
हिमांशु कुमार
इसके बाद कल्लूरी ने अपनी धमकी पर अमल करते हुए करते हुए इस लड़की के पति को जेल में डाल दिया तथा इनकी जीप को ज़प्त कर लिया और इस लड़की को भी नक्सलियों के साथ मिल कर थाने पर और एक कांग्रेसी नेता के घर पर हमला करने के दो मामलों में फंसा दिया और इसके खिलाफ वारंट जारी कर दिया. इसके बाद इस लड़की ने मुझसे मदद करने की गुहार की.लेकिन आखिर इस देश में दंतेवाड़ा के एसएसपी कल्लूरी से ऊपर तो कोई है नहीं. इसलिए मैं इस लड़की की कोई मदद नहीं नहीं कर पाया.
मैं मीडिया, एक्टिविस्टों और नेताओं से इस लड़की की मदद के लिए मिला, लेकिन मदद के नाम पर सबने हाथ खड़े कर दिए. अंत में मैंने इस उम्मीद में एक लेख लिखा कि शायद इस लड़की की ज़िंदगी को बर्बाद होने से कोई तो बचाएगा. मुझे उम्मीद थी कि आखिर इस विशाल और महान देश में कोई न कोई तो उसकी मदद करेगा. अभी बिनायक सेन को उम्रकैद की सज़ा मिलने के बाद टेलीवीज़न पर ऐसे बहुत से बहादुर लोग बोलते हुए दिखते हैं जो अदालत, सरकार और लोकतंत्र की तारीफ़ में बड़ी बड़ी बातें कर रहे हैं और सफलतापूर्वक ये सिद्ध कर रहे हैं कि हम जैसे लोगों को न्याय व्यवस्था पर कोई सवाल नहीं उठाना चाहिए क्योंकि उससे देश कमज़ोर होता है. तो देश की मजबूती की रक्षा की खातिर मैंने सब बातों को स्वीकार कर

दंतेवाड़ा के एसएसपी कल्लूरी : संविधान और कानून ठेंगे पर!
लेकिन फिर आये एक फोन ने मेरे सारे विश्वास को डगमगा दिया. दंतेवाड़ा से फिर उसी आदिवासी लड़की ने मुझे बताया कि सर, दंतेवाड़ा के एसएसपी कल्लूरी ने फिर दो नयी नक्सली वारदातों में उसका नाम जोड़ दिया है और अदालत में उसके खिलाफ चालान भी पेश कर दिया है. वो लड़की रो रही थी कि सर मैं तो रोज़ अपने स्कूल में पढ़ाती हूँ, वहां मेरी हाजिरी लगी हुयी है, मैं जेल में अपने पति से मिलने भी जाती हूं और जेल के रजिस्टर में दस्तखत भी करती हूं. लेकिन फिर भी एसएसपी कल्लूरी ने मुझे फरार घोषित कर दिया है और मुझे मारने की फिराक में है. फोन के उस तरफ वो लड़की रोती जा रही थी और फोन के इस तरफ मैं गुस्से, बेबसी और असमंजस की हालत में उसका रोना सुनता जा रहा था.
लाखों लोग इस देश की आजादी के लिए लड़े थे मेरे पिता भी लड़े थे. क्या यही दिन देखने के लिए उन सारे लोगों ने कुर्बानी दी थी? क्या भगत सिंह इस तरह के देश के लिए शहीद हुए थे? कम से कम मुझे कोई ये तो बता दे कि मुझे क्या करना चाहिए? आदिवासी होता तो बन्दूक उठा सकता था. पर सबने गांधीवादी कह कह कर मुझे इतना इज्ज़तदार बना दिया है कि अब मैं हर अन्याय पर बस इन्टरनेट पर एक लेख लिखता हूं और सोच लेता हूं कि काफी देश सेवा हो गयी. अब तो मीडिया वालों ने मेरे फोन भी उठाने बंद कर दिए हैं.
क्या कोई मेरी बात सुन रहा है? मीडिया? सरकार? न्यायपालिका? है कोई गरीब जनता, आदिवासियों की बात सुनने वाला? क्या कोई बचा है? कम से कम इस लोकतंत्र को बचाने की आखिरी कोशिश तो कर लो, कोई है जो इस बेबस आदिवासी लड़की को बचा सकता है?
हिमांशु कुमार दंतेवाड़ा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं. हिमांशु संघर्ष, बदलाव और सुधार की गुंजाइश चाहने वालों के लिए एक मिसाल हैं.उनसे [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है. हिमांशु का यह लिखा जनज्वार डॉट कॉम से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.












Deepak sharma,meerut,up,india
January 12, 2011 at 2:47 pm
Mujhe ab us aadivasi girl ke saath saath himanshu kumar bhi chinta hone lagi hai.
unki aawaj ke liye aap jaise logo ki bhi jaroorat hai. himanshu ji
sushil shukla shahjahanpur up
February 28, 2011 at 9:11 am
muzhe ye lekh padhkar behad dukh hua aur ye sochne per majboor kar diya ki agar mai kisi aise pad per hota ki mai us ladki ki madad kar pata to jaroor karta per mai ek tuch prani hoo.mai chah kar bhi kuch nahi kar sakta..per itna jaroor kah sakta hoon ki dantevada me to ek aisa nalayak ssp hai but hamare up me maya raaj hai aur is maya raaj me maya k sabhi mla aur mantri us ssp k saman hain to aap thoda sochiye ki is up me us lachar ladki ki tarha hi kitni ladkiyan hain jo ssp roopi mla aur mantri ka shikar ho rahi hain but maya bahen ji chup hain.shyad isme unki rajamandi hai ?