते हैं कि कैसे एक सजग पत्रकार-रचनाकार एक अलग रास्ता तय करता हुआ क्या-क्या कर सकता है. अनिल यादव की इस कहानी के भाग्यशाली शुरुआती पाठकों में एक होने के बाद मेरा विश्वास और भी दृढ़ हुआ था कि इक्कीसवीं सदी का साहित्य असल में पत्रकारिता और मीडिया से ही निर्देशित होना है.

यह यक़ीन आज भी क़ायम है.

लेखक अशोक पांडे करीब सौ किताबों का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद कर चुके हैं. कवि हैं. अच्छे पर्वतारोही रहे हैं. हलद्वानी में रहते हैं. कबाड़खाना ब्लाग के माडरेटर हैं.

अनिल यादव की कहानी ”…क्योंकि नगर वधुएं अखबार नहीं पढ़तीं” को पढ़ने के लिए नीचे (कमेंट आप्शन के ठीक नीचे) दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें.

मरियल क्लर्क, थ्रिल और पुराने रंडीबाज

अनिल यादवएक कहानी (अंतिम) : निहलानी आंखों में मोरेलिटी ब्रिज : प्रकाश की हालत उस सांप जैसी हो गई जिसने अपनी औकात से काफी बड़ा मेढक अनजाने में निगल लिया हो, जिसे न वह उगल पा रहा है न पचा पा रहा है। वह दिन में जिला कचहरी के सामने धरने पर बैठे नेताओं के पास बैठकर लनतरानियां सुनता, घर आकर रात में तस्वीरों में उनके चेहरों का मिलान करता। हर दिन उनके बयान पढ़ता और रात में रजिस्ट्री के कागजों पर उनके हलफनामे देखता। स्नेहलता द्विवेदी, डीआईजी के पिता के साथ इस बीच लखनऊ जाकर दो बार मुख्यमंत्री और कई विधायकों से मिल आई थीं। दिन में कई बार गाड़ियों से उतरने वाले सोने की चेनों, पान मसाले के डिब्बों, मोबाइल फोनों से लदे-फंदे लोग उनका हाल पूछ जाया करते थे। प्रशासन की सारी अपीलें ठुकराकर उन्होंने ऐलान कर रखा था कि यह धरना तभी उठेगा जब मड़ुवाडीह की सारी वेश्याएं शहर छोड़कर चली जाएंगी।

टेंट के आगे लगा ‘वेश्या हटाओ-काशी बचाओ’ का बैनर अब ओस और धूल में लिथड़ कर मटमैला पड़ चुका था। पुआल पर बिछे सफेद रजाई, गद्दों, मसनदों पर मैल जमने लगी थी। रोज पहनाई जाने वाली सूख कर काली पड़ चुकी गेंदे की लटकती मालाओं की झालर बन चुकी थी। गद्दे पर बिखरे लाई चने, पान के पत्तों और मुचड़े हुए अखबारों के बीच, धरना देने वाले अब भी वेश्याओं, ग्राहकों और दलालों के उत्पात के किस्से धारावाहिक सुनाए जा रहे थे। समर्थन देने वाली संस्थाओं के लिए दोपहर बाद का समय तय था। उनके नेताओं के आने के साथ माइक ऑन होता और सभा शुरू हो जाती जो कचहरी बंद होने तक चलती थी। शाम और रात का समय भजन गाने वाले कीर्तनियों के लिए था। वे सभी पूरी तन्यमता से एक पुण्य काम में सहयोग कर रहे थे।

सी. अंतरात्मा ही छवि को खुश कर सकने वाले, प्रकाश के खोजी-पत्रकारिता अभियान में मदद कर सकते थे। उसने चंट फोटोग्राफर की तरह उनकी बरसों पुरानी एक इच्छा पूरी कर दी। वे न जाने कब से कह रहे थे कि प्रकाश उनके मां-बाप की अच्छी सी तस्वीर खींच दे। उसने अंतरात्मा के घर जाकर चुपचाप तस्वीर ही नहीं खींची, एक पेंटर से उसका पोट्रेट बनवाया, अभी पेंट सूखा भी नहीं था कि अखबार में लपेटकर उन्हें भेंट कर दिया। वह खुशी और अचरज से हक्के-बक्के रह गए। उन्हें अंदाजा ही नहीं था कि उनकी छिपी हुई साध इस तरह पूरी हो जाएगी।

अंतरात्मा, प्रकाश को लेकर शहर के सबसे बड़े बिल्डर और राज्यसभा के सदस्य हरीराम अग्रवाल के पास गए, जिसको वह अपना दोस्त कहते थे। प्रकाश को यकीन नहीं था कि अंतरात्मा जैसा फटीचर पत्रकार अग्रवाल का इतना करीबी हो सकता है। वह बड़े तपाक से मिला जैसे घिसी पैंट-कमीज वाले अंतरात्मा सिद्धांतों, मूल्यों वाले कोई असफल नेता हों जिनके लिए उसके मन में अपार सहानुभूति है। उसे बताया गया कि अखबार के लिए एक फोटोफीचर करना है जिसकी थीम यह है कि प्रस्तावित निर्माण परियोजना पूरी होने के बाद मड़ुवाडीह का पिछड़ा, बदहाल इलाका कैसा दिखेगा और शहर में क्या-क्या बदलाव आएंगे। अग्रवाल, फौरन दोनों को लेकर निधि कंस्ट्रक्शन कंपनी के एमडी श्रीविलास निहलानी के पास गए जो शहर के एक पांच सितारा होटल में ठहरे हुए थे। कंपनी के चीफ आर्किटेक्ट और जनसंपर्क अधिकारी को भी वहीं बुलवा लिया गया।

उस शाम वह होटल के सबसे शानदार सूट में एक बेड पर लैपटाप, ब्रीफकेसों और कागजों के ढेर से घिरा शराब पी रहा था। उसके सामने प्लास्टिक की कुर्सियों पर विभिन्न आकार-प्रकार के कारोबारी, बिल्डर, छुटभैये नेता, गुंडे, दलाल विनम्र भाव से बैठे हुए थे। उसका पेट इतना बड़ा था कि लग रहा था, उसके सांवले, विशाल शरीर के बगल में अलग से रखा हुआ है। उस पूरे परिदृश्य में उसकी आंखें विलक्षण थीं। उसकी असाधारण बड़ी आंखों का उजला परदा अति आत्मविश्वास से बुना हुआ था जिस पर आश्वस्ति से निर्मित, भूरी पुतलियां डोल रही थीं। दुनिया के सारे रहस्यों को वह जान चुका था, शायद इसीलिए किसी भी बात पर उसकी आंखें झपकती नहीं थी और न ही उनमें विस्मय का हल्का सा भी भाव आने पाता था।

अग्रवाल के आते ही उसने आर्किटेक्ट और पीआरओ को इशारा किया और मीटिंग चुटकी बजाते निपटा दी। सामने बैठे लोगों से उसने कहा, उस गांव में जिन लोगों के बड़े प्लाट हैं, उनका रेट थोड़ा बढ़ा दो। उन्हें लगाओ कि बाकी लोगों को समझाएं। फिर भी नहीं समझते तो छोड़ दो, उस गांव को भूल जाओ। हमारे पास अभी छह महीने का टाइम है। दो महीने बाद उस जमीन के सरकारी अधिग्रहण का कागज निकलवा देंगे। सरकारी रेट और सर्किल रेट दोनों हमारे रेट से कम है। थोड़ा जिंदाबाद-मुर्दाबाद होगा और पुलिस डंडा चलाएगी तो अपने आप अक्ल ठिकाने आ जाएगी। वे अपने खेत अपने हाथ में उठाकर ले आएंगे और हमें दे देंगे।

जनसंपर्क अधिकारी उन्हें दूसरे कमरे में ले गया, जहां मेज पर बेयरे खाने-पीने का सामान लगा रहे थे। सांसद अग्रवाल ने कहा, कुछ लेते रहिए, बातचीत भी चलती रहेगी, निहलानी जी व्यस्त आदमी है।

अंतरात्मा विश्वकर्मा लपककर उठे और प्रकाश के कान में कहा, ‘वही वाली पिया जाएगा। जो यह पी रहा था। व्हिस्की से सबेरे पेट भी बढ़िया साफ होगा।’

निहलानी कुर्सी में नहीं अट पाता था। अपना गिलास लिए बिस्तर में धंसते हुए बोला, इस शहर में सिटी प्लानिंग का हम नया युग शुरू करने जा रहे हैं, पुराने के ठीक बगल में नया शहर होगा जहां दुनिया के किसी भी अच्छे मेट्रो जैसी सुविधाएं होंगी। दुनिया पुराना बनारस देखने आती है लेकिन यहां के लोग इंच और सेंटीमीटर में नापी जाने वाली पतली गलियों में, टेंट में रुपया दबाए घुट रहे हैं। हम उन्हें नए खुले और मार्डन शहर में ले आएंगे। वह हंसा… कहिए अग्रवाल जी, यह कबीर दास की उल्टी बानी कैसी रहेगी।

बहुत सुंदर, बहुत सुंदर! अग्रवाल ने गिलास रखते हुए भावभीने ढंग से कहा जैसे उनका गला रुंध गया हो। खंखार कर बोले, अब देखिए भगवान की कृपा रही, डीआईजी साहब और अंतरात्मा जी ने चाहा तो दो महीने में आखिरी समस्या भी खत्म हो जाएगी। उसके बाद रोड क्लीयर है।

निहलानी हंसा, डीआईजी तो धर्मात्मा आदमी है साईं, तपस्या कर रहा है। बस अंतरात्मा जी के भाई बंदों की कृपा बनी रहे तो गाड़ी निकल जाएगी। मैंने तो इनके लिए एक पर एक फ्री का ऑफऱ सोच रखा है। एक मकान के बदले एक दुकान और एक फ्लैट ले जाओ। ऐश करो। वैसे भी हमारी स्कीम है कि जब बुकिंग होगी तो हम पुलिस, प्रेस और वकीलों का खास ख्याल रखेंगे। पत्रकार संघ से बात हुई है। अगर उन्होंने पैसा इकट्ठा कर लिया तो हम पत्रकारों के लिए अलग एक ब्लाक दे देंगे, उसमें कोई समस्या नहीं है।

अग्रवाल जी ने अंतरात्मा का कंधा थपथपाया, हमारे तो डीआईजी यही हैं, इन्होंने भी कम प्रयास नहीं किया है। अंतरात्मा की पकी दाढ़ी में मेधावी स्कूली छात्रों जैसी मुस्कान फैल गई।

निहलानी के संकेत पर आर्किटेक्ट ने मेज पर नक्शा फैला दिया। अर्धचंद्राकार घेरे में ग्यारह-ग्यारह मंजिल के तीन आवासीय काम्प्लेक्स बनने थे। जिनके बीच फैले सड़कों के जाल के धागों के इधर-उधर मार्केटिंग काम्प्लेक्स, पार्किंग जोन, स्टेडियम, सिनेमाहाल, पेट्रोल पंप, स्विमिंग पूल, पार्क, कम्युनिटी सेंटर, सिक्योरिटी आफिस छितरे हुए थे। लाल नीले रंग निशानों से भरे स्केच में प्रकाश अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहा था कि इसमें बदनाम बस्ती वाली जगह कहां है।

आर्किटेक्ट, अचानक नक्शा समेटने लगा तो प्रकाश ने हड़बड़ाकर पूछा, अगर वेश्याएं मड़ुंवाडीह से नहीं हटती हैं, तब आपके प्रोजेक्ट का क्या होगा? निहलानी ने आश्वस्त भाव से कहा, नहीं हटेंगीं तो प्रोजेक्ट रुक थोड़े जाएगा बल्कि और शानदार हो जाएगा। उसने आर्किटेक्ट को इशारा किया, इन्हें मॉरेलिटी ब्रिज दिखाओ।

आर्किटेक्ट ने अब दूसरा स्केच खोलकर मेज पर फैला दिया। अर्धचंद्र के दोनों छोरों पर बनी बहुमंजिली इमारतों को एक ओवर ब्रिज से जोड़ दिया गया था। जिसके नीचे, ठीक बीच में बदनाम बस्ती थी।

आर्किटेक्ट समाचार वाचक की तरह बोलने लगा, यह नैतिकता सेतु पांच सौ मीटर चौड़ा होगा। जिसके बीच फाइबर ग्लास के ट्रांसपैरेंट स्लैब होंगे। यहां कारें आसानी से पहुंच सकेंगी। नीचे हैलोजन लाइटस होंगी, जिससे नीचे, जमींन की सारी चीजें रात में भी साफ नजर आएंगी। एक बंगीजंपिंग का प्लेटफार्म होगा और भी बहुत कुछ होगा। इस ब्रिज का इस्तेमाल मनोरंजन, सैरसपाटे लेकर निगरानी तक के लिए किया जाएगा और वहां पर…

उसे रोककर निहलानी ने बताना शुरू किया। एक एजेंसी से बात हो गई है जो लोगों को किराए पर हर दिन दूरबीनें देगी और सुरक्षा का इंतजाम देखेगी। आइडिया यह है कि वहां घूमने आने वाले लोग टिकट लेकर नीचे वेश्याओं को घूमते, ग्राहकों को पटाते और वहां चलता सारा कारोबार देख सकेंगे। इससे बड़ा मनोरंजन और क्या हो सकता है। पुलिस पेट्रोल और निगरानी के लिए खास इंतजाम होगा। पुलिस वहां से अवैध कारोबार पर नजर रखेगी, अपराधियों को पहचानेगी। इससे क्राइम कंट्रोल करने में काफी मदद मिलेगी। यह भी हो सकता है कि इससे बनने वाले मनोवैज्ञानिक दबाव, पहचाने और पकड़े जाने के डर के कारण वहां कस्टमर आना बंद कर दें। जब कारोबार ही ठप हो जाएगा तो वेश्याएं कितने दिन रहेंगी।

प्रकाश को लगा यह मजाक है। अंतरात्मा जो भौंचक, सांस रोके सुन रहे थे, ठठाकर हंस पड़े, ‘जुलुम बात है… यह तो वैसे ही है जैसे बचपन में हम लोग सरपत में छिपकर कुएं पर नहाती औरतों को देखा करते थे।’

प्रकाश ने हैरत से कहा, अगर यह मजाक नहीं है तो यह बताइए कि अगर वेश्याओं ने धंधे का नया तरीका अपना लिया, जिसमें सड़क पर कोई दिखे ही नहीं तो क्या होगा? जहां तक मनोविज्ञान की बात है तो बहुत पहले मकानों की दीवारों पर पेशाब करने वालों के बारे में भी लोग यही सोचते थे लेकिन क्या नतीजा निकला।

निहलानी ने तीसरा पेग खत्म कर लंबी हुंकार भरी, साईं तभी तो असली होना शुरू होगा। दस साल में हमारा दूरबीन कल्चर आ चुका होगा तब इंटरटेनमेंट कंपनियां अपनी लड़कियों को लाकर तुम्हारे मड़ुंवाडीह में बसा देंगी। उनकी छतों पर ओपेन एयर बार, कैबरे, स्विंमिंग पूल, सन बाथ स्टैंड, जाकुजी, साउना और तरह-तरह के खेल होंगे। लोग उन्हें देखने के लिए आएंगे। वेश्याएं इन स्मार्ट और मालदार लड़कियों वाली कंपनियों के आगे पिट जाएंगी। ये कंपनियां उनसे पूरा इलाका ही खरीदकर उसे एशिया क्या, दुनिया के सबसे बड़े ओपन एयर पीप-शो वाले इंटरटेमेंट जोन में बदल देंगी। बनारस में विदेशियों की भारी आमद को ध्यान में रखते हुए यह योजना तैयार की जा रही है लेकिन अभी पाइपलाइन में ही है। प्रकाश हैरत से नशे से रतनार, आत्मविश्वास से दमकती आंखों वाली मैहर की देवी जैसी उस मूर्ति को देखता ही रह गया।

निहालानी के सोने का समय हो चुका था।

लेआउट प्लान की फोटो कापी, योजना का ब्रोशर और कुछ तस्वीरें प्रकाश चला तो इन्हें साथ ले चला। अंतरात्मा ने प्लेट से एक मुट्ठी काजू उठाकर पैंट की जेब में डाल लिया। जनसंपर्क अधिकारी ने बाहर छोड़ते समय सभी को निधि कंस्ट्रक्शन कंपनी का एक मोमेंटो, कंपनी के होलोग्राम वाली एक घड़ी, दो हजार के गिफ्ट बाउचर उपहार में दिए। अंतरात्मा को यह कहते हुए, काजू का दो किलो एक पैकेट दिया कि अपने दोस्तों की पसंद का हम खास ख्याल रखते हैं। अंतरात्मा ने बच्चे की तरह उसे गोद में उठा लिया। रास्ते में हवा लगी तो वह हिचकी लेते हुए बुदबुदाने लगे, बहुत दुर्दिन देखा दादा, बहुत दुर्दिन देखा।

वह बड़बड़ा रहे थे, सब कोई भगवान से मनाओ कि ये साला मुरल्टी का पुल न बने, नहीं तो हमारा परिवार बर्बाद हो जाएगा। बस्ती वाला मकान तो वैसे ही हाथ से निकल गया है। आशा बंधी थी कि कम्पनी खरीद लेती तो कुछ रोटी-पानी का डौल बैठ जाएगा। हमारी तो बारह सौ की रिपोर्टरी करते किसी तरह कट गई पांच-पांच बच्चे हैं, पुल बन गया तो साले कहां जाएंगे। प्रकाश ने उन्हें घर छोड़ा तब सिसक रहे थे, विश्वनाथ बाबा से मनाओ कि मुरल्टी का पुल न बने दादा।

तितलियों के पंखों की धार : बदनाम बस्ती में पहले भूखे भंवरे आते थे। तीन महीने तक खिचड़ी खाने के बाद अब भूखी तितलियां दम साधकर फूलों की तरफ उड़ने लगीं, उनके रहस्यमय पंखों के रास्ते में जो भी आया, कट गया।

शाम के धुंधलके में जब गाड़ियों का धुंआ मड़ुंवाडीह की बदनाम बस्ती के ऊपर जमने लगता, सजी-धजी तितलियां एक-एक कर बेहिचक बाहर निकलतीं। सिपाहियों के तानों का मुस्कानों से जवाब देते हुए वे सड़क पार कर जातीं। वहां पहले से खड़े उनके मौसा, चाचा, दुल्हाभाई या भाईजान यानि दलाल उन्हें इशारा करते और वे चुपचाप एक-एक के पीछे हो लेतीं। वे उन्हें पहले से तय ग्राहकों के पास पहुंचा कर लौट आते थे। जिनके कस्टमर पहले से तय नहीं होते थे, वे अतृप्त, कामातुर प्रेतों की तलाश में सड़कों और घाटों पर चलने लगतीं। औरतों को मुड़-मुड़ कर देखने और उनका पीछा करते हुए भटकने वालों को वे ठंडे, सधे ढंग से इतना उकसाती कि वे घबराकर भाग जाते या उन्हें रोककर तय तोड़ करने लगते। जो थोड़ा तेज तर्रार और आत्मविश्वासी थीं वे होटलों और सिनेमाहालों के बाहर कोनों में घात लगातीं। दोयम दर्जे की समझी जाने वाली अधेड़ औरतें रात गए बस्ती के दूसरे छोर से झुंड में निकलतीं और गांव के पिछवाड़े खेतों से होते हुए हाई-वे पर निकल जातीं। वहां ओस से भीगे, पाले से ऐंठते पैरों को कागज, प्लास्टिक और टायर जलाकर सेंकने के बाद वे एक-एक कर ढाबों पर खड़ी ट्रकों की कतार में समा जातीं। भोर में जब वे लौटतीं लारियों में, चाय की दुकानों की बेंचों और मकानों के चबूतरों पर ओवरकोट में लिपटे, पुलिस वाले आराम से सो रहे होते। पहरा देने वालों का हफ्ता तय कर दिया गया था जिसे दलाल और भड़ुए एक मुश्त पहुंचा आते थे।

एक दोपहर प्रकाश घाट पर सलमा को देखकर चक्कर खाकर गिरते-गिरते बचा। वह नीले रंग का स्कर्ट और सफेद कमीज पहने, छाती पर एक मोटी किताब दबाए, एक पंडे की खाली छतरी के नीचे बैठी छवि के पेट पर लेटी, नदी को देख रही थी। छवि का पेट थोड़ा और उभर आया था और चेहरे पर लुनाई आ गई थी। सलमा की बांह पर हाथ रखे वह जितनी शांत और सुंदर लग रही थी, उतना ही वीभत्स, हाहाकार प्रकाश के भीतर मचा हुआ था।….तो मेरा पूर्वाभास सही था। उसे मडुवाडीह में उस लड़की के बलात्कार का पता था। शायद वह वहां के बारे में मुझसे कहीं ज्यादा जानती है, उसने सोचा। उसका हाथ कैमरे पर गया कि वह दोनों की एक फोटो उतार ले लेकिन फिर वह विक्षिप्त जैसी हालत में लड़खड़ाता, भरसक तेज कदमों से दूसरे घाट की ओर चल पड़ा।  

सामने जलसमाधि लेने वाले युवक के आगे पीछे, अजीबो-गरीब अंतर्राष्ट्रीय बेड़ा गुजर रहा था। और लोगों की तरह सलमा भी नाव पर घंटे घड़ियाल बजाते, नारे लगाते लोगों को देखकर हाथ हिला रही थी।

कोई दो घंटे बाद सलमा उसे फिर दिखी। इस बार वह अकेली, छाती पर किताब दबाए भटक रही थी। वह उससे बहुत कुछ पूछना चाहता था, लपक कर पास भी गया। लेकिन उसने किताब की ओर इशारा किया, आज कल तुम्हारे स्कूल में कुरान पढ़ाई जा रही है क्या?

