मेरठ का क्रिकेटर प्रवीण कुमार जब भारतीय क्रिकेट टीम का हिस्सा बने था तो मेरठ में जश्न का माहौल था। मेरे लिए इसलिए भी गर्व की बात थी कि पीके हमारे ही मोहल्ले का एक साधारण लड़का था, जिसे मैं गलियों में बच्चों के साथ क्रिकेट खेलते हुए देखता था। जब पीके ने अपने पहले ही मैच में आस्ट्रेलिया के खिलाफ शानदार प्रदर्शन करते हुए अपने चयन को साबित किया तो हमारा सीना गर्व से और ज्यादा चौड़ा हो गया था।
उस समय मशहूर थ्रिलर उपन्यास लेखक वेदप्रकाश शर्मा ने ‘डीएलए’ अखबार में एक लेख ‘बहकना मत पीके’ शीर्षक से लिखा था। उस लेख में वेद ने पीके को सफलता के नशे में न बहकने की नसीहत दी थी। लेकिन पीके बहक गया। मेरठ में एक व्यापारी के साथ हाथापाई के साथ ही कई मामलों में पीके की काफी फजीहत हो चुकी है।
लगभग एक साल पहले एक मामला ऐसा हुआ था, जो मीडिया में नहीं आ पाया था। हुआ यूं था कि पीके सुबह सवेरे अपनी लग्जरी गाड़ी निकाल रहा था। गली थोड़ी तंग है। थोड़ा अनाड़ीपन के चलते पीके ने एक अखबार बांटने वाले हॉकर की साइकिल में टक्कर मार दी। हॉकर के सिर में गम्भीर चोटें आईं थीं। तब पीके, उसके भाई विनय और पिता सकट सिंह ने हॉकर को कोई कानूनी कार्रवाई न करने का अनुरोध किया और यह वादा किया था कि वे उसके इलाज का पूरा खर्च उठाएंगे। लेकिन पीके और उसका परिवार वादे से मुकर गया। गरीब हॉकर को पूरा इलाज अपने पैसों से कराना पड़ा था। दो-तीन महीने काम का जो नुकसान हुआ वह अलग था।
लगातार कामयाबी के बाद पीके बहकता चला गया। कहते हैं कि जब एक अति साधारण आदमी सफल होता है तो वह सबसे पहले अपने ही गरीब साथियों से किनारा करता है। कल यह बात साबित भी हो गयी। कल पीके ने अपने ही पड़ोस में रहने वाली लड़की सपना, जो शूटर है, से सगाई की है। कल सुबह एक समाचार-पत्र से मेरे पास फोन आया कि सुना है आज पीके की सगाई है। मैंने कहा मुझे नहीं मालूम मैं पता करके बताता हूं। मैंने उसके पड़ोस में रहने वाले अपने एक परिचित से फोन करके पूछा तो उसने बड़ी तल्खी से कहा-‘हां कुछ हो तो रहा है, ऐसा लग रहा है जैसे सगाई न होकर कोई ऐसा गलत काम किया जा रहा है, जो किसी को पता न चले।’
बात यहीं खत्म नहीं हुई। मीडिया से सख्त परहेज बरता गया। पीके के कुछ दोस्त उसके घर की ऐसे निगरानी कर रहे थे, जैसे कोई मीडिया वाला आ गया तो अनर्थ हो जाएगा। शायद यही वजह थी कि पीके के घर पर कुछ लोगों का जमावड़ा था तो पास-पड़ोस में वीरानी छाई हुई थी। जिन लोगों ने पीके को क्रिकेट का कखग बताया, वो भी मन मसोस कर रह गए। शायद पीके अपने आप को अब सानिया मिर्जा या अमिताभ बच्चन की श्रेणी में रखने लगा है। इन दोनों हस्तियों ने भी अपनी और अपने बेटे की शादी में मीडिया से बेरुखी दिखाई थी।
पीके ने मीडिया से बेरुखी दिखाई तो मीडिया ने भी पीके को आईना दिखाने में कसर नहीं छोड़ी। खासकर ‘अमर उजाला’ ने पीके की एक तरह से बखिया उधेड़ कर रख दी। अमर उजाला ने पीके के संघर्ष के दिनों की एक तस्वीर छापी है। उस तस्वीर के कैप्शन में लिखा गया है-‘अमर उजाला कार्यालय में कुछ वर्ष पहले खींचा गया यह फोटो पीके ने बड़ी मिन्नतें करने के बाद छपवाया था। आज सफलता के नशे में चूर उसी पीके ने मीडिया को सगाई समारोह से दूर रखा।’
पीके को वेदप्रकाश शर्मा के ‘डीएलए’ में छपे लेख को दोबारा पढ़ना चाहिए। यदि उनके पास उपलब्ध न हो तो डीएलए दफ्तर से मंगा कर पढ़ें। पीके को यह बात समझ लेनी चाहिए कि सफलता के साथ असफलता भी जुड़ी होती है। उन्हें कई क्रिकेटर याद होंगे, जो धूमकेतु की तरह चमके और फिर गुमनामी में खो गए। सफलता पाकर न बहकने वाला आदमी ही लोगों के दिलों में जगह पाता है। पीके को सफलता के नशे में न चूर होने का सबक सचिन तेंदुलकर से सीखने की जरुरत है।
लेखक सलीम अख्तर सिद्दीक़ी हिंदी के सक्रिय ब्लागर, सिटिजन जर्नलिस्ट और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उदयन शर्मा से बेहद प्रभावित सलीम मेरठ में निवास करते हैं. विभिन्न विषयों पर वे लगातार लेखन करते रहते हैं.












