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गाजियाबाद में पत्रकारों की कीमत पांच सौ रुपये!

अभी तक अखबारों में विज्ञापनों की कीमत लगती थी, पेड न्‍यूज के रूप में समाचारों की कीमत लगती थी. अगर पत्रकारों की कीमत लगती भी थी तो इक्‍का-दुक्‍का की वो भी चोरी-चुपके. पर अब ऐसा लग रहा है कि पत्रकारों का रेट खुल चुका है. छोटे शहरों में सौ रुपये और बड़े शहरों में पांच सौ रुपये. बनारस में कुछ दिन पहले पत्रकारों की कीमत सौ रुपये लगी थी तो गाजियाबाद में इनकी कीमत पांच सौ रुपये लगाई गई.

अभी तक अखबारों में विज्ञापनों की कीमत लगती थी, पेड न्‍यूज के रूप में समाचारों की कीमत लगती थी. अगर पत्रकारों की कीमत लगती भी थी तो इक्‍का-दुक्‍का की वो भी चोरी-चुपके. पर अब ऐसा लग रहा है कि पत्रकारों का रेट खुल चुका है. छोटे शहरों में सौ रुपये और बड़े शहरों में पांच सौ रुपये. बनारस में कुछ दिन पहले पत्रकारों की कीमत सौ रुपये लगी थी तो गाजियाबाद में इनकी कीमत पांच सौ रुपये लगाई गई.

कल गाजियाबाद में एनएच 58 पर स्थित राजकुमार गोयल इंस्‍टीट्यूट एंड टेक्‍नॉलजी में वार्षिकोत्‍सव था. गाजियाबाद के ज्‍यादातर छोटे-बड़े अखबारों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था. कुछ बिना बुलाए भी पहुंच गए थे. पत्रकारों की जितना संभव था आवभगत की गई. कार्यक्रम खतम होने के बाद जब पत्रकार चलने लगे तो सभी को एक-एक लिफाफा थमाया जाने लगा. पत्रकार भी लिफाफा थामने लगे. संभवत: अंदाजा सभी को था कि इसमें क्‍या हो सकता है.

डग्‍गे के रूप में मिला लिफाफा लेने में कोई पीछे नहीं रहा. बाद में जब इन लोगों ने लिफाफा खोलकर देखा तो उसमें से पांच सौ रुपये का नोट निकला. कुछ पत्रकार जग जीतकर वहां से निकल लिए. कुछ पत्रकार इस पर आपत्ति जताने लगे. आपत्ति किए जाने की सुगबुगाहट देख कुछ और पत्रकार सरक लिए कि कहीं पैसा वापस न करना पड़ा जाए. कुछ बड़े बैनर के पत्रकारों ने अपनी आपत्ति प्रबंधन से जताई, उन्‍हें खरी-खोटी सुनाई तथा पैसा वापस कर दिया.

अब यह पता नहीं चला कि सचमुच में ये बड़े अखबारों के पत्रकार पैसा नहीं लेना चाहते थे या कम कीमत लगाए जाने के चलते उन्‍होंने आपत्ति जताई. क्‍योंकि संभवत: प्रेस कांफ्रेंस में जाने वाले पत्रकारों को इतना ज्ञान तो होता ही है कि एक लिफाफे के भीतर किस तरह का गिफ्ट हो सकता है. लिफाफ के भीतर नोट या चेक ही मिल सकता है, दीवार घड़ी, हाथ घड़ी, जग, लोटा, बाल्‍टी नहीं. यह पूछताछ तो लिफाफा लेने से पहले ही किया जाना चाहिए था.

खैर, वैसे भी परम्‍परा रही है कि प्रेस कांफ्रेंस या कार्यक्रमों में जाने वाले पत्रकारों को डग्‍गा के रूप में कुछ ना कुछ मिलता ही रहता है. हां तब उस स्थिति में वस्‍तु की कीमत नहीं बल्कि एक परम्‍परा मानकर पत्रकार रख लेते हैं. ये सामने वाले की आर्थिक ताकत और पत्रकारों से उसके संबंध पर निर्भर करता है. परन्‍तु अब ऐसा लगने लगा है कि पेड न्‍यूज का दौर आने के बाद पत्रकारों को भी लोग पेड पत्रकार समझने लगे हैं. यानी पेड करो और अपना न्‍यूज छपवा लो.

