: बनारस में गिफ्ट के लिए एक दूसरे से भिड़ते और गरियाते दिखे पत्रकार : अधिकांश शहरों में प्रेस कान्फ्रेंस के बाद गिफ्ट लेने के लिए पत्रकारों में होड़ मची रहती है। मगर, जागरण सिलीगुड़ी ने एक नायाब पहल की है। उसने इस गिफ्ट लेने की परंपरा पर खबर छापने की हिम्मत की है। उसने एक कालम शुरु किया है- नाम दिया है कही अनकही। दिनांक 8 फरवरी के अंक में ऐसा ही एक कालम पेज नंबर 6 पर छपा है। खबर इस प्रकार है-
गटको व्हिस्की, जानो टेस्ट : कंपनी वाले फूड प्रोडक्ट्स बनाते हैं। धुआंधार मार्केटिंग में लगे हैं। मीडिया की मदद भी चाहते हैं। सोचा, क्यों न खबरनवीसों को खुश कर दें। नेक इरादे से सोमवार को एक होटल में कांफ्रेंस बुलाई। न्योता पहले बंट चुका था। डीलरों के साथ-साथ बड़ी संख्या में बंधु-बांधव पहुंचे थे। जायकेदार लंच था। अपने प्रोडक्ट के बारे में जब कंपनी वालों ने खूब बघार लिया, तो मौका विदाई का आया। रस्म-रिवाज का ख्याल था। चलते-चलते गिफ्ट पैकेट्स बंटने लगे। साथ में जो कुछ और था, देखकर कुछ चौंके, अधिक ने चुपके से छुपाकर रख लिया। छुपाने की जो सामग्री थी, वह व्हिस्की की सीलबंद बोतल थी। जाहिर तौर पर इसे गटकने के बाद स्वाद तो भाएगा ही। वैसे भी कहा जाता है कि गला तर होते ही खाने में तेज नमक का स्वाद भी अच्छा लगने लगता है।
सर्दी में भी नहीं मिली जैकेट : पेशे से फोटोग्राफर हैं। उम्र काफी हो चुकी है। चलते साइकिल पर हैं। मसला गिफ्ट का हो, तो दूर तक पहुंचने में भी नहीं हांफते। इनकी हाजिरी आप हर कहीं देख सकते हैं। आदत को दूसरे भी जान गए हैं। जैसे ही पता चलता है, वहां कुछ मिलने वाला है, सूचना इन्हें सबसे पहले पहुंचाई जाती है। लेकिन इन सूचनाओं के बहाने पेशे के ही कुछ लोग इन्हें छकाने भी लगे हैं। ढलती उम्र का भी ये ख्याल नहीं करते। इन दिनों परेशान हैं। वजह यह कि सर्दी गुजरने को है, लेकिन कहीं से पहनने को जैकेट भी न मिला। घड़ी भी पुरानी हो चुकी है। सदमा इस बात का है कि नए-नए लड़के बहुत कुछ बटोर ले जा रहे हैं। वे पुरानों से मदद की गुहार लगा रहे हैं।
इस खबर के छपने के बाद सिलीगुड़ी के कई फोटोग्राफरों ने जाकर संपादकीय इंचार्ज से विरोध दर्शाया पर उन्होंने किसी की एक नहीं सुनी और साफ साफ कह दिया कि आगे भी ऐसी शिकायतें मिलीं तो वे ऐसी खबरें छापते रहेंगे। जिस कंपनी ने गिफ्ट बांटा था उसे भी टका सा जवाब दे दिया। इस घटना से सभी सकते में हैं। गिफ्ट लेने वाले व देने वाले दोनों।
वाराणसी में दो घटनाएं हुईं। दोनों घटनाएं बाबाओं से संबंधित हैं। एक बाबा ने इसी हफ्ते वाराणसी में प्रेस कान्फ्रेंस करने के बाद 500 रुपये नकद पत्रकारों को दिए। कुछ पत्रकारों को नहीं मिला तो उन्होंने बाबा की गाड़ी तक उनका पीछा किया। दूसरे एक बाबा ने पत्रकारों को साड़ियां बांटी। यहां साड़ी लेने वाले पत्रकारों की संख्या एक सौ से ऊपर पहुंच गयी थी। कहना न होगा रुपये और साड़ियां लेने के लिए पत्रकारों को आपस में भिड़ते और गरियाते भी देखा गया। ये दो शहर हैं-एक सिलीगुड़ी जहां इसे खबर का रुप देकर विरोध दर्शाया गया। दूसरा शहर बनारस है यहां नकद 500 रुपये और साड़ी लेने के लिए लोग मार तक करने लगे हैं। साभार : पूर्वांचलदीप












vikrant
February 13, 2011 at 8:56 am
इस पहल से स्वयं दैनिक जागरण,सिलीगुड़ी के दो लोग भी बड़े परेशान हैं । दोनों गोजा लेने के लिए बड़े कुख्यात रहे हैं । शिकायत मिली , तो भरी मीटिंग मे ज्ञानेश्वर सर ने कह दिया , अब ऐसे जो पकड़े गए , वे हटा दिए जायेंगे । सिलीगुड़ी के जर्नलिस्टों की हालत यह है कि सौ-दो सौ की गिफ्ट तो छोडि़ये , नास्ते के पैकेट के लिए लाइन लगा लेते हैं । अपवाद बहुत कम ही मिलते हैं ।
chandan dubey
February 15, 2011 at 7:46 am
kare bhi kya mehnat bhi to itni karte hai ki on the spot bhuk lag jati hai.
अर्जुन इंदवार
February 21, 2011 at 11:13 am
अब जब बात सिलीगुड़ी की निकली है तो मैं बताना चाहूँगा कि अखबारों से जो निष्पक्षता की आशा की जाती है वह यहाँ दैनिक जागरण नहीं दिखा रही है। आदिवासी विकास परिषद गोर्खालैण्ड आंदोलन का विरोध कर रही है। डुवार्स और तराई में गोर्खा जनमुक्ति को हर तरह से परिषद रोक रही है और परिषद को उसके नेता सिर्फ गोर्खालैण्ड आंदोलन के विरोध में उपयोग कर रहे हैं, इसके बारे लिखे गए पत्रों को जागरण ने छापा नहीं। लगता है जागरण सरकारी पक्ष को प्रमुखता देना चाहता है।