उसने कुरान को पलट दिया और अपनी चुटिया को ऐंठते हुए हंसी। तुनक कर धीमे से कहा, जो मुझे ले जाएगा, वह किताब को नहीं पढ़ेगा… अच्छा अब आप जाइए। यहां मत खड़े होइए, बात करनी हो तो वहीं दिन में आइएगा। अब रात में कोई नहीं मिलेगा। अब प्रकाश को दिखा कि नीचे घाट की सीढ़ियों पर, नदी किनारे उसी जैसी पांच-सात और लड़कियां स्कर्ट, सलवार सूट, सस्ती जींस पहने घूम रही थीं। उनकी बुलाती आंखे, रूखे बाल, ज्यादा ही इठलाती चाल और किताबें पकड़ने का ढंग, कोई भी गौर करता तो जान जाता कि वे स्कूल-कालेज की लड़कियां नहीं हैं। जो लोग उनके खिलाफ इतने ताम-झाम से समारोहपूर्वक अपना गुस्सा उगल रहे थे, उन्हीं के बीच भटकती हुई वे कस्टमर पटा रही थीं। प्रकाश उनके दुस्साहस पर दंग था। शायद उन्हें सचमुच की हालत का पता नहीं था इसीलिए वे सड़क पर हुंकारते ट्रकों के बीच मेढ़कों की तरह फुदक रही थीं। अगर लोगों को पता चल जाता कि वे वेश्याएं है तो भीड़ उनकी टांगे चीर देती और झुलाकर नदी में फेंक देती। सलमा ने पलटकर देखा प्रकाश वहीं खड़ा, कैमरा फोकस कर रहा था। उसने पूछा ‘आप अखबार में हम लोगों को नगर-वधू क्यों लिखते हैं?’

प्रकाश ने कैमरे में देखते हुए ही कहा, ‘क्योंकि तुम किसी एक की नहीं, सारे नगर की बहू हो, तुम यहां किसी खास आदमी को तो खोज नही रही हो, जो मिल जाए उसी के साथ चली जाओगी।’

‘अच्छा तब मेयर साहब को नगर प्रमुख क्यों, नगर पिता क्यों नहीं लिखते और उनसे कह दो कि आकर हम लोगों के साथ बाप की तरह रहें।’

प्रकाश ने खिलखिलाती हुई उस वेश्या छात्रा को देखा। उसे अचानक लालबत्ती और रेडलाइट एरिया का फर्क नए ढंग से समझ में आ गया। मेयर पुरुष है, संपन्न है इसलिए लालबत्ती में घूम रहे हैं। तुम गरीब लड़की हो इसलिए अपना पेट भरने के लिए मौत के मुंह में घुसकर ग्राहक खोज रही हो।

उसकी हंसी से चिढ़कर पूछा, ‘तुम्हें यहां डर नहीं लगता। इन लोगों को पता चल गया तो?’

वह हंसती ही जा रही थी, उसने नदी के उस पार क्षितिज तक फैले बालू का सूना विस्तार दिखाते हुए कहा, ‘जिन्हें पता चल गया है, वे लड़कियों के साथ उस पार रेती में कहीं पड़े हुए हैं और वे किसी से नहीं कहने जाएंगे… अलबत्ता हल्के होकर हम लोगों को हटाने के लिए और जोर से हर हर महादेव चिल्लाएंगे।…अच्छा अब आप चलिए, नहीं तो लड़कियां आपको ही कस्टमर समझ कर पीछे लग लेंगी।’

बेईमानी का संतोष : धंधा, शहर में फैल रहा है। यह खबर डीआईजी रमाशंकर त्रिपाठी को लग चुकी थी। उन्होंने अफसरों की मीटिंगे की। सिपाहियों की मां-बहन की। दारोगाओं को झाड़ा, एलआईयू को मुस्तैद किया, तबादले किए लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। जो भी मड़ुंवाडीह के दोनों छोरों पर पहरा देने जाता, भड़ुओं का गुस्सैल बड़ा भाई हो जाता। जिसकी हर सुख-सुविधा का वे ढीठ विनम्रता के साथ ख्याल रखते। कप्तान वगैरह रस्मी तौर पर मुआयना करने आते तो सिपाही उन्हें वेश्याओं के खाली पड़े दो-चार घर दिखा देते। वे लौटकर रिपोर्ट देते कि धंधा बंद होने के कारण, उन घरों को छोड़कर वे कहीं और चली गईं हैं। डीआईजी ने शहर के लॉजों, होटलों में छापे डलवाने शुरू करा दिए, जिनमें बाहर से आकर धंधा कर रही कालगर्लें पकड़ी गईं लेकिन मड़ुवाडीह की कोई वेश्या नहीं मिली। हमेशा की तरह खबरे छपी कि रैकेट चलाने वालों की डायरियों और कालगर्लों के बयानों से कई सफेदपोश लोगों के नाम, पते और नंबर मिले हैं जल्दी ही पुलिस उनसे पूछताछ करेगी और उनकी कलई खुलेगी। हमेशा की तरह न पूछताछ हुई, न कलई खुली और न ही फालोअप हुआ। कालगर्लें जमानत पर छूटकर किसी और शहर चली गईं और रैकेट चलाने वालों ने भी नाम और ठिकाने बदल लिए।

प्रकाश की ड्यूटी लगाई गई कि वह शाम को पहरा देते पुलिसवालों के बीच से होकर बदनाम बस्ती से धंधे के लिए निकलने वाली लड़कियों की फोटो ले आए। उसने पहली बार बेईमानी की, जब वे निकल रहीं थी, तब वह अंतरात्मा के घर में बैठकर उनके साथ चाय पी रहा था। उनके निकल जाने के बाद वहां पहुंचकर उसने एक पूरा रोल खींच डाला, जिसमें कुहरे बीच झिलझिलाते सिपाहियों और गुजरते इक्का-दुक्का राहगीरों के सिवा और कुछ नहीं था। उसे फ्लैश चमकाते देख, दो सिपाहियों ने खदेड़ने की कोशिश की तो उसने कि वे निश्चिंत रहें आज वह एक भी फोटो ऐसा नहीं खींचेगा जिससे उनको कोई परेशानी हो। एक सिपाही ने पूछा, बहुत साधु की तरह बोल रहे हो, बाई जी लोगों ने कुछ सुंघा दिया है क्या?’

सिपाही आश्वस्त हो गए तो उन्होंने बताया कि कम उम्र की लड़कियों का धंधा बढ़िया चलने से अब नई लड़कियां भी आ रही थीं। उन्हें मड़ुवाडीह में नहीं, शहर में किराए पर लिए मकानों में रखा जा रहा था। थाने का रेट बढ़कर अब पैंतीस से पचास हजार हो गया था। प्रकाश ने अंतरात्मा से कहा कि लगता है निहलानी का मॉरेलिटी ब्रिज ही बनेगा और बड़े लोगों की चांदी रहेगी। तुम तो बाई जी लोगों से ही बात कर लो। अंतरात्मा को अफसोस था कि पुलिस भी दो टुकड़ा हो चुकी है।

प्रेस लौटकर उसने फोटो एडीटर को समझाया कि कुहरा इतना है कि वहां कुछ भी देख पाना संभव नहीं है। जो बन सकती थीं, वे यही तस्वीरे हैं। वह बेईमानी करके बहुत खुश था। उसने खुद को हताशा से बचा लिया था। उसके फोटो खींचने से अखबार की थोड़ी विश्वसनीयता बढ़ती, सर्कुलेशन बढ़ता लेकिन धंधे पर कोई फर्क नहीं पड़ता। पुलिस वाले ही बंद नहीं होने देते। वह चाहता भी नहीं था कि धंधा बंद हो। वह अब चाहता था कि चले और खूब चले।

मरियल क्लर्क, थ्रिल और पुराने रंडीबाज : कोई तीन महीने बाद, फिर बीमा कंपनी का वही मरियल क्लर्क, काला चश्मा लगाए अखबार के दफ्तर की सीढ़ियों पर नजर आया। इस बार फिर पक्की खबर लाया था कि प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी की जांच रिपोर्ट आ गई है कि पान मसाला नहीं, डीआईजी रमाशंकर त्रिपाठी ही अपनी पत्नी की आत्महत्या के जिम्मेदार हैं। लगातार मारपीट, प्रताड़ना के तारीखवार ब्यौरे वह लवली त्रिपाठी की डायरियों की फोटो प्रतियों में समेट लाया था। इसके अलावा वह यह खबर भी लाया था कि डीआईजी त्रिपाठी डेढ़ महीने बाद, अपने से काफी जूनियर एक महिला आईपीएस अफसर से शादी करने जा रहे हैं। इन खबरों की स्वतंत्र पड़ताल कराई जाने लगीं।

उन दिनों अखबार प्रकाश को बेहद उबाऊ लगने लगा। हर सुबह खोलते ही काले अक्षर एक दूसरे में गड्डमड्ड अपनी जगहों से डोलते हुए नजर आते थे, जिसकी वजह से सिरदर्द करने लगता था और वह अखबार फेंक देता था। इसकी एक वजह तो यही थी कि जिन घटनाओं को खुद उसने देखा और भोगा होता था, वे छपने के बाद बेरंग और प्राणहीन हो जाती थी। किसी जादू से उनके भीतर की असल बात ही भाप की तरह उड़ जाती थी। पहली लाइन पढ़ते ही वह जान जाता था कि असलियत कैसे शब्दों की लनतरानियों में लापता होने वाली है। रूटीन की बैठकों में उसे रोज झाड़ पड़ती थी कि वह अखबार तक नहीं पढ़ता इसीलिए उसे नहीं पता रहता कि शहर में क्या होने वाला है और प्रतिद्वंदी अखबार किन मामलों में स्कोर कर रहे हैं। दरअसल वह इन दिनों अपनी एक बहुत पुरानी गुप्त लालसा के साकार होने की कल्पना से थरथरा रहा था। यह लालसा थी नकचढ़ा, अहंकार से गंधाता नहीं सचमुच का रिपोर्टर होने की।  ऐसा रिपोर्टर जिसकी कलम सत्य के साथ एकमेक होकर धरती में कंपन पैदा कर सके।

उसके पास इतने अधिक कागजी सबूत, अनुभव, फोटोग्राफ और बयान हो गए थे कि अब और चुपचाप सब कुछ देखते रह पाना मुश्किल हो गया था। अब वह जब चाहे जब वेश्याओं को हटाने वालों के पाखंड का भांडा फोड़ सकता था। यही सनसनी उसके भीतर लहरों की तरह चल रही थी। सीधे सपाट शब्दों में, उसने रातों को जागकर कंपोज कर डाला कि कैसे पैसा, दारू, देह नहीं मिलने पर वेश्याओं को बसाने वाले लोकल नेता उनके खिलाफ हुए। कैसे निधि कंस्ट्रक्शन कंपनी ने उनके गुस्से को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लिया। कैसे डीआईजी ने अपनी छवि बनाने के लिए धंधा बंद कराया और बाद में वे कमिश्नर के साथ कंस्ट्रक्शन कंपनी के एजेंट हो गए। कंस्ट्रक्शन कंपनी कैसे इससे बड़ा और आधुनिक वेश्यालय खोलने जा रही है। वेश्याओं को हटाने से कैसे यह धंधा और जगहों पर फैलेगा। कैसे डीआईजी के पिता और कमिश्नर ने धार्मिक भावनाओं को भड़काया और कैसे हर-हर महादेव के उद्घघोष के साथ विरोध और वेश्यावृत्ति दोनों एक साथ घाटों पर चल रहे हैं। उसका अनुमान था कि यह सीरीज छपते-छपते बीमा कंपनी के जासूसों की जांच रपट का भी सत्यापन हो जाएगा और उसके छपने के बाद सारे पाखंड के चिथड़े उड़ जाएंगे। इसके बाद शायद सचमुच वेश्याओं के पुनर्वास पर बात शुरू हो।

प्रकाश ने दो दिनों तक अपने ढंग से सभी छोटे-बड़े संपादकों को टटोला और आश्वस्त हो गया कि, उसकी रिपोर्टिंग का वक्त आ गया है। तीसरे दिन उसने रिपोर्ट, तस्वीरें, रजिस्ट्री के कागज, लेआउट प्लान और तमाम सबूत ले जाकर स्थानीय संपादक की मेज पर रख दिए। पूरे दिन वे उन्हें पढ़ते, जांचते और पूछताछ करते रहे। शाम को आकर उन्होंने उसकी पीठ थपथपाई, ‘तुम तो यार, पुराने रंडीबाज निकाले! बढ़िया रिपोर्ट हैं, हम छापेंगे।’ यह सचमुच दिल से निकली तारीफ थी।

अगले दिन अखबार की स्टियरिंग कमेटी की बैठक हुई क्योंकि इस मसले पर पुराना स्टैंड बदलने वाला था। संपादक का फैसला हो चुका था, बाकी विभागों से अब औपचारिक सहमति ली जाने की देर थी। डेढ़ घंटे की बहस के बाद अखबार के मैनेजर ने संपादक से पूछा, ‘मड़ुवाडीह में कुल कितनी वेश्याएं हैं?

‘करीब साढ़े तीन सौ’।

‘इनमें से कितनी अखबार पढ़ती हैं?’

इसका आंकड़ा किसी के पास नहीं था। उसने फैसला सुनाने के अंदाज में कहा, आज की तारीख में सारा शहर हमारे अखबार के साथ है। कुल साढ़े तीन सौ रंडिया जिनमें से कुल मिलाकर शायद साढ़े तीन होंगी जो अखबार पढ़ती हों, ऐसे में यह सब छापने का क्या तुक है। अगर कोई बहुत बड़ा और नया रीडर ग्रुप जुड़ रहा होता, तो यह जोखिम लिया भी जा सकता था।

संपादक जो ध्यान से उसका गणित सुन रहे थे हंसे। उन्होंने कहा, सवाल वेश्याओं की संख्या का नहीं है मैनेजर साहब! वे अगर तीन भी होतीं तो काफी थीं। उनके बारे में जो भी अच्छा-बुरा छपता है, उसे उनका विरोध करने वाले भी पढ़ते हैं, बल्कि उनकी ज्यादा दिलचस्पी रहती है।

मैनेजर ने पैंतरा बदला, अब आप ही बताइए कि अपने स्टैंड से इतनी जल्दी कैसे पलट जाया जाए। कल तक आप ही छाप रहे थे कि वेश्याओं की वजह से लोगों की बहू-बेटियों का घर में रहना तक मुश्किल हो गया है और डीआईजी धंधा बंद कराकर बहुत धर्म का काम कर रहा है। अब जब मुद्दा आग पकड़ चुका है तो उस पर पानी डाल रहे हैं। आप बताइए अखबार की क्रेडिबिलिटी का क्या होगा। संपादक ने समझाने की कोशिश की कि क्रेडिबिलिटी एक दिन में बनने-बिगड़ने वाली चीज नहीं है। लोग थोड़ी देर के लिए भावना के उबाल में भले आ जाएं लेकिन अंतत: भरोसा उसी का करते हैं जो उनके भोगे सच को छापता है। पहले ही दिन कोई कैसे जान सकता था कि मड़ुंवाडीह की असली अंदरूनी हालत क्या है। अब हमें जितना पता है, उतना छापेंगे। हो सकता है कल कुछ और नया पता चले उसे भी छापेंगे। अगर हमने नहीं छापा तो हमारी क्रेडिबिलिटी का कबाड़ा तो तब होगा जब लोग देखेंगे कि कंस्ट्रक्शन कंपनी मंडुवाडीह में इमारतें बना रही है।

गुणाभाग और अंततः जिंदगी : मामला उलझ गया कुछ तय नहीं हो पाया। मैनेजर ने डाइरेक्टरों से बात की। डाइरेक्टरों ने प्रधान संपादक को तलब किया। प्रधान संपादक ने फिर बैठक बुलाई। प्रधान ने स्थानीय संपादक को वह समझाया जो वे जानते-बूझते हुए नहीं समझना चाहते थे। उन्होंने उन्हें बताया कि इस इलाके के जितने बिल्डर, नेता, व्यापारी अफसर हैं निधि कंस्ट्रक्शन कंपनी के साथ हैं और चाहते हैं कि जल्दी से जल्दी वह बस्ती वहां से हटे ताकि काम शुरू हो। उन्होंने जनता को भी अपने पक्ष में सड़क पर उतार दिया है। अखबार एक साथ इतने लोगों का विरोध नहीं झेल सकता। खुद हमारे अखबार के इस इलाके के फ्रेंचाइजी यानि जिनकी बिल्डिंग में हम किरायेदार हैं, जिनकी मशीन पर हमारा अखबार छपता है, इस कंपनी के पार्टनर हैं। अखबार के कई शेयर होल्डरों ने भी इस कंपनी में पैसा लगा रखा है। वे सभी अपनी मंजिल के एकदम करीब हैं, और कहां हैं आप! खुद डाइरेक्टर नहीं चाहते कि उनकी राह में कोई अड़ंगा डाला जाए। नौकरी प्यारी है तो हमें, आपको दोनों को चुप रहना चाहिए, फिर कभी देखा जाएगा।

स्थानीय संपादक को निकालने की पूरी तैयारी हो चुकी थी, इसलिए उन्हें सब कुछ बहुत जल्दी समझ में आ गया। स्टियरिंग कमेटी की बैठक में प्रधान संपादक ने भाषण दिया, सभी जानते हैं कि सरसों के पत्तों पर और बैंगन में अल्लाह अपना हस्ताक्षर नहीं करते, दो सिर वाले विकृत बच्चे देवता नहीं होते, खीरे में से भगवान नहीं निकलते, गणेश जी दूध नहीं पीते। यह सब सफेद झूठ है लेकिन हम छापते हैं क्योंकि जनता ऐसा मानती है और उन्हें पूजती है। हम साढ़े तीन सौ वेश्याओं के लिए बीस लाख जनता से बैर नहीं मोल ले सकते। बाजार में हम धंधा करने बैठे हैं। हम वेश्याओं का पुनर्वास कराने वाली एजेंसी नहीं है। लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है इसलिए उसकी भावनाओं का आदर करना ही होगा। मैनेजर मुस्कराया। प्रधान संपादक ने स्थानीय संपादक को मुस्करा कर देखा, ‘हम अखबार किसके लिए निकालते हैं?

