: सर्वश्रेष्ठ प्रबंधक थे अतुल जी : “है मौत उसी की जिस पर करे जमाना अफसोस, यूं तो मरने के लिए सभी आया करते हैं।” संपादकीय और प्रबंधन के बीच की रार-तकरार और उनसे उपजने वाली दिक्कतों से तकरीबन सभी मीडियाकर्मी परिचित होते हैं। हिंदी पट्टी के प्रमुख अखबारों में इस तकरार को भलीभांति अनुभव किया जा सकता है। लेकिन अमर उजाला परिवार के लोगों में से अधिकांश को शायद ही इस रार-तकरार से कोई सरोकार हो। अमर उजाला में संपादकीय की सर्वोच्चता हमेशा रही है। प्रबंधन को कभी संपादकीय के आड़े नहीं आने दिया गया।
इसका प्रमुख कारण अमर उजाला के प्रबंध निदेशक श्री अतुल महेश्वरी की दूरदर्शिता थी। वे दूरगामी निर्णय लेते थे। उनमें कुशल प्रबंधन क्षमता थी। वे संपादकीय में प्रबंधन को कतई हस्तक्षेप नहीं करने देते थे। उनमें हर विभाग में संतुलन बनाने की बेहतर कला थी। शायद हिंदी के प्रमुख अखबारों मसलन दैनिक जागरण, भास्कर, हिंदुस्तान या अन्य को मेरी कही बात बुरी लग जाए लेकिन सत्य कटु ही होता है। अमर उजाला को देश के सर्वश्रेष्ठ तीन अखबारों में शुमार करने का श्रेय अतुल जी को ही जाता है। इसे पाने के लिए दूरदर्शिता और प्रबंधकीय कौशल को अमर उजाला से जुड़ा हर शख्स बहुत बेहतर ढंग से जानता और मानता है। लेकिन इसके अलावा भी सबसे बड़ी बात जो अन्य अखबारों की तुलना में अतुल जी को बहुत बड़ा, पूजनीय और आदर्श बनाती है वो है उनका सर्वश्रेष्ठ मानव संसाधन प्रबंधन कौशल और कर्मचारियों के हित में लिए जाने वाले निर्णय।
मैं यहां अन्य अखबारों को नीचा दिखाने की नहीं बल्कि उनके प्रबंधकों को स्वर्गीय श्री अतुल महेश्वरी जी से सबक लेने की कोशिश कर रहा हूं। वो भी यह कि ऊंचा उठने के दो रास्ते होते हैं पहला कि अपने साथ वाले लोगों को नीचे दबाकर फिर उन पर खड़ा होकर ऊंचा हुआ जाए, दूसरा अपने साथ वालों को इतना ऊंचा कर दिया जाए कि खुद का कद और ऊंचा हो जाए। पहला तरीका जागरण, भास्कर और हिंदुस्तान अपना रहे हैं। जबकि दूसरा तरीका स्वर्गीय अतुल जी ने बेहतर ढंग से अपनाया।
अपने कर्मचारियों को प्रमुख हिंदी अखबारों की तुलना में सबसे बेहतर सुविधाएं, वेतनभत्ते, सम्मान, प्रोन्नति देने में उनका कोई सानी नहीं। अमर उजाला के कर्मचारी अन्य अखबारों की तुलना में खुद को इस मामले में काफी आगे मानते हैं। लेकिन अन्य अखबारों में इस बात की कमी के चलते वहां असंतोष और समस्याएं फैली हुई हैं। कर्मचारियों के हितों की अनदेखी कर मालिक-प्रबंधन अपनी जेबें भरने और स्वार्थ साधने में जुटे हुए हैं। कर्मचारियों को उठाकर ऊपर उठने से इन्हें कोई वास्ता नहीं।
यूं तो मैं अमर उजाला का एक कर्मचारी मात्र हूं और अभी तक तीन-चार बार ही उनसे रूबरू हुआ। अकेले में उनसे कभी बात नहीं हो सकी। हर बार बैठक में उन्हें बोलते और सभी से अपना पक्ष रखने के लिए कहते सुना। अपने सबसे कनिष्ठ कर्मचारी के साथ बैठकर विचार विमर्श करने की क्षमता शायद ही किसी अन्य अखबार के मालिकों में हों।
एक और हतप्रभ और चिंतित कर देने वाली बात है जिसके कारण मैं अतुल जी को कुछ दोष भी देना चाहूंगा कि अपने खराब स्वास्थ्य की जानकारी उनके परिवार के अलावा किसी को नहीं थी। पिछले साल उनके ऑपरेशन के बाद इस वर्ष भी वे जब गुड़गांव के फोर्टिंस अस्पताल में दाखिल हुए तो अमर उजाला के वरिष्ठ संपादकीय, प्रबंधकीय कर्मियों को इसकी कानोंकान खबर तक नहीं हुई। जानकारों के मुताबिक अतुल जी नहीं चाहते थे कि उनके बिगड़े स्वास्थ्य की खबर से काम में किसी भी प्रकार की बाधा पड़े। यदि वे समय रहते इसके बारे में बताते तो देश-विदेश के बड़े अस्पतालों में उनका आसानी से इलाज कराया जा सकता था। लेकिन कर्मठता को वरीयता देने की उनकी फितरत ही उन्हें दी दगा दे गई।
आज अतुल जी के असामायिक निधन ने इस बात को सामने लाने के लिए मजबूर किया। समूचे मीडिया जगत के लिए और मीडिया में अपना करियर तलाश रहे युवाओं के लिए यह बड़ी ही दुखद और अपूर्णनीय क्षति है। एक लंबे सफर के कुशल मार्गदर्शक और विनम्र स्व. अतुल जी मीडिया जगत के लिए एक पथ प्रदर्शक की तरह जिए।
लेखक कुमार हिंदुस्तानी का यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.












bijay singh
January 5, 2011 at 4:13 pm
KAAS HAR KOYI ATUL MAHESWARI BAN PATA.
ISWAR UNKI AATMA KO SHANTI PRADAN KARE.
shiv kumar
January 4, 2011 at 7:10 pm
Amar Ujjala ka Yeh gata kabi pura nahi hoga. Shiv kumar–Sub Editor–Jag Bani jalandhar–9988376991
arpit
January 4, 2011 at 5:25 pm
सही कहा भाई आपने.
वाकई अतुल जी एक महँ व्यक्तित्व के धनी थे. उनके इतनी जल्दी चले जाने से मीडिया जगत में काफी रिक्तता आ गयी है जिसे भर पाना जल्दी संभव नहीं. हालाँकि ऐसे नाज़ुक वक़्त में अमर उजाला प्रबंधन को एकजुटता और मजबूती से खुद को और ज्यादा दमदार साबित करना होगा. ताकि स्वर्गीय अतुल जी द्वारा देखे गए स्वप्न को पूरा किया जा सके.
gaurav
January 4, 2011 at 5:02 pm
bhai aur akhbaro kay malik atul ji ki brabri khabhi nahi kar saktay. Khas kar jagran kay malik?????
Lynette20Blair
April 10, 2011 at 8:46 pm
Some time ago, I needed to buy a good car for my business but I didn’t have enough money and could not order anything. Thank God my dude suggested to take the loan at creditors. Thence, I acted that and was happy with my commercial loan.