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क्‍यों नहीं किसी ने अरुण शौरी से सवाल किया!

मनोज कुमार: महात्मा की पत्रकारिता दिल्ली से देहात के बीच : महात्मा गांधी की पत्रकारिता और वर्तमान समय को लेकर विमर्श हो रहा है और यह कहा जा रहा है कि महात्मा की पत्रकारिता का लोप हो चुका है। बात शायद गलत नहीं है किन्तु पूरी तरह ठीक भी नहीं। महात्मा की पत्रकारिता को एक अलग दृष्टि से देखने और समझने की जरूरत है। महात्मा की पत्रकारिता दिल्ली से देहात तक अलग-अलग मायने रखती है। पत्रकारिता का जो बिगड़ा चेहरा दिख रहा है वह महानगरीय पत्रकारिता का है। वहां की पत्रकारिता का है जिन्हें एयरकंडीशन कमरों में रहने और इसी हैसियत की गाड़ियों में घूमने का शौक है।

मनोज कुमार: महात्मा की पत्रकारिता दिल्ली से देहात के बीच : महात्मा गांधी की पत्रकारिता और वर्तमान समय को लेकर विमर्श हो रहा है और यह कहा जा रहा है कि महात्मा की पत्रकारिता का लोप हो चुका है। बात शायद गलत नहीं है किन्तु पूरी तरह ठीक भी नहीं। महात्मा की पत्रकारिता को एक अलग दृष्टि से देखने और समझने की जरूरत है। महात्मा की पत्रकारिता दिल्ली से देहात तक अलग-अलग मायने रखती है। पत्रकारिता का जो बिगड़ा चेहरा दिख रहा है वह महानगरीय पत्रकारिता का है। वहां की पत्रकारिता का है जिन्हें एयरकंडीशन कमरों में रहने और इसी हैसियत की गाड़ियों में घूमने का शौक है।

पत्रकारिता का चेहरा वहां बिगड़ा है जहां पत्रकार सत्ता में भागीदारी चाहता है और यह भागीदारी महानगर में ही संभव है। दिल्ली से देहात की पत्रकारिता के बीच फकत इसी बात का फर्क है। दिल्ली की पत्रकारिता से महात्मा पत्रकार दूर हैं तो देहाती पत्रकारिता में वे आज भी मौजूद हैं। इस अर्थ में पत्रकार महात्मा की इस दौर में अनुपस्थिति शायद ठीक ही है। पत्रकारिता का आज जो हाल है उसे देखकर पत्रकार महात्मा स्वयं को माफ नहीं कर पाते। वे पत्रकारिता को समाजसेवा का साधन मानते थे किन्तु पत्रकारिता आज स्वयं के जीवन का साध्य बन कर रह गयी है। आजादी के साढ़े छह दशक में पत्रकारिता ने अनेक बदलाव देखे हैं। इन बदलाव की पत्रकारिता गवाह रही है।

विदेशी आक्रमण से लेकर देश के भीतर इमरजेंसी को पत्रकारिता ने करीब से देखा है। आज वही पत्रकारिता पेडन्यूज छापने के लिये रोज-ब-रोज दागदार हो रही है। ठीक ही है कि पत्रकार महात्मा गांधी इस समय हमारे साथ नहीं हैं। उनकी पत्रकारिता आज के दौर में छिन्न-भिन्न हो गयी है। सत्ता को रास्ता बताने वाले सत्ता के साथ चलने लगे हैं। आखिरी छोर पर बैठे व्यक्ति को उसका हक दिलाने वाली पत्रकारिता उनका हक छीनने में आगे हो गयी है।

महात्मा की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता को जांचने के पहले कुछ बुनियादी बातों की चर्चा कर लेना सामयिक होगा। पत्रकार महात्मा द्वारा पत्रकारिता के लिये बताये गये मानदंड और आज की पत्रकारिता के मानदंड में कोई साम्य नहीं है। दोनों की पत्रकारिता एक तरह से नदी के दो पाट की तरह हो गये हैं, जो चलेंगे तो साथ साथ किन्तु कभी मिल नहीं पाएंगे। पत्रकारिता की बात होगी और पत्रकारिता के लिये पत्रकार महात्मा को याद किया जाएगा, किन्तु जब उनके बताये रास्ते पर चलने की बात होगी तो दोनों वापस नदी के दो किनारों की तरह हो जाएंगे। यह बात तो शीशे की तरह साफ है कि आज की पत्रकारिता में महात्मा की पत्रकारिता का लोप हो चुका है, किन्तु क्या यह सच नहीं है कि इतना स्याह हो जाने के बाद भी पत्रकारिता की बुनियाद उन्हीं बातों पर टिकी है जो पत्रकार महात्मा बता गये थे।

