यही सच है. बिना न्याय मिले अभियान खत्म. हर दरवाजे खटखटा लिए. सबको मेल भेज दिया. सब तक घटनाक्रम की जानकारी पहुंचा दी. पर हुआ कुछ नहीं. माया सरकार के नेता कान में तेल डाले मस्त है. सत्ता द्वारा संरक्षित व पोषित अधिकारी विवेकहीन व तानाशाह हो चुके हैं. सो, वे दोषी भी हों तो उनका बाल बांका हो नहीं सकता, और वे अपने दोषी अधीनस्थों का बाल बांका करेंगे नहीं.
मैं कट्टा-बंदूक लेकर दोषियों को मारने नहीं जा रहा क्योंकि मैं लोकतांत्रिक व्यवस्था में आस्था रखते हुए लोकतांत्रिक तरीके से न्याय पाना चाह रहा हूं. दर्जनों अखबारों-चैनलों ने प्रकरण से संबंधित खबरें छाप दीं, दिखा दी. देश भर से घटनाक्रम पर अफसोस जताया गया, दुख व्यक्त किया गया और मुझसे लड़ते रहने की अपेक्षा की गई. यूपी पुलिस के अधिकारी बृजलाल ने घटना की जांच के लिए कह दिया, जांच का नाटक भी हो चुका है, यूपी के बड़े छोटे पत्रकार अपनी ओर से पत्रकारों व पत्रकारों के परिजनों के उत्पीड़न पर चिंता जताते हुए ज्ञापन भी दे चुके हैं, लेकिन कहीं कुछ हो नहीं रहा, कहीं कुछ हुआ नहीं. ऐसे में मैं मां के लिए न्याय का अभियान बिना न्याय मिले ही खत्म करने पर मजबूर हूं.
मैं ये मानकर चल रहा हूं कि सड़ांध से बजबजा रहे इस सिस्टम में इतनी संवेदनशीलता नहीं बची है कि उसके सामने मामला आते ही, प्रकरण उठते ही जांच हो जाए और दूध का दूध व पानी का पानी हो जाए. जो जहां है, वहां सिफ निज की चिंता में मरे जा रहा है, सो उसे दूसरे का दुख व दूसरे के साथ हुआ अन्याय कतई नहीं दिखेगा और न ही महसूस होगा. ऐसे अंधे, बहरे व गूंगे सिस्टम में आवाज उठाने व न्याय के लिए अभियान चलाने का कोई मतलब नहीं है. हां, इस अभियान से इतना जरूर फायदा हुआ कि निजी तौर पर मैं व्यवस्था की कड़वी विसंगति से रूबरू हो सका. बहुतों की औकात पता चली. मीडिया के पतन-स्खलन व आभाहीन हो जाने और पत्रकारों की वैचारिक फटेहाली व सिस्टम के सामने नपुंसकता को नजदीक से समझ सका. ब्योरक्रेसी के बौनेपन का करीब से दर्शन हो सका. नेताओं की नेत्रविहीनता का सामने से साक्षात्कार हुआ.
मां मेरी है, उसने पहले भी नहीं कहा कि अभियान चलाओ, वो आज भी यही कह रही है कि ”रहने दो बस, तुम तो दिल्ली में हो, हम लोग गांव में हैं, इनसे पंगा नहीं लेना चाहिए, जाने कब क्या कर दें ये.” मेरे दोस्त मित्र शुभचिंतक बहुत हैं लेकिन सबके अपने गम व दुख हैं, सबके अपने तनाव व अपनी सीमाएं हैं, सो, किसी के पास फुरसत नहीं कि वे इस मामले को अपना मामला मानकर आगे बढ़ाएं, रोजाना फालोअप करें, बात करें, दबाव डालें. और दूसरे क्यों, मैं खुद भी दिल्ली में हूं, एक्टिविज्म से पेट भरता नहीं, सो कंटेंट के साथ रुपये-पैसे व टेक्नालजी, सभा-सेमिनार-आयोजन आदि के लिए भी बैठक व बात करने में समय जाया करना पड़ता है.
और, यह भी सच है कि न्याय न मिलने पर मैं कट्टा या बंदूक उठाकर चुपचाप किसी के कपार में गोली ठोंकने जैसी हिम्मत नहीं रखता और न ही मां के साथ अपमान होने के बाद डिप्रेसन में आत्महत्या करने जैसी मनःस्थिति में पहुंच पाया हूं. सो, हर ओर से थक हार कर मैं यह अभियान खत्म करने का निर्णय लेता हूं. मैं नहीं चाहता कोई मुझसे अब इस मुद्दे पर बात करे. जिसे इस मुद्दे के बारे में जानना हो, वह इस लेख के ठीक नीचे दिख रहे कमेंट बाक्स के आखिर में आ रहे शीर्षकों पर क्लिक करता जाए पढ़ता जाए और जानता जाए. जिसे जो करना हो करे. मैं इससे ज्यादा अब नहीं लिख सकता और न ही यह अभियान चला सकता. निजी तौर पर मेरी औकात बस इतनी ही है. कुछ मित्रों व कुछ अधिकारियों के अनुरोध पर अपनी मां के न्याय के लिए आज आखिरी मेल कुछ जगहों पर भेज दिया है.