‘जनता के लिए’ बेजान हंसी हंसते हुए उन्होंने कहा।

स्थानीय संपादक ने प्रकाश से इस समय लोगों में नाराजगी बहुत है इसलिए थोड़ा माहौल ठंडा होने दो तब देखा जाएगा। वह जानता था कि धरती हिलाने का मेरा अरमान सदा के लिए धरती में दफन किया जा चुका है।

उसी समय एक विचित्र बात हुई। जलसमाधि का इरादा लिए गंगा में फिरने वाला युवक एक दिन गांजे के नशे में नाव से लड़खड़ाकर नदी में गिर गया। गले में बंधी पत्थर की पटिया के पीछे वह कटी पतंग की तरह लहराता हुआ नदी की पेंदी में बैठा जा रहा था। बड़ी कोशिश करके जल पुलिस के गोताखोरों ने उसे निकाला। पुराना पत्थर काटकर उसकी जगह छोटा पत्थर बांधा गया। उसी दिन से अपने आप, गले में बंधे पत्थर का आकार घटने लगा। जैसे चंद्रमा घटता है उसी तरह पहले सिल, फिर चौकी, फिर माचिस की डिबिया के आकार का होता गया। धीरे-धीरे घटते हुए वह एक दिन ताबीज में बदलकर थम गया।

उस घटते हुए रहस्यमय पत्थर की तस्वीरें, प्रकाश के पास मौजूद हैं।

अभी वेश्याएं मड़ुवाडीह से हटी नहीं है। अब वह युवक नाव में नहीं रहता। वह गाहे बेगाहे अपने गले का ताबीज दिखाकर अपना संकल्प दोहराता रहता है कि वह एक दिन काशी को वेश्यावृत्ति के कलंक से मुक्ति दिलाकर मानेगा। लोग उसे प्रचार का भूखा, नौटंकीबाज, धंधेबाज कहते हैं और उस पर हंसते हैं। प्रकाश को लगता है कि वैसा ही एक ताबीज उसके गले में भी है, जो उसे हमेशा दिखाई देता है। उसे वह अक्सर अपनी कमीज के बटन में उलझा हुआ दिख जाता है। उसे भी लोग धंधेबाज, दलाल और एक पौवा दारू पर बिकने वाला कहते हैं। उस पर और मेरे अखबार पर हंसते हैं।

प्रकाश सोचता है कि अब छवि से जल्दी से शादी कर ले। सच लिख तो नहीं सकता लेकिन उसे अपनी जिन्दगी में स्वीकार तो कर सकता है। समाप्त

इस कथा पर लेखक अनिल यादव तक आप अपनी प्रतिक्रिया oopsanil@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

हमारी दारू, हमारा मुर्गा, आंदोलन उनका

अनिल यादवएक कहानी (9) : साड्डे नाल रहोगे तो ऐश करोगे : एक दिन चुपचाप प्रकाश ने अभिजीत के सामने प्रस्ताव रखा, मैं तुम्हारे साथ वहां चल सकता हूं लेकिन मुजरा कराना पड़ेगा, फोटो खींचना चाहता हूं। उसके मन में मुजरा देखने सुनने की भी बहुत पुरानी दबी इच्छा थी जो इस समय आसानी से पूरी हो सकती थी। इस इच्छा से भी बड़ी वह गुत्थी थी जिसे खोलने के लिए मड़ुवाडीह जाना शायद जरूरी था। एक शाम रुटीन के फोटो प्रेस में डाउनलोड करने के बाद वह जल्दी निकल गया और मड़ुंवाडीह की उस बस्ती में पहुंचकर उसने पाया कि वहां की बिजली काटी जा चुकी है। बस्ती के दोनों तरफ भरे पानी के उस पार बुलडोजरों की गड़गड़ाहट और छपाक-छपाक मिट्टी फेंकने की आवाजें आ रही थीं।

पहली बार ध्यान से उसने कोठों को देखा, जिन्हें एक खास तरह के भ्रम के कारण कोठे कहा जाता था। एक टूटी फूटी सड़क के किनारे ईंटों के एक मंजिला, कहीं दुमंजिला मकान थे। ज्यादातर के पिछले हिस्से में पलस्तर नहीं था। पतली-पतली गलियों में खिड़कियों से लालटेनों और मोमबत्तियों की रोशनी आ रही थीं। बस्ती के दोनों तरफ बरसात का सड़ता पानी भरा था और चारों ओर हवा में बदबू थी, मच्छर भिनभिना रहे थे। सड़क किनारे की खाली पड़ी दुकानों की चाय की भट्ठियों में और छज्जों की छांव में अलाव जल रहे थे, जिनके गिर्द औरतें और रुखे बालों वाले कुम्हलाए बच्चे बैठे हुए थे। यह दलितों का कोई गांव लग रहा था। जहां उदास रात उतर रही थी।

मुजरे के तुरंता इंतजाम के तहत किसी घर से हारमोनियम, कहीं से ढोलक मंगाई गई। एक झबरे बालों वाला नशेड़ी लगता लड़का एक बैजों ले आया। एक घर के दालान में कई लालटेनें रखी गईं जिसकी छत के कोनों में मकड़ी के जाले थे जिनके आसपास सुस्त छिपकलियां रेंग रही थीं। दीवारों पर मामूली कैलेंडर और फ्रेमों में परिवारों के मेले, ठेले या चलताऊ स्टूडियोज में खिंचवाए फोटो लटक रहे थे। अंदर के दरवाजे पर नॉयलान की साड़ी को फाड़कर बनाया गया, चीकट हो चुका परदा लटक रहा था। थोड़ी देर में कमरा औरतों, बच्चों और दलालों से ठसाठस भर गया, उसे किसी तरह अपना कैमरा गोद में रखकर

ऊकड़ू बैठना पड़ा। परदे की ओट से एक काले रंग की मोटी सी औरत आई जिसके चेहरे पर पुते पाउडर के बावजूद चेचक के दाग झिलमिला रहे थे, बैठकर घुघंरू बांधने लगी। प्रकाश को लगा कि वह घुघंरू नहीं बांध रहीं, कहीं जाने से पहले जूते पहन रही है। उसके पीछे घुघंरू बांधे एक खूबसूरत सी लड़की आई जिसकी आंखे बिल्कुल भावहीन थीं। वह होंठ आगे की तरफ निकालकर बीच में खड़ी हो गई। उसे देख कर प्रकाश को लगा कि उसे कहीं पहले देखा है। वह इतनी दुबली थी कि एनीमिया की मरीज लगती थी। अचानक सुर मिलाने के लिए टूटी भाथी वाले हारमोनियम ने हांफना शुरू किया और दोनों औरतें नाचने लगीं। वे हाथ-पैर ऐसे झटक रही थी जैसे उन पर जमी धूल झाड़ रही हों। दोनों ने भावहीन तरीके से एक चालू फिल्मी गाना गाया। एक ऊंघती बुढ़िया ने जैसे नींद में फरमाइश की, ‘बाबू को पंजाबी सुनाओ, पंजाबी।’

एक क्षण के लिए मोटी औरत ने होंठ फैलाकर प्रकाश की तरफ देखा फिर अपने आंचल को कमर से निकालकर सिर पर पटका बांध लिया। ढोलक की गमक के साथ उचकते हुए उन्होंने गाना शुरू किया, ‘बोले तारा रा रा, बोले तारा रा रा!

साड्डे नाल रहोगे तो ऐश करोगे, दुनिया के सारे मजे कैश करोगे…’

कई बच्चे भी कूदकर नाचने लगे और धक्का-मुक्की होने लगी। कमरे में धूल उड़ने लगी, लालटेनों के आगे कुहासा सा गया। अब चीख पुकार के बीच सिर्फ उछलती हुई आकृतियों का आभास भर हो रहा था मानो रात के धुंधलके में प्रेत नाच रहे हों। वाकई यह भूखे और क्रुद्ध प्रेतों का ही नाच था जिन्हें घेरकर सड़ते हुए पानी और पुलिस के पहरे में बंद कर दिया गया। धूल के गुबार के काऱण अब फोटो खींच पाना संभव नहीं रह गया था। वह उठकर बाहर निकल आया। धूल उड़ाने की बेकार कोशिश करते हुए अभिजीत ने कहा, ‘यही इनकी जिदंगी है सर।’

अभिजीत को साथ लेकर प्रकाश चला तो सड़क आते ही पुलिस वाले चिल्लाते हुए लपके। इससे पहले कि वह कुछ बोल पाता एक लाठी से मोटर साइकिल की हेडलाइट फूट कर छितरा चुकी थी। अभिजीत ने तेजी से कहा, मुड़ लीजिए, दूसरी तरफ से निकलिए जानबूझकर मार रहे हैं, ये प्रेस बताने पर भी सुनेंगे नहीं।

मुड़ते-मुड़ते एक लाठी अभिजीत की पीठ पर पड़ी वह बिलबिला गया। बस्ती के दूसरे छोर पर मुस्तैद पर पुलिस वाले दूर से ही लाठियां लहराते, गालियां देते हुए बुला रहे थे, वह समझ गया ये निकलने नहीं देंगे। आज की रात यहीं काटनी पड़ेगी। बहुत दिनों के बाद उसे उस रात सचमुच का डर लगा। लग रहा था जैसे पेट में पानी भर गया है और मुंह से बाहर आ जाना चाहता है। थोड़ी देर तक बस्ती के दोनों छोरों से गालियां लहरातीं आती रही, ‘साले, मादरचोद प्रेस के नाम पर रंडीबाजी करने आते हैं।’

मोटरसाइकिल खड़ी कर संयत होने के बाद दुखते हाथ को सेंकने के लिए वह एक अलाव के आगे बैठ गया। अभिजीत वहां पहले ही जैकेट उतारकर अपनी पीठ सेंक रहा था और दो बच्चे, सिपाहियों को गालियां देते हुए, मास्टर साहब की पीठ की मालिश कर रहे थे। दोनों नाचने वालियां यास्मीन और विमला उसे छेड़ रही थी, और कराओ, खुलेआम मुजरा, समुझावन-बुझावन का प्रसाद मिल गया न।

वे दोनों अब प्रकाश को देखकर मुस्करा रही थी। कुछ इस भाव से जैसे अब आटे-दाल का भाव समझ में कुछ समझ में आने लगा होगा पत्रकार जी को। दोनों के चेहरे पर चुहचुहा आए पसीने से पावडर जगह-जगह बह गया था। उसने यास्मीन से कहा, तुम दोनों नाचती अच्छा हो, खूब नाचती हो। वह जैसे बुरा मान गई, खाली पेट खाक नाचेंगे दीवाली अंधेरे में गई, शादी ब्याह में सट्टा होता था, वह भी बंद हुआ देखिए कितने दिन नुमाइश के लिए नाचते हैं। अलाव से फूस का एक तिनका खींचते हुए यास्मीन ने उलाहना दिया, जिनको खिलाया, पिलाया, बाप-भाई माना जब वही दुश्मन हो जाएं तो कोई क्या गाएगा और क्या नाचेगा।

प्रकाश ने अभिजीत से पूछा इनके कौन बाप-भाई है जो दुश्मन हो गए हैं। वह हंसा, ‘खुद ही देख लीजिए, अब रुक ही गए हैं तो सब समझ में आ जाएगा। उसके कहने पर विमला एक घर से एक छोटा सा फोटो अलबम ले आई। वापसी में उसके पीछे छोटी सी भीड़ चली आ रही थी। उसने फोटो दिखाने शुरू किए, ‘यह देखिए सावित्री की बिटिया का कन्यादान हो रहा है।’ अगल बगल बैठी कई औरतों, बच्चों के चेहरे उस फोटों में थे वे। सभी एक सरपत के मंडप के नीचे खड़े थे। एक आदमी झुका हुआ वर के पैर धो रहा था।

‘ये मायाराम पटेल हैं, जो इस लड़की के बाप हैं। यहीं से डेढ़ साल पहले शादी हुई थी आज यह हम लोगों को भगाने के लिए कचहरी पर धरना देकर बैठा हुआ है।  

यह देखिए, असगरी बेगम के लड़के के खतने में सभासद तीरथराज दुबे मुर्गा तोड़ रहे हैं।

बोतलों, गिलासों, जूठी प्लेटों के पीछे दो औरतों को अगल-बगल दबाए तीरथराज दुबे फोटो से बाहर भहराने वाला था।

‘यह देखिए, हम लोगों के छोटे भइया सलमा से राखी बंधवा रहे हैं।’

पान की दुकान चलाने वाले राजेश भारद्वाज के हाथों में इतनी राखियां बंधी थी कि उसकी कलाइयां फूलदान लग रही थीं।

‘यह देखिए प्रधान जी सुहानी के साथ चांद पर जा रहे हैं।’

शिवदासपुर के उपप्रधान राम विलास यादव किसी मेले के स्टूडियो में चमकीली पन्नियों से सजे लकड़ी के चांद तारे पर एक लड़की से गाल सटाए बेवजह मुस्करा रहे थे।

‘यह देखिए… यह देखिए…वे एक के बाद एक मामूली कैमरों से खींचे हुए गैरमामूली फोटो दिखाए जा रही थीं।’

हमारी दारू, हमारा मुर्गा, आंदोलन उनका : जैसे फोटो अलबम में कोई पंप लगा था। हर फ्लैप पलटने के साथ प्रकाश की छाती में हवा भरती जा रही थी। ये सभी तो बदनाम बस्ती को हटाने के लिए आंदोलन चला रहे, कचहरी पर आमरण अनशन पर बैठे नेता थे। बस इनके छपने की देर थी कि उनके पाखंड को बारुद लग जाता और सारा आंदोलन कुछ घंटे में चिथड़े-चिथड़े हो जाता। अपनी उत्तेजना पर काबू पाने के बाद उसने अलबम हाथ में लेते हुए कहा, लेकिन ये लोग तो कह रहे हैं कि उनके बच्चों की शादियां नहीं हो पा रही हैं, बहू-बेटियों का जीना मुश्किल हो गया है।

लगा मधुमक्खियों की छत्ते पर ढेला पड़ गया। अलाव की आग से भी तेज जीभें लपलपाने लगीं, ये असली दल्ले हैं, अपनी बहू बेटियों का जीना खुद इन्होंने मुश्किल कर रखा है। इनके घर में कौन सी ऐसी शादी हुई है, जिसमें हम लोगों ने पचास हजार-लाख रूपया जमा करके न दिया हो और मुफ्त में गाना बजाना न किया हो। हमारे सामने तो आएं, जबान ही नहीं खुलेगी। हम लोग तो राजेश भारद्वाज की बारात में भी गई थीं, उसकी शादी यहीं की महामाया ने कराई है। जिस मकान में वह रहता है वह भी महामाया का ही है। उसके पास रजिस्ट्री के कागज हैं, चाहिए तो अभी ले जाइए। प्रपंची हैं, कुकर्मी हैं सामने पैसा देखकर बदल गए हैं कोढ़ फूटेगा सालों को।

इस कुहराम से अभिजीत हकबका गया। थोड़ी देर तक लाचार भाव से देखने के बाद उसने खड़े होकर पूरी ताकत से चिल्लाकर कहा, हल्ला करने से कोई फायदा नहीं महामाया को बोलने दिया जाए। वह सबको जानती हैं। ज्यादा अच्छी तरह बताएगी। भुनभुनाहट के बाद फिर थोड़ी के लिए खामोशी छा गई।

नेपालिन महामाया के बस्ती में तीन मकान थ। शायद सबसे मालदार और मानिंद वही थी। वह आग को खोदते हुए एक चमकीले शाल में लिपटी चुपचाप बैठी हुई थीं। सबके चुप होने के बाद उसने झुर्रियों में धंसी, काजल पुती, चमकीलीं आखें उठाईं, नशे से लरजती आवाज में वह ठहर-ठहर कर बोलनें लगी, देखिए कोई छठ आठ महीने पहले की बात है ये नेताजी लोग और भी कई शरीफ लोग बस्ती में रोज आते थे। हमारी दारू पीते थे हमारा मुर्गा तोड़ते थे और हमारे ही साथ सोते थे। हम लोग भी इनसे हर तरह का रिश्ता रखते थे। यह बात उनके बाल-बच्चों को भी पता है। लेकिन उनका लालच बढ़ता ही जा रहा था। ये लोग पुलिस के भी बाप निकले, आए दिन इतना पैसा मांगते थ कि देना हमारे बस में नहीं रहा। मास्टर साहब के कहने पर सब औरतों ने पंचायत करके तय किया कि बहुत हो गया। अब पैसा, दारू, मुर्गा बंद। हां, बोल-बात रहेगी, उनके प्रयोजन में पहले की तरह नाच-गाना भी रहेगा लेकिन पैसे की मदद किसी को नहीं की जाएगी। यही नाराजगी की वजह है। वरना, हम लोगों को तो इन्हीं लोगों ने और उनके बाप-दादों ने ही यहां बसाया था। बसाया भी अपने फायदे के लिए। बाजार से तीन गुने रेट पर भाड़ा लिया और पांच गुने रेट पर जमीन और मकान बेचे। अपनी सारी पूंजी लगाकर हम लोगों ने अपने ठीहे खड़े किए, अब रंडिया आंख दिखाएं, उन लोगों से यह बर्दाश्त नहीं हो रहा है। प्रकाश को बस्ती के भीतर एक नई बस्ती नजर आ रही थी।

महामाया ने ऊपर ताक कर कहा, ‘कागज लाओ… मकान ही नहीं बस्ती के भीतर जितनी दुकानें हैं, वे भी उन्हीं लोगों की हैं। घर-घर में झगड़ा हो रहा है कि उनकी जिद की वजह से पचासो परिवारों की रोजी-रोटी मारी जा रही है।  उसने एक-एक दुकानदारों के नाम गिनाने शुरू किए तो उन्हीं के साझीदार, भाई, रिश्तेदार या नौकर-चाकर थे। कोई दुकान छूट जाए तो बच्चे बीच में उचककर याद दिला देते थे। आधे घंटे के भीतर प्रकाश के पास इक्कीस मकानों की रजिस्ट्री के स्टैंप लगे असली कागज जमा हो चुके थे। बीस-बाइस साल पहले वाकई शहर से बाहर की जलभराव वाली जमीन के मनमाने दाम लिए गए थे।

अब अभिजीत ने बोलना शुरू किया ‘असलियत वैसी इकहरी नहीं है, जैसा कि आप लोग सोचते हैं। दरअसल यह आंदोलन ये बुलडोजर वाले चलवा रहे हैं। जलभराव के अगल-बगल के खेत और परती दिल्ली की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी ने खरीद लिए हैं। यहां के कई बड़े नेता, बिल्डर और माफिया कंपनी के फ्रेंचाइजी हैं। उन सबकी नजर इस बस्ती पर हैं, गांव और पड़ोस के मुहल्लों के चालाक लोग डीआईजी की शह पाकर आंदोलन इसलिए चला रहे हैं कि वेश्याएं अपने मकान औने-पौने में इन्हें बेचकर भाग जाएं फिर ये उनकी प्लाटिंग करके बिल्डरों की मदद से यहां अपार्टमेंट और मार्केटिंग काम्प्लेक्स बनवाएंगे और रातों-रात मालामाल हो जाएंगे। यकीन न हो तो इनमें से जिनके घर हैं, किसी से पूछ लीजिए दलाल और बिचौलिए मकानों की कीमत लगाने लगे हैं। उन्हें लगता है कि धंधा बंद होने के बाद वेश्याएं यहां ज्यादा दिन नहीं टिक पाएंगी। आप गौर से देखिए जो संस्थाएं आजकल डीआईजी का अभिनंदन करने में लगी हैं, उनका कोई न कोई पदाधिकारी कंस्ट्रक्शन कंपनी या फिर बिल्डरों से जुड़ा हुआ है।

प्रकाश के सीने में फिर से हवा भरने लगी। वह तुरंत उड़ जाना चाहता था। उसे तीस साल पहले इस इलाके की जमीनों के असल रेट और वेश्याओं को की गई रजिस्ट्री के रेट का तुलनात्मक व्यौरा, कंस्ट्रक्शन कंपनी के भू-उपयोग और ले-आउट प्लान का खाका, आंदोलन कर रहे नेताओं और डीआईजी की बिल्डरों से सौदेबाजी के सबूत और कुछ पुराने प्रापर्टी डीलरों और रीयल इस्टेट के धंधेबाजों के बयानों का इंतजाम करना था बस! यह कोई बड़ी बात नहीं थी। रजिस्ट्री दफ्तर, विकास प्राधिकरण और कंस्ट्रक्शन कंपनी के मार्केटिंग डिवीजन और पीआरओ से मिलकर ये सारे काम चुटकी बजाते हो सकते थे। एक सनसनीखेज स्टोरी सीरिज उसकी मुट्ठी में थी। उसने अभिजीत से कहा, ‘हमें एक बार फिर निकलने की कोशिश करनी चाहिए।’

‘अब ज्यादा खतरा है, सुबह से पहले निकलने की सोचिए भी मत, इस समय पुलिस वाले ट्रकों को रोककर वसूली कर रहे होंगे, बौखला जाएंगे।, अभिजीत ने कहा।

एक लड़की ने आकर बताया कि आज रात खाने का इंतजाम रोटी गली में है। ज्यादातर लोग खाकर जा चुके हैं, वे लोग भी पहुंचें, नहीं तो खाना खत्म हो जाएगा। प्रकाश हिचकिचाया तो एक अधेड़ औरत ने हाथ पकड़कर खींचते हुए कहा, ‘हम लोगों का कोठी, बंगला और गाड़ियां सब तो आपने देख ही लिया, अब चलकर खाना भी देख लीजिए। बड़े-बड़े लागों का खाना तो रोज ही खाते होंगे, एक दिन हमारा भी खाइए।  

एक गली में पेट्रोमेक्स की रोशनी में वेश्याओं की पंगत बैठ रही थी। बच्चों को पहले ही खिला दिया गया था। यह शायद आखिरी पंगत थी। पत्तल पर जब खिचड़ी और अचार आया तो यास्मीन हंसी, पत्रकार जी आजकल हम लोग यही खा रहे हैं। जो कमाया था डेढ़ महीने में उड़ गया। अगर पैसा हो भी तो सामान लाने निकल नहीं सकते। चोरी-छिपे चावल लाकर यही इंतजाम किया गया है।

प्रकाश अचरज को दबाना चाहता था लेकिन मुंह से निकल गया, ‘तवायफें साधुओं की तरह खिचड़ी खा रही हैं और जहां यह बंट रही है, उस जगह का नाम रोटी ही गली है।’

अभिजीत ने सामने की पंगत में खा रही पत्थर जैसे भावहीन चेहरे वाली एक औरत से कहा, ‘ये पत्रकार है, इनको बताओ रोटी वाली गली को किसने बसाया।’

जल्दी-जल्दी चार-पांच कौर खाने के बाद वह बोलने लगी, असली रोटी गली यहां नहीं कानपुर में है। वहां भी एक पागल पुलिस अफसर आई थीं, नाम था उसका ममता विद्यार्थी, उसने धंधा बंद करा दिया और पीटकर सब आदमियों को भगा दिया। आसपास के लोग भी हमें हटाने के लिए धरना प्रदर्शन करने लगे। डेढ़ साल तक हम लोग बैठकर खाते रहे, सोचते थे कि धंधा फिर शुरू होगा लेकिन नहीं हुआ। सबकी हालत बहुत खराब हो गई तो भागना पड़ा। मेरा बच्चा डेढ़ साल का था और बूढ़ी मां थी। सावित्री, जानकी और रेशमा के भी बच्चे छोटे-छोटे थे। हम लोग किसी परिचित के साथ यहां आ गए। बाकी औरतें कहां-कहां गई पता नहीं। हम लोगों का नाम ही रोटी गली वाली पड़ गया है। प्रकाश जान गया, अगर ये यहां से गईं तो पता नहीं कितने नए मड़ुंवाडीह और आबाद होंगे।

खाना खाने के बाद दोनों बाकी रोटी-गली वालियों के घर गए जहां मोमबत्ती की मद्धिम रोशनी में लटकते चीथड़ों के बीच उने बच्चे बेसुध सो रहे थे। प्रकाश ने ऐसे सैकड़ों घर देखे थे जहां गरीबी, भूख और दीनता बच्चों की आंखों में आंसुओं की पतली परत की तरह जम जाती है और वे दुनिया को हमेशा भय के परदे से देखने के आदी हो जाते हैं। यहां उनकी आंखें बंद थीं। सोते बच्चों की तस्वीरें खींचने के बाद वे फिर अलाव के पास वापस आ गए। वहां एक लूली बुढ़िया, वही रोज वाला किस्सा सुना रही थी कि कैसे एक बारात में नाचते हुए उसने बंदूक की नाल पर रखे सौ रुपए के नोट को छुआ तभी बंदूक वाले ने घोड़ा दबा दिया। उसकी जो हथेली अब नहीं है, उसमें दर्द महसूस होता है। बच्चे उसे चुप कराने के लिए शोर मचा रहे थे। ….जारी….

