नीरा यादव को भ्रष्टाचार के आरोप में चार साल की सजा हो गई। यह देर से उठाया गया एक सही कदम है। यह नौकरशाहों के लिए एक सबक भी है। जिस ताकत का इस देश के नौकरशाह गलत इस्तेमाल करते रहे हैं, वही ताकत अब उनके लिए जी का जंजाल भी बनती जा रही है। यह देश के लिए बहुत शुभ सन्देश है। इस सिलसिले को लगातार आगे बढऩा भी चहिए। नौकरशाहों को समझ में आना ही चहिए कि वो लोगों की सेवा करने के लिए ही इस नौकरी में रखे गए हैं न कि हुकूमत करने के लिए। लोकतंत्र को जिन्दा रखने के लिए यह बेहद जरुरी है कि अफसर ईमानदारी से काम करें। दु:ख की बात यह है कि यह भावना लगातार कम होती जा रही है।
नीरा यादव कोई मामूली अफसर नहीं थीं। सत्ता के गलियारों में उनकी तूती बोलती थी। यह तूती उनकी ईमानदारी या उनके सख्त रवैये के कारण बोलती हो, ऐसा नहीं था। यह उनके उस आचरण के कारण बोलती थी, जो राजनेताओं को बेहद भाता है। यह आचरण भ्रष्टाचार का था। नीरा इस खेल की माहिर खिलाड़ी थीं। इसीलिए सत्ता कोई भी रही हो उनके रुतबे पर कभी कोई फर्क नहीं पड़ा। नीरा की धमक शासन में हर सरकार में एक ही तरह की कायम रही। तब भी नहीं जब उनकी अपनी आईएएस एसोसिएशन ने उन्हें सबसे तीन महाभ्रष्ट अफसरों में से एक चुना। उन पर तो कोई फर्क नहीं पड़ा, मगर इस मुहीम की शुरुआत करने वाले विजय शंकर पाण्डेय के खिलाफ कई जांचें शुरू कर दी गईं।
अगर कोई और अफसर होता तो महाभ्रष्ट चुने जाने के बाद तो कम से कम शर्मिंदा होता, मगर नीरा ने फिर अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया और समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह ने उन्हें अपने शासन काल में प्रदेश के सबसे बड़े पद मुख्य सचिव की कुर्सी दे दी। पत्रकार शरद प्रधान ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। जिसके बाद न्यायालय की कड़ी फटकार के बाद नीरा को इस पद से रुखसत होना पड़ा। मगर विजय शंकर पाण्डेय की तरह शरद प्रधान की मुसीबतें जरुर बढ़ गईं। मैंने खुद एक दर्जन से अधिक प्रेस काफ्रेंस में देखा है कि जब मुलायम सिंह ने सीधे शरद प्रधान का नाम ले कर उनका मजाक उड़ाने की कोशिश की। इस कोशिश के दौरान इसका विरोध करने की जगह मुझ समेत सभी पत्रकार खामोश रहे। यह नेताओं का वो आचरण है, जो नीरा जैसी भ्रष्ट अफसर को और नापाक काम करने की इजाजत देता है। सिर्फ मुलायम ही नहीं नीरा यादव बाकी सब नेताओं की भी इतनी ही करीबी रही हैं।
दरसअल, भ्रष्ट्राचार का खेल होता ही इतना बड़ा है कि सभी नेताओं को नीरा जैसी अफसर की दरकार होती है। सो ऐसे अफसरों की हनक हर पार्टी की सरकार में देखते ही बनती है। नैतिकता का दावा करने वाली बीजेपी ने नीरा के आईपीएस पति महेंद्र यादव को मंत्री बनाने में देर नहीं लगाई। उन्होंने भी अपनी पत्नी की तरह अपनी नौकरी के दौरान कई जांचों का सामना किया था। मगर अब तक अफसर यही सोचते रहते थे कि ऐसी जांचों से उनका कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। देश भर में न जाने ऐसी कितनी जांचें आज भी लम्बित पड़ी हुईं हैं। जिनका किसी भी तरह का परिणाम लोगों के सामने नहीं आया है। मगर नीरा की सजा ने अब उनके इस भ्रम को भी तोड़ा है। अब उन्हें भी लगने लगा है कि कानून का फंदा उन तक भी पहुंच सकता है। अब वो भी कानून की गिरफ्त से ज्यादा दिनों तक बच नहीं सकते हैं। एक न एक दिन कानून का शिकंजा उन पर भी कसेगा। यह वो बात है जो बहुत पहले नौकरशाहों को समझ आ जानी चहिए थी। मगर जब जागो तभी सबेरा। अगर अभी भी यह बात पूरी समझ में आ जाये तो इस देश का बहुत भला हो जायेगा।