पत्रकार महात्मा के साथ साथ चलते हुए इस दौर के महान पत्रकारों के बारे में बात करना लाजिमी होगा। पत्रकारिता की जो बुनियादी बातें हैं उनमें पहला है पत्रकारिता की निष्पक्षता। दूसरी बात है पत्रकारिता का तथ्यों को तटस्थ होकर पाठकों के समक्ष रखना न कि न्यायाधीश बनकर फैसला देना। तीसरी बात पत्रकारिता को व्यवसाय न बनाना। फौरी तौर पर तीनों ही बातें पत्रकारिता से खारिज कर दी गयी लगती हैं, किन्तु सच यह है कि पत्रकारिता आज भी इन्हीं तीन बातों के कारण जनमानस की आवाज बनी हुई है। जीवन जीने के बुनियादी अधिकार को दिलाने में पत्रकारिता हमेशा से सक्रिय रहा है किन्तु कभी इस पर चर्चा नहीं की गई।

नीरा राडिया मामले में पत्रकारिता की जो भूमिका रही हो उसको लेकर ऐसा हंगामा हो रहा है कि मानो पत्रकारिता नेस्तनाबूद हो गई हो। पत्रकारिता पर कयामत आ गयी हो। जो लोग इस मामले को लेकर हंगामा कर रहे हैं वे शायद भूल गये हैं कि अरूण शौरी आज भले ही राजनेता के रूप में स्थापित हों, किन्तु उन्हीं की कलम का कमाल था कि तीन दशक बाद भी बोफोर्स का मामला खत्म नहीं हुआ। मेरा सवाल है कि नीरा राडिया के साथ चलने वाले दस पांच पत्रकारों के नाम आ भी गये तो हंगामा क्यों होना चाहिए? क्यों कभी किसी ने अरूण शौरी से सवाल नहीं किया कि उन्हें राजनीति में आने की क्या जरूरत थी? अब अरूण शौरी के नक्शे कदम पर बाद की पत्रकारिता की पीढ़ी चलती है तो इसे सहज रूप में लेना चाहिए। समाज के हर वर्ग में ऐसे लोग मिल जाएंगे जो अपने उद्देश्य से भटकते नजर आते हैं।

दिल्ली और देहात की पत्रकारिता का फर्क वास्तव में यही तो है। दिल्ली की पत्रकारिता नदी का एक किनारा है और जो आज का सच है, तो देहात की पत्रकारिता नदी का दूसरा किनारा है जो महात्मा की पत्रकारिता है। एक सच यह भी है कि ऐसे पत्रकारों के खिलाफ लिखकर पत्रकारों का एक वर्ग वाहवाही लूटना चाहता है। मुद्दा तो यह है कि इतना हंगामा करने और लिखने के बाद कथित दोषी पत्रकारों को समाज ने बहिष्कृत क्यों नहीं किया। जिस प्रभु चावला को एक प्रबंधन ने ‘सीधी बात’ कर हटा दिया तो दूसरे प्रबंधन ने ‘सच्ची बात’ कहने के लिये अपने साथ ले लिया। अब इसे कौन तय करेगा कि प्रभु चावला को दोष के कारण हटाया गया या इस दोष के चलते उनकी ख्याति को भुनाने के लिये दूसरे ने अपने साथ ले लिया। दिल्ली की पत्रकारिता में सबकुछ चलता है किन्तु देहात की पत्रकारिता में इस तरह की छूट नहीं है।

