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मीडिया हुई लापतागंज

[caption id="attachment_18823" align="alignleft" width="83"]अमिताभ ठाकुरअमिताभ ठाकुर[/caption]शरद जोशी तो आज से लगभग बीस साल पहले सन 1991 में दुनिया से विदा हो गए और खुद बच गए पर वे अपने पीछे इतना कुछ बवाल छोड़ गए हैं जिन्हें हम सबों को झेलना पड़ रहा है. जी हाँ, आप खुद देखिये कि आज से बीस साल पहले की दुनिया और आज की दुनिया में कितना अंतर आ गया है- उस हद तक जिसे शायद शरद जोशी जैसा युग-द्रष्टा भी पूरी तरह नहीं देख पाया होगा. वैसे तो इस बवाल में शरद जोशी का भी कोई कम हाथ नहीं रहा है जिन्होंने अपनी लेखनी से देश, समाज, तंत्र और व्यवस्था की कई सारी ऐसी परतें खोल कर सामने रख दी हैं जो पहले दबी-छिपी होने के नाते अन्दर-खाने ही बजबजाती रहती थीं, नज़र नहीं आती थीं, लेकिन उन्होंने अपनी कलम की तीखी धार और सोच की गहराईयों से उन परतों को साफ़ करते हुए सबों के सामने कर दिया.

अमिताभ ठाकुर

अमिताभ ठाकुर

शरद जोशी तो आज से लगभग बीस साल पहले सन 1991 में दुनिया से विदा हो गए और खुद बच गए पर वे अपने पीछे इतना कुछ बवाल छोड़ गए हैं जिन्हें हम सबों को झेलना पड़ रहा है. जी हाँ, आप खुद देखिये कि आज से बीस साल पहले की दुनिया और आज की दुनिया में कितना अंतर आ गया है- उस हद तक जिसे शायद शरद जोशी जैसा युग-द्रष्टा भी पूरी तरह नहीं देख पाया होगा. वैसे तो इस बवाल में शरद जोशी का भी कोई कम हाथ नहीं रहा है जिन्होंने अपनी लेखनी से देश, समाज, तंत्र और व्यवस्था की कई सारी ऐसी परतें खोल कर सामने रख दी हैं जो पहले दबी-छिपी होने के नाते अन्दर-खाने ही बजबजाती रहती थीं, नज़र नहीं आती थीं, लेकिन उन्होंने अपनी कलम की तीखी धार और सोच की गहराईयों से उन परतों को साफ़ करते हुए सबों के सामने कर दिया.

उनकी लेखनी का एक कमाल लापतागंज के रूप में इन दिनों सब टीवी पर नज़र आ रहा है जिसमे कई विषयों पर हास्य और व्यंग्य के माध्यम से गंभीर प्रहार किये जाते हैं. इधर दो-तीन दिनों से जिस विषय-वस्तु पर यह धारावाहिक केन्द्रित है वह है मीडिया, वही मीडिया जो इन दिनों नीरा राडिया प्रकरण में कई सारे नामचीन और लम्बे हाथ-पाँव वाले पत्रकारों के ऊपर कीचड उछलने के बाद से खुद ही एक प्रकार से कटघरे में खडा है. लेकिन शायद इस मीडिया में, ख़ास कर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में कुछ ना कुछ गंभीर खामी तो जरूर है तभी तो ताबड़-तोड़ कई साहित्यिक और सिनेमाई कृतियों में इलेक्ट्रोनिक मीडिया को लगभग एक विलेन के तौर पर पेश किया जा रहा है.

मुझे याद आ जाती  है शाहरुख़ खान और जूही चावला की वह फिल्म ‘फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी’ जो बॉक्स ऑफिस पर सफल तो नहीं हो पायी थी पर निश्चित रूप से अपने समय से आगे थी जिसमे इलेक्ट्रोनिक मीडिया के भूखे और स्व-केन्द्रित आचरण को बड़ी सच्चाई के साथ प्रतिबिंबित किया गया था. एक दूसरे चर्चित उदाहरण के तौर पर पीपली लाइव तो आप सभी के सामने है ही. इस समय लापतागंज सीरियल में लगभग पीपली लाइव की ही कहानी को कुछ हास्य के पुट के साथ पेश किया जा रहा है जिसमे सुत्तीलाल नाम के एक हलवाई के दुकान के उजाड़े जाने के सरकारी प्रयासों के विरोध में स्वयं एक सरकारी अधिकारी उन लोगों को भूख-हड़ताल पर जाने की राय देती हैं. उनके शब्द हैं- “मीडिया क्या नहीं कर सकता.”

