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”हिंदी की दुर्दशा के लिए आज की पत्रकारिता जिम्‍मेदार”

: नामवर सिंह ने वडनेरकर को प्रदान किया राजकमल कृति सम्‍मान : दूसरा राजकमल प्रकाशन कृति सम्‍मान (हिंदी की शब्‍द संपदा- विद्यानिवास मिश्र पुरस्‍कार) सोमवार को यहां त्रिवेणी सभागार में अजित वडनेरकर को उनकी पांडुलिपि ‘शब्‍दों का सफर’ भाग दो के लिए दिया गया. पुरस्‍कार स्‍वरूप उन्‍हें एक लाख रूपये की राशि, पंचधातु का लंकरण और प्रशस्ति-पत्र दिया गया. यह पुरस्‍कार उन्‍हें प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने दिया.

 

: नामवर सिंह ने वडनेरकर को प्रदान किया राजकमल कृति सम्‍मान : दूसरा राजकमल प्रकाशन कृति सम्‍मान (हिंदी की शब्‍द संपदा- विद्यानिवास मिश्र पुरस्‍कार) सोमवार को यहां त्रिवेणी सभागार में अजित वडनेरकर को उनकी पांडुलिपि ‘शब्‍दों का सफर’ भाग दो के लिए दिया गया. पुरस्‍कार स्‍वरूप उन्‍हें एक लाख रूपये की राशि, पंचधातु का लंकरण और प्रशस्ति-पत्र दिया गया. यह पुरस्‍कार उन्‍हें प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने दिया.

 

नामवर सिंह ने इस अवसर पर ‘शब्‍दों का सफर’ विषय पर अपने व्‍याख्‍यान में हिंदी के हिंग्लिस बन जाने पर अफसोस जताते हुए कहा कि हिंदी की आजकल जो दुर्दशा बनी है, उसके लिए आज की पत्रकारिता, खास तौर से इलेक्‍ट्रानिक मीडिया जिम्‍मेदार है.

राजकमल प्रकाशन के यहां जारी बयान के मुताबिक, सिंह ने उम्‍मीद जताते हुए कहा कि वडनेरकर ने जो काम किया है वह अभी भले ही दो खंडों में आया है, पर वह आगे भी आता रहेगा. उन्‍होंने कहा कि ‘शब्‍दों का सफर’ में वडनेरकर ने शब्‍दों की जन्‍मकुंडली तैयार की है.

इस पुरस्‍कार के निर्णायक मंडल में नामवर सिंह, विश्‍वनाथ त्रिपाठी और अरविंद कुमार शामिल थे. प्रशस्ति वाचन के साथ विश्‍वनाथ त्रिपाठी और अरविंद कुमार का सम्‍मति पत्र कथाकार अशोक गुप्‍ता ने पढ़ा, जिसमें शब्‍दों की संपदा को बढ़ाने में वडनेरकर के योगदान को महत्‍वपूर्ण बताया गया. वडनेरकर ने अपने वक्‍तव्‍य में कहा कि वे ‘शब्‍दों’ के प्रति इतने आग्रहशील हैं कि रात को एक बजे दफ्तर से लौटने के बाद भी प्रतिदिन एक या दो शब्‍दों की व्‍याख्‍या अपने ब्‍लॉग पर देते हैं.

राजकमल के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्‍वरी ने इस अवसर पर वर्ष 2010 में चुने गए पाठक एसएनडी परमिल और डा. मिथिलेश कांति को विशेष पाठक सम्‍मान प्रदान किया. इससे पूर्व राजकमल प्रकाशन कृति सम्‍मान (हजारी प्रसाद द्विवेदी ‘कबीर’ पुरस्‍कार) से पुरुषोत्‍तम अग्रवाल की पांडुलिपि ‘अकथ कहानी प्रेमी की : कबीर की कविता और उनका समय’ को सम्‍मानित किया गया था. साभार : जनसत्‍ता

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