एनडीटीवी पर बरखा दत्त ने संपादकों के सवालों के जवाब देते हुए अपनी पोजीशन स्पष्ट की तो हेडलाइंस टुडे पर प्रभु चावला और वीर सांघवी प्रकट हुए और एमजे अकबर, एन राम, दिलीप चेरियन समेत कई संपादकों के सवालों के बहाने अपनी बात रखी. बातचीत ज्यादातर मीडिया एथिक्स पर केंद्रित रही और विषय भी यही रखा गया था. बड़े मीडिया हाउसों अपनी ब्रांड इमेज खराब होते देख आरोपियों को शो में बिठाकर बातचीत करके डैमेज कंट्रोल करने में लगे हैं. सारा कुछ तमाशा सरीखा हो चुका है. कायदे से इस पूरे प्रकरण की जांच किसी निष्पक्ष एजेंसी, पैनल या टीम को करना चाहिए लेकिन मीडिया हाउस खुद अपने यहां पंचायत करके मामले को निपटाने में जुट गए हैं. संदेश ये कि देखिए, हम लोग इस गंभीर मुद्दे पर चिंतित हैं और आरोपियों से बातचीत के अंदाज में पूछताछ कर रहे हैं.
बरखा दत्त एनडीटीवी पर लगातार सक्रिय हैं और ग्रुप एडिटर की भूमिका निभा रही हैं. प्रभु चावला अपने ग्रुप के साथ जुड़े हुए हैं. वीर सांघवी भी जस के तस हैं, बस उनका केवल एक कालम बंद हुआ है. कहीं कुछ होता जाता दिख नहीं रहा है. सुप्रीम कोर्ट भले कहे कि ये टेप दिमाग हिलाने वाले हैं लेकिन कारपोरेट मीडिया का दिमाग बिलकुल नहीं हिला है और उसे अपने रास्ते पता हैं. ये रास्ते मुनाफा कमाने वाले हैं और मुनाफा कमाने के लिए जरूरी है कि वे नीरा राडियाओं, टाटाओं, अंबानियों से संपर्क साधे रहें. इस काम में जाहिर है, वे अपने आइकन, ब्रांड एंबेसडर व हाउस के चेहरे को लगाते हैं जो आसानी से इनसे ताल्लुकात बनाने, मेंटेन करने व लाभ लेने-दिलाने में सफल रहते हैं. पेड न्यूज के इस दौर में नीरा राडियाओं से संपर्क रखना और उनको ओबलाइज करना व होना भी पेड न्यूज से कमतर अपराध नहीं है. बल्कि कहें कि यह ज्यादा बड़ा अपराध है क्योंकि इसके जरिए मीडिया जनता से दूर, कारपोरेट व सत्ता की गोद में जा बैठता है.
लाइव शो और अनएडिटेड शो के जरिए जिस तमाशे को जनता के सामने पेश किया जा रहा है, उससे मीडिया की विश्वसनीयता और ज्यादा घटी है क्योंकि हाल-फिलहाल जो सर्वे हो रहे हैं वे सब यही बताते हैं कि जनता पत्रकारों को फिक्सर यानी दलाल मानने लगी है. मतलब, जनता का भरोसा पत्रकारों पर नहीं है. ये नीरा राडियाएं हर प्रदेश और जिले में हैं, अलग-अलग नाम और शक्ल में. ये प्रभु चावला, वीर सांघवी, बरखा दत्त आदि हर प्रदेश व जिले में हैं, अलग-अलग नामों व शक्लों में. इस बार बस हुआ यह है कि मीडिया की सबसे बड़ी मछलियों का खेल सामने आया है. रही बात करप्शन की तो आजकल करप्शन का तरीका भी बदल गया है. बैंकाक या सिंगापुर में 99 साल की लीज पर किसी दूसरे के नाम के फ्लैट की चाभी आपको दे दी जाए तो भारतीय कानून के लिहाज से यह कहां करप्शन होता है. स्विस बैंक में पैसे जमा हो जाएं तो यह कहां करप्शन साबित होता है. ये ऐसे करप्शन होते हैं जिनके प्रमाण नहीं होते. लेकिन सौ पचास रुपये लेने वाला पत्रकार जब पकड़ा जाता है तो उसे सबसे बड़ा भ्रष्ट बताकर उस पर थू थू की जाती है.
