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आइये, सचिन को भारत रत्न बनायें ! (तीन)

दिनेश चौधरीएनडीटीवी ने सूत्रों के हवाले से यह खबर चलायी की सचिन को भारत रत्न मिलना तय है। सूत्रों का हवाला जी टीवी ने भी दिया। सबसे तेज ‘आज तक’ को लगा कि उसकी तेजी कुछ कम हो रही है-बल्कि वह पिछड़ रहा है।

दिनेश चौधरीएनडीटीवी ने सूत्रों के हवाले से यह खबर चलायी की सचिन को भारत रत्न मिलना तय है। सूत्रों का हवाला जी टीवी ने भी दिया। सबसे तेज ‘आज तक’ को लगा कि उसकी तेजी कुछ कम हो रही है-बल्कि वह पिछड़ रहा है।

इसलिए उसने एक कदम आगे बढ कर सचिन को भारत रत्न बनाने के लिये समर्थन जुटाने की कवायद शुरू की। कहा कि राजीव शुक्ला ने मांग की है। अंबिका सोनी के पास गये, संजय निरूपम के पास गये, उद्धव ठाकरे के भी पास गये। सबने कहा कि सचिन से बड़ा ”रत्न” और कौन है? ”आज तक” के विशेष कार्यक्रम का शीर्षक था, ”पापा के सचिन, भारत के ”रत्न”। रत्न इनवाइटेड कॉमा में था। 25 की देर रात तक अगर इस ‘रत्न’ से इनवाइटेड कॉमा हट जाता तो सभी चैनलों में भारत का गणतंत्र दिवस “रनतंत्र” दिवस में बदल कर रह जाता। चैनल वाले चाहते भी यही थे।

यह जो शीर्षक ‘आज तक’ ने चलाया था -पापा के सचिन, भारत के ”रत्न” -इस पर जरा गौर फर्मायें। आप पायेंगे कि ‘पापा के सचिन’ शब्दों से एक किस्म का वात्सल्य का भाव आता है, लाड़  उमड़ता है, ममता आती है। हमारे क्रिकेट खिलाड़ी चैनलों के राजदुलारे हैं। वे इन्हीं इन्हीं नामों से पुकारते हैं। जैसे – ‘माही’, ‘वीरू’, ‘भज्जी’, ‘सच्ची’ वगैरह। इस तरह के नाम से मायें अक्सर अपने उन बेटों को देती हैं जो कमाऊपूत होते हैं। निखट्‌टू पुत्रों को तो ताने सुनने पड़ते हैं। कभी आपने सुना कि किसी चैनल वाले ने अभिनव बिंद्रा को ‘अभि’ या विश्ननाथ आनंद को ‘विशु’ या धनराज पिल्लई को “धन्नू” कहकर पुकारा हो ? विचार पद्वति का प्रभाव भाषा पर पड़ता है और विचार पद्वति उन स्रोतों से प्रभावित होती है, जहां से पैसा आता है।

नशीले पदार्थों का धंधा ऐसा ही चलता है। पहले तो नौजवानों को उनका आदी बना तो फिर चाहे इसके एवज में उनसे चोरी-डकैती करा लो। लोगों को क्रिकेट की लत लग गयी है। वे इसे खाते, पीते, ओढ़ते, बिछाते हैं। इसलिए जरूरी है कि गणतंत्र दिवस पर भी सिर्फ ‘रनतंत्र’ की चिंता हो और देश के करोड़ों ‘गण’ किस हालत में हैं उन पर कम से कम साल में एक बार भी नजर न डाली जाये! अगर मेरी भाषा भदेस न हो- या चलिए मैं पहले ही माफी मांग लेते हूं-तो दिल से कह रहा हूं कि मेरा मन इन चैनल वालों पर थूकने का करता है।

आपको मैं फिर एक बार कुछ पीछे की ओर ले चलता हूं, नब्बे के दशक में। माफ कीजियेगा, आपका थोड़ा वक्त भी लूंगा, पर यह विषयांतर नहीं है। बिल्कुल मुदृदे की बात है। पहले आप इस खबर को पढ़ लें जो कि मूल रूप से अंग्रेजी में है :

It was 6:45 p.m. on Wednesday, November 23, 1994. The evening sky over the Vidhan Bhavan, the venue of the winter session of the Maharashtra State Legislature, at Nagpur was turning black as tragedy struck, hardly one kilometre from the assembly building, when more than 113 tribals mostly women and children perished in a disastrous stampede triggered by the cane wielding police who attempted to prevent the estimated crowd of 40,000 from pressing towards the Vidhan Bhavan. The processionists, belonging to the Gowari tribe from the adjoining districts of Bhandara, Yavatmal, Tumsar, Gondia, Parbani, as well as Nagpur, had come to meet the Minister of Tribal Welfare, Mr. Madhukarrao Pichad, who was attending the assembly, and to place before him their demand for inclusion in the list of tribes, which are entitled to reservation in the matter of education and employment.

