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दिल्‍ली में स्ट्रिंगरों की मनमानी और चैनलों की मजबूरी

योगराजटीवी चैनलों की बाढ़ के साथ ही खबरों की मांग भी बढ़ी है। ज्यादातर चैनलों में स्टाफ रिपोर्टरों के पास ज्यादा खबरें निकालने के लिए दिल्ली में संपर्कों की कमी है। लिहाजा आज ज्यादातर चैनल दिल्ली की खबरों के लिए स्ट्रिंगर्स पर ही ज्यादा निर्भर हो गए हैं। चाहे वो स्टार न्यूज हो, आजतक, आईबीएन, सहारा समय या फिर जी नेटवर्क हो। दिल्ली में अगर सही स्ट्रिंगर्स की संख्या की बात करें तो आंकड़ा दर्जन भर आ कर ही अटक जाता है। फिर शुरू हो जाता है मजबूरी का खेल… एक स्ट्रिंगर दो से तीन चैनलों के लिए काम करता है। एसाइन्‍मेंट डेस्क की भी मजबूरी है कि उसे दूसरे चैनलों पर चलने वाली खबरों को ही अपने स्ट्रिंगर से मंगवाना पड़ता है। और कोई चारा नहीं है।

योगराजटीवी चैनलों की बाढ़ के साथ ही खबरों की मांग भी बढ़ी है। ज्यादातर चैनलों में स्टाफ रिपोर्टरों के पास ज्यादा खबरें निकालने के लिए दिल्ली में संपर्कों की कमी है। लिहाजा आज ज्यादातर चैनल दिल्ली की खबरों के लिए स्ट्रिंगर्स पर ही ज्यादा निर्भर हो गए हैं। चाहे वो स्टार न्यूज हो, आजतक, आईबीएन, सहारा समय या फिर जी नेटवर्क हो। दिल्ली में अगर सही स्ट्रिंगर्स की संख्या की बात करें तो आंकड़ा दर्जन भर आ कर ही अटक जाता है। फिर शुरू हो जाता है मजबूरी का खेल… एक स्ट्रिंगर दो से तीन चैनलों के लिए काम करता है। एसाइन्‍मेंट डेस्क की भी मजबूरी है कि उसे दूसरे चैनलों पर चलने वाली खबरों को ही अपने स्ट्रिंगर से मंगवाना पड़ता है। और कोई चारा नहीं है।

चूंकि ज्यादातर चैनल नोएडा में हैं तो दक्षिणी और पूर्वी दिल्ली में उनके रिपोर्टरों की पहुंच आसान है। जब बारी आती है उत्तरी और पश्चिमी दिल्ली और खास तौर पर बाहरी दिल्ली की, तो लगभग सभी चैनल स्ट्रिंगर्स पर निर्भर हैं। विजुअल्स जो चाहिए। स्ट्रिंगरों ने गुटबाजी कर ली है। तीन चार स्ट्रिंगरों का गुट ज्यादातर बड़े न्यूज चैनलों के लिए काम कर रहा है। जो खबर आजतक पर चलेगी, वही विजुअल आपको इंडिया टीवी पर भी दिखेंगे। वही हूबहू विजुअल्स आपको स्टार टीवी, सहारा समय और जी न्यूज पर भी देखने को मिल जाएंगे। कारण ये कि स्ट्रिंगर्स गुट का एक सदस्य मौके पर पहुंच गया तो वो अपने विजुअल्स दूसरों को भी बांट देगा। एक स्क्रिप्ट सभी चैनलों को केवल रिपोर्टर का नाम बदल कर भेजी जा रही है। चैनलों को अपनी इस मजबूरी का पता नहीं हो, ऐसा नहीं है। केवल नीतियां नहीं बना सकने वाले चैनलों के एसाइन्मेंट इस व्यवस्था को झेलने को मजबूर हैं। जबकि लोकल खबरों की मांग बढ़ने और चैनलों में फास्ट न्यूज जैसे बुलेटिन शुरु करने पर खबरें ज्यादा चाहिए तो चैनलों को बाहरी, पश्चिमी और उत्तरी दिल्ली के बीच अपने ब्यूरो ओफिस बनाने चाहिए। वहां हर वक्त दो स्टाफ रिपोर्टर, एक ओबी वैन खड़ी कर दें तो खबरें और बेहतर और स्पेशल भी हाथ आ सकेंगी। खर्च भी कुछ खास नहीं होगा।