पत्रकार महात्मा की उस पंक्ति को याद कर लेना सामयिक होगा जिसमें वे कहते हैं कि कम समय में सच को जांच लेना मुश्किल होता है और इसलिये अच्छा है कि ऐसा लिखा ही न जाए। इस संदर्भ में एक अनुभव स्मरण हो रहा है देहाती पत्रकारिता का जिसे हम महात्मा की पत्रकारिता कह सकते हैं बल्कि कहना चाहिए। पत्रकारिता में अपना जीवन गुजार चुके पत्रकार ने बताया कि एक बार वे एक महिला को अपनी खबर में वेश्या लिख दिया। महिला की मौत हो चुकी थी। गुस्से में लाल-पीला होता उसका बेटा हाथ में हथियार लिये अखबार के दफ्तर में प्रवेश कर गया। गंदी गालियों के साथ वह उस पत्रकार को तलाश करने लगा जिसने यह खबर लिखी थी। उक्त वरिष्ठ पत्रकार का डर जाना स्वाभाविक था किन्तु अपना नाम छिपाते हुए उस युवक से आपत्ति की वजह जाननी चाही। युवक को खबर में अपनी मां को वेश्या लिखे जाने पर आपत्ति थी और उसका तर्क था कि क्या उसकी मां को किसी सरकार ने या शासन ने लाइसेंस दिया था, यदि नहीं तो किस आधार पर यह लिखा गया।

युवक का गुस्सा जायज था। वरिष्ठ साथी को अपनी गलती का अहसास हुआ और आगे से दुबारा बिना जांचे कोई खबर नहीं लिखने की कसम खा ली। गांधीजी यही बात कहते थे। इस अनुभव का अर्थ यही है कि देहात की पत्रकारिता में महात्मा की पत्रकारिता आज भी मौजूद है किन्तु दिल्ली की पत्रकारिता में नहीं है। यदि ऐसा होता तो नैतिकता के नाते ही सही, आरोपों के जद में आये पत्रकार अपने वर्तमान दायित्व को स्वेच्छा से छोड़कर स्वतंत्र रूप से लेखन करते किन्तु आज के दौर की पत्रकारिता में यह कहां संभव है।

थोड़ी देर के लिये मान लिया जाए कि जिन पत्रकारों के नाम आरोपों की जद में आये हैं, उनसे पत्रकार बिरादरी ने नाता तोड़ लिया है क्या? क्या उन्हें जिन पत्रकार संगठनों की मान्यता या संबद्धता है, उनसे अलग कर दिया गया है, शायद यह भी नहीं। क्या पत्रकारों ने उनसे विमर्श बंद कर दिया है, शायद यह भी नहीं। जब स्वयं पत्रकार बिरादरी में इतना साहस नहीं है तो बेवजह अखबार के पन्ने और आम आदमी का वक्त जाया करने की जरूरत ही क्या है। इसमें जीवन के सभी रंग समाये हुए हैं। जिसमें खुशियों की इंद्रधनुषी रंग हैं तो कुछ स्याह हिस्सा भी है। नीरा मामले में जो कुछ घटा और पत्रकार कथित आरोपों से घिरे अपने उन साथियों के बारे में लिखा है और लिख रहे हैं तो यह साहस पत्रकारिता में ही हो सकता है। किसी अन्य पेशे में यह साहस नहीं हो सकता, बल्कि हरचंद कोशिश की जाती रहती है कि किस तरह साथी को बचाया जा सके। इस तरह के अनेक उदाहरण समाज के पास हैं जिन्हें पत्रकारिता ने बेनकाब किया है।

कितना भी कठिन दौर क्यों न हो, पत्रकारिता अपने बुनियादी उसूलों से मुंह नहीं मोड़ सकता है। ठीक उसी तरह जिस तरह एक वकील यह जानते हुए भी कि उसका मुवक्किल एक अपराधी है, किन्तु उसे बचाने का यत्न करता है क्योंकि फीस उसने उसे बचाने की ली है। एक डाक्टर की तरह जो कितना भी निर्मोही हो किन्तु मरीज को देखना नहीं भूलता है। यहां मैं अपवादों की बात नहीं करता बल्कि उन सच्चाईयों की बात कर रहा हूं जिसे पत्रकारिता कहते हैं। आज पत्रकार महात्मा होते तो यह देखकर इत्मीनान कर लेते कि इस कठिन समय में पत्रकार अपना दायित्व निभा रहे हैं।

लेखक मीडिया एवं सिनेमा की शोध पत्रिका समागम के संपादक एवं वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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