पर इसमें दिक्‍कत यह होने लगी है कि विज्ञापन में जहां प्रत्‍येक अखबार का रेट अलग-अलग होता है, वहीं इसमें सभी अखबार वालों को एक ही रेट में तौल दिया जा रहा है. शायद पैसा मिलने पर कुछ पत्रकारों के विरोध का यह भी एक कारण हो सकता है, कुछ सचमुच में विरोध करना चाहते हों, पर एक बात तो सच है कि अब पत्रकारों का खुला रेट लोगों को मालूम पड़ने लगा है. यानी पत्रकारों की अब यही औकात रह गई है. तो इसके लिए सिर्फ पैसे देने वाले ही नहीं खुद मीडिया के लोग भी उतने ही जिम्‍मेदार हैं.

उल्‍लेखनीय है कि अभी कुछ दिन पहले बनारस में सौ रुपये बांटे जाने की बात सामने आई थी. यहां भी एक पत्रकार को छोड़कर बाकी लोग पैसे लेकर चलते बने थे. गाजियाबाद में भी ऐसा ही हुआ. कुछ पत्रकारों को छोड़कर ज्‍यादातर लोग उस पैसे को लेकर चलते बने. अगर सबने विरोध दर्ज कराया होता तो एक बढि़या मैसेज जा सकता था, पर कुछ ने विरोध दर्ज कराया. यानी आधे से ज्‍यादा पत्रकारों की कीमत तो लोगों को पता चली ही गई.

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0 Comments

  1. shubham-Raghav austraila

    March 17, 2011 at 11:06 am

    WRITER AND COMENTES MAN MR KK….(M SURE U R NOT CHAUHAN)
    PLZ MIND ON YOUR LANGUAGE ABOUT JOURNLIST…
    TUMARI KYA AUKAT HAI TUMAREY LEKHAN SEY LAG RAHA HAI SALO SHARM KARO !!!

  2. faisal khan

    March 16, 2011 at 1:19 pm

    bhai ji sab jagah yahi haalat hain yahan saharanpur mai bhi patrkar log gift ya dagge ka lifafa lene ke liye kafi samay tak intazar karte rehte hain aur na milne par press confrence karne wale ki maa bahan ko gali dekar nikal jate hain .inki auqat dagge tak hi seemit reh gayi hai ab in patrkaron ko patrkar nahi balki daggamar kehna chahiye.inki auqat hi yahi hai.aur doosri baat ye hai ki zayadtar patrkar isi paise ki wajah se hi to is line mai aate hain.jai ho daggamar patrkaron ki,,m faisal khan(UNI.TV saharanpur)

  3. kk chauhan

    March 16, 2011 at 2:48 pm

    वाराणसी में सौ रुपये गाजियाबाद में 500 रुपये, बहुत है। मुरादाबाद में त¨ 20 रुपये से 50 रुपये कीमत रह गई है पत्रकारों की। हां बड़े अखबार के रिपोर्टर 100 रुपये का स्टेटस मेनटेन किए हुए हैं।

  4. pramod sharma

    March 17, 2011 at 3:45 am

    sharmnak…Neta ho ya Abhineta,Gov officer ho ya koi aur sab ki Imandari par sawal karne wale patrakaro ko kya Eiase kratya karte sharm nahi aati. unhe dusre par ungli uthane se pahle khud k gireban mai jhakna chahia. pichle kuch varso mai ghaziabad mai mea bhi es pavitra paishe mia girawat aaye hai eske peeche koi sanghthan ka na hona tatha koi controling na hona & bahut jaldi ameer banne ki mahatvakanchha jo patrkaro ko neeeche gira rahi hai………..yaad rakho jab tum dusre ki taraf Apne unli uthate ho to baki khud tum par uthti hai….sudhar jao..paisha kamana hai to koi aur dhandha kar lo yahan gandgi mat failao…

  5. toshik kardam

    March 17, 2011 at 5:28 am

    rahul… mujhe jhatak pta h sab hi lifafa chodh aaye the halaki virodh hmari taraf se hua tha..

  6. Manisha

    March 17, 2011 at 5:57 am

    ak Kahawat hai ki apni ijjat apna hath hai agar media ke log ak hokar nahi bolenge to ase hi kaudio ke bhav hi honge …yah sach hai ki paisa bahut imp hai lekin usse badkar patrkaro ka rutba hota kalam ki taakat ko bhunana jadatar patrkar bhul gaye hai …….. kuki ab patrkar proffessional ho gaye hai

  7. dinesh priyedarshi kanpur inext

    March 17, 2011 at 12:35 pm

    [i][b]ek chor blog par bhi yahi baatein
    [/b][/i]
    http://sachchiaawaj.blogspot.com/

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