: अर्श से फर्श पर पहुंचा अखबार : एक दौर में अखबार जगत में अपनी अनोखी पहचान रखने वाला आजादी की पहली किरण का साक्षी चर्चित अखबार स्वतंत्र भारत अपने वित्तीय परेशानियों के चलते अब बेहद संकट के दौर में है। जनवरी के प्रथम सप्ताह में पिकप द्वारा रोटरी मशीन की भी नीलामी की चर्चा है। कुल मिलाकर अब देखना यह है कि आजादी का साक्षी स्वतंत्र भारत अखबार अपने सुधी पाठकों के बीच अपनी पहचान बनाये रख पाता है या नहीं।
वर्तमान के परिदृश्य को देखते हुए तो फिलहाल इस अखबार की नैया डूबती ही नजर आ रही है। यह बात दीगर है कि कोई हाथ सहारा बन जाये और डूबती नाव को किनारा मिल जाये। राजे-रजवाड़ों से पल-पुसकर पला-बढ़ा और लम्बे समय तक धमाल करने वाला यह अखबार अब अंतिम सांसे ले रहा है। अर्श से फर्श पर आ पहुंचे इस अखबार के अभी भी बहुत से सुधी पाठक ऐसे हैं जो कि चाहते हैं कि यह अखबार बंद न होने पाये।
स्थिति यह है कि राजधानी लखनऊ से संचालित हो रहे इस अखबार को अब अपने कर्मचारियों को मानदेय व वेतन देने के भी लाले पड़ गए हैं। करीब तीन-चार महीनों से अखबार में कार्यरत करीब आठ दर्जन से अधिक कर्मचारी परेशानी का सामना कर रहे हैं। गुल हुई बत्ती तो किसी तरह रोशन कर ली गई है पर आगे बड़ा संकट मुंह बाये खड़ा है। पिकअप द्वारा मशीन की नीलामी आगामी 3 जनवरी को किये जाने की चर्चा है। बताते चले कि एक दौर ऐसा था कि राजधानी लखनऊ के पीकप्लेस 20 विधान सभा मार्ग पर स्वतंत्र भारत व पायनियर जब राजाराम जयपुरिया ‘पायनियर ग्रुप लिमिटेड’ के हाथ था तो पायनियर अखबार के शताब्दी समारोह में न केवल भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राधा कृष्णन उपस्थित थे बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय
लालबहादुर शास्त्री भी कार्यक्रम में सम्मिलित हुये। यह दौर ऐसा था कि स्वतंत्र भारत न केवल प्रसार के मामले में अन्य अखबारों से आगे था बल्कि इस अखबार की खासी हनक भी कायम थी।
स्वतंत्र भारत का यह चमत्कारी दौर भी जयपुरिया के स्वामित्व दौर में ही आया था। यही नहीं इस अखबार का भारत सरकार द्वारा स्वतन्त्र भारत नाम देते हुये डाक टिकट भी जारी किया गया था, जो कि उत्तर-भारत में अखबार जगत के लिए एक अनोखी मिसाल बनी थी। लेकिन विडम्बना देखिये इस अखबार के चरम पर पहुंचते ही कर्मचारियों की आये दिन हड़तालें और यूनियनबाजी शुरू हो गई, जिससे तंग आये राजाराम जयपुरिया ने 1990-91 में यह अखबार देश के प्रमुख उद्योगपति ललित मोहन थापर के हाथों बेच दिया। कर्मचारियों के मनमाना रवैया के चलते लगातार घाटे में जा रहे अखबार को थापर ग्रुप बहुत लम्बे समय तक नहीं चला सका। आखिर में थापर ग्रुप ने स्वतंत्र भारत का टाइटल एग्रो पेपर मिल के स्वामी केके श्रीवास्तव को 1996 में बेच दिया तथा पायनियर अखबार को भी थोड़े दिनों बाद ही पायनियर के तत्कालीन संम्पादक चन्दन मित्रा के हाथों बेच दिया।
स्वतंत्र भारत जब केके श्रीवास्तव के पास आया तो प्रथम संम्पादक के रूप में घनश्याम पंकज, जो कि इस अखबार से पहले से ही जुड़े थे, ने स्थानीय संपादक की भूमिका निर्वाह की। उनके बाद