कथा लेखक अनिल से संपर्क oopsanil@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

महावर, आशिक का बैनर और पुतलियां

अनिल यादवएक कहानी (8) : पुलिस वाले मंड़ुवाडीह की बदनाम बस्ती से फिर किसी लड़की को न घसीट ले जाएं, इसकी चौकसी के लिए टोलियां बनाकर रात में गश्त की जा रही थी। डर कर भागने वालियों को मनाने के लिए पंचायत हो रही थी। अदालत जाने के लिए चंदा जुटाया जा रहा था। पुराने ग्राहकों और हमदर्दों से संपर्क साधा जा रहा था। शहर में फैली इस कचरघांव के बीच मड़ुंवाडीह की बदनाम बस्ती में चुपचाप अखबारों पर रोशनाई और महावर से अनगढ़ लिखावट में ‘हमको वेश्या किसने बनाया, ‘काशी में किसने बसाया, जो किस्मत से लाचार-उन पर भी बलात्कार, पहले पुनर्वास करो-फिर धंधे की बात करो जैसे नारे लिखे जा रहे थे। पुआल, पॉलीथीन और कागज के अलावों पर एल्यूमिनियम की पतीलियों में पतली लेई पक रही थी।

एक पुराना कस्टमर जो पेंटर था, बैनर लिखकर दे गया, जिस पर इतनी फूल-पत्तियां बना दी थीं कि जो लिखा था, छिप गया था। स्कूल चलाने वाले लड़के अभिजीत ने राष्ट्रपति से लेकर कलेक्टर तक के नाम ज्ञापन लिखे।

एक दिन सुबह वे अचानक, चुपचाप अपने बच्चों, भूखे खौरहे कुत्तों, सुग्गों के पिंजरों, पानदानों, खाने की पोटलियों, पानी की बोतलों के साथ हाथ से सिली जरी के किनारी वाले, फूलपत्तियों से ढके बैनर के पीछे मुख्य सड़क पर आ खड़ी हुईं। आगे वही लड़का अभिजीत था और सबके हाथों में नारे लिखी तख्तियां थीं। यह अब तक के ज्ञात इतिहास में वेश्याओं का पहला जुलूस था जो आठ किलोमीटर दूर कचहरी पर प्रदर्शन करने और कलेक्टर को मांग-पत्र देने जा रहा था। तीन सौ औरतों की लंबी कतार। इनमें से ज्यादातर बस्ती में लाए जाने के बाद पहली बार बाहर शहर में निकलीं थीं। उन्हें देखने के लिए ट्रैफिक थम गया, सड़कों के किनारे और मकानों के छज्जों पर लोगों की कतारें लग गईं।

रंडियां… रंडियां… देखो, रंडियां

लेकिन वे किसी को नहीं देख रही थीं, उनकी आंखों में भीड़ से घिरे जानवर के भय की परछाई थी और रह-रहकर गुस्सा भभक जाता था। लड़ेंगे… जीतेंगे, लड़ेंगे.. जीतेंगे वे किसी का सिखाया हुआ, अजीब सा नारा लगा रही थीं जिसका उनकी जिंदगी और हुलिए से कोई मेल नहीं था। ज्यादातर औरतें बीमार, उदास और थकी हुई लग रही थीं। मामूली साड़ियों से निकले प्लास्टिक की चप्पलों वाले पैर संकोच के साथ इधर-उधर पड़ रहे थे मानो सड़क में अदृश्य गड्ढे हों, जिनमें गिरकर समा जाने का खतरा था। बच्चे और कुत्ते भी सहमे हुए थे। नारे लगाते वक्त उठने वाले हाथों में भी लय नहीं झिझक और बेतरतीबी थी। लेकिन उनकी चिंचियाती, भर्राई आवाजों में कुछ ऐसा मार्मिक जरूर था जो रह-रहकर कचोट जाता था। उनके साथ-साथ सड़कों के किनारे-किनारे लोग भी गरदनें मोड़े चलने लगे। लोगों के घूरने से घबराकर गले में हारमोनियम और ढोलक लटकाए सांजिदों ने तान छेड़ी और वे चौराहों पर रुक-रुक कर नाचने लगीं।

झिझकते, नाचते-गाते यह विशाल जुलूस जब कचहरी में दाखिल हुआ तो वहां भी सनसनी फैल गई।

वे नारे लगाती कलेक्टर के दफ्तर के सामने के बरामदे और सड़क पर धरने पर बैठीं और चारों ओर तमाशबीनों का घेरा बन गया। जल्दी ही वकील, मुवक्किल, पुलिसवाले और कर्मचारी कागज की पर्चियों पर गानों की फरमाइशें लिखकर उन पर फेंकने और नोट दिखाने लगे। कुछ ढीठ किस्म के वकील हाथों से मोर और नागिन बनाकर भीड़ में बैठी कम उमर की लड़कियों को नाचने के लिए इशारे करने लगे। वेश्याओं ने उनकी ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया, वे अपने बच्चों को संभालती नारे लगाती बैठी रहीं। दो-ढाई घंटे बाद जिलाधिकारी के भेजे प्रोबेशन अधिकारी ने आकर कहा कि विभाग के पास वेश्याओं के पुनर्वास के लिए कोई फंड और योजना नहीं है। इसके लिए केन्द्र और राज्य सरकार को लिखा गया है। उनकी मांगे सभी संबंधित पक्षों तक पहुंचा दी जाएंगी। नारी संरक्षण गृह में इतनी जगह नहीं है कि सभी को रखा जा सके। जिलाधिकारी ने आश्वासन दिया है कि अगर वे धंधा नहीं करें तो अपने घरों में रह सकती हैं, उनके साथ जोर-जबरदस्ती नहीं की जाएगी। जिलाधिकारी ने राहत फंड की उपलब्धता जानने के लिए समाज कल्याण अधिकारी को बुलवाया लेकिन पता चला कि वे इन दिनों जेल में हैं। उनके विभाग के क्लर्कों और स्कूलों के प्रधानाचार्यों ने मिलकर हजारों दलित छात्रों के नाम से फर्जी खाते खोलकर उनके वजीफे हड़प लिए थे। इस मामले का भंडा फूटने के बाद कल्याण विभाग पर इन दिनों ताला लटक रहा था।

भीड़ में से एक बुढ़िया प्रोबेशन अधिकारी के आगे अपनी मैली धोती का आंचल फैलाकर खड़ी हो गई और भर्राई आवाज में कहने लगी,… जब तक जवानी रही सरकार आप सब लोगन की सेवा किया। ऊपर वाले ने जैसा रखा, रह लिए अब बुढ़ापा है। सरकार उजाड़िए मत कहां जाएंगे, कहीं ठौर नहीं है। वेश्याएं हंसने लगी, बुढ़िया प्रोबेशन अधिकारी को ही कलक्टर समझकर फरियाद कर रही थी। बुढ़िया बोले जा रही थी, ‘जब तक जवानी रही आपकी सेवा किया सरकार।’ तमाशबीन भी हंसने लगे। प्रोबेशन अधिकारी के चेहरे का रंग उतर गया। वह जल्दी से कुछ बोलकर मुड़ा और अंग्रेजों के जमाने की कचहरी के बरामदे के विशाल खंभों के पीछे अदृश्य हो गया।

यज्ञ, जला हुआ स्कूल और संपादकों से निवेदन : वेश्याओं के जुलूस के अगले दिन दशश्वमेध के बगल में मान मंदिर घाट पर ब्रह्मचारी साधुओं और बटुकों ने सामाजिक पर्यावरण की शुद्धि के लिए गणिका उच्छेद यज्ञ शुरू कर दिया। आटे के स्त्रियों के सैकड़ों पुतले बनाए गए। उन्हें नहलाने के बाद चंदन, सिंदूर, गुग्गुल आदि का लेप करने के बाद कच्चे सूत से लपेट कर सीढ़ियों पर सजा दिया गया। हर दिन हजारों की तमाशाई भीड़ के आगे टीवी चैनलों के कैमरो की उपस्थिति में गुरू गंभीर मंत्रोच्चार के बीच इन्हें हवन कुंड में फेंका जाता था। साधु और मांत्रिक गर्व से बताते थे कि इससे वेश्याएं समूल नष्ट हो जाएंगी और काशी पुन: पवित्र हो जाएगी। इन साधुओं और बटुकों की अधिक विश्वसनीयता नहीं थी, इसलिए उन्हें बहुत समर्थन नहीं मिल पाया। इनमें से ज्यादातर साधु, पंडे थे जो खासतौर पर विदेशियों को फांसने के लिए टूटी-फूटी अंग्रेजी, फ्रेंच या स्पेनिश बोलते हुए घाटों पर अलबम लिए बैठे रहते थे। बटुक भी ऐसे थे जिन्हें पितृपक्ष के महीने में यजमानों की भारी भीड़ जुट जाने पर पुरोहित दिहाड़ी पर लगा लेते थे। उन्हें घाटों पर मुंडित सिरों के बीच थोड़ी-थोड़ी दूरी पर पोथी थमाकर बिठा गया जाता था। पुराहित माइक्रोफोन पर मंत्र बोलते थे, वे उसे दुहराते थे। वे पुरोहित के निर्देशों की नकल कर यजमानों को उपनिर्देश देते थे। एक तरह से वे पिंडदान और तर्पण के दिहाड़ी मजदूरों की तरह थे।

हवन कुंड में पककर फट गई इन पुतलियों को विधि विधान पूर्वक गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता था। रात में इन हवन कुंडों को घाटों पर सोने वाले भिखारी टटोलते थे और आग पर पकी इन पुतलियों का गूदा निकालकर खा जाते थे। वे अपनी भूख मिटाने के लिए वेश्याओं को वैसे ही खा रहे थे जैसे थोड़े पैसे वाले लोग अपनी भूख मिटाने के लिए वेश्याओं से संभोग करते हैं। जब मालाओं और धागों में लिपटी प्रवाहित पुतलियां नदी के किनारों पर तिर रही थीं और उनके नितंबो, स्तनों, पेट, जांघों, चेहरों का गूदा फूलकर पानी में छितर रहा था तब वेश्याएं राजनीतिक पार्टियों के दफ्तरों के फेरे लगाकर मदद की गुहार कर रही थीं।

डेढ़ महीने के बाद बदनाम बस्ती के बच्चों का स्कूल एक रात जला दिया गया। यह स्कूल बस्ती के बाहर एक खंडहर पर टीन शेड डालकर चलता था। स्कूल चलाने वाले युवक अभिजीत ने बहुत कोशिश की लेकिन रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई। सभी जानते थे कि किसने जलाया है लेकिन पुलिस ने अपनी तरफ से जांच कर निष्कर्ष निकाला कि वहां रात में जुआ खेला जाता था। रात में आग तापने के लिए जुआरियों ने जो अलाव जलाया था, उसी से आग लगी थी। अखबारों में भी यही छपा क्योंकि कोई सबूत नहीं था। जिसके आधार पर आग लगाने वालों को इस घटना का जिम्मेदार ठहराया जा सके।

यह लड़का अभिजीत दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.फिल. करने के बाद कुछ दिन मध्य प्रदेश के सीधी जिले में बेड़िनियों के एक गांव में एक साल रहा था। यहां आकर उसने वेश्याओं के कुछ बच्चों को गोद लेकर पढ़ाना शुरू किया। अब उसके स्कूल में सौ से अधिक बच्चे पढ़ते थे और उसे विश्वास था कि ये बच्चे, उस नर्क में जाने से बच जाएंगे। वेश्याएं पहले अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजती थीं क्योंकि उन्हें यकीन ही नहीं था कि उन्हें कोई सचमुच पढ़ाना चाहता है। वह लगातार वेश्याओं से कहता रहता था कि वे अपनी आमदनी अपने पास रखें, उसे अपने पतियों यानि दलालों और भड़ुओं को न दें। उस पैसे को अपने और बच्चों पर खर्च करें।

वह बदनाम बस्ती के पुरुषों की आंख की किरकिरी था। वे स्कूल जलने से खुश थे। यहां भी ज्यादातर औरतें बिना पति के अकेले नहीं रह पाती थीं। उन्हें किसी न किसी से सुरक्षा की ओट चाहिए थी। ये पति यानि दलाल, भड़ुंए और साजिंदे ही उनके लिए ग्राहक पटाकर लाते थे और ज्यादातर पैसे हड़प लेते थे। वे आम पत्नियों की ही तरह उनके नाम पर व्रत और उपवास करती थीं और वे उन्हें आम पतियों की ही तरह पीटते थे। यह लड़का अभिजीत अब सब तरफ से मायूस होकर सारे दिन अखबारों के दफ्तरों में चपरासी से लेकर संपादक तक सबसे निवेदन करता रहता था कि वे बस एक बार चलकर अपनी आंखों से बदनाम बस्ती की हालत देख लें। वहां भुखमरी की हालत है, छह औरतें कोठे छोड़कर जा चुकी हैं और दूसरे जगहों पर धंधा ही कर रही हैं। यहां अगर पुलिस पिकेट नहीं उठती और उनका धंधा नहीं शुरू होता तो वे भूखों मरेंगी, या फिर चारों ओर फैल जाएंगी। इससे वेश्यावृत्ति कम नहीं होगी, बल्कि और बढ़ेगी। सी. अंतरात्मा की तरह, आम पत्रकारों की भी उसके बारे में राय यही थी कि बच्चों को पढ़ाने की आड़ में वह लड़कियों की तस्करी का रैकेट चलाता है और वेश्याओं की आमदनी से हिस्सा लेता है। वेश्याओं की भलाई का स्वांग करते हुए वह करोड़पति हो चुका है।

डेढ़ महीना बीतने के बाद भी किसी वेश्या ने थाने में जाकर सरकारी लोन की अर्जी नहीं दी थी और कोई भी नारी संरक्षण गृह जाने को तैयार नहीं हुई। ज्यादातर साजिंदों, दलालों के जाने के बाद यह मान लिया गया था कि जल्दी ही वे सभी कहीं और चली जाएंगी, सिर्फ बूढ़ी, बीमार औरते रह जाएंगी। जिनमें से कुछ को पुलिस उठाकर संरक्षण गृह में डाल देगी। बाकियों को खदेड़ दिया जाएगा जो घूमकर भीख मांगेगी। वैसे भी जनगणना विभाग वेश्याओं की गिनती भिखारियों के रूप में ही करता आया है। …जारी….

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हवा-हवाई टीवी के लिए मैं चिन्मय चिलगोजा…

अनिल यादवएक कहानी (7) : सी. अंतरात्मा का कौतुक : सी. अंतरात्मा को कंडोम बाबा बहुत दिलचस्प आदमी लगे, उस शाम अनायास उनका स्कूटर सर्किट हाउस की तरफ मुड़ गया और वह इंटरव्यू करने के बहाने उनसे मिलने चले गए। वे इस विचित्र आदमी को एक बार फिर देखना और उसकी छवि अपने मन में ठीक से बिठा लेना चाहते थे। उन्होंने सोचा था, लगे हाथ कंडोम के आठ-दस पैकेट भी मांग लेंगे। घर में पड़े रहेंगे, कभी-कभी काम आएंगे। सी. अंतरात्मा हमेशा इतने चौकन्ने रहते थे कि उन्हें अचूक ढंग से पता रहता था कि काम की कोई भी चीज मुफ्त में या कम से कम दाम में कहां मिल सकती है। उनमें अगर यह काबिलियत नहीं होती तो प्रेस की तनख्वाह से उनकी गृहस्थी का चल पाना असंभव था। दवाओं के मुफ्त सैंपल वे फार्मासिस्टों, डाक्टरों के यहां से लेते थे, बच्चों की किताबें सीधे प्रकाशकों से मांग लाते थे, कपड़े कटपीस के रियायती दाम पर लेते थे, प्रेस कांफ्रेंसों में मिलने वाले पैड और कलमें साग्रह बटोरते थे जो बच्चों के काम आते थे।

वहां गिफ्ट में मिलने वाले सजावटी सामानों को वे दुकानदारों को बेचकर नकद या अपने काम की चीजें लेते थे। खटारा स्कूटर उन्हें एक सजातीय थानेदार ने सुपुर्दगी में दिया था जो एक कुर्की के बाद थाने के अहाते में पड़ा सड़ रहा था। उन्हें अखबार की जो कांप्लीमेंट्री कॉपी मिलती थी, वे उसे पढ़ने के बाद आधे दाम में घर के सामने चाय वाले को बेच देते थे और इस पैसे से बच्चों को यदा-कदा बिस्कुट, नमकीन वगैरह दिला दिया करते थे।

सर्किट हाउस में घंटी बजाने के बाद कंडोम बाबा ने जैसे ही कमरे का दरवाजा खोला अंतरात्मा ने आदतन और थोड़ा उनके व्यक्तित्व के प्रभाव में झुककर, आत्मीय मुस्कान के साथ पूछा, यहां पर आपको कोई दिक्कत तो नहीं है, बेहिचक बताइएगा आप हमारे मेहमान हैं। कंडोम बाबा बिदक गए, यह सर्किट हाउस है या डकैतों का अड्डा, एक साफ तौलिया तो दे नहीं सकते दिक्कतें पूछने चले आते हैं। अंतरात्मा अकबका गए, कुछ बोल ही नहीं पाए और भड़ाक से दरवाजा बंद हो गया। पूरे सर्किट हाउस में एक ही चीकट तौलिया था जो वेटर ने कंडोम बाबा को दे दिया था। उन्होंने साफ तौलिया मांगा तो उसने उन्हें बताया कि आप ही जैसे गेस्ट लोग उठा ले जाते हैं इसलिए कोई और बचा ही नहीं है। कंडोम बाबा ने मैनेजर से शिकायत की तो उसने बताया कि इस साल अभी तक सामानों की खरीद नहीं हुई है। सी. अंतरात्मा जब इंटरव्यू मुलाकात के लिए पहुंचे, उस वक्त भन्नाए हुए कंडोम बाबा जिलाधिकारी को शिकायती पत्र लिख रहे थे और उन्होंने उन्हें सर्किट हाउस का वेटर समझ लिया था।

अंतरात्मा दफ्तर लौटकर यह किस्सा सुना रहे थे कि सिटी चीफ ने उन्हें डांटा कि ‘इतनी बड़ी खबर’ उनके पास है और वह बैठे चकल्लस कर रहे हैं। अगले दिन यह तौलिए वाली खबर कंडोम बाबा के बदनाम बस्ती दौरे के बीच में डबल कॉलम बॉक्स में छपी। कंडोम बाबा का उस दिन दिल्ली लौटना स्थगित हो गया, शाम को वह अंग्रेजी में लिखा साढ़े तीन पेज का खंडन लेकर अखबार के दफ्तर पहुंचे और वहां सी. अंतरात्मा को बैठे देखकर उनकी चीख निकल गई। वह संपादक से झगड़ने लगे कि उनका अखबार पीत-पत्रकारिता कर रहा है। खंडन में लिखा था कि आदर, आतिथ्य और सत्कार के लिए वे जिला प्रशासन व सर्किट हाउस के कर्मचारियों के आभारी हैं। तौलिए का किस्सा पूरी तरह मनगढ़ंत है। किसी रिपोर्टर ने इस बारे में उनसे बात तक नहीं की है। अखबार यह सब जिला प्रशासन की छवि बिगाड़ने के लिए कर रहा है। दरअसल जिलाधिकारी ने कंडोम बाबा को बुलाकर कह दिया था कि वे या तो तुरंत इस खबर का खंडन छपवांए या फिर अगली बार से अपने ठहरने का कोई और ठिकाना ढूढ़ लें। कंडोम बाबा का खंडन रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया। क्योंकि पता था कि उन्हें रात में दिल्ली जाना ही जाना है और उनके दर्शन फिर कब होंगे कोई नहीं जानता।