बस. अब कोई मेल या अप्लीकेशन नहीं. मैं मां के अपमान को भूल नहीं सका हूं और न भुलूंगा, सो मुझे कैसे रिएक्ट करना है, क्या करना है, कहां कहां जाना है या नहीं जाना है, ये अब मैं निजी तौर पर तय करूंगा. इसमें अब किसी की सहभागिता नहीं चाहता. जो कुछ गिने-चुने लोग इस प्रकरण को लेकर मेरे साथ सक्रिय हैं, उनके संपर्क में रहते हुए मामले को यह मानते हुए आगे बढ़ाऊंगा कि यह लंबी व थका देने वाली न्याय की लड़ाई है, एक दिन में या एक महीने में कुछ नहीं होना.
आप सब इस अभियान में किसी भी रूप में जुड़े, मामले से संबंधित खबरों को पढ़ा, सोचा, मेल किया, बात की, सलाह दी, कमेंट लिखे, मेल फारवर्ड किए, एकजुटता दिखाई…. आदि आदि… इसके लिए मैं हृदय से आभारी हूं.
आपका
यशवंत
09999330099












नूतन ठाकुर
October 27, 2010 at 3:39 am
यशवंत जी,
ये अभियान नहीं रुकेगा, किसी भी कीमत में नहीं रुकेगा. आप ने अपनी तरफ से रोक भले दिया हो पर हम लोग इसे सही नहीं मान रहे हैं.
ये अभियान अब आपका नहीं है, हम सबों का है. हम अपनी पूरी ताकत भर इस अभियान की उसके गंतव्य तक आगे बढायेंगे और यही न्याय होगा
नूतन ठाकुर
akhilesh
October 27, 2010 at 3:43 am
Yashwant
Ab samajh me aya ki Aam insaan Naxali kaise ban jate hain. Aapke sath jo ghatna ghati uska pratikar aapne kiya. Aap ke paas media ki so called taakat thi. Phir bhi aapko nyay nahi mil paya. System se sir takra kar rah gaye. Aam insaan aisi ghatnao se roj hi do char hota rahta hai. Pratikar nahi kar pata. Nyay ke liye dar-dar bhatkta hai. Nyay nahi milegi to kya karega. Hathiyaar uthayega. Naxali banega.
Aapme to Itni bhi himmat nahi ki aap hathiyar utha sake. Naxali ban sake.
bijay singh
October 27, 2010 at 4:14 am
GANDHI GIRI SE KAM NA CHALE TO SUBHAS BOSE ,BAGAT SINGH AUR CHANDRASEKHAR AZAD KI BHUMIKA ME AANA HI HOGA. netawon aur adhikariyon se jada ummid na hi kare.juta lekar nikle aur jin dushton ne galat kam kiya hai unhe do do juta lagaye ,dimag thikane ho jayega.besharmon ke liye juta hi upyukta hota hai.
SHRIPAL
October 27, 2010 at 5:02 am
यशवंतजी,
अन्याय के खिलाफ लडाई कहने से ख़त्म नहीं होती,लडाई के तरीके बदल जाते हैं.उम्मीद है आप भी ऐसा ही करेंगे.हम अपनी मान के अपमान का प्रतिकार नहीं करेंगे तो फिर क्या मतलब ?
ज़िन्दगी में आने वाले इम्तिहान इंसान को रणनीति बनाना सिखाते हैं…हथियार डालना नहीं !
एक व्यक्ति के लडाई से हट जाने का मतलब है,दूसरों के लिए भी इसे ही हालत का रास्ता बनाना.मामला मानव अधिकारों से जुड़ा है,अन्याय से जुड़ा है,उसके खिलाफ लड़ने के लिए कई मंच हैं.उनका इस्तेमाल कीजिये.