The whole tragic drama enacted in the afternoon of Wednesday, when an estimated 40,000 strong Adivasis of the Gowari tribe converged on to the Morris College “T” point in Nagpur, at 2 p.m. near the police barricade. They carried nothing except their food wrapped in cloth. They had come to present their demands to the Chief Minister or the tribal welfare minister, for inclusion in the reservation list. But none of them cared to come out of the Assembly building to meet them. The Chief Minister left for Bombay and the Tribal Welfare Minister was too busy with his work.

यह घटना आजाद भारत की ”जलियांवाला बाग” थी जहां मासूमों को चारों ओर से घेर कर पीटा गया था और निर्दोश महिलायें व बच्चे मारे गये। किसलिये? महज इसलिये कि एक सूबे के मंत्री के पास 40,000 लोगों से मिलने का समय नहीं निकल पाया क्योंकि वे अपने काम में ”बहुत व्यस्त थे।”

अब 1994 की ही एक दूसरी घटना पर नजर डालिये।

“When I was crowned Miss Universe, I remember the then prime minister PV Narasimha Rao call me as soon as I was announced the winner to congratulate me. The government really supported me. I would like to see the same support as the girls who compete at beauty pageants or also talented people like any sportsman or actor or anyone who is making India proud,” Miss universe Susmita sen says.

अब यह चमत्कार सिर्फ हिंदुस्तान में ही संभव है कि इसके एक सूबे के  मंत्री के पास अपने ही विभाग के कामकाज के सिलसिले में 40,000 लोगों से मिलने के लिये 5 मिनट का भी समय नहीं है और इसी देश का प्रधानमंत्री इतने फुर्सत में है कि वह अपनी ओर से विश्वसुंदरी को बुलाकर आधे घंटे का समय देता है।

नरसिंहा राव बुजुर्ग प्रधानमंत्री थे। चरित्र के भी भले थे। उनका रिकार्ड एन,डी, तिवारी जैसा नहीं था। फिर सुंदरियों में उनकी दिलचस्पी क्या थी? इस सवाल का जवाब कुछ आगे चलकर मिला। खबर अखबार में छपी थी कि सुष्मिता सेन कलकत्ता मे एक मध्यमवर्गीय परिवार से मिलने गयीं और वहां जाकर उन्होंने कोकाकोला पिया। पेड न्यूज तो बहुत बाद में आयी, पर यह खबर मैंने 1994 में पढ़ी थी। मैंने मित्रों से कहा कि अब अपने देश को जल्दी ही एक और सुंदरी मिलने वाली है। उन्होंने ‘ज्योतिषाचार्य’ कहकर मेरा मजाक उड़ाया। पर कुछ ही दिनों बाद ऐश्वर्या राय का नंबर लगा- ऐश्वर्या राय ने पेप्सी का विज्ञापन किया। सुष्मिता कोला का कर रही थीं।

अब क्या मुझे यह बात खोलकर कहनी पड़ेगी कि  नरसिंहा राव से लेकर ऐश्वर्या राय तक, सभी उसी मशीन के पुर्जे थे जिन्हें इस देश को विश्व-बाजार के हवाले कर देना था। और यह सिलसिला यहीं तक नहीं थमा। इसके बाद इस देश में अचानक इतनी सुंदर लडकियां पैदा होने लगीं कि उनके नाम तक याद रखना मुश्किल हो गया। यह एक चमत्कार ही था कि इस देश में सुंदर लडकियों की  पैदावार 1991 के बाद ही प्रांरभ हुई जब नरसिंहा राव की अल्पमत सरकार ने देश के बाजार को बहुराष्ट्रीय सौदागरों के लिये खोल दिया।

मुख्य खिलाड़ी पेप्सी ओर कोला ही हैं, बाकी आते जाते रहते हैं। सचिन तेंदुलकर ओर उनके जैसे अन्य खिलाडि़यों को ”भगवान” बनाने का काम भी इसी बाजार का है जिन्होंने इस देश को धुआंधार विश्व-सुंदरियां प्रदान की हैं। अब आप इस बात को देख नहीं पा रहे हैं तो इसका कारण यह है कि क्रिकेट की लत ने आपकी आँखों में परदा डाल दिया हैं। मैंने पहले भी कहा था कि अब इस देश का ध्यान यदि किसी संवेदनशील अथवा महत्वपूर्ण मुद्‌दे से हटाना हो तो भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच करा दो। क्रिकेट के साथ मिलकर हमारा राष्ट्रवाद इतना नशीला हो जाता है कि इसकी खुमारी कई -कई दिनों तक नहीं उतर पाती।

