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तुलसी के खिलाफ खबर छपी तो पेमेंट रूक जाएगा!

राष्ट्रीय सहारा में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। एक हैं बाबू तुलसी सिंह राजपूत। पहले के कांग्रेसी अब पार्टी से निष्कासित। बनारस के सभी अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देते हैं। चंदौली में कांग्रेसी पर्यपेक्षक भाई जगताप को पीटने में कांग्रेस से शुक्रवार को बहरिया दिए गए। उनके खिलाफ एफआईआर तक हुआ है। यह तो महज एक घटना है। पर, असली खेल सहारा में हुआ है। यह खबर सहारा वाराणसी संस्करण में छोड़ दी गयी जबकि बनारस के बाकी अखबारों ने इसे पहले पेज पर स्थान दिया और इसके फालोअप की भी अनेक खबरें छापीं।

राष्ट्रीय सहारा में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। एक हैं बाबू तुलसी सिंह राजपूत। पहले के कांग्रेसी अब पार्टी से निष्कासित। बनारस के सभी अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन देते हैं। चंदौली में कांग्रेसी पर्यपेक्षक भाई जगताप को पीटने में कांग्रेस से शुक्रवार को बहरिया दिए गए। उनके खिलाफ एफआईआर तक हुआ है। यह तो महज एक घटना है। पर, असली खेल सहारा में हुआ है। यह खबर सहारा वाराणसी संस्करण में छोड़ दी गयी जबकि बनारस के बाकी अखबारों ने इसे पहले पेज पर स्थान दिया और इसके फालोअप की भी अनेक खबरें छापीं।

पता चला है कि सहारा के चंदौली संस्करण में पेज तीन पर यह खबर प्रकाशित हुई थी, वह भी आधी अधूरी। उसमें राजपूत के कांग्रेस से बहरिया जाने संबंधी खबर भी नहीं थी। बहरहाल जब वाराणसी नगर संस्करण में यह खबर लेने की बात आयी तो संपादक ने फोन पर कह दिया कि राजपूत ने 15 लाख का विज्ञापन दिया है और अगर यह खबर छपी तो उसका सारा का सारा पेमेंट रूक जाएगा। इसलिए, संबंधित रिपोर्टर के पास यह खबर रहने के बावजूद उसे नहीं दिया गया और सहारा को छोड़कर सभी अखबारों में यह खबर प्रमुखता से पहले पेज पर छापी गयी और मार्केट में सहारा की काफी भद्द पिटी। पूरे नगर में सहारा की काफी लानत मलानत हुई। प्रसार ने भी इस मुद्दे को जोर शोर से उठाया और कहा कि ऐसे में आप निष्पक्ष होने की कैसे गारंटी ले सकते हैं और वे कहां अखबार बेचेंगे और किस किसकी आलोचना सुनेंगे। प्रसार विभाग ने तो यहां तक कह दिया कि ऐसे में वे अखबार नहीं बेच पाएंगे।

ज्ञात हो कि सहारा के प्रसार विभाग ने अपने दम पर अखबार को किसी तरह जिंदा रखा हुआ है। इस वाकये और आलोचना से तमतमाए यूनिट मैनेजर अमर सिंह ने संबंधित व्यक्तियों राकेश कुमार और रामकृष्ण बाजपेयी से लिखित में पूछताछ कर दी। मामला हाईकमान तक चला गया है। नोएडा ने मामले पर पूछताछ शुरु कर दी है। इसे लेकर जितने मुंह उतनी बात सुनी जा रही है। संपादक इन दिनों वाराणसी में नहीं हैं और कह कर गए हैं कि वह धार्मिक यात्रा पर हैं। अब अगर पूछताछ हुई और जांच आगे बढ़ी तो साफ है कि संपादक आदेश देने के बावजूद बच जाएंगे। बाकी कौन नपेगा इसे आसानी से समझा जा सकता है। यहां यह बताना बेहद जरूरी है कि स्टांप घोटाले के मास्टर माइंड अब्दुल करीम तेलगी के कभी सहयोगी रहे बाबू तुलसी सिंह राजपूत बनारस में अक्सर चर्चाओं में रहते हैं। वे पत्रकारों को उपकृत करने के लिए बदनाम भी हैं। जागरण सहित कई अखबारों के संपादकीय में वरिष्ठ पदों पर काम करने वालों के काफी करीबी भी माने जाते हैं।

इसी तरह एक हैं बाबू अभयानंद, डाक पेज प्रभारी। बीके त्रिपाठी उर्फ बीकेटी भी डाक का पेज देखते हैं। बीकेटी ने शनिवार को पेज छोड़कर सिस्टम में डाल दिया। सिस्टम में जब पेज खोला गया तो वह वहां नहीं खुला। सिस्टम ने बीकेटी को सूचित किया कि पेज तो खुल ही नहीं रहा है। बीकेटी का माथा ठनका। उसने पता लगाया तो पता चला कि डाक में तो पेज खुला हुआ है। उसने संबंधित व्यक्ति को झाड़ पिलाई कि जब उसने पेज छोड़ दिया है तो फिर पेज किसने खोला है। पेज खोलने वाले उस आपरेटर के पक्ष में बाबू अभयानंद उठ खड़े हुए और बीकेटी और अभयानंद में जमकर तू-तू,मैं-मैं हुई। बाद में खोजबीन हुई तो पता चला कि छूटे पेजों के साथ डाक में पेज खोलकर अक्सर छेड़छाड़ हो जाती है। बीकेटी ने कह दिया कि वे पेज नहीं बनाएंगे और अब वे आफिस छोड़कर जा रहे हैं। उनके इतना कहते ही वहां हड़कंप मच गया। आधे घंटे से संपादकीय विभाग मूकदर्शक बनकर दो जनों की लड़ाई को निहार रहा था। पूरा कामकाम ठप पड़ा था। किसी तरह समय पर पेज छोड़ने के नाम पर बीकेटी को बैठाया गया। तब जाकर काम शुरु हुआ। इस घटना के बाद पूरे संपादकीय में भयानक तनाव बना हुआ है। संपादकीय का मामला दिनों दिन विस्फोटक होता जा रहा है। इस घटना की सहारा में दूर दूर तक गूंज सुनी जा रही है।

इसी अखबार में अभिषेक कुमार स्ट्रिंगर के रूप में कार्य करते थे। उसका स्थानांतरण कानपुर से वाराणसी में हुआ था और उसे चार हजार का इन्क्रिमेंट भी दिया गया था। वह यहां जनरल डेस्क पर काम करता था। उसे दिसंबर तक वेतन भी मिला। पर पता नहीं कैसे एच आर वालों की जगलरी के चलते चारों तरफ सूचना हो गयी कि वह दो माह से लापता है। वह कहता रह गया कि नहीं वह तो काम कर रहा है पर किसी ने उसकी एक नहीं सुनी और उसे शनिवार को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। यह है राष्ट्रीय सहारा। साभार : पूर्वांचलदीप

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0 Comments

  1. Hanuman singh

    February 6, 2011 at 9:42 am

    Hanuman singh 6/2/11
    from Varansi.
    sahara me sampadak nahi sampadak ke nam par putla banaie jate haie. Sneh ranjan UpEndra Rai ke Putle haie. jab kam par nahi chamchaie par sampasak banaie jaienge to aise hi hoga.varansi ke thakathit sampadak Snehrangan thiek se khabar nahi likh sakte aur sampadak haie to kya hoga.kaie galtiya hone ke bad bhi Snehrangan ka kuch nahie bigda.aur age bhi nahi bigadega.

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