छायामुनी भुयान, अमेरिकन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले की बरसी पर कवरेज के लिए देश भर में चुने गए 11 पत्रकारों में से एक थीं। असमिया भाषा की ये पत्रकार कवरेज के बाद वापस हिंदुस्तान आईं। अपने अखबार के दफ्तर में लौटीं तो स्तब्ध रह गईं।
उन्हें नौकरी से बर्खास्त किये जाने का कागज़ थमा दिया गया। वजह ये बतायी गयी कि वो बिना पूर्व सूचना के अमेरिका कवरेज के लिए क्यूँ चली गयी? प्रबंधन का कहना था कि ट्रेड सेंटर पर हमले की बरसी की खबर अंग्रेजी अखबारों के लिए है, हमें इससे क्या मतलब ?अखबार ने उनकी अमेरिका से लायी गयी किसी भी रिपोर्ट को छापने से इनकार कर दिया और तो और उन्हें फैक्स तक का पैसा नहीं दिया गया। शर्मनाक ये था कि छायामुनी ने उसी अखबार में तीन साल तक बिना किसी नियुक्ति पत्र के अपना पसीना बहाया था।
छायामुनी कहती हैं “ये बर्खास्तगी सिर्फ मेरे आत्मविश्वास को कुचले भर जाने की बात नहीं थी, भाषाई आधार पर मुझे कमजोरी का एहसास करने का भी जरिया थी। अजीबोगरीब है कि भाषाई आधार पर समूचे देश को अलग- अलग हिस्सों में बांटे जाने की बात को लेकर आग उगलने वाली समकालीन पत्रकारिता ने खुद महिलाओं को भाषाई आधार पर विभाजित कर दिया है। ये विभाजन कुछ ऐसा ही है जैसा पब्लिक स्कूल में पढने वालों और सरकारी स्कूल के बच्चों के बीच होता है। देश के लगभग सभी हिंदी अख़बारों में भीतर का माहौल ऐसा है जहाँ महिलायें न तो खुद की हक़तलफी के खिलाफ आवाज उठा पाती हैं और न ही पुरुषों के सापेक्ष बरते जा रहे भेदभाव के खिलाफ आवाज उठा पाती है, जबकि वहीं अंगेरजी अख़बारों में काम करने वाली महिलायें अपने अधिकारों को लेकर सजग हैं और किसी भी प्रकार के जेंडर बायस का विरोध करने का साहस रखती हैं।
मुंबई की रीना शर्मा को ही लीजिये बड़े हिंदी अखबार में पांच साल की नौकरी के बावजूद उन्हें स्थायी नहीं किया गया, वो बताती हैं कि उनसे एक कागज़ पर हस्ताक्षर ले लिए गए थे, जिसमे लिखा था मै शौकिया पत्रकारिता करना चाहती हूँ और इस एवज में जो भी मानदेय होगा स्वीकार करुँगी। मुझसे वादा किया गया था कि एक वर्ष भीतर आपको स्थायी कर दिया जाएगा, लेकिन अब सिर्फ टालमटोल…, मजबूरी ये है कि हम महिलाओं के पास, ख़ास तौर से हिंदी माध्यमों से जुड़ी महिलाओं के पास विकल्प बेहद कम हैं, जहाँ विकल्प कम हैं वहां शोषण और उत्पीडन तो होगा ही। ये बात शायद बहुत अजीब है कि वुमेन फीचर सर्विसेस कि भारतीय शाखा, जो कि महिला पत्रकारों ख़ास तौर से स्वतंत्र पत्रकारों के लिए बहुत बड़ा प्लेटफोर्म है और तमाम देशों में वहाँ की मातृभाषा में काम कर रहा है, यहाँ हिंदुस्तान में सिर्फ अंग्रेजी की महिला पत्रकारों के ही फीचर छापता है। अन्य एजेंसियां भी तमाम तरह के फेलोशिप अंग्रेजी अख़बारों या चैनलों से जुड़ी महिला पत्रकारों को ही दे रहे हैं। प्रतिभा के बावजूद हिंदी अखबारों की महिला पत्रकारों को पैसे तो बेहद कम मिल ही रहे हैं, वो भी इस कदर दिए जा रहे हैं कि जैसे उन पर एहसान किया जा रहा हो।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ भाषा ही महिला पत्रकारों को बाँट रही है, अब बेहद शर्मनाक ढंग से उम्र का पैमाना भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है। दूरदर्शन ने एक समय 30 से 45 आयु वर्ग की महिलाओं से बेहद शानदार ढंग से समाचार पढाये, अब खबरिया चैनलों को खूबसूरत और अधिकतम ३० वर्ष तक की ही महिला पत्रकार चाहिए। हिंदी भाषी राज्यों में जिन महिलाओं को नौकरियों से हटाया जाता है, उनमे से 100 फीसदी 30 से ऊपर की होती हैं। अखबारों में जो भी नयी भर्तियाँ हो रही हैं, उनमे भी अधिकतम आयु सीमा 30-32 वर्ष निर्धारित कर दी जा रही है। ऐसे में अपने जीवन का एक लंबा समय नौकरी की तलाश में दर-दर की ठोकरे खाकर बिताने वाली महिलायें आखिर कहाँ जाएँ? प्रतिभा है, पर नौकरी नहीं है।