आइए, हेडलाइंस टुडे पर हुई पंचायत के वीडियो देखें. क्लिक करें- हेडलाइंस टुडे पर संपादकों की पंचायत












युवा पत्रकार की पीड़ा
December 2, 2010 at 2:34 am
सब कुछ नाटक है…………पत्रकार अपना काला चेहरा छुपाने के लिए नाटक कर रहे हैं. कोई अनएडिटेड रेकॉर्डिंग तो कोई लाइव पंचायत बैठाकर अपने को पाक-साफ साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. मेरा सवाल यह है की इतने बड़े चेहरे अपने हिंदी न्यूज़ चैनेल पर क्यों नहीं आ रहे हैं. जबकि इनकी टीआरपी ज्यादा है और देश का आम से गरीब हर तबका इससे जुड़ा हुआ है. अंग्रेजी चैनेल पर बैठकर यह लोग किसे समझाने की कोशिश कर रहे हैं??? नीरा राडिया जैसे दलालों को, टाटा और रिलायंस जैसे उद्योगपतियों को या फिर देश के बड़े-बड़े राजनेताओं को जो देश के गरीबों से ज्यादा अमीरों के फिक्रमंद हैं. अगर इतनी ही शर्मिंदगी महसूस हो रही है और आप अपना पक्ष रखना चाहते हैं तो देश का वह मिडियाचुनिये जो भारत के हर तबके तक पहुँच सके. अपने चैनेल पर गरीबी, बदहाली, भ्रष्टाचार पर बड़े – बड़े प्रवचन गढने वाले पत्रकार कितने गुणवान हैं यह देश की जनता को पता चल गया है. आरोपी पत्रकार इस तरह की पंचायत बैठकर सोच रहे होंगे…….”हिंग लगे ना फिटकरी और रंग चोखा”
रवीश से पूछने वाला
December 2, 2010 at 5:56 am
रवीश बाबू कहां गुम हैं ? दूसरे चैनलों के संपादकों को उनके धत्तकर्म की याद दिलाते रहने वाले रवीश कुमार अपने चैनल के संपादक के मामले में मौन क्यों हैं ? जब अपने घर में दलाली का भांडाफोड़ हुआ तो चुप क्यों हो गए ? कैसे यकीन करें कि बरखा दत्त एनडीटीवी के लिए सत्ता प्रतिष्ठान से फायदे नहीं उठाती होंगी ? एनडीटीवी अगर ईमानदार है तो क्यों नहीं बरखा के खिलाफ कार्रवाई करता है ? नेताओं -नौकरशाहों से नैतिक आधार पर इस्तीफे मांगने की मुहिम चलाने वाले चैनल , पत्रकार आज अपनी चमड़ी बचाने के लिए झूठे तर्क क्यों गढ़ रहे हैं और उन्हें बख्शा क्यों जा रहा है ? रवीश कुमार अगर इतने ही नैतिकतावादी हैं तो एनडीटीवी की राजकुमारी ने जो कुछ किया है , उस पर मुंह खोलें या फिर कहें कि सुविधावादी पत्रकारिता में अपने संस्थान के पक्ष में खड़ा होना उनकी मजबूरी है । रवीश कहें कि जैसे एक घर डायन भी छोड़कर चलती है , वैसे ही अपना घर छोड़कर दूसरों के घरों पर ही पत्थर मारने में उन्हें मजा आता है । अपनी नौकरी चलती रहे तभी तो दूसरे चैनलों पर लिखते रहेंगे। आज एनडीटीवी के सारे नौतिकतावादी और पत्रकारिता के झंडावरदार कहां छिपे हैं ? किस मुंह से अब तक बाकी दुनिया को आईना दिखाते रहे हैं । जब अपना चेहरा दिखा तो आईना उलट कर कंबल में घुस गए कि कोई चेहरा न देखे , कोई सवाल न करे । निकलो भाई , बाहर निकलो । हिम्मत दिखाओ । वरना कभी किसी और पर ऊंगली उठाने लायक नहीं रहोगे रवीश ….।
