: संगठन भी तार-तार व मर्यादा भी : आईएनएस, इलना पर मौकापरस्तों का कब्जा : मैं एक अखबार वाला हूं. एक छोटे से शहर से, लेकिन बड़े-बड़े सपनों के साथ अखबार और पत्रकारिता को एक आदर्श रूप में चुना. अखबार मालिक की छवि एक बड़े क्रांतिकारी की थी, जो अपनी जीविका के साथ कुछ दूसरे जुनूनी लोगों यानी की पत्रकार को नौकरी देने के साथ कई तरह के लोगों की जीविका का माध्यम था. जिनमें हॉकर, आर्टिस्ट, मजदूर, एजेंट, सर्कुलेशन और मार्केटिंग वाले शामिल थे.
इसके साथ ही वो देश की सेवा करता था. लोगों को जागरूक करता था. सूचना जानकारी व ज्ञान का वाहक था. इसलिए समाज व सरकार में उसकी हनक व धमक भी थी. अखबार मालिक होना, मीडिया से जुड़ना गौरव की बात थी. आलम ये था कि वो बिना कुछ खास किये-धरे, अपने उन्हीं चंद रुपयों पर नौकरी के लिए कलम की मसाल थामने वाले खबरों के शिकारियों के दम पर लोकतंत्र का चौथा खंभा बन गया. ताकत और पैसा बेइंतहा. इतना की खादी के कुर्ते से मर्सडीज की सवारी होने लगी. अखबार मालिक जितना अमीर- पत्रकार उतना गरीब, बशर्ते वो दलाल ना हो.
मैंने अखबार निकाला. ठीक-ठाक चलाया. रोजी-रोटी भर का. पर धुन सवार हुई बड़ों में बैठने की. ज्यादा और ज्यादा पैसा कमाने की. इसलिए अखबार मालिकों की राजनीति शुरू कर दी. दो-तीन संगठनों से जुड़ा. जिनमें इलना व आईएनएस खास थे. इलना यानी इंडियन लैंग्वेज न्यूज पेपर एसोसिएशन और आईएनएस यानी इंडियन न्यूज पेपर सोसाइटी. पहले सामान्य मेम्बर, फिर एक्जक्यूटिव और फिर कई बार कई छोटी मोटी कमेटियों में कई पदों पर रहा. पर आज इन संगठनों की कुकुर झाऊं-झाऊं देखकर थू-थू करने को जी हुआ और रहा नहीं गया. सोचा फोरम क्या होगा. दो ही नाम ध्यान में आया- भड़ास4मीडिया या चौथी दुनिया. चौथी दुनिया की अपनी बाध्यताएं होंगी. इस संगठन के एक पदाधिकारी के पास चौथी दुनिया के प्रसार का बंदोबस्त है. इसलिए भड़ास4मीडिया में यशवंत जी को जिम्मेदारी दी.
कुछ तथ्य-
-एक हफ्ता पहले मुझ तीन नोटिस एक साथ मिली. एक में आईएनएस के एजीएम की सूचना थी. 24 को बैंगलोर में देश के सारे बड़े अखबार मालिकों का मजमा लगाने की.
-दूसरी चिट्ठी इलना के परेश नाथ गुट की ओर से थी, जो 23 तारीख को 3 बजे दिल्ली में इलना की एजीएम करा रहे थे.
-तीसरी चिट्ठी इलना में अनिल अग्रवाल गुट की थी, जो 29 को मुंबई में एजीएम करा रहे हैं.
मुझे समझ नहीं आ रहा मैं जाऊं कहां-कहां, कैसे और क्यों? ये सारे इतनी हड़बड़ी में क्यों हैं, आखिर चाहते क्या हैं? क्यों ऐसा कर रहे हैं और वहां फिर होगा क्या ? एक ब्योरा देता हूं आप सभी अखबार वाले भाइयों को मजा आयेगा.
आईएनएस में देश के सारे अखबार मालिक हैं. बड़े-बड़े अखबार, हजारों-हजार करोड़ के टर्न ओवर वाले, लेकिन संगठन में चलती है उसकी जिसके पास प्राक्सी हो. प्राक्सी क्या है? एक तरह का अधिकार, जिसके पास जितना ज्यादा है, वो आईएनएस का मालिक. सालों-साल तक इस संगठन पर दक्षिण वालों का कब्जा था. उनका कब्जा तोड़ने के लिए पश्चिम के बड़े लोगों- टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स के मालिकों ने छोटे लोगों पर निशाना साधा और उनको पकड़ने के लिए सुनील डांग को मोहरा बनाया. मिस्टर डांग सालों तक प्राक्सी के दम पर आईएनएस के बड़े खिलाड़ी बने रहे.
फिर एक वक्त आया कि मुंबई व दिल्ली के समाचार मालिकों ने सुनील की प्राक्सी की मदद से दक्षिण वालों को उखाड़ फेंका और आईएनएस पर मुंबई व दिल्ली वालों का कब्जा हो गया. पर दिल्ली वाले एक साल के भीतर ही किनारे कर दिए गए. मुंबई के माफिया ने अपना एक प्यादा रखा आईएनएस दफ्तर में, जिसका काम ही हर आने वाले से प्राक्सी ले लेना था. उन्होंने नया मेंबर बनाया, उनके भी जो चाय-पान वाले थे और अखबार के नाम पर पर्चा भी नहीं छापते थे.