गाँव के लोग इस बात में आ जाते हैं और सुत्तीलाल अपनी दुकान बचने  के चक्कर में भूख हड़ताल पर बैठ जाता है. फिर वहां “परसों से परसों तक” नामक चैनेल का एक पत्रकार दीपक आता है और जब सुत्तीलाल यह कहता है कि यदि मेरी दुकान गिरा दी गयी तो मैं भूखों मार जाउंगा (यानि कि उसके पास खाने को भी नहीं रहेगा) तो दीपक भाई उसे तुरंत यह रूप दे देते हैं कि सुत्तिलाल ने मरने की घोषणा कर दी है. इसके बाद तमाम तरह की नौटंकियां होती जाती हैं जिनमे अधिकतर पीपली लाइव की नक़ल देखने को मिल जाती है. पर जहां उस फिल्म में ज्यादातर घटनाक्रम ही दिखाए गए हैं और अपनी ओर से उन पर टिप्पणियाँ नहीं के बराबर हैं, इस सीरियल में कई बार डायलोग के जरिये मीडिया के इस तरीके, उसकी सोच, उसके गलत प्रयासों और उसकी हानियों को भी सामने लाया गया है.

सीरियल में कई ऐसे डायलोग हैं जो मीडिया की ताकत के बारे में बयान करते हैं, बल्कि कहा जाने तो बखान और महिमामंडन करते हैं. कई बार तो ये इतने ज्यादा सच के करीब नज़र आते हैं कि यह सोचने को मजबूर कर देते हैं कि कहीं भस्मासुर की तरह मानव ने भी तो यह ऐसा यंत्र नहीं बना के रख दिया जो जिसके हाथ में चला गया वह अपने आप को खुदा समझने लगे और उसका इस तरह मन-मर्जी से उपयोग करे जिससे राम का रावण और रावण का राम बनने में एक पल का भी समय ना लगे. मैंने बहुत पहले पढ़ा था कि नेपोलियन का कहना था कि मैं किसी फौज की ताकत से उतना नहीं डरता जितना कलम की ताकत से. शुक्र है कि नेपोलियन इलेक्ट्रोनिक मीडिया के आने के बहुत पहले गुज़र गए नहीं तो पता नहीं उन्हें किस विद्रूप स्वरुप में किस प्रकार से पेश कर दिया जाता जिससे उनकी विश्व-विजेता बनाने की सारी हेकड़ी एक बार में ही निकल गयी होती.

परसों मैं एक और फिल्म देख रहा था- “पा”, जो मूल रूप से तो गंभीर रूप से बीमार एक बच्चे की कहानी है पर जिसमे उपकथा के रूप में मीडिया की ताक़त, उसके खेल और उनकी जिम्मेदारियों के ऊपर भी चर्चा हुई है. अभिषेक बच्चन ने युवा नेता के अपने किरदार में तमाम मीडिया वालों को सीख देने के साथ-साथ उनकी जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व  के विषय में भी एक लंबा किन्तु गंभीर, उपयोगी और सारगर्भित आख्यान दिया है जो मेरी दृष्टि में सच से बहुत करीब है. जी हाँ, ताकत के साथ जिम्मेदारी का एहसास बहुत जरूरी है- लगभग चोली-दामन के साथ की तरह. ऐसा नहीं होने पर कई बार चोली अलग हो जाती है और दामन अलग. फिर तो जो बचता है उस पर निरंतर प्रश्न-चिन्ह लगा ही रहता है

लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अफसर हैं. इन दिनों आईआईएम, लखनऊ के विद्यार्थी हैं.
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0 Comments

  1. skand shukla

    December 9, 2010 at 10:45 am

    lagatar aappake lekhon ne tahalka macha rakha hai sir aage bhee chalata rahe

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