बरखा दत्त का असली चेहरा तो अब हम सब के सामने उजागर हो गया है । जिस चेहरे को एनडीटीवी अपना चेहरा बता कर एक दशक से दर्शकों के साथ छल कर रहा था , उस चेहरे मे इतने दाग नजर आए हैं कि अब टीवी पर नौतिकता की दुहाई देने वाले चेहरों से भरोसा उठ गया है । साफ सुथरी छवि वाला एनडीटीवी अब तक बरखा के खिलाफ कार्रवाई करने के बदले उन्हें प्लेटफार्म देकर सफाई देने का मौका दे रहा है , जाहिर एनडीटीवी की नजर में बरखा गुनहगार नहीं है । होंगी भी नहीं क्योंकि इसी बरखा दत्त ने एनडीटीवी के भी खूब लांबिग की होगी । एनडीटीवी में बरखा जैसे कई और चेहरे हैं , जो नेताओं और दलालों से दिन रात संपर्क में रहते हैं और पत्रकारिता की मां-बहन करते हुए नौतिक बने रहते हैं ।
रवीश कुमार देश भर में घूम -घूम कर रवीश की रिपोर्ट तैयार करते हैं तो लोग तो उनसे पूछते ही होंगे कि बरखा ने पत्रकारिता के साथ …..क्यों किया । क्या जवाब देते हैं रवीश कुमार , कम से कम यही हमें बता दें ।
रवीश कुमार अब तक मीडिया के मुद्दे पर बहुत मुखर रहे हैं । अब बोलती बंद है । बोलिए …हुजूर कुछ तो बोलिए …। एनडीटीवी की महादेवी ने राडिया छाप पत्रकारिता करके जो मिसाल कायम की है , उसके बारे में कुछ क्यों नहीं बोलते । ब्लॉग पर कुछ क्यों नहीं लिखते । एनडीटीवी के उन सभी पत्रकारों को घेर -घेर कर यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि बरखा को क्या अब भी साफ -सुथरी छवि वाली पत्रकार मानते हैं …। नहीं मानते हैं तो क्या बरखा के मामले में बोलने की हिम्मत नहीं है क्योंकि सवाल लाखों की मोटी पगार का है । यही अगर किसी दूसरे चैनल के पत्रकार ने किया होता और एनडीटीवी वाले नहीं फंसे होते तो गला फाड़ कर सब चिल्ला रहे होते …। रवीश कुमार ब्लॉग पर लेख पेल चुके होते । पंकज पचौरी हमलोग में सवाल खड़े करते । बिग फाईट से लेकर विनोद दुआ लाईव हर जगह मीडिया के गिरते स्तर पर नौतिक स्टैंड ले रहे होते । अब सब चुप हैं । विनोद दुआ क्यों नहीं बोल रहे हैं । विनोद दुआ लाइव में नेताओं के मुद्दे पर तो विनोद बहुत मुखर होते हैं , बरखा के मुद्दे पर क्या सोच रहे हैं …।
joseph
December 2, 2010 at 3:08 pm
ye hamare loktantra ka asli chehra hai..loktantra ka koi stambh ise mazboot nahin kar raha balki khokhla hee kar raha hai. hammam mein sabhi nange hain…
amitabh
December 3, 2010 at 4:42 am
यह संपादको का खाप पंचायत है !;D
govind goyal sriganganagar
December 3, 2010 at 1:30 pm
ha…ha…ha….ha……..ha…….ha……..ha………ha…ha…ha…ha….ha……..ha…….ha……..ha………ha…ha…ha…ha….ha……..ha…….ha……..ha………ha…ha…ha…ha….ha……..ha…….ha……..ha………ha…ha…ha…ha….ha……..ha…….ha……..ha………ha…ha…ha…ha….ha……..ha…….ha……..ha………ha…ha…ha…ha….ha……..ha…….ha……..ha………ha…or lagatar aisa hee ravan marka atthas.