पर प्राक्सी तो प्राक्सी, जिसने पहले ही 4-5 सालों की साइन करके दे दी, वो आईएनएस का मेंबर नहीं तो नहीं, चाहे जितना जेन्इव अखबार वाला हो. सिलसिला चल निकला और सारे बड़े अखबार मालिक ताकते रहे. पिछले पांच साल से यही हो रहा है. आईएनएस के माई-बाप हरमुसजी कामा और उनका प्यादा वीके चोपड़ा हैं. इस संगठन के पास हजार करोड़ की पूंजी है. ये विज्ञापन एजेंसियों के माई-बाप हैं. दिल्ली-मुंबई में जमीनें हैं, मौजा ही मौजा है.
अब आते हैं इलना पर.
इलना की राजनीति कभी भी आईएनएस की पिछलग्गू नहीं थी. ये संगठन मध्यम व छोटे दर्जे के अखबार मालिकों की मदद करने के लिए बना था. पर आजादी व तरक्की ने मध्यम को बड़ा और छोटों को मध्यम दर्जे तक पहुंचा दिया. जिसका नतीजा ये रहा कि आईएनएस के लोगों ने इस संगठन में भी दखल देना शुरू कर दिया. बड़े-बड़े नाम आए, इलना का अध्यक्ष बने और संगठन को इस्तेमाल कर चलते बने. फिर भी नाम के लिए ही सही देश के इस सबसे पुराने संगठन की अपनी गरिमा बची रही, पर असली खेल खराब हुआ आईएनएस के तख्ता पलटने से.
जब दक्षिण की लॉबी आईएनएस से बहरियाई गई तब आईएनएस में मुंबई का अध्यक्ष बना. चूंकि सुनील डांग की जुटाई प्राक्सी से ही सत्ता हाथ आई थी, इसलिये उनको आईएनएस में ट्रेजरार के साथ इलना का अध्यक्ष बना दिया गया. जब तक सुनील आईएनएस पर सत्ता जमाये लॉबी को भाये, सब ठीक रहा. पर जैसे ही अवसरवादियों ने प्राक्सी पर खुद कब्जा जमाना सीख लिया, सुनील आईएनएस से बाहर तो हुए ही इलना में भी उन्हें तंग किया जाने लगा. पर चूंकि सुनील डांग ने हमेशा छोटे व मझोले अखबारों की राजनीति ही की और उन्हीं के साथ प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया और प्राइम मिनिट ऑफ इंडिया को अपने कार्यक्रमों में लाने में सफल रहे. उन्हें इलना से तब तक हटाया नहीं जा सका, जब तक आईएनएस की लॉबी ने मिस्टर परेश नाथ, दिल्ली प्रेस के मालिक का इस्तेमाल नहीं किया.
चूंकि परेश नाथ भी दिल्ली के थे और डंग भी, परेश नाथ ने सुनील की मदद की हामी भरकर उन्हें चुनाव के लिए राजी कर लिया और खुद उनके खिलाफ चुनाव लड़कर अध्यक्ष बन गए. ये और बात है कि सुनील को चुनाव से पहले पता तक नहीं था कि उनके साथ छह घंटे पहले तक बैठकर पदाधिकारी तय करनेवाले परेश नाथ का असली चेहरा ये है. और जिस दिन परेश नाथ अध्यक्ष बने उस दिन वो खुद इलना के वोटर तक नहीं थे. बहरहाल परेश नाथ के अध्यक्ष बनने के तीन माह के भीतर ही इलना में दरार पड़ गई.
इलना के बाइलॉज के मुताबिक वहां लिखने-पढ़ने का सारा काम सेक्रेटरी जनरल हेडक्वार्टर करता था. पर आईएनएस में तब तक हाशिए पर ला दिए गए परेश नाथ किसी के साथ अधिकार शेयर करने को राजी नहीं थे. क्योंकि इसकी उन्हें शायद आदत नहीं थी. दिल्ली प्रेस आज भी जर्नलिस्टों, लेखकों का नहीं बंधुआ मजदूरों का संस्थान है. ना जाने कैसे किस दबाव में जय प्रकाश पाण्डेय नामक शख्स के समय कुछ खुली बयार आई, पर वह परेश नाथ ने किन मजबूरियों में बर्दास्त किया वही जाने, और जैसे ही मौका मिला जेपी वहां से बाहर निकल गए. पर इलना को भी परेश नाथ ने अपनी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह ही चलाना चाहा.