असाइनमेंट के बीच मे ही प्रकाश पार्लर पहुंचा और छवि को लगभग घसीटते हुए बाथरूम में ले जाकर उसे प्रेगनेन्सी के होम टेस्ट की किट थमा कर दरवाजा धड़ाक से बंद कर दिया। थोड़ी देर बाद छवि ने उसे दिखाया कि इंडीकेटर साफ बता रहा था कि वह सच बोल रही थी। वह पूछना चाहता था कि तुम्हें उस लड़की के बलात्कार की बात कैसे पता चली लेकिन मुंह से निकला, कब पता चला। छवि ने उसे छुआ तो वह कांप रहा था उसने कहा, तुम्हारा तो वह हाल हो रहा है जो, मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं, का भयानक डॉयलाग सुनते ही पुरानी फिल्मों के हीरो का हुआ करता था।

अब शादी के बारे सोचना होगा जल्दी कुछ करना पड़ेगा, उसका मुंह सूख रहा था। क्योंकि भीतर लू चल रही थी।

जलसमाधि वाया चिन्मय चिलगोजा : मड़ुवाडीह में नहीं गंगा की मंझधार में एक नया संकट उठ खड़ा हुआ। एक बलिदानी हिन्दू युवक ने संकल्प  कर लिया कि अगर मकर संक्रांति तक काशी को वेश्यावृत्ति के कलंक से मुक्त नहीं किया जाता, तो वह सूर्य के उत्तरायण होते ही जलसमाधि ले लेगा। मुंडित सिर, जनेऊधारी यह युवक गले में पत्थर की एक भारी पटिया बांधकर गंगा में ही एक नाव पर रहने लगा। पहले भी एक बार वह ऐसा प्रयास कर चुका था। इसलिए प्रशासन विशेष सतर्क था। उसकी नाव के आगे और पीछे प्रशिक्षित गोताखोरों से लैस जल पुलिस की दो नावें लगा दी गईं।

जल पुलिस के पीछे महाबीरी झंडों से सजी नाव पर शंख, घंटा, घड़ियाल बजाते और बीच-बीच में हर-हर महादेव का उदघोष करते गर्व से तने समर्थक चलते थे। पीछे नावों में सवार इलेक्ट्रानिक चैनलों के क्रू रहते थे। हर क्रू को अपने इंटरव्यू की बारी के लिए समर्थकों की अगली नाव से टोकन लेना पड़ता था। जल्दबाज मीडिया की अराजकता को रोकने और युवक को पर्याप्त विश्राम देने के लिए यह व्यवस्था की गई थी। क्योंकि बोलते-बोलते उसका गला बैठ चुका था। दिल्ली और मुंबई के बड़े चैनलों ने बजरे किराए पर लेकर उन्हें ओबी वैन में बदल दिया था। वे निरंतर ‘सदाचार की गंगा से गणिका विरोध,’ ‘जल में आंदोलन,’ ‘जल समाधि’ का सजीव प्रसारण कर रहे थे।

दाएं, बाएं और बीच में कैमरे लिए विदेशी पर्यटकों की कश्तियां घुसी रहती थीं, वे उस युवक की नैतिकता, संकल्प और अभियान के विलक्षण तरीके से चमत्कृत थे। स्वीडन की ओरिएंटल फिलासफी की छात्रा माग्दालीना इन्केन इतनी प्रभावित थी कि उसने युवक से प्रेम की सार्वजनिक घोषणा कर दी थी। प्रकट तौर पर वे यही कहते थे कि उन्हें इस युवक में ईसा मसीह की छवि दिख रही है लेकिन आपसी बातचीत में गोद में रखी बिसलेरी की बोतलों को दुलराते हुए वे पुलक उठते थे कि किताबों में पढ़े मदारियों, संपेरों, साधुओं और जादूगरों के जिन करतबों को देखने के लिए वे यहां आए थे, अनायास दिख रहे हैं। इस दुर्लभ क्षण की झांकियों अपने देश ले जाकर बेचने का अवसर वे चूकना नहीं चाहते थे।

यह अंतर्राष्ट्रीय धज का अजीबो-गरीब बेड़ा भोर से लेकर रात के ग्यारह बजे तक राजघाट के पुल से रामनगर के किले के बीच गंगा में तैरता था। घाटों पर तमाशबीनों की भीड़ लगी रहती थी। जब बेड़ा उनकी नजरों से ओझल होने लगता था तो वे खीझकर हर-हर महादेव का नारा लगाते हुए गालियां बकने लगते थे और पास आने पर फिर वे प्रसन्नता से अभिवादन करते हुए हर-हर महादेव का नारा  लगाते थे। यह उदघोष ऐसा संपुट था जिसका इस्तेमाल वे प्रसन्नता, क्रोध, गौरव, हताशा, उन्माद सभी भावों को व्यक्त करने के लिए सैकड़ों सालों से करते आए थे।

वेश्याओं को धंधे के लाइसेंस दिए जाएं न दिए जाएं इस पर टीवी चैनलों पर टॉक शो हो रहे थे जिनमें वेश्यावृत्ति के विशेषज्ञ, ट्रैफिकिंग के जानकार, नैतिक प्रश्नों के शोधकर्ता, इतिहासकार, कालगर्लों के रैकेट पकड़ने वाले पुलिस अधिकारी, समाज कल्याण से जुड़े अफसर, महिला संगठनों की नेता और आम लोग धारावाहिक बोल रहे थे। गंगा में नावों पर सवार रिपोर्टर असहाय मंदबुद्धि बच्चों की तरह चीख रहे थे, ‘समूची काशी नगरी नदी और घाटों पर निकल आई है। वेश्यावृत्ति से नाराज लोग हर-हर महादेव के नारे लगा रहे हैं। पानी और पत्थर के बीच एक युवक की जान खतरे में है, उधर वेश्याओं ने अब तक रोजगार के उपायों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है और वे मड़ुंवाडीह में ही बनी हुई है। अब देखना है प्रशासन इस चुनौती से कैसे निपटता है… मैं चिन्मय चिलगोजा… वाराणसी से हवा-हवाई टीवी के लिए।’

उधर घाट किनारे, अस्सी मोहल्ले में बुद्धिजीवियों का अड्डा कही जाने वाली एक चाय की दुकान में विश्वविद्यालयों के निठल्ले प्रोफेसर, विफल वकील, राजनीतिक दलों के हताश कार्यकर्ता, बेरोजगार, ठलुए, अधपगले भंगेड़ी, कवि, पत्रकार, लेखक और बतरसी आपस में इस मुद्दे पर जूझ रहे थे। मठों में कोठारिनों, मंदिरों में देवदासियों और सेविकाओं को लेकर औझैती के कर्मकांड में पिछड़ी, दलित औरतों के साथ व्यभिचार के उद्धरण दिए जा रहे थे तो जवाब में हर घर में चलते व्याभिचार और छिनालपन के सच्चे किस्से सुनाए जा रहे थे। कोई विवाह को खाना, कपड़ा, छत और सुरक्षा के एवज में होने वाली सामाजिक मान्यता प्राप्त वेश्यावृत्ति का सबसे बड़ा कर्मकांड बता रहा था तो जवाब में ऐसे विचार का उत्स उसके रखैल की औलाद होने में तलाशा जा रहा था। इन सबके ऊपर एक आयुर्वेदिक नुस्खा था, जिसे सभी अपनी स्मृति में सहेज लेना चाहते थे इसे एक भंगेड़ी ने वेश्यावृत्ति उन्मूलन के उपाय के रूप में सुझाया था-

सोंठ, सतावर, गोरख गुंडी

कामराज, विजया, नरमुंडी।।

गिरै न बीज, झड़े न डंडी

पलंग छोड़ के भागै रंडी।।

उसका कहना था कि अगर कस्टमर इस नुस्खे का इस्तेमाल शुरू कर दें तो नगर वधुएं भाग जाएंगी और मड़ुंवाडीह देखते ही देखते खाली हो जाएगा। पतली गर्दन, झुकी पीठ और सूख चली जांघों वाले बुद्धिजीवी इसे याद कर लेना चाहते थे। शायद उनके अवचेतन में था कि वेश्याओं पर न सही अपनी पत्नियों, प्रेमिकाओं पर तो वे इसका इस्तेमाल कर ही सकते हैं। …जारी…

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कंडोम बाबा की करूणा

अनिल यादवएक कहानी (6) : बनारस में धंधा बंद होने की खबर पाकर दिल्ली से कंडोम बाबा आए। साठ-बासठ साल के बुजुर्ग बाबा वेश्याओं को सेक्सवर्कर कहते थे और उन्हें एड्स आदि यौन बीमारियों से बचाने के लिए देशभर के वेश्यालयों में घूमकर कंडोम बांटते थे। ये कंडोम उन्हें सरकार के समाज कल्याण विभाग और कई विदेशी संगठनों से मिलते थे। वे लड़कियों की तस्करी और वेश्याओं के पुनर्वास की समस्याओं को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाते थे। वे समर्पित, फक्कड़ सोशल एक्टिविस्ट लिखे जाते थे। उन्हें फिलीपींस का प्रतिष्ठित मैगसायसाय पुरस्कार मिल चुका था। वे सर्किट हाउस में ठहरे। तड़के उठकर उन्होंने गंगा-स्नान और विश्वनाथ मंदिर में दर्शन किया। फिर फूलमंडी गए। वहां एक ट्रक से ताजा कटे लाल गुलाबों के बंडल उतर रहे थे। उन्होंने गिनकर एक सौ छिहत्तर फूलों का बंडल बंधवाया और सर्किट हाउस लौटे। प्रेस और टीवी वालों के साथ दनदनाता हुआ उनका काफिला मड़ुवाडीह से थोड़ा पहले सड़क किनारे रुक गया जहां उन्होंने अपना श्रृंगार किया।

कार में बैठे-बैठे उन्होंने सबसे पहले कई राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय ठप्पों वाली टी -शर्ट पहनी, दो कंडोम खोलकर दोनों कानों में लटका लिए, जो हवा चलने पर सीगों की तरह तनने लगते थे वरना बकरी के कानों की तरह लटके रहते थे। कई कंडोमों को थोड़ा सा फुलाकर एक धागे में बांधकर उनकी माला गले में डाल ली। वे ऐसे अंगुलिमाल लगने लगे, जिसने किसी पारदर्शी दानव की उंगलियां काटकर गले में पहन ली हों। ड्राइवर से उन्होंने कई गुब्बारे कार के आगे पीछे बंधवा दिए। उन्होंने पहले ही जिलाधिकारी से अनुमति ले ली थी और उनके साथ समाज कल्याण विभाग का एक अफसर भी था, जिस कारण बदनाम बस्ती में घुसने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई।

बस्ती में सन्नाटा था, यहां-वहां कुछ बच्चे खाली सड़क पर खेल रहे थे। बच्चों ने उनकी गाड़ी को घेर लिया और गुब्बारे मांगने लगे। उन्होंने उन्हें खदेड़ते हुए कहा कि बच्चों को कंडोम देना संसाधनों की बर्बादी है। जब तक उनकी कंडोम से संबंधित जिज्ञासाओं का समाधान करने वाले कार्यकर्ता हर घर तक नहीं पहुंचेंगे, बच्चे उन्हें गुब्बारा ही समझते रहेंगे। इसके बाद वे हर दरवाजे पर जाकर वेश्याओं को ताजे लाल-लाल गुलाब के फूल भेंट करने लगे। यह कंडोम बाबा का अपना खास तरीका था जिस रेड लाइट एरिया में वे जितने दिनों बाद जाते थे, उतने गुलाब के फूल बांटते थे। यहां वे कोई छह महीने बाद आए थे। उन्होंने कंडोम देने चाहे तो वेश्याओं ने मना कर दिया। एक बुढ़िया ने उन्हें डांटा, जब धंधा ही बंद है तो गुब्बारा लेकर क्या करेंगे, उबालकर खाएंगे कि तुम्हारी तरह झुमका बनाकर पहनेंगे। ज्यादातर कंडोम दलालों और भडुंओं ने झपट लिए, वे इन्हें ग्राहकों को बेचते थे।

फूल बांटने के बाद उन्होंने एक तेरह साल की लड़की को कंडोम देना चाहा तो वह शरमा गई। उसके कंधे पर हाथ रखकर वे उसे कैमरों के सामने लाते हुए उन्होंने पूछा, ‘बेटी कंडोम का इस्तेमाल करती हो?’

वह चुप खाली आंखों से उन्हें देखती रही। उन्होंने फिर उससे पूछा, ‘लकड़ी खाती हो या नहीं?’

लड़की घबराकर भाग गई।

कान में लटके कंडोम की चिकनाई को अंगूठे और तर्जनी के बीच मलते हुए वे अब प्रेस की तरह मुखातिब हुए, ‘लकड़ी खिलाना एक तकनीक है जो कम उमर की लड़कियों को धंधे में लाने के लिए अपनाई जाती है। इसमें सोला लकड़ी का इस्तेमाल होता है जो पानी में बहुत जल्दी फूल जाती है। लड़की के भीतर इस लकड़ी को डालकर उसे रोज पानी के टब में या पोखर में नहलाया जाता है। जल्दी ही लड़की धंधे के लायक हो जाती है… जब धंधे से बचा नहीं जा सकता तो इसे करने में हर्ज ही क्या है, इससे लड़कियों को तकलीफ नहीं होती।’ प्रेस वाले वेश्याओं के जीवन के बारे में उनकी जानकारी से चकित थे।

देर तक बुलाने के बाद कुछ वेश्याएं इकट्ठा हुईं। उन्होंने एक छोटा सा भाषण दिया, कुछ दिन पहले धार्मिक नगरी उज्जैन की नगर पालिका ने वेश्याओं को लइसेंस दिए थे, हमने मांग की है कि काशी में भी ऐसा किया जाए। इसके लिए मेयर और जिलाधिकारी से बात हुई है… जब से दुनिया है तब से सेक्स वर्कर हैं। डंडे के जोर पर वेश्यावृत्ति कोई नहीं रोक पाया है। एक सौ छिहत्तर देशों में सेक्स वर्करों को धंधे के लाइसेंस दिए गए हैं। यूरोप में तो लाइसेंस है, बीमा होता है, मेडिकल जांच कराई जाती है, ऐसी सुविधाएं दी जाती हैं जो हमारे यहां के सरकारी कर्मचारियों को भी नहीं मिलती हैं। अगर वेश्यावृत्ति बंद करनी है तो पुनर्वास के अंतर्राष्ट्रीय मानकों का पालन किया जाना चाहिए। पहले ऐसी परिस्थितियां बनाई जाएं कि समाज, सेक्स वर्करों को सामान्य नागरिक की तरह स्वीकार कर सके, फिर उन्हें धंधा छोड़ने को कहा जाए वरना कोई नतीजा नहीं निकलेगा।’ उन्होंने नारा दिया, ‘काशी को उज्जैन बनाओ’ और जाने लगे। बच्चों से घिरी एक औरत ने रास्ते में रोककर उनसे कहा कि क्या वे कंडोम बांटने के बजाय यहां खाने का कुछ सामान नहीं भिजवा सकते। यहां से कोई न जा सकता है, न अंदर आ सकता है। हम लोगों के पास जो कमाई थी, खत्म हो चली है। यही हाल रहा तो हम लोग बीमारी से पहले भूख से मरेंगे। उन्होंने उसे गुलाब का फूल देते हुए कहा कि वे जिलाधिकारी के पास जा रहे हैं, उनसे इस बारे में बात करेंगे। बस्ती से वे जिलाधिकारी के पास चले गए। अगले दिन उन्हें किसी सम्मेलन में थाइलैंड जाना था।

कंडोम बाबा जिस समय गुब्बारे मांगने वाले वेश्याओं के बच्चों को लंगड़ाते हुए खदेड़ रहे थे छवि ने ठीक उसी समय फोन पर बताया, उसे आशंका है कि वह प्रेगनेन्ट हो गई है। प्रकाश ने उसे बधाई देते हुए बताया कि कल अखबार के मेन पेज पर उसकी ऐसे आदमी से मुलाकात होने वाली है, जो अगर इस दुनिया में न होता तो वह अब तक एक दर्जन बच्चों की मां बन चुकी होती।

अगले ही क्षण उसे लगा कि उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक रही है और वह अंधेरे में धंसता जा रहा है। छवि ने शांत ढंग से कहा कि उसने कई महिलाओं से बात की है जिनका कहना है कि बारह हफ्ते से ज्यादा हो चुके हैं। कंधे पर लटका उसका बैग धप्प से गिर पड़ा। वह लड़खड़ाता हुआ एक मकान के आगे निकले चबूतरे पर बैठकर आंखे फाड़े कंडोम बाबा को देखने लगा। उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, आंखों के ठीक आगे मटमैले धुंधले चकत्ते उड़ रहे थे। उसकी तरफ किसी का ध्यान जाए इससे पहले उसने खुद को जबर्दस्ती खींच कर खड़ा कर करने की कोशिश की तो चक्कर आ गया, माथे पर हाथ फिराते हुए उसने महसूस किया कि वह जाड़े में भी पसीने से भीगा हुआ है। थोड़ी देर बाद अकस्मात पहली चीज उसके दिमाग में यही आई कि छवि उस लड़की के साथ  बलात्कार की घटना के बारे जानती है। वह फिर घड़ी के पेंडुलम की तरह झूलने लगा, जानती है…..नहीं जानती….जानती है। उसकी पूरी जिंदगी इस एक सवाल पर जैसे आकर टिक गई थी और उसे बहुत जल्दी फैसला करना था। अक्सर सिर उठाने वाले शर्मिंदंगी से भरे संदेहों और उनके शांत होने पर उससे भी भीषण आत्मघाती पश्चाताप में सुलगने का समय जा चुका था क्योंकि छवि के भीतर एक बच्चा लगातार बड़ा हो रहा था और वह किसी भी चीज का इंतजार नहीं करने वाला था। …जारी…

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लड़की लाना बंद करो दाज्यू

अनिल यादवएक कहानी (5) : धंधा बंद होने के एक हफ्ते बाद, डीआईजी रामशंकर त्रिपाठी का काफिला फिर मड़ुवाडीह पहुंचा। आगे उनकी बिल्कुल नई हरे रंग की जिप्सी थी। पीछे खड़खड़ाती जीपों में कई थानों के प्रभारी और लाठियों, राइफलों से लैस सिपाही थे। सबसे पीछे एक रिक्शे पर माइक और दो भोंपू बंधे हुए थे। शाम को जब यह लाव-लश्कर वहां पहुंचा तो मकानों की बत्तियां जल चुकी थी। आसमान पर छाते कुहरे के धुंधलके में बदनाम बस्ती के दोनों तरफ भरे पानी के गड़ढों के पार एक-एक बुलडोजर रेंग रहे थे। कोई कंस्ट्रक्शन कंपनी इस खलार जमीन को पटवा रही थी। कुहरे में हिचकोले खाते बुलडोजर बस्ती की तरफ बढ़ते मतवाले हाथियों की तरह लग रहे थे। एक जीप के बोनट पर मुश्किल से चढ़ पाए एक तुंदियल सिपाही ने माइक से ऐलान किया, ‘मानव-मंडी के सभी बंशिंदे फौरन यहां आ जाएं, डीआईजी साहब उनसे बात करेंगे, उनकी समस्याएं सुनेंगे और उनका निदान करेंगे।’ मडुवाडीह थाने में मानव-मंडी बाकायदा एक बीट थी।

थाने में एक रजिस्टर में वहां रहने वाले सभी लोगों के नाम पते और अतीत दर्ज था। नए आने और जाने वालों का रिकार्ड भी उसमें रखा जाता था। रेड लाइट एरिया के देसी विकल्प के रूप में सब्जी मंडी, गल्ला मंडी, बकरा मंडी के तर्ज पर रखा गया यह नाम कितना सटीक था। मानव देह ही तो बिकती थी, वहां। चेतावनी की लालबत्ती जलती तो कभी देखी नहीं गई। नगर वधुओं को बुलाने के लिए सिपाहियों का एक जत्था बस्ती में घुस गया। थाने के ये वे सिपाही थे जो इन मकानों की एक-एक ईंट को जानते थे। वेश्याओं ने सोचा था कि धंधा बंद कराना, पुलिस की हफ्ता बढ़वाने की जानी पहचानी कवायद है। आमतौर पर थानेदार एक आध कोठे पर छापा डालता, दो चार दलालों से लप्पड़-झप्पड़ करता। कोई लड़की पकड़ कर थाने पर बिठा ली जाती और तय-तोड़ हो जाता था। लेकिन डीआईजी खुद दूसरी बार आए थे। उन्हें अंदाजा हो गया था कि इस बार मामला गंभीर है।