चंदन सिंह
November 9, 2010 at 5:45 am
सफलता का नशा ही कुछ ऐसा होता है…जिसे संभालना काफी मुश्किल होता है…पीके जैसे खिलाड़ी ने जिस तेजी से सफलता हासिल की, वो काबिलेतारीफ है…लेकिन जब सिर आसमान की तरफ उठने लगता है…तो पैरों का साथ जमीन से छूट ही जाता है…प्रवीण कुमार के साथ भी ऐसा ही हो रहा है, लेकिन शायद वो ये भूल गए हैं, कि कामयाबी कितनी बेवफा होती है…क्रिकेट की दुनिया में कई ऐसे नाम हैं, जो चमक बिखेरने के बाद गुस्ताख हो गए…और अंत में गुमनामी में खो गए…विनोद कांबली का उदाहरण सबके सामने है…
mayur
November 9, 2010 at 6:01 am
bhot khub sir.
sunil chhaiyan
November 9, 2010 at 6:27 am
saleem bhai aapke lekh par ek sher yaad aya jise marhoom chacha Manjoor ahemad (ex- MLA) kabhi kabhi kisi kee utarte vaqt sunaya karte the. sher hai- ‘kitne kamzarf hain ye gubbare chand sanson mai fool jate hain, jab kabhi ye urooz pate hain apni aukat bhool jate hain’. apne sachin ka sabak diya vakyee-
‘manzilon tak pahunchana koi kamaal nahi manzilon par thaharana kamaal hota hai’
anjan cricketer
November 9, 2010 at 3:01 pm
सर मैं भी मेरठ से हूं..पत्रकार हूं..सर पहली बात तो ये कि आदमी पैसे और शोहरत से बड़ा नहीं होता..हालांकि ये आज की दुनिया में सच यही है..खैर इसके अलावा यह बात बहुत ज्यादा अहम है कि आपकी शिक्षा-दीक्षा और परवरिश कैसे हुई और आपकी पृष्ठभूमि क्या है..आपके संस्कार कैसे हैं..सचिन तेंदुलकर आज इसीलिए तेंदुलकर हैं कि उनके पिता साहित्यकार थे..और खुद सचिन ने स्वीकारा कि उनके पिता का उन पर बहुत ज्यादा प्रभाव सचिन पर था..अमिताभ का व्यक्तित्व कभी बिना हरिवंश राय बच्चन के पूरा नहीं होगा…पर मुझे लगता है कि प्रवीण पर पिता का कम, उनके पिता पर प्रवीण का प्रभाव अब ज्यादा हो गया होगा..क्योंकि पृष्ठभूमि और बैकग्राउंड और संस्कार जैसी बातें किसी जाट परिवार (माफी चाहता हूं) में कोयले की खान में हीरा ढूंढने जैसा है..और प्रवीण कुमार कितने शिक्षित हैं, ये उनके इर्द-गिर्द के लोग अच्छी तरह जानते हैं….कहने का सार यही है सर कि आदमी पैसे और शोहरत से बड़ा नहीं होता…बड़ा बनने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है..और ये सब प्रवीण कुमार और परिवार के जींस में अगले सौ सालों या कई जन्मों भी नहीं आ पाएगा………….
sunil chhaiyan
November 10, 2010 at 7:23 am
anjan cricketer mitr . koyle kee khan mai heera talashane kee kahavat ke sath ek biradari visesh ko jodna apki kam jankariyon ko darshata hai. muzaffarnagar ko agar mauhabbat nagar kaha jata hai to vo isi biradari ke sanskaron kee vajah se hee hai.agar aap jaat biradari ka itihaas khangalen to aapko bhartiya sanskaron kee badi thati ka pata chalega. sir chhotu ram.ch. charan singh, balram jakhar se pahale aise anek naam hain jinhone desh aur samaj ko disha dene mai badi bhoomika nibhayee.
kanhaiyalal Tiwari
November 11, 2010 at 1:04 pm
सफलता का नशा ही कुछ ऐसा होता है…जिसे संभालना काफी मुश्किल होता है…पीके जैसे खिलाड़ी ने जिस तेजी से सफलता हासिल की, वो काबिलेतारीफ है…लेकिन जब सिर आसमान की तरफ उठने लगता है…तो पैरों का साथ जमीन से छूट ही जाता है…प्रवीण कुमार के साथ भी ऐसा ही हो रहा है, लेकिन शायद वो ये भूल गए हैं, कि कामयाबी कितनी बेवफा होती है…क्रिकेट की दुनिया में कई ऐसे नाम हैं, जो चमक बिखेरने के बाद गुस्ताख हो गए…और अंत में गुमनामी में खो गए…विनोद कांबली का उदाहरण सबके सामने है