‘‘भड़ास’’ में ही दिल्ली जर्नलिस्ट यूनियन की एक खबर देखी, उसने मीडियाकर्मियों से आह्वान किया है कि वे 16 नवंवर को ‘‘पत्रकारिता बचाओ दिवस’’ मनायें दिल्ली जर्नलिस्ट यूनियन का यह आह्वान काबिले तारीफ है, पर सवाल ये है कि पत्रकारिता को कौन बचायेगा? अखबारों में काम करने वाले पत्रकार, अखबारों के धन्ना सेठ मालिक, अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिये मीडिया का उपयोग करने वाले राजनेता या फिर अखबारों के पाठक और न्यूज चैनल देखने वाले दर्शक.
सवाल बहुत उलझा हुआ है पर इतना तो साफ हो गया है कि पत्रकारों की यूनियनों को ये तो लगने लगा है कि अब पत्रकारिता को बचाने का वक्त आ गया है, वैसे काफी देर से उनकी भी नींद खुली फिर भी कहा जा सकता है कि ‘‘जब जागो तभी सबेरा.’’ इस वक्त देश में बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिन्हें बचाने की जरूरत है. ‘‘ईमानदारी’’ बचाने की जरूरत है, देश की सीमाओं को दुश्मनों से बचाने की आवश्यकता है, लुटेरे-भ्रष्ट नेताओं से लोकतंत्र को बचाने की जरूरत है, पेड़ों को, बाघो को, पानी को, जंगलों को, पहाडियों को, बच्चियों को, नर्मदा को, गंगा को, सबको बचाने की जरूरत है तो ऐसे में पत्रकारिता कैसे अछूती रह सकती है, सो इसे भी बचाने की जरूरत आन पड़ी है, लेकिन इसे बचायेगा कौन?
अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों की इतनी हैसियत तो बची नहीं है कि वे पत्रकारिता को बचाने में सक्षम हों, वे अब पत्रकार कम ‘‘क्लर्क’’ ज्यादा हो चुके हैं. पत्रकारिता कैसी करनी है, खबर कैसे बनाना है, उसमें किस को बचाना है, किसकी बखिया उधेड़ना है, ये पत्रकार नहीं बल्कि अखबार का मालिक तय करता है. किस नेता से कितना माल मिला है उस आधार पर उसका कवरेज करना होता है. ‘‘पेड न्यूज’’ हर बड़े-छोटे अखबार का खुला धंधा है, जिसे रोक पाना किसी पत्रकार के बस की बात तो नहीं है, इसलिये पत्रकारों और मीडिया में नौकरी कर रहे लोगों से तो पत्रकारिता बचाने की उम्मीद करना ही व्यर्थ है, पर इसमें उनका दोष नही उनकी मजबूरी है, अपना और अपने परिवार का पेट पालने की मजबूरी. अगर मलिक के खिलाफ आवाज उठाई तो दूसरे की पल नौकरी से बाहर. ऐसी कठिन परिस्थिति में कौन सा ऐसा ‘‘शूरवीर’’ है जो इतनी रिस्क मोल ले.
अब आता है नंबर अखबार के मालिकों का, उनसे पत्रकारिता को बचाने की उम्मीद करना तो अपने आप को भुलावे में रखने जैसी बात है, जो व्यक्ति करोड़ों रूपये लगाकर अखबार चला रहा है उसके पास ये धन कहां से आता है, जिसे लाखों रूपये महीने का घाटा होता हो, करोड़ों रूपये फूंक कर और लाखों रूपये महीने को घाटा उठाकर कोई समाज सेवा करे, इसकी तो आशा करना ही करना बेमानी होगा. जाहिर है कि उसके कई और धंधे होंगे और उन धंधों के आवरण के लिये उसने पत्रकारिता का दामन थामा होगा. अब उससे कैसे उम्मीद की जाये कि वो स्वच्छ, स्वस्थ और ईमानदार पत्रकारिता को प्रश्रय देगा. जो राजनेताओं-अफसरों की लूट में खुद हिस्सा चाहता हो, वो पत्रकारिता के मूलस्वरूप यानी मिशन को वापस लाने की पहल करेगा ऐसा कैसे संभव हो सकता है, जहां तक सरकारें और राजनेताओं की बात है तो जब उन्हें देश को खुलेआम लूटने में उन्हें कोई गुरेज नही है तो वे क्यों चाहेंगे कि पत्रकारिता में साफ सुथरापन आये, यदि पत्रकारिता साफ हो गई, एक मिशन की तरह काम करने लगी तो उनकी ‘‘धोती खुलने’’ में ज्यादा देर नहीं लगेगी. यह बात अलग है कि अभी भी बीच-बीच में न्यूज चैनल राजनेताओं की चड्ढी उतारने में सफल हो जाते हैं, पर इसके पीछे भी कहीं न कहीं उनका अपना स्वार्थ जुड़ा होता है. किसी नेता की बखिया उधाड़ने के पीछे उसके प्रतिद्वंद्वी का हाथ भी होता है और वो इसके लिये मीडिया का सहारा लेता है और मीडिया उसका साथ दे भी देता है.