सबसे पहले बच्चे आए। उनके साथ एक युवक आया, जिसने दो साल पहले उन्हें पढ़ाने के लिए बस्ती में स्कूल खोला था। बच्चे उसे मास्टर साहब कहते थे। पीछे बस्ती के दुकानदार, साजिंदे, भड़ुए, सबसे बाद में वेश्याएं आईं। इतनी भीड़ हो गई कि उसमें अचानक गुम हो गए डीआईजी की फोटो खींचने के लिए प्रकाश को एक मकान की छत पर चढ़ना पड़ा। भीड़ के बीच छोटे से घेरे में, चार पांच बूढ़ी औरतें और उनकी नकल करते बच्चे, बलैया लेते हुए, गिड़गिड़ाते हुए, नाटकीय ढंग से डीआईजी के पैरों की तरफ लपक रहे थे। सिपाही उन्हें डांटते हुए आगे बढ़ते, वे उनसे पहले ही तपाक से वापस अपनी जगह चले जाते थे। एक चाय की दुकान से लाए गए बेंच पर, हाथों में माइक थामकर डीआईजी खड़े हुए तो सन्नाटा खिंच गया। बस्ती के किनारों पर रेंगते बुलडोजरों की गड़गड़ाहट फिर सुनाई पड़ने लगी। उन्होंने कहा ‘भाईयों और बहनों।’ बहनों के ‘ओं’ में जैसे कोई चुटकुला छिपा था, भीड़ हंसने लगी, वेश्याएं हंसते-हंसते एक दूसरे पर गिरने लगीं।

उन्होंने गला साफ करके कहीं दूर देखते हुए कहना शुरू किया, प्रशासन को मानव मंडी के बशिंदों की समस्याओं का पूरा ध्यान है, वेश्यावृत्ति गैर-कानूनी है इसलिए उस पर सख्ती से रोक लगा दी गई है। मड़ुवाडीह थाने में अलग से एक सेल खोला गया है। आप लोग वहां जाकर सरकारी लोन के लिए आवेदन करें। आप लोगों को छूट के साथ, कम ब्याज पर भैंस, सिलाई-मशीन, अचार-पापड़ का सामान दिलाया जाएगा। अपना रोजगार शुरू करें, जो काम करने के लायक नहीं हैं, उन्हें नारी संरक्षण गृह भेज दिया जाएगा ताकि आप लोग यह बेइज्जती का पेशा छोड़कर सम्मान के साथ…। सरकार के नारी संरक्षण गृह का नाम सुनकर वेश्याएं फिर आपस में ठिठोली करने लगी। डीआईजी ने अपने फालोअर को डपटा, जाओ पता करो, वे क्या कह रही है। फालोअर थोड़ी देर वेश्याओं के बीच जाकर हंसता रहा लेकिन पलटते ही उसका चेहरा पहले की तरह सख्त हो गया। लौटकर अटेंशन की मुद्रा में खड़ा होकर बोला, ‘सर, कहती हैं फ्री में समाज सेवा नहीं करेंगे।’

डीआईजी समझ नहीं पाए, वेश्याओं ने सिपाही से कहा था कि संरक्षण गृह जाने से बेहतर तो जेल है क्योंकि वहां फ्री में समाज सेवा करनी पड़ती है। कुछ दिन पहले संरक्षण गृह में संवासिनी कांड हुआ था। वहां की सुपरिटेडेंट नेताओं, अफसरों और अखबारी भाषा में सफेदपोश कहे जाने वाले लोगों को लड़कियां सप्लाई करती थीं। जब यह मामला खुला तो एक के बाद एक मारकर पांच लड़कियां गायब कर दी गईं। ये वे लड़कियां थी जिन्होंने मुंह खोला था। इन दिनों सीबीआई इस मामले की जांचकर रही थी।

भीड़ के पीछे एक बुढ़िया गश खाकर गिर पड़ी थी। झुर्रियों से ढके उसके चेहरे पर सिर्फ बेबस खुला मुंह दिखाई दे रहा था। एक मरियल औरत बैठकर आंचल से उसे हवा करते हुए गालियां दे रही थी, करमजले, मिरासिन की औलाद…मार डाला बेचारी को… जब जवानी थी तब यही पुलिस वाले रोज नोंचने आ जाते थे। कसबिन की जात अब चौथेपन भैंस चराएगी…. पेड़ा बनाएगी। कोई जाकर पूछे मरकीलौना से रंडी के हाथ का कौन पापड़ खाएगा, कौन दूध पिएगा, कौन कपड़ा पहिनेगा…यह सब, हम लोगों से घर-बार छीनकर भीख मंगवाने का इंतजाम है और कुछ नहीं… शहर छोड़कर चले जाओ, जैसे हम हाथ पकड़ कर लोगों को घर से बुलाने जाते हैं। लोगों को ही क्यों नहीं मना कर देते कि यहां न आया करें। जो हमें भगाने के लिए धरना देकर बैठे हैं, वही कहीं और जाकर क्यों नहीं बस जाते। हमें कौन अपने पड़ोस में बसने देगा। यहां की तरह वहां भी छूत नहीं लगेगी क्या?

यह बुढ़िया अकेली रहती थी। उसने सबेरे से कुछ खाया पिया नहीं था। सुबह से ही वह दोनों छोरों तक घूम-घूम कर आंदोलन करने वालों को गालियां बक रही थी। उसके दो बेटे थे जो कहीं नौकरी करते थे। चोरी छिपे साल-दो साल में मिलने आ जाते थे। सबके सामने उसे वे अपनी मां भी नहीं कह सकते थे।

पीछे हंगामा देखकर सिपाही उधर लपके तभी न जाने कहां से एक अधेड़ नेपाली औरत झूमते हुए आकर डीआईजी के पीछे खड़ी हो गई। उसके बाल खुले थे, साड़ी धूल में लिथड़ रही थी, वह पीकर धुत्त थी। अगल- बगल की औरतें उसे खींच रही थी। अचानक वह चिल्लाने लगी और उसके गालों पर गंदले आंसू बहने लगे, ‘आस्तो न गर बड़ा साहब… आस्तो न गर दाज्यू.. अपाना हुकुम माथे पर लिया।’

डीआईजी चौंक कर पीछे घुमें तो उसने हाथ जोड़ लिए, ‘साहेब, मेरा साहेब। पहले यहां नई लड़की लोग का लाना तो बंद करो साहेब! हम लोग खुद तो नहीं आया साहेब… बहुत बड़ा-बड़ा लोग लेकर आता है। नेपाल से, बंगाल से, ओड़िसा से… हर नई लड़की पीछे थाना को पैंतीस हजार पूजा दिया जाता है। पुराना का तो घर है, बाल-बच्चा है, बूढ़ा होके नहीं तो बीमारी से मर जाएगी। लेकिन नया लड़की आता रहेगा तो यहां का आबादी बढ़ता जाएगा। जहां से लड़की आता है, रास्ते भर सरकार को बहुत रुपया मिलता है।’

सिपाही उसे चुप कराने लपके तो उचक कर उसने एक की टोपी झटक ली और उसी से खुद को पीटने लगी। मानो जिस सबसे बुरी होनी की आशंका हो, उसे खुद अपने हाथों घटित कर देना चाहती हो, वह उन्माद में बड़बढ़ाए जा रही थी, ‘मारेगा हमको, मारेगा… काट डालेगा… और जास्ती क्या कर लेगा। यहां से कोई नहीं जाएगा…. जहां जाओ, वहीं से भगाता है। कितना भागेगा… यहीं मर जाएगा। लेकिन अब कहीं नहीं जाएगा। डीआईजी हाथ में माइक लिए भौंचक ताकते रह गए। उन्होंने कई बार नाराज होकर सुनिए, सुनिए की अपील की लेकिन हुल्लड़ में उधर किसी का ध्यान ही नहीं गया। सिपाही ने उससे टोपी वापस लेनी चाही तो वह भागने लगी। सिपाही पीछे लपका तो उसने टोपी पहन ली और ठुमकते हुए भीड़ में घुस गयी। वह नाचते हुए आगे-आगे, बौखलाया सिपाही पीछे-पीछे। लोग सब कुछ भूलकर हंसने लगे। जो पुलिस वाले वहां अक्सर आते थे। वेश्याएं उनके साथ इसी तरह हंसी ठट्ठा करती थीं। लेकिन आज यह सिपाही नथुने फुलाए, दांत पीसते हुए, उसके पीछे लड़खड़ाता भाग रहा था। बच्चे तालियां बजाने और चीखने लगे।

डीआईजी ने घूरकर पुलिस वालों की तरफ देखा जो हंस रहे थे। पहले वे सकपकाए फिर तुरंत उन्होंने कतार बनाकर डंडों से भीड़ को बस्ती के भीतर ठेलना शुरू कर दिया। जो बस्ती के नहीं थे, सिपाहियों को धकेलकर सड़क की ओर भागने लगे। इन भागते लोगों पर पीछे खड़े सिपाहियों ने डंडे जमाने शुरू कर दिए। इसी बीच गुस्से से तमतमाए डीआईजी अपने फालोअर और ड्राइवर को लेकर निकल गए। बस्ती में स्कूल चलाने वाला लड़का डंडों के ऊपर इस तरह झुका हुआ था जैसे लाठियां उसके पंख हों और वह उड़ रहा हो। वह वहीं से चिल्लाया, ‘आप उनसे खुद ही बात कर लीजिए, मैडम! पता चल जाएगा… शरीफ औरतें वेश्याओं के बारे में बात नहीं करतीं। वे गुड़िया पीटने और विश्वसुंदरी प्रतियोगिता के विरोध में बयान दे सकती हैं बस। यहां आएंगी तो उनके पति घर से भगा देंगे, सारा नारीवाद फुस्स हो जाएगा।’

एक महिला रिपोर्टर उससे पूछ रही थी कि आप लोग महिला संगठनों से बात क्यों नहीं करते, तभी लाठियां चलनी शुरू हो गई थीं। अब वह पुलिस वालों के पीछे घबराई खड़ी हुई उसे लाठियों, शोर और बस्ती के अंधेरे में गायब होता देख रही थीं।

थोड़ी ही देर में वह जगह खाली हो गई जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं था। अगले दिन अखबार में हेडलाइन थी, ‘वेश्याओं ने पुलिस की टोपी उछाली, लाठी चार्ज, बाइस घायल।’ अखबारों और चैनलों की भाषा में यह मामला अब ‘हॉटकेक’ बन चुका था जिसे वे अपने ही ढंग से परोस और बेच रहे थे। चैनलों ने इसे कुछ इस तरह पेश किया जैसे देश में यह अपने ढंग की अकेली घटना हुई हो जिसमें वेश्याओं ने एक डीआईजी के साथ ग्राहक से भी बुरा सलूक करने के बाद उन्हें खदेड़ दिया हो। अखबार के दफ्तर में जो संगठन बधाईयां दे रहे थे, अब उनकी तरफ से वेश्याओं के इस कृत्य के निन्दा की विज्ञप्तियां बरसने लगीं। कई और संस्थाएं कचहरी पर चल रहे धरने में शामिल हो गईं और स्नेहलता द्विवेदी आमरण अनशन पर बैठ गईं। मड़ुवाडीह के दोनों छोरों पर अब एक-एक प्लाटून पीएसी भी लगा दी गई। बदला चुकाने और वेश्याओं का मनोबल तोड़ने के लिए पुलिस वालों ने एक लड़की के साथ बलात्कार कर डाला।

चौदह साल की यह लड़की डीआईजी की मीटिंग के बाद से खाने का सामान लाने के लिए सड़क के उस पार जाने देने के लिए पहरा दे रहे सिपाहियों की विनती कर रही थी। दो-तीन बार आई तो डपटकर भगा दिया। अगले दिन फिर आईं तो सिपाही उससे बतियाने और चुहल करने लगे, उसे लगा कि शायद अब जाने देंगे इसलिए वह भी दिन भर इतराती और हंसती रही।

अंधेरा होने के बाद सिपाहियों ने उसे एक छोटे लड़के के साथ सड़क पार करने दी। वे सामानों की गठरियां लेकर जैसे ही लौटे सिपाहियों ने डंडे पटकते हुए दोनों को दूर तक खदेड़ दिया। वे डर गए, क्योंकि बस्ती से कभी बाहर निकले ही नहीं थे। दोनों वहीं सड़क के किनारे बैठकर रोने लगे, कई घंटे बाद जब दुकानें बंद हो गईं। तब एक सिपाही लड़की को बुलाकर एक लारी के भीतर ले गया। वहां एक सिपाही ने उसका मुंह बंद कर दिया और दो ने टांगे पकड़ लीं। बारी-बारी से चार सिपाहियों ने उसके साथ बलात्कार किया फिर उसे बच्चे और पोटलियों के साथ बस्ती में धकेल दिया गया। वेश्याएं रात भर सड़क के मुहाने पर जमा होकर गालियां देती रहीं और पुलिस वाले यह कहकर हंसते रहे कि उन्होंने लड़की को बढ़िया ट्रेनिंग दे दी है, अब आगे कभी कोई दिक्कत नहीं होगी।

स्कूल चलाने वाले युवक ने अखबार के दफ्तर में आकर सारा वाकया सुनाया। यह लड़की उसके स्कूल में पढ़ती थी। रिपोर्टरों ने कहा कि वह एफआईआर की कॉपी लाए तब खबर छप सकती है, कोई तो सबूत होना चाहिए। उसने बहुत समझाया कि जब पुलिस ने ही रेप किया है तो वे कैसे सोचते हैं कि अपने ही खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कर लेगी। वे चाहें तो लड़की को अस्पताल ले जाकर या किसी डाक्टर को बस्ती में ले जाकर मेडिकल जांच करा सकते हैं। उसकी हालत अब भी बहुत खराब है। खबरों के बोझ के मारे रिपोर्टर इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहते थे और वे जानते थे कि कोई डाक्टर बस्ती में जाने को तैयार नहीं होगा। एक रिपोर्टर ने शरारत से कहा, ‘और मान लो मेडिकल जांच हो भी तो क्या निकलेगा क्या?’

‘मतलब हाइमन ब्रोकेन, खरोंच, खून ये सब तो रिपोर्ट में आएगा नहीं।’

दूसरे रिपोर्टर ने हंसी दबाते हुए घुटी चीख के स्वर में कहा, ‘रिपोर्ट में आएगा एवरीथिंग ओवर साइज, ट्यूबवेल डीप, अनेबल टू फाइंड एनीथिंग!’

कानफाड़ू ठहाकों के बीच वह युवक हक्का-बक्का रह गया। थोड़ी देर बाद उसे सांत्वना देने के लिए एक रिपोर्टर ने पुलिस सुपरिटेंडेंट को फोन मिलाया तो वे हंसे, वेश्या के साथ बलात्कार! विचित्र लीला है। अरे भाई साहब, वे आजकल ग्राहकों के लिए पगलाई घूम रही हैं, सामने मत पड़ जाइएगा। नहीं तो आपही का बलात्कार कर डालेंगी। यह पुलिस को बदनाम करने का रंडियों का खास पैंतरा हैं। यह खबर नहीं छपी न ही किसी चैनल में दिखी, क्योंकि किसी के पास कोई सबूत नहीं था कि बलात्कार हुआ है। दरअसल सुपरिटेंडेंट की तरह पत्रकारों को भी यह समझ मे नहीं आ रहा था कि आखिर, किसी वेश्या के साथ बलात्कार कैसे संभव है।

प्रकाश ने अचानक खुद को उस युवक जैसी हालत में पाया जिसका हुचुर-हुचुर हंसते अपने साथियों के सामने यह भी कहना व्यर्थ था कि वह खबर दे पाने में लाचार है लेकिन उसे यकीन है कि लड़की के साथ बलात्कार हुआ है। तब शायद अगला निर्मम जुमला यह भी आ सकता था कि वह भविष्य की एक अनुभवी पोर्न मॉडल तक पहुंचने का सूत्र बना रहा है।

तभी फोन की घंटी बजी, यह छवि थी जो कह रही थी कि उसे अब फोटो खींचने की तमीज सीख ही लेनी चाहिए। शायद आवाज के कंपन से उसे तीव्र पूर्वाभास हुआ कि उसे लड़की के साथ बलात्कार की घटना का पता है। उसने जब यूनिवर्सिटी में ब्यूटीशियन का कोर्स कर रही छवि की पहली बार फोटो खींचने की कोशिश की थी तो उसके भरे-भरे होंठों पर नाचती रहस्मयमय हंसी, आंखों की शरारत और बांह पर खरोंच के दो निशानों से अकबका गया था। कैमरे का शटर खोलना ही नहीं, उस पर लगा ढक्कन भी हटाना भूल गया था और लगातार फोटो खींचते, लगभग हकलाते हुए उसे तरह-तरह के पोज देने के लिए कह रहा था। छवि ने जब कहा कि कई दिन से उसका टेली लेंस उसके पार्लर में ही पड़ा हुआ है तो लगा शायद उसे नही पता है। उससे फोन पर बात करते हुए उसे लगातार लग रहा था कि दुनिया में बहुत सारे लोग हैं जो अपने साथ घट चुके को कभी साबित नहीं कर पाएंगे और वह भी उन्हीं में से एक है। वह उनकी आवाज कभी नहीं बन सकता जो कमजोरी के कारण बोल नहीं पाते, वह सिर्फ उनकी आवाज को दुहरा सकता या चेहरे दिखा सकता है, जिनके पास ताकत है। उसकी कलम में किसी और की स्याही है, कैमरे के पीछे किसी और की आंख है। फोन रखने के काफी देर बाद तक वह कैमरे का शटर खोलता, बंद करता यूं ही बैठा रहा।

खटाक….पता है। खटाक….नहीं पता है। खटाक…पता है। उसका दिमाग झूला हो चुका था।

…जारी…

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तो बहनों, धंधा बंद

एक कहानी (4) : मडुवाडीह के आसपास के गांवों- मोहल्लों से लोकल नेताओं के बयान और अफसरों के पास ज्ञापन आने लगे कि वेश्याओं को वहां से तुरंत हटाया नहीं गया तो वे आंदोलन करेंगे। आंदोलन से प्रशासन नहीं सुनता तो वे खुद खदेड़ देंगे। रातों रात कई नए संगठन बन गए, राजनीति के कीचड़ में कुमुदिनी की तरह अचानक उभरी एक सुंदर और गदबदी महिला नेता स्नेहलता द्विवेदी आस-पास के इलाकों का दौरा कर औरतों को गोलबंद करने लगीं। उनका कहना था कि वे जान दे देंगी लेकिन काशी के माथे से वेश्यावृत्ति का कलंक मिटाकर रहेंगी। कई रात बैठकें और सभाएं करने के बाद वे एक दिन कई गांवों की महिलाओं को लेकर कचहरी के सामने की सड़क पर धरने पर बैठ गईं। तैयारी लंबी थी, यह धरना पहले क्रमिक फिर महीनों चलने वाले आमरण-अनशन में बदल जाने वाला था।

डीआईजी रमाशंकर त्रिपाठी के खिचड़ी बालों की खूंटियों में कंधी फेरने के दिन आने में अभी देर थी लेकिन वह दुर्लभ क्षण सामने था। अपने धार्मिक पिता की इच्छा पूरी करने और अपनी दागदार छवि धुलने का सही समय आ गया था। अचानक एक दिन वे लाव-लश्कर के साथ दोपहर में मंडुवाडीह बस्ती पहुंचे और सबको बुलाकर ‘आज से धंधा बंद’ का फरमान सुना दिया। उन्होंने सरकार की ओर से ऐलान किया, धर्म और संस्कृति की राजधानी काशी के माथे पर वेश्यावृत्ति का कलंक बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वेश्याएं शहर छोड़ दें। उनके जाते ही मडुवाडीह की बदनाम बस्ती से गुजरने वाली सड़क के दोनों छोरों पर पुलिस पिकेट लगा दी गई। शामों को बस्ती की तरफ लपकने वालों की ठुकाई होने लगी। नियमित कस्टमर सड़कों के किनारे मुर्गा बने नजर आने लगे। जो सिपाही रोज कोठों पर मुंह मारते थे, उनके मुंह लटक गए। थाने के बूढ़े दीवान ने खिजाब लगाना बंद कर दिया। घुंघरूओं की खनक, रूप की अदाएं, पियक्कड़ों की बकबक, दलालों का कमीशन और पुलिस का हफ्ता सब हवा हो गए। मंडुवाडीह के कर्फ्यू जैसे माहौल में अखबार काजल और लिपिस्टिक से ज्यादा जरूरी चीज हो गया।