यह कहने का कोई अर्थ नहीं कि हम आपके साथ हैं,क्योंकि दूर बैठकर इस तरह कि दिलासा या भरोसा देने का कोई अर्थ नहीं है.यह लडाई आपको हर हाल में और अपने अंदाज़ में लडनी चाहिए.हाँ,हमारे लायक कोई काम हो तो जरूर बताएं.
arbaaz
October 27, 2010 at 7:21 am
ye hatasha kyon yashwant bhai,chand logon kee berukhi media kee berukhi nahin hai,nahin hai …kuchh logon kee dukandaari media ka chehra nahin hai..aap immandaari se sabhi kee pol kholate ho to koi aapka saath nahin dega isliye yah dikhana hai ki aap kisi ke bharose nahin ho…
शशिकान्त अवस्थी (कानपुर)
October 27, 2010 at 8:25 pm
यश्वतं जी आपने जो अभियान खत्म करने की बात कही है वह यह दर्शाता है कि किस तरह आम आदमी अपने ही बनाये हुये सिस्टम से हार मान जाता है या फिर कहे कि मजबूर हो जाता है । ये सब चीजे यह बताती है कि हम लोग किस तरह के लोकतन्त्र का डंका पूरे विश्व में पीट रहे है । जहॉ पर सिर्फ और सिर्फ कुर्सी की पावर चलती है न कि सही व गलत की पहचान होती है । आम आदमी यह कल्पना कर सिहर जाता है कि जब पत्रकार वर्ग ही शोषण का शिकार हो रहा है तो उसकी क्या बिसात है । खैर यश्वतं भाई आप ने अपनी तरफ से एक तरफा युद्ध बिराम किया है । लेकिन मीडिया समुदाय ने नही न्याय तो हर हाल में ही चाहियें ।
rajeev kumar
October 28, 2010 at 2:01 am
[b]satya paresan hota hai parajit nahi.
[/b]Yaswant ji jab aap itney dukhi aur hatash ho jayengey to hum log ka kya hoga hamey yaad hai ki mainey aapko apney uper ghati story http://bhadas4media.com/vividh/6355-rajeev-story.html
di thi to aapney usey bhadas per dekar mera utsah badhaya aaj aap udas aur hatas hokar hum log ka dil tod rahey hai. Aap sangarsh jari rakhey . Lekin kabhi kabhi mai bhi sochta hun ki kahney ko merey dost aaj tak aur ibn 7 aur star news mei hain lekin burey vakt per koi sath nahi deta hai.
lekin yaad rakhey [b]satya paresan hota hai parajit nahi.[/b]
AMITESH
October 28, 2010 at 4:11 am
यशवंत जी,
ये अभियान नहीं रुकेगा, किसी भी कीमत में नहीं रुकेगा. आप ने अपनी तरफ से रोक भले दिया हो पर हम लोग इसे सही नहीं मान रहे हैं.
ये अभियान अब आपका नहीं है, हम सबों का है. हम अपनी पूरी ताकत भर इस अभियान की उसके गंतव्य तक आगे बढायेंगे और यही न्याय होगा
AMITESH
YASHOVARDHAN NAYAK TIKAMGARH(M.P.)
October 28, 2010 at 4:47 pm
यशवंत जी पत्रकार व्यवस्था का “सफाई कामगार”है ,उसका कोई निजी अपमान नहीं होता है ?आपके परिजनों की पीड़ा में शामिल हुए लोगों की तादाद देख कर आपका हौसला बुलंदी पर होना चाहिए ? दुष्यंत जी का कहना था “सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं ,मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए ” पुलिस ने क्या यह पहली बार किया है? या केवल आपकी ही माँ पुलिसिया उत्पीडन कि शिकार हुई है .आपकी माँ का मामला इसलिए प्रकाश मै आ गया क्योकि वो यशवंत कि माँ थी ?अपने देश में रोज हजारो मांए इसी तरह पुलिस से पीड़ित होती है .आपको इस लड़ाई के जरिये उन सभी को न्याय दिलाना है ,ताकि पुलिस-वाले माँ शब्द कि गरिमा को महसूस करना शुरू का सकें .हम लोग टीकमगढ़ जिला कलेक्टर के माध्यम से उ.प्र. के महामहिम राज्यपाल महोदय को इस पुलिसिया -पराक्रम के बाबत ज्ञापन भेज रहें है .
YASHOVARDHAN NAYAK TIKAMGARH(M.P.)
October 28, 2010 at 5:00 pm
YASHOVARDHAN NAYAK TIKAMGARH ,VINOD-KUNJ TIRAHA JHANSI-ROD TIKAMGARH(MADHYA-PRADESH)PIN-472001 [07683-240064]MO-9424923031
namit
November 1, 2010 at 3:30 am
yashwant ji
abhiyan band nahi kare.
iska asar kuchh samay bad Dikhega
aap ki vajah se any longo ko bhi nyay milega
up me har taraph kanoon ka makhol udhaya ja raha hai
aap ke sath hai>