मैं इस लेख के साथ दो ”इमेज” अटैच कर रहा हूं। जिस दिन नरसिंहा राव की सरकार ने भारत को विश्व-बाजार में बेचने के लिये मोरक्कश में गुलामी के दस्तावेज ”’गैट” संधि पर हस्ताक्षर किसे उस दिन भारत के क्रांतिकारी नौजवान किस काम में व्यस्त थे? क्या 15 अप्रेल 1994 की यें घटनायें महज एक संयोग थीं?

(अगर उपरोक्त लिखे को पढ़ने में दिक्कत हो तो इमेज पर क्लिक करें)

लेखक दिनेश चौधरी जर्नलिस्ट, एक्टिविस्ट रहे हैं. सरकारी नौकरी भी की. रिटायरमेंट के बाद फिर से कई तरह के प्रयोगों में सक्रिय हैं. वे भिलाई में रहते हैं. उनसे [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है. ”आइए, सचिन को भारत रत्न बनाएं!” सीरिज के पार्ट एक व दो के लेख पढ़ने हों तो नीचे कमेंट बाक्स के ठीक बाद आ रहे सचिन से संबंधित शीर्षकों पर क्लिक करें.

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0 Comments

  1. Indian Citizen

    January 27, 2011 at 2:05 pm

    सत्य सुनना कौन चाहता है, बोलना कौन चाहता है, लिखना कौन चाहता है, सब के अपने अपने सिद्धान्त हैं.. बस एक सूत्रीय कार्यक्रम है, अपना हिस्सा लो और निकल लो. बाजारवाद यही तो है.. सबको बेचो.. सब बिकते हैं. सबको खरीदो.. सब तैयार हैं खरीदे जाने के लिये…

  2. deepak choudhri bhilai

    January 27, 2011 at 2:24 pm

    CHIN KE AFIM YUDHA KI TARAH BHARAT KO BHEE “CRICKET YUDH” KE LIYE EK MAWO KI JARURAT HAI.

  3. santosh pandey

    January 27, 2011 at 9:30 pm

    aapne ek kadvi sachai ujagar ki hai.

  4. Lokenath Tiwary

    January 28, 2011 at 8:25 am

    Dinesh Bhai, its a hard truth which you have shown to our opened eyes, which is closed with artificial “chakachoundh of bazaarwaad”.

  5. virendra Mishra

    January 28, 2011 at 12:20 pm

    क्या खूब लिखा है, सर आप ने, काश आज के टीवी पत्रकारों को यह बात समझ में आ जाती !

  6. deepak choudhri bhilai

    January 28, 2011 at 12:30 pm

    ME EK BANK KARMI HUN. ROJ 100 SE 150 GRAHAKON KO NIPTATA HUN. ARTHARTH ROJ HI SHATAK MARATA HUN. PAISA KAM PAD JAYE TO JEB SE BHARANA BHI PADATA HAI. SACHIN KOUN SEE SAMAJ SEWA KAR RAHA HAI. WO TO APNA GHAR BHAR RAHA HAI. VASTAV ME BHARAT RATNA TO MUJHE MILNA CHAHIYE.

  7. M P SHAJI BHILAI

    January 28, 2011 at 12:38 pm

    SACHIN KO BHARAT RATNA DENA MURKHATA HOGI. PRAKASH AMTE, ANNA HAJARE, DR. ASHISH SATAV, DR. ABHAY BANG, RAJENDRA SINGH JAISE SACHCHE SAMAJ SEVION KO BHARAT RATNA DENE KI MANG HO TO BAT SAMAJH ME BHI AATI HAI. KYA JAB ENHEN NOBEL PURSKAR MILENGA USKE BAD LOGON KO SHARMA AAYEGI? AUR BHIR UNHEN BHARAT RATNA KE LAYAK SAMAJHA JAYEGA? SACHIN KO BHARAT RATNA KE MANG DIMAGI DIWALIYAPAN HAI. ESKE KHILAPH KALAM KI DHAR DINESH AUR TEJ KARO.