पत्रकारिता में लगभग दो दशक पूरा करने वाली दिल्ली की रश्मि सहगल कहती है “पत्रकारिता में कई वर्षों तक पागलपन की हद तक काम करने के बाद मैंने ये जाना है कि इसका कोई मतलब नहीं की मैंने कितने पुरस्कार पाए हैं, मैं कितनी प्रतिभाशली हूँ। अब हुनर को मापने के दूसरे तरीके इजाद कर लिए गए हैं, अगर आप युवा हैं खूबसूरत हैं, भले ही आपके भीतर एक कालम खबर लिखने का भी गुण न हो तो भी इंडस्ट्री पहले उन्हें ही पूछेगी। दिल्ली की ही दीक्षा गुप्ता के अपने तर्क हैं, वो कहती हैं- तमाम संस्थानों में 40 पार की महिलाओं को अयोग्य और सठियाया हुआ मान लिया जाता है। वो मानते हैं कि अब ये काम के योग्य नहीं रही, तो जैसे तैसे उन्हें निकालने की जुगत लगायी जाती है। पहले तो ये कोशिश की जाती है वो खुद ही संस्थान छोड़ कर चले जाए, नहीं तो एक दिन ये कहकर हटा दिया जाता है कि आपके पास नए आइडियाज नहीं हैं।
मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ आदि राज्य, जो हिंदी पत्रकारिता के गढ़ हैं। वहाँ के परिप्रेक्ष्य में इस विभेद को और आसानी से समझा जा सकता है। ये सुनना शायद आश्चर्यजनक लगे मगर सच है कि यहाँ काम करने वाली बमुशिकल 8 फीसदी महिलाओं को ही नियुक्ति पत्र दिया गया है, बाकी अस्थायी नौकरियां कर रही हैं। खुशकिस्मत वो महिलायें हैं, जिन्हें दो से तीन वर्ष के अनुबंध पर काम मिल जाता है। वहीं इन राज्यों में जो भी महिलायें अंग्रेजी अखबारों में हैं, उन्हें अच्छे पैसे मिल रहे हैं। साथ ही साथ तमाम तरह की सुविधाएं भी मिल रही हैं। वहीं उम्र को लेकर भी यहाँ किये जा रहे भेदभाव को साफ़ देखा जा सकता है। लगभग सभी अखबारों और चैनलों में 30-35 की आयु पार कर चुकी महिलाओं को बाहर किये जाने का काम तेजी से हो रहा है।

आवेश
जारी —-
लेखक आवेश तिवारी प्रतिभाशाली जर्नलिस्ट हैं. सोनभद्र में डेली न्यूज एक्टिविस्ट के ब्यूरो चीफ हैं. वेब व ब्लागों पर अति सक्रिय रहने वाले आवेश की लेखनी जनपक्षधरता की हिमायती है.












dharmendra, mahanagar kahaniyan
July 31, 2010 at 3:09 pm
bahut khub awesh ji. aapane majabuti ke saath aadhi aabadi ka paksh rakha hai.
sadhuwad !
गजेन्द्र राठौड़, बेंगलूरु
July 31, 2010 at 4:34 pm
यह देश का दुर्भाग्य ही हैं कि आजादी के छह दशक बाद भी हम आपस में ही भाषावाद, क्षेत्रवाद,जातिवाद और स्त्री पुरुष के लिंग का रोना रो रहे हैं। इससे भी दुर्भाग्य यह हैं कि इस रोने में लोकतंत्र का चौथा और अहम हिस्सा मीडिया भी शामिल हैं। हिंदी पत्रकारिता की बात कहें तो यह भाषावाद का जहर बेंगलूरु की आबोहवा में भी घुल गया हैं।
jyoti
July 31, 2010 at 7:57 pm
badiya lekh hai…bahut bahut badhai…
JASBIR CHAWLA
August 1, 2010 at 12:28 am
Patrakaria puree tarah ek peshaa ban chuka hai.Yah ab mission yaa sarokar nahin hai.Bazar ke hawale ek peshaa hai.Yahan netik-anetik ki baat bemani ho chuki hai.Iss peshe me koi mahilaon ke pratee sahanubhooti nahin rakhega.malik ko munafe se matlab hai,sahkarmee rat race me lage hain.Iss vyawastha main shoshan hona hi hai.