
नौनिहाल
वे अक्सर मजाक में मुझसे कहते थे, ‘तुझे मैंने सही समय पर खेल पत्रकार बनने की सलाह दी थी। तू मेरठ का पहला पूर्णकालिक खेल पत्रकार है। इस तरह मेरठ की खेल पत्रकारिता की शुरूआत तुझसे ही होती है। ये मेरठ की पत्रकारिता को मेरा सबसे बड़ा योगदान रहेगा…’
मैं संकोच से जमीन में गड़कर कहता, खेल पत्रकारिता ही क्या, मेरठ की पत्रकारिता में तुम्हारा योगदान हमेशा रहेगा… अमिट रहेगा तुम्हारा नाम।’ और वे मेरी कमर पर धप्प मारकर हौले से कहते, ‘चल, अब बस कर। एनएएस के पास भगत की चाय पीने चलते हैं।’
हम भगत के यहां पहुंचते और गरमागरम समोसे के साथ चाय पीते। वहां हमें मेरठ के अखबारों के बारे में आम पाठकों की मजेदार राय और नजरिया सुनने को मिलता। नौनिहाल ने भगत से कह रखा था कि वह हमारे पत्रकार होने के बारे में किसी को न बताये।
दरअसल, भगत को हमें देखते ही ‘आओ अखबारनवीस’ कहने की आदत थी। धीरे-धीरे उसकी यह आदत छूट गयी। इसके लिए उससे नौनिहाल को बार-बार मन्नत करनी पड़ी। इसके पीछे उनका मंतव्य यही था कि पत्रकारों को आम पाठकों के बीच चुपचाप बैठकर उनका मत जरूर जानना चाहिए। इसके लिए वे अक्सर मुझे भीड़ वाली जगहों पर ले जाते और लोगों से चर्चा शुरू करा देते। ये सब करने से हमें कई बार मजेदार बातें पता चलतीं।
एक बार हम कचहरी गये। नौनिहाल को एक एफिडेविट बनवाना था। वहां लंच चल रहा था। हम भी अपने एक परिचित वकील के ‘बस्ते’ पर बैठ गये। वहां 20 से ज्यादा मुवक्किल पहले से मौजूद थे। उनमें आपस में बातचीत चल रही थी। ‘भई ये पेप्पर वाले भी ना। इनकी तो कुछ बूझ्झो ई ना।’
‘क्यूं चौधरी, थारे साथ कुछ हो गया के?’
‘भई म्हारे साथ के होगा?’
‘फिर के कैना चाओ हो?’
‘कल या खबर छाप्पी जागरण नै। कानपुर मैं वन डे मैच के बाद श्रीलंका के दो खिलाड़ी रात को वां की दो छोरियों को अपने साथ लै गे। इब लै गे तै लै गे। थारा के लै गे?’
‘अर ताऊ, वो वाली बात बी तै बताओ।’
‘वो वाली? वो तो बई उजाला नै छाप्पी थी। परधानमंतरी सै मिलनै म्हारे यूपी का एक नेता गया। आकै बोल्ला-परधानमंतरी सै मुकालात ना हुई। क्यूं ना हुई भला? क्यूंकि परधानमंतरी टट्टी कर रे थे।’
‘तो इसमैं के होगा ताऊ?’
‘इब तू बी रया चकचूंदर का चकचूंदर ई। तेरा दिमाग ना चलता के? अबे, परधानमंतरी टट्टी जांगे तै के बता कै जांगे?’
‘अर ताऊ वो वाली खबर?’
‘कौण सी?’
‘वोई कुकरम वाली?’
‘लै। वो बी सुन। जागरण नै छाप्पी थी। देहरादून मैं एक परधानाचारय नै एक छोरी सै कुकर्म कर दिया। मेरा पोत्ता खबर पढ़ कै सुना रा था। परधानाचारय कू परधानमंतरी पढ़ता चला गा वा। मैं उससै बेर-बेर पूच्छू, के बोल्ला तू? अर वो बेर-बेर कहवै, बाब्बा परधानमंतरी ने एक छोरी सै कुकरम कर दिया। साम तक तै पूरे गांव मैं या बात फैल गी। सब ताज्जुब करन लाग्गे। ई तै अंधेर आ गा। इब परधानमंतरी भी ऐसे कुकरम करनै लाग्गे के?’