अखबार के सर्कुलेशन में हल्का उछाल आया। उस हफ्ते अखबार की स्टियरिंग कमेटी की मीटिंग में यूनिट मैनेजर ने अपनी रिपोर्ट पेश की कि इस स्टोरी सीरीज का लोगों और प्रशासन पर जोरदार असर हुआ है। धार्मिक संस्थाओं के विज्ञापनों का फ्लो भी बढ़ा है। इसे जारी रखा जानी चाहिए।

सी. अंतरात्मा अखबार के उपेक्षित कोने से उठाकर सबसे चौड़ी डेस्क पर लाए गए और अचानक अपने व्यक्तित्व की दीनता को तिरोहित कर बेधड़क, व्यास की भूमिका में आ गए। वे अपने पड़ोस के मोहल्ले की दिनचर्या, आयोजनों, झगड़ों, अर्थशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र पर धारा प्रवाह, थोड़ा इतराते हुए बोलते जाते। प्रेस के सबसे बेहतरीन, वरिष्ठ लिक्खाड़ उसे लिपिबद्ध करते जाते। प्रकाश ने उन्हें वेश्या-विशेषज्ञ की उपाधि दी लेकिन उसी क्षण, उसके भीतर विचार आया कि दुर्बल अंतरात्मा भूखे सांड़ों को चारा खिला रहे हैं, जैसे ही उनका पेट भरेगा वे उन्हें हुरपेट कर खदेड़ देंगे। अंतरात्मा की जानकारियों में वह सब भी अनायास शामिल हो गया जो कुछ ये लिक्खाड़ बचपन से वेश्याओं के बारे में सुनते, जानते और अपनी कल्पना से जोड़ते आए थे।

कोठों का एक रंगारंग धारवाहिक तैयार हुआ, जिसका लव्बोलुआब यह था कि ज्यादातर वेश्याएं बहुत अमीर, सनकी और कुलीन हैं। कई शहरों में उनकी कोठियां, बगीचे, कारें, फार्म हाउस और बैकों में लॉकर हैं। वे चाहें तो यह धंधा छोड़कर कई पीढ़ियों तक बड़े आराम से रह सकती हैं लेकिन हर शाम एक नए इश्क की आदत ऐसी लग गई है कि वे यह धंधा नहीं छोड़ सकतीं। एक तरफ कार्टूनों, इलेस्ट्रेशनों और सजावटी टाइप फेसेज से सजा यह रंगीन धारावाहिक था तो दूसरी तरफ रूटीन की तथ्यात्मक रिपोर्टें थीं, जिनकी शुरुआत इस तरह होती थी, ‘डीआईजी रमाशंकर त्रिपाठी की पवित्र काशी को वेश्यावृत्ति के कलंक से मुक्त कराने की मुहिम रंग ला रही है, आज चौथे दिन भी धंधा, मुजरा दोनों बंद रहे। अब तक कुल छियालीस लोगों को बदनाम बस्ती में घुसने की कोशिश करते पकड़ा गया। इनमें से ज्यादातर को जानकारी नहीं थी कि धंधा बंद हो चुका है। आइंदा इधर नहीं आने की चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।

डीआईजी के इस पुण्य काम की चारों ओर प्रशंसा हो रही थी। अखबारों के दफ्तरों में संगीतमय, संस्कृतनिष्ठ नामों वाले अखिल जंबूद्वीप विद्धत परिषद, हितकारिणी परिषद, जीव दया हितकारिणी समिति, मानव कल्याण मंडल, स्त्री प्रबोधिनी पुष्करणी, काशी गौरव रक्षा समिति, पराहित सदाचार न्यास, वेद-ब्रह्मांड अध्ययन केन्द्र आदि पचासों संगठनों की ‘साधु-साधु’ का निनाद करती विज्ञप्तियां बरसने लगीं। कहीं न कहीं हर दिन उनका सम्मान और अभिनंदन को रहा था। सी. अंतरात्मा अब इस धन्यवाद से टपकते पुलिंदे को संक्षिप्त करने दोपहर बाद बैठते और देर रात तक निचुड़ कर घर जाते। उनके लिए अलग से आधा पेज तय करना पड़ा क्योंकि यह संपादकीय नीति थी कि सभी विज्ञप्तियां और दो-तीन प्रमुख लोगों के नाम जरूर छापे जाएं। जिसका नाम छपेगा, वह अखबार जरूर खरीदेगा।

तीस साल बाद इतिहास खुद को दुहरा रहा था। तब बदनाम बस्ती शहर के बीच दालमंडी में हुआ करती थी। बस्ती नहीं, तब उन्हें तवायफों के कोठे कहा जाता था। वहां तहजीब थी, मुजरा था, उनके गाए ग्रामोफोन के रिकार्ड थे, किन्हीं एक बाईजी से एक ही खानदान की कई पीढ़ियों के गुपचुप चलने वाले इश्क थे। यहीं से कई मशहूर फिल्म अभिनेत्रियां और क्लासिकी गायिकायें निकलीं जिनके भव्य वर्तमान में हेठा अतीत शालीनता से विलीन हो चुका है। वहां जमींदार, रईस और हुक्काम आते थे। जमींदारी और रियासतें जा चुकी थीं फिर भी कोठे की वह तहजीब गिरती, पड़ती विद्रूपों के साथ बहुत दिन घिसटती रही। सत्तर के दशक में भयानक गरीबी और लड़कियों की तस्करी के कारण वहां भीड़ बहुत बढ़ गई। जिन गलियों में रईसों की बग्घियां खड़ी होती थी वहां लफंगे हड़हा सराय के मशहूर चाकू लहराने लगे। लोगों के विरोध के कारण तवायफों को शहर की सीमा पर मडुवाडीह में बसा दिया गया।

तवायफों के जाने के बाद वहां चीन और बांग्लादेश से आने वाले तस्करी के सामानों का चोर बाजार बस गया। अब वहां नकली सीडी का सबसे बड़ा बाजार है। इलेक्ट्रानिक्स के विलक्षण देशी इंजीनियर इन दिनों वहां मिलते हैं, जिनके लिए काला अक्षर भैंस बराबर है लेकिन कबाड़ से किसी भी देश की किसी भी मल्टीनेशनल कंपनी के मोबाइल, सीडी प्लेयर, कैमरे और म्युजिक सिस्टम तैयार करके बेचते हैं। अब तक वेश्यावृत्ति एक सुसंगठित, विशाल व्यापार बन चुकी थी। मडुवाडीह में गजलें, दादरा और टप्पे सुनना तो दूर गेंदे के फूल की एक पत्ती तक नहीं बिकती थी। वहां सिर्फ निर्मम धंधा होता था जहां कारखानों के मजदूरों से लेकर रिक्शेवाले तक ग्राहक थे। ग्लोबल दौर के प्लास्टिक मनी वाले रईसों को अब हाथ में गजरा लपेट कर धूल, सीलन और अनिल यादवकूड़े से बजबजाती बदनाम बस्ती में जाने की कतई जरूरत नहीं थी। उन्हें अपनी पसंद के रंग, साइज और भाषा की कालगर्लें होटलों, फार्महाउसों और ड्राइंगरूमों में ही मिल जाती थीं। इनमें से कई अपने कस्बों, शहरों या प्रदेश की सुंदरी प्रतियोगिताओं की विजेता थीं। मिस लहुराबीर से लेकर मिस नार्थ इंडिया तक बस एक फोनकॉल की दूरी पर सजी-धजी इंतजार करती रहती थीं। ….जारी…

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मठ, खंजन चिड़िया, मिस लहुराबीर

अनिल यादवएक कहानी (3) : डीआईजी रमाशंकर त्रिपाठी के भव्य, फोटोजेनिक, रिटायर्ड आईएएस पिता परिवार की प्रतिष्ठा, बेटे के कैरियर की चिंता के आवेग से मठों, अन्नक्षेत्रों और आश्रमों की परिक्रमा करने लगे। बनारस में ब्रिटिश जमाने के भी पहले से अफसरों और मठों का रिश्ता टिकाऊ, उपयोगी और विलक्षण रहा है। कमिश्नर, कलेक्टर, कप्तान आदि पोस्टिंग के पहले दिन काशी के कोतवाल कालभैरव के आगे माथा नवाकर मदिरा से उनका अभिषेक करते हैं। जो दुनियादार, चतुर होते हैं वे तुरंत किसी न किसी शक्तिपीठ में अपनी आस्था का लंगर डाल देते हैं, क्योंकि वहां अहर्निश परस्पर शक्तिपात होता रहता है। इन शक्तिपीठों में देश भर के ‘हू इज हू’ नेता, उद्योगपति, व्यापारी, माफिया, मंत्री भक्त या शिष्य के रूप में आते हैं।

वे अपने गुरुओं के लिए कुछ भी करने को आतुर रहते हैं। अफसरो की तरक्की, तबादला, विरोधियों का सफाया, खुफिया जांच रपटों का निपटारा सारे काम गुरुओं के एक संकेत से हो जाते हैं। इसके बदले वे महंतों, ज्योतिषाचार्यों, तांत्रिकों, वास्तुशास्त्रियों और प्राच्यविद्या के ज्ञाताओं की इच्छाओं को आदेश मानकर पालन करते हैं क्योकि वह प्राणिमात्र के कल्याण के लिए किया गया धार्मिक कार्य होता है। नौकरशाही और धर्म का यह संबंध अरहर और चने के पौधों जैसा अन्योनाश्रित है। दोनों एक दूसरे को पोषण, समृद्धि और जीवन देते हैं। छोटे-मोटे संत की मान्यता पा चुके उस वक्त के कमिश्नर ने एक मठ को अपना कैंप कार्यालय बना लिया था और सरकारी ओदश के अनुपालन में बनारस को विश्व धरोहर घोषित करने की अर्जी यूनेस्को में डाल रखी थी जिसकी पैरवी के लिए वे हर महीने अमेरिका जाते थे। मठ में आने वाले विदेशियों, प्रवासी भारतीयों, उद्योगपतियों और सेठों को व महंत की कृपा से काशी के विकास में धन लगाने के लिए प्रेरित कर एक अरब से अधिक रुपया इकट्ठा कर चुके थे। यह काम आज तक कोई अधिकारी नहीं कर पाया था।

जिनसे मान्यता, गरिमा और शक्ति मिलती है, शक्तिपीठें उन्हें अपने करीब और करीब बुलाती हैं। धर्म की छतरी के नीचे यहां, आधुनिक और पुरातन, वैराग्य और ऐश्वर्य, धंधे और अध्यात्म, सहजता और तिकड़म ईश्वर की उपस्थिति में इस कौशल से आपस में घुल मिल जाते हैं कि कहीं कोई जोड़ नजर नहीं आता। जो जितने शक्तिशाली और संपन्न दिखते हैं उनकी आत्मा उतनी ही खोखली और असुरक्षित होती जाती है। ऐसे लोगों को अभय और आश्वस्ति का नैतिक संबल देने वाला यह शहर बनारस चुंबक की तरह खींचता है। भौतिक चीजों की कामना करते, दुखी साधारण लोग इन शक्तिपीठों को आस्था देते हैं और बदले में सूखा आशीर्वाद पाते हैं। यह खांटी आध्यात्मिक लेन-देन होता है। शक्तिशाली लोगों के आस्था निवेदित करते ही यह लेन-देन भौतिक हो जाता है और वे इन शक्तिपीठों के सबसे सुरक्षित गोपन रहस्यों में बराबर के साझीदार हो जाते हैं।

यूं ही ईश्वर ने फुर्सत के एक दिन डीआईजी के भव्य फोटोजेनिक, बूढ़े बाप की आर्त पुकार सुन ली। अक्टूबर के महीने में अचानक खंजन चिड़ियां छतों पर फुदकने लगीं और अखबार के चितकबरे पन्नों पर स्टोरी सीरिज ‘कहानी बदनाम बस्ती की’ नाचने लगी।

नैतिकता के सन्निपात में डूबते-उतराते दो रिपोर्टर, गाईड सी. अंतरात्मा के पीछे-पीछे घूमते हुए मड़ुवाडीह, शिवदासपुर के मोहल्लों और गांवों को खंगालने लगे। खबरें छपने लगीं कि नगर वधुओं के कारण आसपास के मोहल्लों की लड़कियों की शादियां नहीं हो या रही हैं, कईयों के तलाक हो चुके हैं, कई मायके आने को तरस रही हैं, भाइयों की कलाईयां और सावन के झूले सूने पड़े हैं। लोग गांव, मोहल्ले का नाम छिपाकर रिश्ते जोड़ने की चालाकी करते हैं लेकिन असलियत पता चल ही जाती है। तब मंडप उखड़ते हैं, बारात लौटती है। बत्तीस साल की बीए पास सरला को शादी के नाम से नफरत हो गई है और अब उसे द्वाराचार के गीत सुनकर हिस्टीरिया के दौरे पड़ते हैं।

शिवदासपुर में पान की दुकान लगाने वाले राजेश भारद्वाज की शादी पांच बार टूटी, छठी बार जौनपुर के त्रिलोचन महादेव मंदिर में चोरी से विवाह हुआ, पोल खुल गई। लड़की की विदाई रोककर, कहीं और शादी कर दी गई। नाते-रिश्तेदार हालचाल लेने तक गांव में नहीं आ सकते, उन्हें दलाल जबरन कोठों में खींच ले जाते हैं, वेश्याएं-भडुए-गुंडे उनका मालमत्ता छीन लेते हैं। जान बचा कर निकले तो पुलिस घड़ी-अंगूठी बटुआ छीन लेती है। शर्म के मारे किसी से कुछ कह भी नहीं सकते। शाम ढलते ही शराबी घरों में घुसकर बहू बेटियों के हाथ पकड़कर खींचने लगते हैं। यह कि जलालत से बचने के लिए लोग अपने मकान औने-पौने बेचकर भाग रहे हैं। कई तो अपने घर वैसे ही खाली छोड़कर शहर के दूसरे इलाकों में किराए के मकानों में रहने लगे हैं। अखबार के पन्नों पर काले अक्षरों में इन लाचार लोगों की पीड़ा और उनके बीच की खाली सफेद जगह में वेश्याओं के प्रति नफरत छलछला रही थी। खबरों को विश्वसनीय बनाने के लिए प्रकाश को ढेरों ढहती खपरैल वाले, भुतहे मकानों की फोटों खींचनी पड़ी जो वैसे भी रहने के लायक नहीं रह गए थे। …जारी…

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आप कौन सा मसाला खाती थीं मेमसाहेब

एक कहानी (2) : एक हफ्ते बाद सिर मुड़ाए डीआईजी का बयान आया कि यह आत्महत्या नहीं, महज एक दुर्घटना थी। उनकी पत्नी पान मसाले की शौकीन थीं। बिजली जाने के बाद अंधेरे में उन्होंने पान मसाला के धोखे में, घर में पड़ा सल्फास खा लिया था।  साथ ही खबर आई कि लवली त्रिपाठी के पिता ने डीआईजी पर अपनी बेटी को प्रताड़ित करने व आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा किया है और अदालत जाने वाले हैं। क्राइम रिपोर्टर यह खबर फीडकर रहा था और सी. अंतरात्मा पान का चौघड़ा थामे पीछे खड़े थे।

तभी एक चपरासी कंप्यूटर की स्क्रीन देखते हुए खुद से कहने लगा, ‘आप कौन सा मसाला खाती थीं मेमसाहेब। सल्फास की गोली उंगली जितनी मोटी होती है और पान मसाला एकदम चूरा। गजब हैं आप जो सूई के छेद से ऊंट पार करवा रही हैं।’ अचानक डीआईजी के ससुर ने सारी परिस्थितियों पर गौर करने और सदमे पर काबू पाने के बाद अपनी एफआईआर वापस ले ली। उन्होंने भी अपनी बेटी की मौत को अंधेरे में हुई दुर्घटना मान लिया। पुलिस ने इस मामले की फाइल बंद कर दी और डीआईजी लंबी छुट्टी पर चले गए। जानते बूझते मक्खी निगलनी पड़ी थी।

रुटीन की संपादकीय बैठकों में कभी नहीं आने वाले प्रधान संपादक आए, उनसे नीचे के स्थानीय, असोसिएट और समाचार संपादकों ने रिपोर्टरों को झाड़ा कि वे एकदम काहिल, कामचोर और धंधेबाज हैं। उन्हें अखबार की कम, अफसरों से अपने संबंधों की चिंता ज्यादा है, इसीलिए वे अपने ढंग से तथ्य और सबूत खोजकर लाने के बजाय पुलिस की कहानी सुनकर संतुष्ट हो गए। रिपोर्टरों में संपादकों की झाड़ सुनने और बहाने गढ़ने की अदभुत क्षमता होती है। ये बहाने अखबार की गति से उपजते हैं। उन्हें पता होता है कि बहानों समेत यहां सब कुछ अगले दिन पुराना, बासी, व्यर्थ हो जाता है। उन्होंने एक कान से सुना और दूसरे कान से निकाल दिया। हर दिन नई घटनाएं और नई खबरें थी, कौन एक लवली त्रिपाठी को याद रखता।

एक महीने बाद, डीआईजी रमाशंकर त्रिपाठी छुट्टी से लौटे तो बिल्कुल बदल गए थे। वे दफ्तर में आरती के इलेक्ट्रानिक दीपों से सज्जित मैहर देवी की तस्वीर के आगे माथे पर त्रिपुंड लगाकर बैठने लगे। शहर के कई मठों, मंदिरों में जाना बढ़ गया और साधु-संत रोज दफ्तर और घर में फेरा डालने लगे। उनका एकरस, खाकी कार्यालय अचानक रंगीन और सुगंधित हो गया।  उन्होंने अपनी पत्नी की स्मृति में शहर के मुख्य चौक गोदौलिया पर एक प्याऊ लगवाया। शहर में उसकी स्मृति में बेसहारा महिलाओं और बच्चों के लिए दो-तीन संस्थाएं बन चुकी थीं जिनके संरक्षक धर्मरक्षक रमाशंकर त्रिपाठी थे। धर्मरक्षक की उपाधि उन्हें इन संस्थाओं के प्रमुखों ने दी थी। छुट्टी के दौरान उन्होंने पुलिस की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए सामान्य ज्ञान की एक किताब लिखी थी। इस किताब में कंप्यूटर का पहला उपयोग यह बताया गया था कि यह उपकरण सफल दांपत्य में सहायक है क्योंकि यह विवाह के पूर्व कुंडली एवं नक्षत्रों के मिलाने और कालगणना के काम आता है। इस किताब को सभी थानेदार अपने-अपने हलकों में बुक स्टालों पर कोटा बांधकर बिकवा रहे थे।

सारा पसीना नौकरी चलाने वाली रुटीन खबरों के लिए बहाया जाता है, बड़ी खबरें अपने आप चलकर अखबारों, चैनलों तक आती हैं। वे परस्पर विरोधी स्वार्थो के टकराहट से चिनगारियों की तरह उड़ती, भटकती रहती हैं और एक दिन बुझ जाती हैं। एक शाम एक बीमा कंपनी का एक मरियल सा क्लर्क तथ्यों और सबूतों के साथ खबर लाया कि पुलिस ने भले ही मामला दाखिल दफ्तर कर दिया हो लेकिन बीमा कंपनी इसे दुर्घटना नहीं मानती। लवली त्रिपाठी की मौत के कारणों की जांच एक प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी से कराई जा रही है। डीआईजी रमाशंकर त्रिपाठी ने ससुर के हलफिया बयान के साथ अपनी पत्नी के बीमे की बीस लाख की रकम के लिए दावा किया था जिसके तुरंत बाद यह जांच शुरू हुई थी।

प्रकाश को यह बूढ़ा कभी-कभार एक सस्ते बार में मिला करता था और दो पैग के बाद पीछे पड़ जाता था कि वह एक पॉलिसी ले ले ताकि उसके बीमा एजेंट बेटे का टॉरगेट पूरा हो सके। प्रकाश उससे हमेशा यही कहता था कि फोकट की दारू पीने वाले उस जैसे पत्रकारों को इतने पैसे नहीं मिलते कि वे बीमा का प्रीमियम भर सके लेकिन कई साल बाद भी बूढ़े ने अपनी रट नहीं छोड़ी।   

पुष्टि की गई तो खबर बिल्कुल सही थी। लेकिन बीमा कंपनी का कोई अधिकारी इस खबर के साथ अपना नाम देने को तैयार नहीं था। वह मरियल क्लर्क ऐसी खबर लाया था जिसे वाकई स्कूप कहते हैं, दो दिन की पड़ताल और स्पेड वर्क के बाद उसे छापना तय किया गया। लेकिन जिस दिन खबर कंपोज हुई, पता नहीं कैसे लीक होकर डीआईजी तक जा पहुंची फिर मोबाइल फोनों की तरंगें खबर की गर्दन पर लिपटने लगीं। डीआईजी ने राजधानी में एक मंत्री और फिर पुलिस महानिदेशक को कातर भाव से सैल्यूट बजाया। इन तीनों ने अखबार के दो डाइरेक्टरों को मुंबई फोन लगाया। डाइरेक्टरों ने आपस में बात की फिर प्रधान संपादक को तलब किया। प्रधान ने स्थानीय संपादक को फोन किया। स्थानीय ने असिस्टेंट को, असिस्टेंट ने न्यूज एडीटर को, न्यूज एडीटर ने ब्यूरो चीफ को, ब्यूरो चीफ ने सिटी चीफ को खबर रोकने के लिए आदेश दिया। इतनी सीढ़ियों से लुढ़कती यह आशंका आई कि यह खबर आपसी स्पर्धा में किसी बीमा कंपनी ने इस बीमा कंपनी को बदनाम करने के लिए प्लांट कराई है। इसलिए इसे कुछ दिन तक रोककर स्वतंत्र ढंग से जांच-पड़ताल की जाए। प्रकाश के पास मणिकर्णिका घाट की जमीन पर बैठकर सिर मुड़ाते डीआईजी की फोटो भी थी, जिसका कैप्शन ‘सिर मुंड़ाते ही ओले पड़े’ उसने पहले से ही तय कर रखा था लेकिन ओले अब फोटो से बाहर छिटक कर कहीं और पड़ रहे थे।