नतीजा तीसरे महीने ही दोनों उपाध्यक्ष डीएस त्रिखा, वीके चोपड़ा, सेक्रेटरी जनरल कृष्णा सेवेडिकर, अनिल अग्रवाल, संदीप कुलश्रेष्ठ, सत्य प्रकाश असीम जैसे लोग अलग होने लगे. संगठन बंट सा गया. फिर भी परेश नाथ ने आईएनएस के चक्कर में लोगों को पकड़े रहने की कोशिश की. उन्होंने प्राक्सी भी जुटाई. आईएनएस के इलेक्शन में हैदराबाद गए भी, चुनाव से पहले डेमोक्रेसी, इंडस्ट्री के वेलफेयर का रोना भी रोया. पर केवल एक्जक्यूटिव में बने रहने भर के लिए.
अपने साथ गए लोगों को धोखे में रखकर ना केवल माफी मांग लिया बल्कि मिस्टर कामा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को वापस भी ले लिया. आईएनएस से वो हलाक हो चुके थे और इलना उनके लिए एक नई दुकान थी, क्योंकि जिस दिल्ली प्रेस की बिन्दी-टिकुली वाली मैगजीन को एक पैसे का भी सरकारी विज्ञापन नहीं मिलता था उसी को परेश नाथ ने इलना अध्यक्ष बनने के बाद एक करोड़ से भी ज्यादा के विज्ञापन मिल चुके थे. लिहाजा आईएनएस में बहरियाये जाने की खीझ उन्होंने उसी हैदराबाद में फर्जी चुनाव करा कर निकाली. यहां भी उन्होंने सुनील डंग की ही मदद ली. जेपी के रिलेशन व सुनील के दिमाग को भुनाने के उनके इस खेल से इलना बंट गई. क्योंकि कानूनन परेश नाथ गलत थे. सेक्रेटरी जनरल के अधिकारों में कटौती के लिए वे मुंबई कोर्ट भी गए पर हार कर लौटे. पर ज्यादा समय तक ये खेल भी नहीं चल पाया. दूसरे गुट ने नया चुनाव कराकर उत्तम चंद शर्मा को अध्यक्ष चुन लिया.
आज आलम ये है कि 23 को फिर परेश नाथ चुनाव करा रहे हैं, वे संगठन के 64 सालों के इतिहास को पलट कर बाइलॉज को बदल कर तीसरी बार कब्जा करना चाहते हैं. जैसे आईएनएस में हुआ है, उससे भी चार कदम आगे इलना में हो रहा है. परेश नाथ के ड्राइवर, चपरासी तक इलना में उनके नुमाइंदे हैं. साथ में मेरठ की टीम है, जिसे डांग ने कभी अपनी मजबूती के लिए खड़ा किया था. आज हर कोई इन संगठनों के नाम पर लूटने पर लगा हुआ है. सरकार से जो भी मिल जाये. अभी हरियाणा के सीएम इसी लल्लू-चप्पू में आकर 11 लाख देकर गए और सारे अखबारों को 2-2 विज्ञापन की बात कह गए. परेश नाथ इसी को भुना रहे हैं.
शर्मनाक तो ये है कि यही मालिक अखबारों में पत्रकारों को सरकार की तरफ से तय की गई तनख्वाह तक ना मिले की हिमायत करते हैं, वेज बोर्ड की रिपोर्ट ज्यादातर नहीं लागू करने वाले अखबार यही पेड न्यूज की वकालत करते हैं, परेश नाथ ने पेड न्यूज की हिमायत करते हुए अपने सदस्यों को चिट्ठी भेजी थी, पर एक-एक आरओ के लिए आज कुछ भी करने को तैयार हैं.
अखबार मालिकों का संगठन अब इस तरह से चलेगा, कौन चलायेगा और कैसे? ये एक सवाल है, जिसे इलना और आईएनएस के सदस्यों को ही नहीं सबको सोचना है, जो इस धंधे से जुड़े हैं. परेश नाथ गुट ने ये मान लिया है कि आईएनएस में वो कहीं नही हैं. इसलिए जो लोग भी आईएनएस से जुड़े हैं वो इलना के इस फर्जीवाड़े वाले चुनाव से ऐसे ही बाहर हो जायेंगे, क्योंकि उन्हें 24 को बैंगलोर में आइएनएस की चुनाव की पड़ी होगी.
वैसे भी अब दिल्ली और बैंगलोर की दूरी काफी है. सो मौका खाली है. मैदान मार लें, इंडस्ट्री के भले के नाम पर! कुछ तो शर्म करो मौकापरस्तों! शर्म है की हम अखबार वाले हैं, सुकून है कि अभी आग बची है.
एक वरिष्ठ पत्रकार द्वारा भड़ास4मीडिया को भेजी गई चिट्ठी पर आधारित. उन्होंने अपना नाम न प्रकाशित करने का अनुरोध किया है.












amiy pandey
September 24, 2010 at 6:18 am
mai aapke us vaykti ko salaam karta hu jisne yah patra akhabar maliko ki rajniti aur unka occhapan bhadas4media ko likha hai mai unke uproktt baat se sahmat hu… aur bhadas ko thxx kahta hu ki wah aise khaber parkasit kiye
tarun sharma
September 24, 2010 at 7:37 am
sir thoda short me lekha karo ,jhel ho jata hai.