: अनिरुद्ध बहल और उनके सहयोगी ने किया था स्टिंग : दिल्ली हाईकोर्ट ने पत्रकार अनिरुद्ध बहल और उनके सहयोगी को बड़ी राहत दी. सांसदों द्वारा पैसे लेकर सवाल पूछे जाने के मामले में स्टिंग करने पर दोनों पत्रकारों के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने मामला दर्ज किया था. कोर्ट ने साफ कहा कि समाज में फैले भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए ऐसे स्टिंग ऑपरेशन में अगर किसी को रिश्वत दी जाती है तो उसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. कोर्ट ने पत्रकार अनिरुद्ध बहल समेत दो पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मामले को खारिज करते हुए ये टिप्पणी दी.
कोर्ट ने कहा कि अपने स्टिंग ऑपरेशन के जरिए पत्रकार अनिरुद्ध बहल ने यह साबित करने की कोशिश की थी कि देश के कुछ सांसद पैसे लेकर संसद में कोई भी सवाल उठा सकते हैं. इस स्टिंग को करने के पीछे उनकी कोई गलत या आपराधिक मंशा नहीं थी. दोनों पत्रकार लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रतीक संसद में व्याप्त भ्रष्टाचार का खुलासा करना चाहते थे और उसे सबके सामने लाना चाहते थे. इसके लिए गठित की गई संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट तैयार करते वक्त स्टिंग ऑपरेशन में शामिल सभी पत्रकारों से अलग-अलग बातचीत की थी.
पूरे स्टिंग के टेप को बिना संपादित किए सुना था. इसके बाद ही समिति ने स्पीकर से सांसदों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की सिफारिश की थी. लेकिन पुलिस की कार्रवाई से न सिर्फ समिति की रिपोर्ट, बल्कि स्पीकर की कार्रवाई भी सवालों के घेरे में आ गई. कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की नीयत पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि घूस लेने के आरोपी सांसदों के खिलाफ स्टिंग करने वाले पत्रकार गवाह हो सकते थे. परन्तु पुलिस ने सांसदों के कारनामे सामने लाने वाले पत्रकारों को भी उनके साथ आरोपियों की सूची में डाल दिया.
गौरतलब है कि इस स्टिंग में रिश्वत लेकर संसद में सवाल पूछने वाले 11 सांसदों की असलियत दुनिया के सामने उजागर हुई थी. 2005 में जब ये मामला सामने आया तो देश भर में तूफान खड़ा हो गया था. सांसद इसे विशेषाधिकार हनन का मामला बताने लगे थे. जिसके बाद इस मामले की छानबीन के लिए एक संसदीय समिति गठित की गई. जांच के बाद समिति ने न सिर्फ आरोपी सांसदों को जिम्मेदार ठहराया और उनकी सदस्यता रद्द करने की सिफारिश की बल्कि समिति ने स्टिंग ऑपरेशन करने वाले पत्रकारों को सच्चाई सामने लाने के लिए प्रशंसा भी की.
इसके बावजूद स्टिंग करने वाले दोनों पत्रकारों पर दिल्ली पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर उनके खिलाफ चार्जशीट दायर कर दी थी. जबकि दोनों पत्रकारों के काम की संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट तक ने तारीफ की थी. इसके बाद समिति की सिफारिश पर सांसदों की सदस्यता रद्द कर दी गई थी. अपनी सदस्यता रद्द होने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए लेकिन संसद की सर्वोच्चता को मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था.












sudhir
September 24, 2010 at 3:24 pm
[b] कोर्ट का ये आदेश देश के भ्रष्ट नेताओं के गाल पर एक जोरदार तमाचा है [/b]
Sandeep
September 24, 2010 at 3:41 pm
Yashwant Bhai,
Etane bade such ko logo ke samane lane ki himmat to sirf bhadas4media ke pass hi ho sakati hai.badhai.lage rahiye.
Atul Shrivastava
September 24, 2010 at 6:17 pm
पत्रकारों को बधाई हो, रिश्वत खोर सांसदों को बेनकाब कर कोई गलत काम नहीं किया गया। इनमें से एक हमारे संसदीय क्षेत्र का दुर्योधन था। काफी समय तक भाजपा ने उसे पार्टी से अलग रख दिखावा किया फिर उसे पार्टी में ले लिया गया, मुख्यमंत्री का करीबी जो था वह नाम में गांधी है और उसने कागज भी वही लिया था जिसमें गांधीजी की तस्वीर थी।
ravishankar vedoriya
September 25, 2010 at 12:28 pm
bhadai ho sir dono patrakaro ko jinhone janta ko sansado ki hakikat ko samne laya