अनूप श्रीवास्तव एवं नंद किशोर श्रीवास्तव स्थानीय संम्पादक हुए। बाद में माधवकान्त मिश्र ने भी संम्पादन किया। इनके बाद प्रमोद जोशी और नवीन जोशी ने भी इस अखबार का संम्पादन किया। उस समय भी एक बार फिर ऐसा दौर आया कि कर्मचारियों को मानदेय व वेतन के लाले पड़ने शुरू हुए अंतत: कर्मचारियों ने जब हंगामा काटा तो अखबार बंद होने के कगार पर आ गया और बंद भी हो गया। कुछ कर्मचारी न्यायालय की शरण में जा पहुंचे। करीब छह महीने बाद अखबार लाकआउट हुआ। इस बार अखबार जगत से नहीं बल्कि जनमानस में नेता व ठेकेदार की पहचान बनाये अरविन्द सिंह को इस अखबार का स्थानीय संम्पादक बनाया गया, लेकिन उनके निरन्तर प्रयासों में कामयाबी झलकना शुरू हुआ और अखबार ने किसी तरह दुबारा मार्केट बनाना शुरू कर दिया।
श्री सिंह ने जहां कर्मचारियों को रौब में लिया वहीं बड़ों की शाहखर्ची पर भी रोक लगाई। परिणामस्वरूप अखबार चल पड़ा। जनवरी 2009 में खतरनाक बीमारी के चलते श्री सिंह का देहान्त हो गया। सच तो यह है कि उनके निधन के बाद से ही माडिया गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी थी कि अब फिर इस अखबार की उल्टी गिनती शुरू होगी, हुआ भी वैसा ही। केके श्रीवास्तव के रिश्तेदार संजय श्रीवास्तव ने जिम्मेदारी संभाली किन्तु अखबार को मजबूती देने में असफल रहे। वित्तीय संकट दिन-ब-दिन बढ़ता रहा। यहां तक की रोटरी मशीन जिससे कि अखबार छप रहा था वो भी नीलामी पर लग गयी। सूत्रों का मानना है कि वित्तीय अनियमितताओं के चलते ही ऐसी स्थित बनी।
लेखक रिजवान चंचल रेड फाइल के संपादक और जनजागरण मीडिया मंच के महासचिव हैं.












narayan pargain
December 25, 2010 at 8:22 am
dukh ki kabar hai ki machine nilam ho rahi hai ….. imadari sai paper chal panaa kafi khatin hai .koshis ho ki machine nilam na ho
vivek verma reporter
December 25, 2010 at 10:44 am
yanha ki machine itni zyada ghis chuki hain k kharidna to dur koi free mein bhi nahi lega.bhala kaun bhukha hathi palega. main bhi kuch din mein yanha se vida le lunga
vivek verma.
December 25, 2010 at 10:53 am
sawtanra bahrat ki itni dayniye sthiti dekhne k baad main to chod k ja hi raha ho wanh k or employers se kahunga k wo bhi kanhi na kanhi vyavastha bana le.jisse pet to chalta rahe sabka maliko ka kya ye to kuch na kuch kar hi rahe hai
x-editar
December 25, 2010 at 2:36 pm
ye kaise dheeth patrakar hai itani badnami k bad bhi nahi bhag rahe hai.
x-reporter
December 25, 2010 at 2:40 pm
are swatantra bharat k patrakaro, bibhago me sabhi ko maloom hai ki tum log DALAL ho. sharm karo aur bhago.
deepakdevmishra photojournalist...
December 26, 2010 at 5:09 pm
is me kisi ka dosh nahi hai …. sab kuch wakt dikahata hai aur wakt se balwaan kuch bhi nahi hai… so said…