अब आता है पाठक और दर्शक. यद्यपि इनका पत्रकारिता में कोई सीधा रोल नही होता पर ये सबसे बड़ी ताकत साबित हो सकते हैं पत्रकारिता को बचाने के लिये. जैसे लोकतंत्र में जनता बहुत बड़ी ताकत है वैसे ही पत्रकारिता में पाठकों और दर्शकों की अपनी अहमियत है, यदि पाठक तय कर ले कि उन्हें ऐसे अखबार नहीं पढ़ने हैं जो पत्रकारिता की आड़ में अपने धंधों को ‘‘सेफ’’ कर रहे हैं, जो किसी के हाथों का खिलौना बने हुये हैं, जो समाज और देश के हित की बजाय अपने हितों का संवर्धन कर रहे हैं तो उन अखबारों और उनके मालिकों को सोचने के लिये मजबूर होना पड़ेगा, क्योंकि अखबार तो पाठकों के ही बल पर चलते हैं. ऐसी ही स्थिति यदि न्यूज चैनलों के दर्शक भी पैदा कर दें कि वे ऐसे चैनलों को देखेंगे ही नहीं जो पत्रकारिता के मापदंडो का उल्लघंन करते हैं, जिस दिन दर्शक उसे देखना बंद कर देंगे उसकी ‘‘टीआरपी’’ अर्श से फर्श पर आ जायेगी और जिस दिन टीआरपी नीचे आ जायेगी चैनलों के मालिकों की बोलती बंद होने में देर नही लगेगी. दिल्ली जर्नलिस्ट यूनियन को मेरे विचार से तो मीडिया कर्मियों की बजाय ‘‘पाठक जागरूकता अभियान’’ चलाना चाहिये, क्योंकि अब वे ही पत्रकारिता को बचा सकते हैं और कोई नहीं!
लेखक चैतन्य भट्ट जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे कई अखबारों में संपादक रहे हैं.












Sadashiv Tripathi
November 16, 2010 at 11:40 am
Very very thanks Chaitnyaji !!
मदन कुमार तिवारी
November 17, 2010 at 5:53 am
चैतन्य जी पत्रकारिता को वैसा खतरा नही है जैसा हम और आप जैसे लोग समझ रहे हैं । हां यह सत्य है कि पत्रकारिता के स्तर में गिरावट आई है। कारण है पत्रकारों का शोषण . ईलेक्ट्रोनिक चैनलों को मुफ़्त में रिपोर्टर चाहिये । अब रिपोर्टर क्या करेगा । वह ब्लैक मेलिंग का धंधा शुरु कर देता है। जरुरत हुई तो थाना या अधिकारियों की दलाली भी । पाठक को जागरुक बनाने के बजाय । समाचार पत्रों के लिये नियम की जरुरत है और वकालत की तर्ज पें पत्रकारों की समय -समय पर परीक्षा होनी चाहिये । सिर्फ़ पत्रकारिता का कोर्स कर लेना काफ़ी नही है। ईस वर्ष से यह व्यवस्था लागु की गई है कि कोई भी नया वकिल अपना निबंधन तो करा सकता है लेकिन प्रेक्टिस के लिये उसे एक परीक्षा देनी होगी । दिसम्बर से यह शुरु हो रहा है । आप देखेंगें साल दो साल के अंदर वकिलों की क्वालिटी में सुधार नजर आयेगा। वैसे अंतिम निर्णय तो पाठक का हीं होता है।