खबरों के इस घोटालों की एक खास वजह ये भी है कि ज्यादातर चैनलों के एसाइन्मेंट डेस्क पर बैठे लोगों में दिल्ली के लोग हैं ही नहीं। यूपी और बिहार से संबंधित लोग हैं, जो दिल्ली के इलाकों के नाम तक नहीं जानते, तो स्ट्रिंगर्स पर निर्भर रहना तो उनकी मजबूरी होगी ही। कई चैनलों में उनके स्टाफ रिपोर्टर की तनख्‍वाह तो 25 हजार है, लेकिन इलाके के स्टिंगर का मासिक बिल 70 हजार तक पहुंच जाता है। एक दो चैनलों ने तो इस खर्च में कटौती करने के लिए अपने स्ट्रिंगर को रिटेनर बना दिया है। महीने में 20 हजार देकर उसी का कैमरा, उसी की गाड़ी, उसी का कैमरामैन सब जिम्मेदारियां उसी पर सौंप दी है। इस राशि में वो क्या खर्च करेगा, क्या बचा कर घर चलाएगा, इसका अंदाजा भी चैनलों को है। लेकिन करें तो क्या?

बाहरी, उत्तरी और पश्चिमी दिल्ली में स्ट्रिंगर्स के गुटों के हावी होने का नुकसान स्थानीय अधिकारियों व नेताओं को भी भुगतना पड़ता है। जिसके पीछे एक स्ट्रिंगर पड़ गया, उसे सब मिलकर बर्बाद करने तक में कसर नहीं छोड़ते। जिस खबर को उठाना हो या जिस खबर में उनका हित सध रहा हो, उसे सभी एक साथ उठा देते हैं। एक चैनल पर खबर चली नहीं कि दूसरे चैनल को उस खबर को चलाना मजबूरी हो जाता है। चैनलों के इनपुट हेड, आउटपुट हेड या मॉनिटरिंग डिपार्टमेंट क्या इन मुद्दों को बैठकों में उठाते नहीं होंगे। ये संभव नहीं। लेकिन हल निकालने की चिंता किसी को नहीं।

लेखक योगराज शर्मा जर्नलिस्‍ट टुडे नेटवर्क के एडिटर इन चीफ हैं.

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0 Comments

  1. दलजीत

    February 12, 2011 at 10:04 am

    प्रवीण जी, योगराज शर्मा ने स्टिंगर से एसाइन्मेंट हेड तक का सफर तय किया, मैं उन्हें जानता हूं। उस व्यक्ति ने हमेशा तरक्की की है। आज वह एक मीडिया कंपनी के मालिक हैं। और इसमें उन्होंने चैनलों को आईना दिखाया है, जो सब जानते हुए अन्जान बने हुए है। स्टिंगर इमानदारी से काम करें, उन्हें पैसा मिले, इस बात पर सब सहमत हैं। लेकिन स्टिंगर हरामखोरी करते हुए बिना स्पोट पर जाए, खबरें चोरी करके और बांट कर जो मुफ्त के पैसे चैनलों से एंठने की कोशिश कर रहे हैं, ये तो गलत है ही। मैं दिल्ली के कुछ एसे स्टिंगर्स को भी जानता हूं, जो स्क्रिप्ट तक लिखना नहीं जानते, कंप्यूटर खोलना नहीं आता वो भी नेशनल चैनलों के लिए काम कर रहे हैं। काम करने में बुराई नहीं है, स्टिंगर्स हों या रिपोर्टर।
    ऐसे लेखों पर बजाए निजी कमेंट करने के व्यवस्था पर बात की जाए तो बेहतर होगा। चैनलों के न्यूज हैड अगर सभी स्टिंगर्स को बुलाकर अपने सामने स्क्रिप्ट ही लिखवा लें, तो आधे लोग बाहर हो जाएंगे।

  2. rajan kumar

    February 18, 2011 at 9:13 am

    yes right

  3. rj_arvinda

    February 19, 2011 at 4:22 am

    mai yograj ji ki aisy bato se ittefak nhi rakhta……mai pede ke peeche ka pura khel janta hu…..lekin shayad ya kahne ke liye shi jagah nhi….ye sabkuch channel ke ander baithay logo ki kutneeti hai

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