: फिल्म ‘द रेवाइन्स’ की शूटिंग जारी : फिल्में समाज को कुछ न कुछ दिशा जरूर देती हैं, लेकिन इस समय चम्बल के बीहड़ों में जिस फिल्म की शूटिंग हो रही है उससे तो अपराधियों का मनोबल ही बढे़गा। डकैतों के खतरनाक असलहों से बहाए गए बेगुनाहों के रक्त को पीकर ऊब चुकी चम्बल घाटी को बहुत मुश्किल से डकैतों से मुक्ति मिली थी, लेकिन खतरनाक डाकुओं के भेष में अब मुम्बइया कलाकारों के कदमों की आहट से चम्बल घाटी एक बार फिर थरथरा उठी है।
कभी चंबल के खूंखार डाकुओं मे शुमार रहे निर्भय गुर्जर की जिंदगी पर बनने वाली फिल्म द रेवाइन्स को लेकर दो सैकड़ा से अधिक छोटे-बडे़ मुम्बइया कलाकारों की फौज चंबल के बीहड़ों मे कूद पड़ी है। इस समय औरया जिले के बीहड़ों मे निर्भय गुर्जर की जिंदगी पर बनने वाली इस फिल्म को लेकर बीहड़ की तस्वीर हकीकत में जगमग भरी नजर आ रही है।
शुरू करते है फिल्म के मुर्हुत शॉट से। औरैया जिले के बीहड़ में स्थित जब मंगलाकाली के मंदिर परिसर मे सिनेमाई निर्भय (विकास श्रीवास्तव ) ने मुन्नी पांडे (अंशी राना) से शादी के बाद अपने गैंग के साथ मां की अर्चना करके अपने आप को बीहड का बादशाह साबित किया तो गैंग के दर्जनों सदस्यों ने खतरनाक असलहों को हवा में लहराकर जय माँ काली के गगनभेदी उदघोष के साथ निर्भय के हाँ में हाँ मिलाया। अपने को बीहड़ का बादशाह बताने वाले निर्भय गुर्जर को जिन लोगों ने असल में नहीं देखा था, वे लोग इस सीन को देखकर निर्भय की क्रूरता का अंदाजा जरूर लगा लेंगे।
करीब एक महीने से अधिक समय तक रह कर पूरे कलाकार इटावा, औरैया और आसपास के बीहड़ों मे रह कर शूटिंग करेंगे। बैंडिट क्वीन, वुंडेड की सफलता के बाद सिने निर्देशकों ने एक बार फिर चंबल के बीहड़ की ओर रूख किया है। हाईकोर्ट के न्यायाधीश तथा पुलिस महानिरीक्षक कानपुर जोन की मौजूदगी में फिल्म बीहड़ (द रेवाइन्स) का मुहूर्त सम्पन्न हुआ। यमुना तट पर स्थित मंगलाकाली मंदिर में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रवीन्द्र सिंह तथा आईजी चन्द्रप्रकाश ने फिल्म का औपचारिक उद्घाटन किया।
फिल्म निर्मात्री डा. शालिनी गुप्ता, चन्द्रा मिश्रा ने बताया कि फिल्म की कहानी बीहड़ में उतरने वाली युवा पीढ़ी और इलाके की पेचीदगियों पर आधारित है। फिल्म में एनएसडी थियेटर के सिनेमा तथा दूरदर्शन से जुड़े कई कलाकार अभिनय के रंग दिखायेंगे। फिल्म का संगीत रवीन्द्र जैन ने तैयार किया है। लेखन व निर्देशन कृष्णा मिश्रा द्वारा किया जा रहा है। मुहूर्त के बाद फिल्म के कुछ दृश्य भी
फिल्माये गये। निर्देशक के लाइट-कैमरा-एक्शन बोलते ही फिल्म के नायक तथा नायिका ने अभिनय शुरू किया। बीहड़ में अर्से बाद हो रही फिल्म शूटिंग को देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ी।
बताते चले कि चंबल का बीहड़ कभी सिनेमाई कलाकारों के लिये खास रहा है। निर्भय के जीवन पर फिल्म बनाने का सपना देखने वाले निर्माता कृष्णा मिश्रा की मुसीबतें अब बढ़ती नजर आ रही हैं, क्योंकि निर्भय की पहली बीबी सीमा परिहार ने इस फिल्म के निर्माण पर आपत्ति जाहिर करते हुये कहा कि निर्भय की बीबी होने के नाते उसकी अनुमति के बिना किसी भी फिल्म का निर्माण नहीं किया जा सकता है। सीमा का कहना है कि फिल्म के निर्माता कृष्णा मिश्र पहले भी वुंडेड फिल्म में उनसे काम ले चुके हैं, लेकिन दाम देने में आज तक आनाकानी कर रहे हैं। सीमा कहती हैं कि वे फिल्म के निर्माण को रूकवाने के लिये कानूनी मदद ले रही हैं। सीमा का कहना है कि निर्भय के जीवन पर फिल्म बना कर फिल्म निर्माता आखिर क्या साबित करना चाहते हैं?
सिनेमा की दुनिया के निर्माता निर्देशकों का मोह चंबल के बीहड़ों से अलग नहीं हुआ है। डाकुओं की जिंदगी को बड़े परदे पर दिखाने के पीछे तर्क चाहे कुछ भी दिए जाएं, लेकिन सत्यता तो मोटी कमाई की लालच ही नजर आती है। इससे एक बात साफ हो चली है कि कभी ऐसी फिल्मों के जरिये ही चंबल मे डकैतों ने एक-एक करके नये-नये अपराध करने के गुर सीखे थे और पुलिस के सामने ऐसी चुनौती खड़ी की थी, जिससे निपटने में पुलिस को सालों लग गए। कभी बीहड़ में रहकर पुलिस के लिए मुसीबत बनी सीमा परिहार भी शायद इस सच्चाई को जानने के बाद ही अब समाज के हित के मद्देनजर फिल्म की शूटिंग रोकने की मांग कर रही हैं।
लेखक सुरेश मिश्र औरेया के निवासी हैं तथा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.












rajitraam yadav
February 27, 2011 at 1:09 pm
[b][/b]suresh mishra auraiya ke niwasee nahi eelahabad ke hai waha to sasuraal me chauka jamaye hai.
lavinsh chaubey
February 28, 2011 at 12:13 pm
thank you suresh gee
Ayus
February 28, 2011 at 12:36 pm
सुरेश जी आप ने जो लिखा हैँ बो बिल्कुल सच हैँ! इसका युवा पीढी पर बुरा असर पडेगा. मगर हम मीडिया बाले जब शहीदोँ का कुछ नहीँ लिखेगेँ तो येँ डाकुओँ पर ही फिल्म बनायेँगेँ (आयुष पण्डेय -स्वतन्न चेतना -)