आजादी के बाद से ही अफसरों का आचरण बनने की जगह लगातार बिगड़ता गया है। अंग्रेजों ने इस सर्विस की स्थापना इसलिए की थी कि वह भोले-भाले भारतीयों को यह समझा सकें कि वह सिर्फ नौकर हैं और देश में रहने वाले अन्य भारतीयों से पूरी तरह से अलग हैं। दु:ख की बात यह है कि आजादी के बाद से अब तक अफसर अंग्रेजों की बनाई हुई इस मानसिकता से उबर नहीं पाए हैं। उन्हें लगता है कि वह दूसरी दुनिया के वासी हैं। यह दुनिया और यहाँ के लोग उनके लायक नहीं हैं। अफसरों के इस रवैये ने उन्हें आम आदमी से खासा दूर कर दिया है। उन्हें न आम आदमी से मतलब बचा है न उसके सरोकारों से। उनकी अलग ही दुनिया है, जिसमे झांकने की इजाजत यह नौकरशाह किसी को नहीं देते हैं।
इस देश में नौकरशाहों ने बड़ी सफाई के साथ अपना तंत्र विकसित किया है। सारी बुराई नेताओं के सिर। सारे अच्छे काम अफसरशाही के हवाले। आम जनता आज तक यह मानती है कि इस देश में सबसे ज्यादा भ्रष्ट नेता ही होते हैं। यह वो सच है जो बहुत सफाई के साथ अफसरों ने इस देश के आम आदमी को समझाया है। हकीकत का इससे कोई वास्ता नहीं है। अगर अफसर न चाहें तो नेता कोई भी गलत काम नहीं कर सकता है। मगर अफसर खुद बहती गंगा में हाथ धोने को बेताब रहते हैं। लिहाजा चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर यह गन्दगी फैलती ही जा रही है। नेताओं के सामने तब भी हर पांच साल बाद खुद को सही साबित करने की परीक्षा देनी होती है। मगर अफसरों पर यह सब लागू नहीं होता है। उन्होंने एक बार परीक्षा पास कर ली फिर जिंदगी भर भ्रष्टाचार करने का मानो लाइसेंस मिल जाता है उन्हें।
इस देश के लोगों के सब्र की सीमा अब धीरे-धीरे खत्म हो रही है। उन्हें अफसरों की करोड़ों की कोठियों में भ्रष्टाचार की बू आने लगी है। आम लोगों को यह बात अच्छी तरह से समझ में आ गई है कि सिर्फ नेता ही नहीं ये नौकरशाह भी भ्रष्टाचार और दलाली के दलदल में आकण्ठ तक डूबे हैं। ये बात ऐसे अफसरों और नेताओं के लिए खतरे की घंटी है। अगर लोगों ने खुद न्याय करने की प्रक्रिया शुरू कर दी तो अफसरों को ऐसी मुसीबत का सामना करना पड़ जायेगा, जिसकी उन्होंने सपने में भी उम्मीद नहीं होगी। इसलिए अब भी समय है कि अफसरों को अपने आचरण में थोड़ा सुधार लाना होगा। वरना लोग हाथ में न्याय के लिए हथियार उठायेंगे और हम सोच रहे होंगे कि आखिर देश में नक्सलवाद क्यों बढ़ रहा है..!
लेखक संजय शर्मा लंबे समय से पत्रकारिता में हैं. वे लखनऊ से प्रकाशित ‘वीक एंड टाइम्स’ से संपादक हैं. आप इस लेख पर अपनी राय 9452095094 पर एसएमएस कर सकते हैं.












Hasan Zaidi
December 28, 2010 at 5:55 pm
Sanjay bhai aap ki lekhni ki to baat hi alag hai jo aap likh denge vo to bade se bada journalist bhi nahi likh payega. Is desh ko aap jaise hi tez tarraar patrkaro ki zaroorat hai.
Hasan Zaidi
The Times OF India LKo
Sadhvi Chidarpita
December 29, 2010 at 10:19 am
असल में तो नेताओं को भ्रष्टाचार के तरीके अफसर ही सिखाते हैं. काश, यह लेख नीरा राडिया को सज़ा होने के पहले आया होता तो लगता कि देश में कुछ पत्रकार हैं, जो दबाव में काम नहीं करते. खैर! बधाई एवं शुभकामना