अतुल माहेश्वरी की अंतिम यात्रा के गवाह कुछ दृश्य

ये छह वीडियो हैं, जिन्हें अतुल माहेश्वरी के नोएडा स्थित घर से श्मशान गृह ‘अंतिम निवास’ तक की अंतिम यात्रा के दौरान शूट किया गया.  पहले वीडियो में घर से अतुल माहेश्वरी के पार्थिव शरीर को कंधों पर रखकर अंतिम यात्रा शुरू करने के दृश्य हैं. दूसरे से लेकर छठें वीडियो में श्मशान पर मुखाग्नि देने और अतुलजी के पंचतत्व में विलीन होने के क्षण हैं. इन सभी वीडियोज को देखने के लिए आगे दिए गए लिंक्स पर एक-एक कर क्लिक करते जाएं…

अमर उजाला में वर्चस्व की जंग तेज होगी

वाराणसी। अमर उजाला के एमडी अतुल माहेश्वरी के निधन के साथ ही अमर उजाला ग्रुप में वर्चस्व की जंग तेज होने की आशंका बलवती हो गयी है। मंगलवार को अमर उजाला का अंक देखकर ऐसी ही आशंका यहां लोगों ने व्यक्त की। कारण यह कि अमर उजाला के दो पार्टनरों स्वर्गीय डोरी लाल अग्रवाल और स्व. मुरारी लाल माहेश्वरी के खानदानों में कंपनी में वर्चस्व की जंग चल रही है और मामला अदालतों में विचाराधीन है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अतुल माहेश्वरी पर दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में एक क्रिमिनल मुकदमा भी चल रहा है। दोनों खानदानों के झगड़े में कंपनी ला बोर्ड के कार्यवाहक चेयरमैन को सात लाख रुपये की रिश्वत देने का मामला है और इस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने अतुल माहेश्वरी को दोषी मानते हुए पटियाला हाउस कोर्ट में याचिका दाखिल की है।

चिनगारी उर्फ उनका मरना हमारा रोना…

: अतुल माहेश्वरी – अंतिम निवास और अंतिम यात्रा : दिल्ली के दंदफंद से दूर शांति की खातिर पुराने-नए साल के संधिकाल में नैनीताल गया. बर्फ में खेलने-कूदने-सरकने, पहाड़ों पर घूमने से मिली खुशी नए साल के शुरुआती दो-तीन दिनों में काफूर हो गई. पहली दुखद खबर.

दो दशक से ऊपर का यह साथ खत्म हुआ

दस दिन पहले ही वीरेन दा और राजुल जी ने आश्वस्त किया था कि भाई साहब अब ठीक हैं, घर आ गए हैं। राजुल जी ने रात को बात करने की सलाह दी, जबकि वीरेन दा ने कहा कि अतुल जी जल्दी ही खुद फोन करेंगे। सुबह उनके बारे में चर्चा कर ही रहे थे कि दोपहर सवा बजे फोन पर मनहूस खबर मिली। अब वह कभी फोन नहीं करेंगे, न सुनेंगे और न बुलाकर समझाएंगे। दो दशक से ऊपर का यह साथ खत्म हुआ। 22 साल पहले उन्होंने ही मुझे मेरठ में बतौर सीनियर सब एडीटर नौकरी दी थी। मैं रात की पाली में काम करता था। गढ़वाल संस्करण छपने के बाद ही भाई साहब घर जाते थे और पहुंचते ही उनका फोन आता था। वह पेज और कॉलम नंबर गिना कर गलतियां बताते थे, और अगले संस्करण में उन्हें दुरुस्त करने को कहते थे।

ऊंचाइयां छूने के बाद भी वह भोला था, बहुतों से उसे धोखा मिला

: ‘सर,  याद होगा आपको जब हम बरेली कॉलेज में पढ़ते थे, तो आप अकसर हमारी क्लास में कहा करते थे कि मुझे इनमें से एक भी लड़के की आंख में चिनगारी नहीं दिखती, सपने नहीं दिखते, तभी मैंने सोच लिया था कि कुछ करके दिखाऊंगा, आज एक बड़े काम की शुरुआत के गवाह आप भी हैं’ : एक अजब-सी बेचैनी, अजब-सी आशंकाएं मन को घेरे हुए थीं, कई दिनों से। तो क्या वह ऐसी ही मर्मांतक, अनहोनी का संकेत थीं, सोचने को विवश हूं। अतुल नहीं रहा, उसका पार्थिव शरीर भी पंचतत्व में विलीन हो गया। किसी बुरे सपने जैसा इतना डरावना सच। इसका सामना करने का साहस अपने भीतर तलाश रहा हूं।

पंचतत्व में हुए विलीन

देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र अमर उजाला के प्रबंध निदेशक और पत्रकार अतुल माहेश्वरी पंचतत्व में विलीन हो गए। वे 55 वर्ष के थे। कल शाम यमुना तट पर सेक्टर-94 स्थित श्मशान घाट पर हजारों लोगों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। उनके पुत्र तन्मय माहेश्वरी ने जब मुखाग्नि दी तो वहां उपस्थित लोगों के आंसू छलक आए। अंतिम संस्कार में राजनीतिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक और मीडिया जगत से जुड़ी अनेक हस्तियां शामिल हुईं। सोमवार सुबह गुड़गांव के एक निजी अस्पताल में संक्षिप्त बीमारी के बाद उनका निधन हो गया था।