उसी शाम बुर्के में चेहरा ढके एक अधेड़ औरत लगातार पान चबाते एक किशोर के साथ तीन घंटे से दफ्तर के बाहर खड़ी थी। वह एक ही रट लगाए थी कि उसे अखबार की फैक्ट्री के मालिक से मिलना है। दरबान ने उसे कई बार समझाया कि यह फैक्ट्री नहीं है और यहां मालिक नहीं, संपादक बैठते हैं, वह चाहे तो उनसे जाकर मिल सकती है। औरत जिरह करने लगी कि ऐसा कैसे हो सकता है कि अखबार का कोई मालिक ही न हो और उसे तो उन्हीं से मिलना है। आते-जाते कई रिपोर्टरों ने उससे पूछा कि उसकी समस्या क्या है लेकिन वह कुछ बताने को तैयार नहीं हुई। रट लगाए रही कि उसे मालिक से मिलना है। काम भी कुछ नहीं है, बस सलाम करके लौट जाएगी। सी. अंतरात्मा की नजर उस पर पड़ी तो देखते ही भड़क गए, ‘तुम यहां कैसे, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई प्रेस में आने की, भागो चलो यहां से। हद है अब यहां भी…।’ घबराई हुई वह औरत लड़के का हाथ पकड़कर तेजी से निकल गई। वह सी. अंतरात्मा के मोहल्ले की औरत थी और वे उसे अच्छी तरह पहचानते थे।

प्रकाश इस तरह हाथ में आयी कामयाबी के हताशा में बदल जाने के खेल का आदी थी। वह उस नजरबंद को पहचानने लगा था जिसके चलते बीसियों स्कैंडल, घोटाले और रहस्य ऐसे थे जो सबको पता थे लेकिन नजरअंदाज किये जाते थे। उन पर दिमाग लगाने को अबोध, लौंडपन समझा जाता था लेकिन आज उसे समझ नहीं आ रहा था कि छवि को कैसे समझाएगा। सॉरी, मैं तुम्हारी दोस्त के लिए कुछ नहीं कर पाया के जवाब में आंसुओं से रूंधी आवाज में छवि ने कहा, ये अखबार और चैनल मदारी की तरह खुद को सच का ठेकेदार क्यों बताते हैं। साफ कह क्यों नहीं देते कि उन्हें डीआईजी जैसे ही लोग चलाते हैं।

लंबी चुप्पी के बीच ‘सत्य का मदारी’ को कई बार उसने थूक के साथ गुटका। वह सोच रहा था कि क्या सचमुच उसके फैशन फोटोग्राफर बनने का समय अनिल यादवआ गया है कम से कम तब उसे उन भ्रमों से तो छुटकारा मिल जाएगा जो उसे कभी-कभार सच साबित हो कर उसका रास्ता रोक लेते हैं। अचानक छवि ने कहा कि चलो तुमने मरने के बाद ही सही, लवली से चिढ़ना तो बंद कर दिया लेकिन फोटोग्राफी के बहाने मॉडलो के बीच रासलीला के मंसूबे मत पालो। प्रकाश चौंक गया कि किस सटीक तरीके से वह उसके सोचने के ढंग को ट्रैक करने लगी है। …जारी…

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लवली त्रिपाठी की आत्महत्या

एक कहानी (1) : छवि जिसे फोटो समझती थी, दरअसल एक दुःस्वप्न था। रास्ते में चलते-चलते अक्सर उसे प्रकाश के हाथों में एक चेहरा दिखता था और उसके पीछे अपने दोनों हाथ सीने पर रखे, कुछ कहने की कोशिश करती एक बिना सिर की लड़की….। प्रकाश जिसे सपना जानता था, एक फोटो थी जो कभी भी नींद की घुमेर में झिलमिला कर लुप्त हो जाती थी- रात की झपकी के बाद जागते, अलसाए घाट, लाल दिखती नदी और सुबह का साफ आसमान है। एक बहुत ऊंचे झरोखेदार बुर्ज के नीचे सैकड़ों नंगी, मरियल, उभरी पसलियों वाली कुलबुलाती औरतों के ऊपर काठ की एक विशाल चौकी रखी है। उस डोलती, कंपकंपाती चौकी पर पीला उत्तरीय पहने उर्ध्वबाहु एक कद्दावर आदमी बैठा है जिसके सिर पर एक पुजारी तांबे के विशाल लोटे से दूध डाल रहा है। चौकी के एक कोने पर मुस्तैद खडे़ एक मुच्छड़ सिपाही के हाथों में हैंगर से लटकी एक कलफ लगी वर्दी है जो हवा में फड़फड़ा रही है। थोड़ी दूर समूहबद्ध, प्रसन्न बटुक मंत्र बुदबुदाते हुए चौकी की ओर अक्षत फेंक रहे हैं।

इस फोटो और सपने को एक दिन, पूरी शक्ति के साथ टकराना ही था और शायद सबकुछ नष्ट हो जाना था। मृत्यु हमेशा जीवन के बिल्कुल पास घात लगाए दुबकी रहती है लेकिन जीवन के ताप से सुदूर लगती है। यह दिन भी उन दोनों से बहुत दूर – बहुत पास  था। फोटोजर्नलिस्ट प्रकाश जानता था कि यह सपनों की फोटो है जो कभी नहीं मिलेगी लेकिन इसी अंतर्वस्तु की हजारों तस्वीरें उन दिनों गलियों, घाटों, सड़कों और मंदिरों के आसपास बिखरी हुई थी, जिनमें से एक को भी वह कायदे से नहीं खींच पाया। सब कुछ इतनी तेजी से बदल रहा था कि कैमरा फोकस करते-करते दृश्य कुछ और हो चुका होता था और अदृश्य सामने आ जाता था। लगता था पूरा शहर किसी तरल भंवर में डूबता-उतराता चक्कर खा रहा है।

लवली त्रिपाठी की आत्महत्या

धर्म, संस्कृति और ठगी के पुरातन शहर बनारस में सहस्त्राब्दि का पहला जाड़ा वाकई अजब था। हाड़ कंपाती, शीतलहर में लोग ठिठुर रहे थे लेकिन घुमावदार, संकरी, अंधेरी गलियों में और भीड़ से धंसती सड़कों पर नैतिकता की लू चल रही थी। लू के थपेड़ों से समय का पहिया उल्टी दिशा में दनदना रहा था।

नैतिकता की इस लू के चलने की शुरुआत यूं हुई कि सबसे पहले एक कुम्हलाती पत्ती टूट कर चकराती हुई जमीन पर गिरी।

उस दिन के अखबार के ग्यारहवें पन्ने पर सी. अंतरात्मा के मोहल्ले के एक घर की ब्लैक एंड व्हाइट, डबल कालम फोटो छपी। आधा ईंट-आधा खपरैल वाले घर के दरवाजे के बगल में अलकतरे से एक लंबा तीर खींचा गया था, जिसके नीचे लिखा था, ‘यह कोठा नहीं, शरिफों का घर है।’ तीर की बनावट में कुछ ऐसा था जैसे खुले दरवाजे की ओर बढ़ने में वह हिचकिचा रहा हो और शरीफों में छोटी इ की मात्रा लगी थी। घर के आगे एक भैंस बंधी थी जो आतुर भाव से इस लिखावट को ताक रही थी। फोटो के नीचे इटैलिक, बोल्ड अक्षरों में कैप्शन था- ‘ताकि इज्ज्त बची रहेः बदनाम बस्ती में आने वाले मनचले अब पड़ोस के मुहल्लों के घरों में घुसने लगे हैं। लोगों ने अपनी बहू बेटियों के बचाव का यह तरीका निकाला है। महुवाडीह में इन दिनों करीब साढ़े तीन सौ नगर-वधुएं हैं।’

सी. अंतरात्मा ही प्रकाश को लेकर वहां गए थे। दोनों को अफसोस था कि अंदर के पेज पर काले-सफेद में छापकर इतने अच्छे फोटो की हत्या कर दी गई है।

काशी की संस्कृति के गलेबाज कहा करते थे कि यहां के अखबार आज भी बहन-बेटी का संबंध बनाए बिना वेश्याओं तक की चर्चा नहीं करते। यह आचार्य चतुरसेन के जमाने की भाषा की जूठन बची हुई थी। वे अपहरण को बलान्नयन, बलात्कार को शीलभंग, पुलिस की गश्त को चक्रमण और काकटेल पार्टी को पान-गोष्ठी लिखते थे। धोती वाले संपादक ही नहीं प्रूफ रीडर, पेस्टर, टाइपराइटर और टेलीप्रिंटर भी विदा हो चुके थे लेकिन सूट के नीचे जनेऊ की तरह अखबरों के व्यक्तित्व में ये शब्द छिपे हुए थे, और कई लक्षणों के साथ इस भाषा से भी अखबारों की आत्मा की थाह मिलती थी।

रोज की तरह उस दिन भी बयालीस साल के संवाददाता सी. अंतरात्मा अपनी खटारा स्कूटर से जिसके आगे पीछे की नंबर प्लेटों के अलावा स्टेपनी पर भी लाल रंग से प्रेस लिखा था, शाम को चीरघर गए। लाशों का लेखा-जोखा उनका रूटीन असाइमेंट था। उन्होंने चौकीदार को चाय पिलाई, एक बीड़ा पान खिलाया, खुद भी जमाया और कागज कलम निकालकर इमला घसीटने लगे। मर्चुरी में उस दिन आई लाशों के नाम, पते, मृत्यु का कारण और कुछ किस्से नोट कर दफ्तर लौट आए। उन्होंने रिपोर्टिंग-डेस्क से पुलिस के भेजे क्राइम बुलेटिन का पुलिंदा, निंदा, बधाई, चुनाव, मनोनयन, की विज्ञप्तियां बटोरीं और अखबार के सबसे उपेक्षित कोने में जाकर बैठ गए। रात साढ़े दस तक वह मारपीट, चेन छिनैती, स्मैक बरामदगी, आलानकब और प्रथम सूचना रपट दर्ज की सिंगल कॉलम खबरें बनाते रहे। ग्यारह बजे क्राइम रिपोर्टर को ये खबरें सौंपकर वे सीनियरों को पालागन के दैनिक राउंड पर निकलने ही वाले थे कि उसने पूछा, ‘यह लवली त्रिपाठी कौन हैं जानते हैं?’

‘सल्फास खाकर आई थी, किसी अफसर की बीबी है, पोस्टमार्टम तुरंत हो गया अब तो दाह संस्कार भी हो चुका होगा।’ उन्होंने बताया।

‘और यह रमाशंकर त्रिपाठी, आईपीएस कौन है?

उन्होंने सिर खुजलाया। मतलब था, आप ही बताइए कौन हो सकते हैं।

क्राइम रिपोर्टर बमक गया, अरे बुढ़ऊ रात ग्यारह के ग्यारह बज रहे हैं। चार घंटे से चूतड़ के नीचे डीआईजी की बीबी की आत्महत्या की खबर दबाए बैठे हो और अब सिंगल कालम दे रहे हो। कब सुधरोगे। कब डेवलप होगी, कब जाएगी, यह कब छपेगी। सी. अंतरात्मा की घुन्नी आंखें चमकीं, जरा जोर से बोले हम क्या जानें, हम तो समझे थे कि आपको पहले से पता होगा। प्रकाश ने भी जानकारी दी कि अंतिम संस्कार की फोटो भी है, तीन बजे मणिकर्णिका घाट पर हुआ था।

कोई जवाब देने के बजाय रिपोर्टर ने लपककर खाली पड़े एक टेलीफोन को गोद में उठा लिया। पौन घंटे तक सिपाही, दरोगा, ड्राइवर, नर्सिंग होम की रिसेप्शनिस्ट की मनुहार करने के बाद उसने पूरा ब्यौरा जुटा लिया। खबर का इंट्रो कम्प्यूटर में फीड करने के बाद उसने सी. अंतरात्मा को बुलवाया जो दफ्तर के बाहर पान की दुकान पर अपनी मुस्तैदी और क्राइम रिपोर्टर की चूक की शेखी बघार रहे थे। उसने उनकी ड्यूटी रात डेढ़ बजे तक के लिए डीआईजी के बंगले के बाहर लगा दी। अंतरात्मा जानते थे कि बंगले बाहर अब कुछ नहीं मिलना है, इसलिए उन्होंने जी भईया जी कहा और अपने घर चले गए।

डीआईजी की बीबी सुंदर थी, सोशियोलाइट थी, शहर की एक हस्ती थी। उसने भरी जवानी में आत्महत्या क्यों की। इसके बारे में सिर्फ कयास थे। एक कयास यह था कि डीआईजी रमाशंकर त्रिपाठी के अवैध संबंध किसी महिला पुलिस अफसर से थे, जिसके कारण उसने जान दे दी। लेकिन इस कयास को किसी ने गॉसिप के कालम में भी लिखने की हिम्मत नहीं की, डर था कि तूफान से भी तेज रफ्तार उन जीपों की शामत आ जाएगी जो रात में अखबार लेकर दूसरे जिलों में जाती थीं। तब पुलिस अवैध ढंग से सवारी लादने के आरोप में उनका चालान करती, थाने में खड़ा कराती। एक घंटे की भी देर होती तो सेंटर तक पहुंचते-पहुंचते अखबार रद्दी कागज हो जाता। प्रतिद्वंद्वी अखबारों की बन आती। ऐसे समय क्राइम रिपोर्टर को ही पुलिस के बड़े अफसरों से चिरौरी कर जीपें छुड़ानी पड़ती थीं। मोटी तनख्वाह पाने वाले किसी कॉरपोरेटिया मैनेजर के पास इस देसी हथकंडे से निपटने का कोई ऊपाय नहीं था।

लवली त्रिपाठी, छवि की क्लाइंट थी जिसे वह अपनी दोस्त कहना पसंद करती थी। छवि यूनिवर्सिटी से ब्यूटीशियन का कोर्स करने के बाद अपने बूढ़े, बीमार पिता के असहाय विरोध के बावजूद घर के एक कमरे में व्यूटी पार्लर चलाती थी। डीआईजी की पत्नी से उसकी मुलाकात यूनिवर्सिटी की एक मेंहदी एंड फेशियल कंपटीशन में हुई थी जिसकी वह चीफ गेस्ट थी। अक्सर लवली त्रिपाठी के घर जाने के कारण वह जानती थी कि उसका सोशियोलाइट होना पति की उपेक्षा से त्रस्त आकर, दिन काटने की मजबूरी थी क्योंकि डीआईजी ने कह रखा था कि वह जहां चाहे मुंह मार सकती है या जब चाहे मर सकती है। लवली की दोस्त बनने की प्रक्रिया में छवि को एक नए तरह के फेशियल का आविष्कार करना पड़ा जिससे घूंसों से बने नील और तमाचों के निशान खूबसूरती से छिपाए जा सकते थे। वह लगातार प्रकाश से कह रही थी कि अपराध की फर्जी कहानियां रचने के माहिर डीआईजी ने ही लवली की हत्या की है और उसे फांसी मिलनी चाहिए।

प्रकाश और छवि के तीन साल पुराने प्यार में लवली त्रिपाठी अक्सर तनाव लेकर आती थी जिसके झटके से वह आगे बढ़ता था। प्रकाश को लगता था कि लवली जैसी संपन्न, निठल्ली औरतों के प्रभाव में आकर ही वह कहा करती है कि वह प्रेस फोटोग्राफी छोड़कर मॉडलों के फोटो खींचे और फैशन-फोटोग्राफर बन जाए तभी उसकी कला की कद्र होगी और पैसे भी कमा पाएगा। छवि जानती थी कि यह सुनकर उसके भीतर के जर्नलिस्ट उर्फ वाच डॉग को किलनियां लगती हैं, तब यह सलाह आती है कि अगर वह तमाचों के निशान छिपाने की मेकअप कला का पेटेंट करा ले तो करोड़ों महिलाएं उसकी क्लाइंट हो जाएंगी और टूटते परिवारों को सुंदर और सुखी दिखाने के अपने हुनर के कारण वह इतिहास में अमर हो जाएगी। समझौता यहां होता था कि कृपा करके अपनी-अपनी सलाहें उन बच्चों के लिए बचा कर रखीं जाएं जो भविष्य में पैदा होने हैं और अभी इस तरह से प्यार किया जाए कि वे पैदा न होने पाएं।………क्योंकि शादी होने में अभी देर है। 

प्रकाश के पास एक लवली त्रिपाठी की एक सहेली थी जो डीआईजी और उसके झगड़ों की प्रत्यक्षदर्शी थी और खुलेआम डीआईजी की फांसी की मांग भी कर सकती थी। लेकिन प्रकाश उसे किसी जोखिम में नहीं डालना चाहता था। उसने भी और पत्रकारों की तरह अपने प्रोफेशन और निजी जीवन को अलग-अलग जीना सीख लिया था क्योंकि दोनों का घालमेल इस नाजुक से रिश्ते को तबाह कर सकता था। फिर भी छवि को दुखी, परेशान देखकर उसने वादा किया कि इस मामले में सच सामने लाने के लिए उससे जो बन पड़ेगा जरूर करेगा।  

अनिल यादवबिना पुख्ता सबूत के हाथ डालना खतरनाक था। लेकिन इस सनसनीखेज मुद्दे को छोड़ा भी तो नहीं जा सकता था। इसलिए रिपोर्टरों को लवली त्रिपाठी के मायके दौड़ाया गया, उसकी सहेलियों को कुछ याद करने के लिए उकसाया गया, समाजसेवियों को उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर रोशनी डालने के लिए कहा गया। प्रकाश ने एक स्टूडियो से डीआईजी की फैमिली अलबम की कुछ पुरानी तस्वीरों का जुगाड़ किया। कुछ चर्चित आत्महत्याओं का ब्यौरा जुटाया गया और लच्छेदार शब्दों में ह्यूमन एंगिल समाचार कथाओं का सोता पन्नों से फूट निकला। समाचार चैनलों पर भी यही कुछ, जरा ज्यादा मसालेदार ढंग से आ रहा था।

…जारी…

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…क्योंकि नगर वधुएं अखबार नहीं पढ़तीं

भड़ास4मीडिया पर बहुत जल्द एक लंबी कहानी का प्रकाशन शुरू होगा. लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव लिखित इस कहानी का नाम है ‘क्योंकि नगर वधुएं अखबार नहीं पढ़तीं’. कहानी कुछ यूं है- उदास, निष्प्रभ तारे जैसा एक फोटो जनर्लिस्ट है. और है उसकी रहस्यमय नक्षत्र सी प्रेमिका. एक आत्महत्या के रहस्यों का पीछा करते हुए, वह दुनिया के सबसे पुराने यानि देह के धंधे के रहस्य जान जाता है. उन्हीं बदनाम गलियों में उसकी आंखें किसी वेश्या से नहीं अपने पेशे (पत्रकारिता) की आँखों से चार हो जाती है. यह आंखों का लड़ना मीडिया के क्रूर यथार्थ से मुठभेड़ है जिसमें शर्मसार होकर दोनों के आंखें फेर लेने के सिवा शायद कोई और रास्ता नहीं है…

अनिल यादवअनिल ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा और राजनीति की वामपंथी पाठशाला से विचार दीक्षा लेकर बनारस के कुछ अखबारों में काम किया. फिर लखनऊ चले आए. लखनऊ में दैनिक जागरण और अमर उजाला में कई वर्ष गुजारने के बाद हिंदुस्तान, वाराणसी के साथ हो लिए. इन दिनों दी पायनियर, लखनऊ में कार्यरत हैं.

अनिल की कलम बेबाक बयानी के लिए विख्यात है. शानदार भाषा, जानदार प्रस्तुति और जमीनी बिंब के जरिए अनिल समकालीन यर्थार्थ को गहन संवेदना के साथ पकड़ते हैं और उसे कई-कई अर्थों के साथ सामने रखते हैं. पत्रकारिता को मिशनरी अंदाज में जीने वाले अनिल कई बार नौकरियां छोड़ कर लंबी यात्राओं पर निकले. जीवन व लेखन में कामय फौरी ठहराव को वे लेखन के जरिए तोड़ने में जुट गए हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के निवासी अनिल से संपर्क oopsanil@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.