और जोर का ठहाका लगा। तब तक लंच का टाइम खत्म हो गया। वकील साब आ गये। आधे घंटे में नौनिहाल का एफिडेविट भी बन गया। और हम अपने देहाती पाठकों के खबरों के चटकारों से हंसते-हंसते लौटे। ये नौनिहाल का स्टाइल था। खबरों के बारे में जनता की राय जानने का स्टाइल।
एक बार इस बारे में उन्होंने बहुत गंभीर बात कही- ‘अखबार को अपने पाठक का मन जरूर टटोलना चाहिए कि उन्हें कौन सी खबरें भाती हैं, कौन सी लुभाती हैं और कौन सी अघाती हैं। इस पर अगर पकड़ हो गयी, तो अखबार होगा हिट। और अगर ये पकड़ नहीं बनी, तो अखबार जायेगा पिट।’
‘पर गुरू, इसके लिए तो पत्रकारों के अलावा किसी और की ड्यूटी लगनी चाहिए।’
‘उसका भी समय आयेगा। ये काम बाहर के लोगों को भी सौंपा जा सकता है और अखबार में मार्केटिंग के लोगों को भी। पर अभी हम उससे कोई 20 साल पहले हैं। सन 2010 से पहले ऐसा भी होने लगेगा। पर फिलहाल तो हमें खुद ही यह काम करना चाहिए। और हमसे बेहतर इस काम को कोई और कर भी नहीं सकता। खबरें लिखते हम हैं। तो उन पर जनमत भी हमें ही जुटाना चाहिए। इससे हमें खबरों पर असली प्रतिक्रिया का पता चलता है। और इस पूरी प्रक्रिया में हमें खबरों के सही एंगल पता चलते हैं।’
‘पर अगर हम दफ्तर में जाकर ये बात करेंगे, तो लोग हंसेंगे।’
‘तो हंसने दे। वैसे ये नजरिया संपादक की तरफ से सामने आना चाहिए। पर बांगला-मराठी-मलयालम को छोड़कर हिन्दी और किसी अन्य भारतीय भाषा में ऐसा चलन है नहीं। हम ज्यादा परंपरागत हैं…प्रयोग नहीं करते…’
‘एक बात तो बताओ। हिन्दी की तो मानी। पर बांगला-मराठी-मलयालम अखबारों के बारे में तुम कैसे कह सकते हो?’
‘अंग्रेजी के स्टेट्समैन अखबार में मीडिया पर एक कॉलम छपता है। साप्ताहिक है। इतवार को आता है। उसे पढ़ा कर। तुझे भी पता चल जायेगा।’
‘वाह गुरू! क्या बात है! मुझे आज बता रहे हो?’
‘नहीं ये बात नहीं है। पहले कभी इसका जिक्र ही नहीं आया।’
इस तरह नौनिहाल की बहु-पठिता के नये-नये रूप सामने आते थे। शायद ही कोई ऐसा विषय हो, जो उन्होंने न पढ़ा हो। एक बार रमेश गोयल अंग्रेजी साहित्य पर बात कर रहे थे। सर्दियों की उतरती धूप में गोल मार्केट के पार्क में बैठे हम चाय पी रहे थे। गोयलजी ने अचानक इस माहौल पर कीट्स की कोई लाइन बोली। नौनिहाल ने मुझसे पूछा कि क्या चर्चा हो रही है। मैंने उन्हें इशारे से बताया। इस पर वे गोयलजी से बोले, कीट्स ही पढ़ा है या यीट्स भी?’
अब उनका मजेदार वार्तालाप शुरू हो गया।
‘बच्चू, ये इंगलिश लिटरेचर की बात है। यीट्स का नाम कहीं से पता चल गया, तो उस पर उछल रहे हो?’
‘गोयलजी, आपने एमए में पढ़ा होगा इंगलिश लिटरेचर। मजबूरी में। पर मैंने दिल से पढ़ा है। बिना इम्तिहान के डर के अपनी मर्जी से पढ़ा है।’
‘तो मिल्टन भी पढ़ा होगा?’
‘मिल्टन ही नहीं, शेक्सपियर भी चाटा है। गिनाऊं उनके नाटकों के पात्रों के नाम?’
नौनिहाल को इस तकरार में मजा आ रहा था। गोयलजी भी मजा ले रहे थे। आखिर उन्होंने ही बहस खत्म की।
‘ठीक है यार। तुमने ज्यादा पढ़ा है। इस बात पर मेरी तरफ से इमरती खाओ। और गोयलजी ने आधा किलो इमरती का ऑर्डर दे दिया।
दरअसल, जागरण में यह एक बहुत अच्छी परंपरा थी। काम का सारा दबाव और तनाव गोल मार्केट में जाकर दूर हो जाता था। वहां हंसी ठठ्ठा होता था। नाश्ता-पानी होता था। खबरों
को छोड़कर हर तरह की चर्चा होती थी। निजी किस्म की बातें भी हो जाती थीं। दफ्तर में लौटते ही फिर सब एक नयी दुनिया में आ जाते थे। काम में जुट जाते थे। जागरण मेरठ की लॉंचिंग टीम का काम करने का ये एकदम अनूठा अंदाज था। जागरण की सफलता में इसका बहुत बड़ा हाथ था। ये एक आलीशान इमारत की मजबूत नींव थी!
लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.











