: पता नहीं फिल्म अभिनेता शाइनी आहूजा के मामले में अदालत का फैसला क्या आएगा, लेकिन उनकी नौकरानी के अदालत में दिए गए ताजा बयान के बाद पूरे देश के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, पुलिस अधिकारियों और जजों को सोचना जरूर चाहिए। शाइनी की नौकरानी ने अदालत को बताया कि उसके साथ कोई दुष्कर्म नहीं हुआ था और उसने अपनी उस महिला रिश्तेदार के कहने पर झूठी रिपोर्ट शाइनी आहूजा के खिलाफ करवाई थी।
जिसने वहां पर उसे नौकरी पर रखवाया था। नौकरानी ने यह भी कहा कि तब भी उसने पुलिस को दिए बयान में दुष्कर्म की बात नहीं कही थी, लेकिन उसे जबरदस्ती डाल दिया गया। अब सवाल यह उठता है कि पिछले एक साल में शाइनी आहूजा के साथ जो गुजरा उसकी भरपाई कौन करेगा? वह तीन महीने से ज्यादा जेल की कोठरी में रहे, मीडिया ने उनकी धज्जियां उड़ाकर पूरी इज्जत धूल में मिला दी। फिल्म वालों ने उन्हें काम देना बंद कर दिया, लोगों ने उनसे बात करना बंद कर दिया। वह हमेशा घर में भय और बदनामी की जिंदगी से जूझते पड़े रहे और अदालतों व वकीलों के चक्कर काटते रहे। उनकी मानसिक यातना को बहुत कम लोग समझ सकते हैं। यहां एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शाइनी की पत्नी, जो दिल्ली में रहती हैं, इस पूरी मुसीबत में उनके साथ रहीं और डटकर इस बात का विरोध करती रहीं कि उनके पति ने कुछ गलत किया है।
शाइनी की अपनी पत्नी से नहीं बनती है, फिर भी उन्होंने इस मामले में पति की गारंटी ली और कहा कि वह ऐसा कर ही नहीं सकते हैं। एक तरफ किसी के उकसाने पर एक महिला दुष्कर्म का आरोप लगा रही थी, दूसरी तरफ आरोपी की पत्नी, जो खुद एक महिला है, इसका डटकर विरोध कर रही थी, लेकिन सारे महिला संगठन, पुलिस और मीडिया आरोप लगाने वाली महिला की बात को ही मान रही थी। अब सब चुप हैं। पूरे देश में एक माहौल बन गया है कि कोई भी किसी पर कैसा भी आरोप लगा सकता है।
जब वह आरोप सालों बाद गलत साबित होता है तो चुपके से उसकी बात करना बंद कर देते हैं। उसका प्रतिकार तक नहीं करते हैं और अपनी गलती का कभी अहसास नहीं करते हैं। शाइनी जैसे मामलों में तो हर आदमी मानकर चलता है कि उसने दुष्कर्म किया ही होगा और अब झूठ बोल रहा है। जब समाज और मीडिया में माहौल बनता है तो अदालतें भी उसी तरह से प्रभावित हो जाती हैं। जब तक किसी आरोप की पूरी तफ्तीश न हो जाए, उस पर अभियान नहीं चलाया जाना चाहिए। समाज में उस व्यक्ति का ऐसा ट्रायल हो जाता है कि वह मुंह दिखाने के काबिल भी नहीं रह जाता है। बाद में पता चलता है कि सब गलत था या सिर्फ कुछ सच्चाई थी। उसकी कोई भरपाई उस व्यक्ति को कभी नहीं मिल पाती है।
सबको याद होगा कि तेलगी कांड में मुंबई के पुलिस आयुक्त आरएस शर्मा को उनके ही कुछ परिचित आईपीएस अफसरों ने झूठा फंसा दिया था। शर्मा को एक साल से ज्यादा जेल में रहना पड़ा, पूरा परिवार तबाह हो गया। 35 साल का ईमानदारी का रिकार्ड चौपट हो गया। नौकरी के सब प्रमोशन रुक गए, जेल में थे तभी रिटायर भी हो गए। रिश्तेदार तक बात करने से कतराते थे। उनकी पत्नी दर-दर भटकती थीं, लेकिन कोई मदद के लिए तैयार नहीं था। मीडिया ने ऐसा माहौल उनके खिलाफ बनाया था कि जिन लोगों की उन्होंने मदद की थी वे भी बदनामी के डर से कतराते थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उनके मामले में सारी तहकीकात करके जो फैसला सुनाया वह चौंकाने वाला था
