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जिला प्रभारी के चलते रणभूमि में बदल सकता है दफ्तर

मैं एक दिलजला अखबारनवीस हूं, भड़ास को अपनी बात रखने का उचित मंच मानकर ही एक प्रयास कर रहा हूं, इस अनुरोध के साथ कि मेरी पहचान को गुप्त रखा जाए. जनपद बस्ती में एक बड़े अखबार के जिला प्रभारी का हाल कुछ यूं है, उन पर संपादकीय प्रभारी और महाप्रबंधक का ऐसा वरदहस्त है कि जिला प्रभारी जो चाहे वो करे, पिछले दिनों उन्होंने जो किया कुछ उदाहरण पेश है.

मैं एक दिलजला अखबारनवीस हूं, भड़ास को अपनी बात रखने का उचित मंच मानकर ही एक प्रयास कर रहा हूं, इस अनुरोध के साथ कि मेरी पहचान को गुप्त रखा जाए. जनपद बस्ती में एक बड़े अखबार के जिला प्रभारी का हाल कुछ यूं है, उन पर संपादकीय प्रभारी और महाप्रबंधक का ऐसा वरदहस्त है कि जिला प्रभारी जो चाहे वो करे, पिछले दिनों उन्होंने जो किया कुछ उदाहरण पेश है.

विज्ञापन विभाग का संपादकीय से कुछ लेना-देना नहीं था, पर पिछले दिनों सालाना लक्ष्य पूरा करने की प्रबंधन की चिंता ने लूट-खसोट के रास्ते खोल दिए, सरकार में मंत्री राम प्रसाद चौधरी का विज्ञापन छापने के नाम पर 20 हजार, सांसद अरविन्द चौधरी से 36 हजार, खाद्य एवं रसद विभाग से 36 हजार रुपए लिए, इस वसूली का किसी को पता नहीं चला और खबरें छाप कर मैनेज कर लिया गया, अगस्त 2009 में यहां का कार्यभार संभालने के बाद से जारी लूट-खसोट का कारोबार पहले चौपहिया वाहन के तौर पर फिर बैंक एकाउण्ट में लगातार बढोत्तरी के तौर पर सामने आया, पर हाय रे अंधी व्यवस्था और उसके अंधे संचालक, किसी को इससे मतलब नहीं रहा कि जिला प्रभारी कर क्या रहा है बल्कि समय समय पर उसकी पीठ ठोंककर बाकी संपादकीय टीम के मनोबल को तोड़ने की कोशिश की गयी.

अब हाल ये है कि कब अखबार का दफ्तर रणभूमि में बदल जाए अंदाजा लगाना मुश्किल है, जिला प्रभारी के एकमात्र लक्ष्य रुपया कमाने के साथ ही एक रखैल है, जो अक्सर उसके आवास पर रातें गुजारती है, किसी को नजर नहीं आ रही है. तरीख 15 जनवरी को भी जो विज्ञापन छापा गया उसमें भी खेल कर दिया गया. बेइमानी का सिलसिला लगातार जारी है और वसूली की चपेट में इतने लोग आ गए है कि बस पूछिए मत, पिछले दिनों कंपनी के निदेशक आए थे, उन्हें समय से इसलिए नाश्‍ता नहीं मिल पाया क्योंकि जिला प्रभारी पर पहले से ही उसके 18 हजार बाकी थे, खैर निदेशक तो खा पी कर चले गए पर बकाए का भुगतान आज भी नहीं हुआ है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित.

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0 Comments

  1. shubham singh

    January 21, 2011 at 4:24 pm

    dainik, amar ujala , hindustan, bharti, sahara kiske kiske prbhari ho bhaiya
    shubham singh

  2. Ek Hindustani

    January 24, 2011 at 12:19 pm

    अरे भाई यह हाल तो बस्ती के अधिकतर जिला प्रभारियों का है। जिन साहब ने यह लिखा है वह क्या इससे अछूते हैं मै जानता हूॅं कि वह कौन है लेकिन नाम नही लिख सकता कि कौन है हां उनका नाम अ, प, र, में से ही षुरू होता है। बस बात यही है कि लूटने का मौका इन साहब को नही मिला। अरे भाई आप भी तो यहीं काम करते है। कम से कम उसे तो यह नही लिखना चाहिये जिसके 72 छेद हो। वैसे जो भी बात लिखी है वह सही और सोलह आने सच है। लेकिन यह काम सिर्फ एक जिला प्रभारी नही बल्कि अधिकतर जिला प्रभारी करते है। लेकिन कुछ प्रभारियों के पास रखैल भी है और कुछ स्ंवय किसी की रखैल है क्योकि यह अपनी मर्जी से सबकुछ नही लिख पाते। मैं लिखने वाले की भाषा से भलि भंति परीचित हूॅं मै उसका नाम नही लिखना चाहता वरना फजीहत हो जायेगी। लेकिन यह जरूर है कि वह एक तेज तर्रार पत्रकार के रूप में जाने जाते है। लेकिन यह भी पत्रकारिता को मिषन की तरह नही बल्कि व्यवसाय की तरह करते है। इनके दामन में भी छेद ही छेद है।

  3. Ek Patrkaar

    January 26, 2011 at 6:31 am

    बहुत अच्छा कमेन्ट दिया आपने ’पी‘ भाई लेकिन ज्यादहतर जिला प्रभारी का ये हाल नही है बल्कि सारे जिला प्रभारी ऐसे ही है। सबको सिर्फ पैसा ही चाहिये बेईमानी में नम्बर एक है लेकिन उसके बाद भी इन्हे दूसरे द्वारा बेईमानी करनी बुरी लगती है। यह भी मौके की तलाष में ही रहते हैं। बहुत गन्दा कर दिया है इन जैसे लोगो ने पत्रकारिता और पत्रकार को। लेकिन सवाल यह है कि इस गन्दगी को कैसे दूर किया जाय।

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