अतुल के विचार-विजन की एक झलक

[caption id="attachment_19104" align="alignleft" width="179"]अतुल माहेश्वरीअतुल माहेश्वरी[/caption]: आधी रात के बाद की चुनौती : बीते एक दशक में हिंदी अखबारों की दुनिया में भारी बदलाव आया है। एक ही अखबार के अलग-अलग शहरों से संस्करण निकलने लगे हैं। इस बेतहाशा वृद्धि के पीछे कुछ ठोस कारण मौजूद हैं। पहली बात, देश में साक्षरता के स्तर में खासी बढ़ोतरी हुई है। साक्षर लोगों की आबादी तेजी से बढ़ रही है और इसका असर अखबारों के विस्तार के रूप में नजर आ रहा है। दूसरी बात, अखबारों को तैयार करने की प्रौद्योगिकी और उनके वितरण की प्रणाली में उत्तरोत्तर प्रगति हुई है।

अतुलजी से सबक लें दूसरे अखबारों के मालिक

: सर्वश्रेष्ठ प्रबंधक थे अतुल जी :  “है मौत उसी की जिस पर करे जमाना अफसोस, यूं तो मरने के लिए सभी आया करते हैं।” संपादकीय और प्रबंधन के बीच की रार-तकरार और उनसे उपजने वाली दिक्कतों से तकरीबन सभी मीडियाकर्मी परिचित होते हैं। हिंदी पट्टी के प्रमुख अखबारों में इस तकरार को भलीभांति अनुभव किया जा सकता है। लेकिन अमर उजाला परिवार के लोगों में से अधिकांश को शायद ही इस रार-तकरार से कोई सरोकार हो। अमर उजाला में संपादकीय की सर्वोच्चता हमेशा रही है। प्रबंधन को कभी संपादकीय के आड़े नहीं आने दिया गया।

यादें अतुल जी की…

मैं अपने जालंधर के दिन याद करता हूं तो अतुल माहेश्वरी याद आते हैं। नवंबर 1999 में हमने अमर उजाला में योगदान किया था। अमर उजाला के पंजाब संस्करण की लांचिंग के दौरान अतुल माहेश्वरी जी ने संपादकीय विभाग के लोगों के साथ कई बैठकें लीं। इस दौरान उनकी दूर दृष्टि पत्रकारीय कौशल और एक सहृदय मालिक का रूप देखने को मिला। ये सहज भरोसा करना मुश्किल है कि 55 साल की उम्र में एक बड़ा संपादक और बड़े समाचार पत्र समूह का मालिक इस दुनिया को अलविदा कह गया। कहा जाता है कि हिंदी पट्टी के पत्रकारों को अच्छा वेतन, कार्य स्थल पर सम्मान देने की परंपरा अतुल माहेश्वरी ने शुरू की।

जाना अतुल भाईसाहब का

राजेंद्र तिवारीविश्वास नहीं हो पा रहा कि अतुल भाईसाहब नहीं रहे। पांच माह पहले नोएडा में मिलना हुआ था। वे चिंतित थे। उन्होंने कहा कि हिंदी अखबार भेड़चाल की माफिक चलते हैं। कभी सब लोकल कवरेज के पीछे पड़े थे तो अब लोकल कवरेज में अपमार्केट कंटेंट का रट्टा चल रहा है। कोई अखबार मालिक या संपादक इससे इतर कुछ करने को तैयार नहीं। जो लोग अपमार्केट का विरोध करते हैं, उनको समझ ही नहीं है कि अखबार में कैसे पूरे समाज को संबोधित किया जाए। यह सब बात करते हुए वे 1996 वाले अतुल माहेश्वरी जितना उर्जावान-उत्साह से भरे नहीं बल्कि हताश-टूटे हुए नजर आ रहे थे।

अतुल माहेश्वरी के निधन पर उपजा ने शोक जताया

अमर उजला के प्रबंध निदेशक अतुल माहेश्वरी के असामयिक निधन पर यूपी जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) ने शोक जताया है। उपजा ने श्री माहेश्वरी के निधन को मीडिया के लिए अपूर्णीय क्षति बताया है। उपजा ने अपने शोक संदेश में कहा है कि श्री माहेश्वरी के निधन से न केवल अमर उजाला समूह को आघात लगा है, बल्कि पूरे हिन्दी मीडिया जगत को अपूर्णीय क्षति हुई है। श्री माहेश्वरी की शख्सियत का अदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने केवल दो शहरों से प्रकाशित होने वाले अमर उजाला का कई प्रदेशों तक विस्तार किया तथा उसे राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।

अतुल माहेश्वरी – मजदूर संपादक, मजबूत दोस्त

[caption id="attachment_19096" align="alignleft" width="179"]अतुल माहेश्वरीअतुल माहेश्वरी[/caption]अभी तक विश्वास नहीं हो रहा कि अतुलजी चले गए. अमर उजाला के संपादक, प्रकाशक और मुद्रक रहे अतुल माहेश्वरी का लम्बी बीमारी के बाद गुड़गांव के एक अस्पताल में निधन की सूचना से मैं ही नहीं, हर कोई हतप्रभ है. हिंदी पत्रकारिता में आधुनिक प्रौद्योगिकी, कम्प्यूटरों, सस्ती छपाई, पेनलेस-पेपरलेस तकनीक, प्रतिदिन पाठकों के लिए एक नये विषय पर केन्द्रित समाचारपत्र के संस्करण, मूल्ययुद्ध के दाव-पेंचों और कारपोरेट संस्कृति की शुरुआत करने वाले दो युवाओं को मैंने करीब से देखा और जाना है.