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शर्मा के खिलाफ एक भी सबूत नहीं है, उन्होंने तो उल्टे तेलगी के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया। वह तो एक ईमानदार आदमी हैं, उन्हें एकदम गलत फंसाया गया और जिन अफसरों ने फंसाया दरअसल वे तेलगी से मिले हुए थे। उनके साथ घोर अन्याय हुआ है इसलिए उन्हें रिहा किया जाना चाहिए। देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले के बाद सब चुप हो गए, लेकिन शर्मा की इज्जत लौटाने न मीडिया आया, न सामाजिक संगठन, न अफसरशाही की फौज। लौटाएं भी तो कैसे, गलती तो उनसे हो चुकी थी। अब रिटायर होकर शर्मा सिर ऊंचा कर मुंबई में रह रहे हैं। बाद में उनके बेटों से शादी करने बड़े-बड़े अफसर अपनी बेटियों का प्रस्ताव लेकर पहुंच गए। प्रश्न यह है कि लोग आरोप लगाने के पहले क्यों नहीं सोचते। देश में हर एक को अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। किसी के खिलाफ आरोप लगाने के पहले हमें चार बार सोचना चाहिए।
अब गाजियाबाद पीएफ घोटाला ही लीजिए, जांच के बाद तमाम जज निर्दोष पाए गए और सिर्फ तीन को दोषी पाया गया, लेकिन कई जजों के प्रमोशन रुक गए, कई हाईकोर्ट में जज नहीं बन पाए और उन्हें रिटायर होना पड़ा। मीडिया का हंगामा और सिर्फ आरोपों की बौछार की वजह से ही न्यायपालिका के उच्च जज सहम गए और उन्होंने इन्हें प्रमोशन नहीं दिया। अब जजों के तबाह करियर को कौन लौटा सकता है? कई आरोप तो इतने हल्के थे कि अमुक जज को ट्रेजरी अफसर ने एक मोबाइल फोन दिया था। रामदेव के लिए कहा गया कि उनकी दवाओं में हड्डियां मिलाई जाती हैं, संसद में हंगामा हुआ। बाद में आरोप लगाने वालों ने कहा कि हम गलत थे। अब सब चुप हैं। तफ्तीश के पहले सिर्फ आरोपों की बुनियाद पर कीचड़ उछालना उचित नहीं है। यदि किसी के खिलाफ झूठा अभियान चलाया जा सकता है तो निर्दोष साबित होने पर उसके पक्ष में भी वैसा ही अभियान चलाया जाना चाहिए।
लेखक राजीव शुक्ला पत्रकार रहे हैं. इन दिनों कांग्रेस के नेता हैं. एक मीडिया हाउस के मालिक हैं. क्रिकट की राजनीति में भी अच्छा खासा दखल रखते हैं. कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य हैं. उनका लिखा यह दैनिक जागरण में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लिया गया है.












shweta
September 12, 2010 at 4:57 pm
aree rajeev jee ….
jara apne channel me ho rahe shosan ko bhi dekhie…….3 saal se 1 rs increament naidiye hai aur badi badi baatein karte hai…
shame shame
Media killer
September 13, 2010 at 8:06 pm
hahaha sir News 24 ye kaam zyada achha karta hai behtar hoga use apne updesho ki potli thama de vaise bhi employees ko increament nhi milta , trainee ko job nhi miltee, or intern ka whole sale market hai hee……….[/b]