  8. ANITA SHAJI BHILAI

    January 28, 2011 at 1:09 pm

    MEDIA KE BANAYE MAHAPURUSHON KO BHARAT RATNA NAHI DIYA JANA CHAHIYE. TIN GHANTE KE AMITABHI SAMADHAN NE YUWAWON KO NA KEWAL ARAJAK BANAYA BALKI DON JAISE CHARITRA KO SAMAJ ME STHAPIT BHI KIYA. SACHIN BHI CRICKET NAMAK AFIM KA SALESMAN HAI. LATAJI KO SACHIN APNA BETA KYUN LAGATA HAI? ASMAN ME CHAMKTE SITARE APNE HO JATE HAIN. GUMNAMI AUR GARIBEE ME JINE WALON KO KAUN PUCHCHATA HAI. GARIB KISAN AUR MAJDOOR HI VASTAV ME BHARAT RATNA HAIN BAKI TO BAHURASHTRIYA CO. KE DALAL. ME DINESHJI KI BATON SE SAHAMAT HUN. SACHIN KO BHARAT RATNA NAHI MILANA CHAHIYE.

  9. S. K. Choube

    January 28, 2011 at 5:22 pm

    Sachin ko kendrit kar ke likhe gaye charon lekh padh kar mujhe laga ki Dinesh ko na to Sachin se chidh hai aur na hi Bhaarat Ratna se. Use to vartmaan bhrashta vyavastha se nafrat hai aur un logon se bhi jo desh ki janataa ko desh ki jwalant samasyaaon se gumraah kar rahe hain. Gandhiji ne kaha tha ki desh ke har naujawaan ko desh ki raajneeti me sakriya bhaag lena chaahiye. Mediawale is baat ko bakhoobi jaanate hain aur isiliye desh ke naujawaano ki kamjoree (Cricket) ka faayadaa uthaa rahe hain. Ramesh Nayyarji ki ek baat yaad aa rahi hai ki desh men chor-uchakke ekjoot ho rahe hain aur sharif aadmi chupchaap baithaa hai. Shaayad aaj ka sharif aadmi suvidhaabogi ho gaya hai aur ye sochane laga hai ki padosi ke ghar me aag lagatee hai to lage, hame kya? hum to T.V. par Sachin ki santuri dekhenge, humane to SIP karaa ke apnaa ghar fire-proof kar liya hai.
    Aaj Sachin ko Bhaarat Ratna dilane ki muhim chali hai, kal dhooni ke liye yahi muhim chalaayee jaayegi, parason kisi aur ke liye. Ye silsila kab tak chalataa rahegaa? Shaayad tab tak jab tak ki desh ke buddhijeevee aur aam aadmi milkar media aur sarkaar ke viruddh koi jabardast muhim na chheden.

  10. PRAVIN RAI

    January 29, 2011 at 10:25 am

    SIR AAP NE BAZARBAD KI POL ACHI TARAH KHOLI HAI . AGAR ISI THRAH KE LEKH ATTE RAHE TO LOG BAZARBAD KE BHRAM SE JARUR SAWADHAN HO SHKENGE. AAP KA LEKH LOGO ME EK NAI SOCH PAIDA KAR SAKTA HAI.

  11. ANTHONI HARI

    January 29, 2011 at 12:14 pm

    SACHIN KO PULELA GOPICHAND SE SABAK SIKHANA CHAHIYE. SRI GOPICHAND NE KOKA KOLA KA VIGYAPAN KARNE SE MANA KAR DIYA THA CHUNKI WO HANIKARAK HAI. JABAKI SACHIN NAM KA DALAL PEPSI KA VIGYAPAN KAR YUWAWON KE SWASTHYA SE KHILWAD KIYA THA. AISE MIRJAFARON KO BHARAT RATNA DENA GALAT HAI. ESKE ALAWA KULHE MATKANE WALON KO PADMASRI DENA BHI MURKHATA HI HAI.

  12. SHEKHAR BHILAI

    January 29, 2011 at 12:35 pm

    GANDHI WADI PATRAKAR SWARGIYA PRABHASH JOSHI BHI CORPORATE KHEL CRICKET KE DIWANE THE. JANSATTA KE DHER SARE PANNE UNHONE KALE KIYE. AISE ME AM ADMI SE KYA UMMID KAR SAKTE HAIN JINKI SOCH MEDIA BANATI HO. LATAJI TO GAYEEKA HAIN. TU KITNE BARAS KA? ME 16 BARAS KI JAISA KARANAPRIYA? GANA BHI GATEE HAIN. PAR PRABHASH JI KI BUDHI KO KYA HO GAYA THA KI DESH KO EK ACHCHA PATRAKAR CRICKET KE KARAN KHONA PADA.

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