: भाग-39 : मन से आज तक नहीं उतरा वो रंग : मेरठ की होली मशहूर रही है। खासकर पुराने शहर की। अब दूर तक जा बसे नये शहर में आभिजात्य प्रवृत्ति के कारण भले ही वहां होली के रंग फीके पड़ गये हों, पर पुराने शहर में अब भी ठसक वाली होली खेली जाती है। नौनिहाल बेशक सुन नहीं सकते थे और बोलते भी बहुत अस्पष्ट थे, पर त्योहारों पर उनका मूड देखते ही बनता था।
खासकर होली पर। वे पूरी तरंग में होते। उनका मानना था कि होली तो अपनी सुध-बुध खोकर खेलनी चाहिए। अपनों के साथ तो खेलो ही, अनजानों के साथ भी खेलो। तो एक बार नौनिहाल ने होली पर मेरठ भ्रमण का कार्यक्रम बनाया। उन्होंने कहा कि रंग की पुडिय़े, गुलाल और गुब्बारों के पैकेट लेकर निकला जाये। जहां जैसा मौका मिले और जैसी जरूरत लगे, वैसा इस्तेमाल कर लिया जाये।
सुबह नौ बजे नौनिहाल साइकिल पर सवार होकर कोतवाली के पास तोपचीवाड़ा में मेरे घर आ गये। मूंग की दाल की पकौडिय़ां खाकर और एक-दूसरे के चेहरे पर रंग पोतकर हम आगे बढ़े। घर से निकले ही थे कि मोहल्ले की सार्वजनिक होली में घेर लिये गये। वहां भट्टी पर बेहद बड़े कढ़ाव में टेसू के फूल उबाले गये थे। रात को वहीं होलिका दहन भी हुआ था। घिरा देखकर हमने अपनी साइकिलें किनारे लगा दीं और रंग लगवाने को खड़े हो गये। पहले हमारे चेहरों पर होलिका दहन की बची हुई राख पोती गयी। फिर बाल्टियां भरकर टेसू का रंग डाला गया। नौनिहाल मस्ती में इशारा करते रहे- और डालो, और डालो।
कपड़ों को निचोड़कर हम साइकिलों पर सवार हुए। सुभाष बाजार और बुढ़ाना गेट पर भी रंगे गये। चीन्हे न जा सकने वाले चेहरों के साथ पहुंचे सुभाष नगर गली नंबर एक में। ‘मेरठ समाचार’ के दफ्तर। उसी इमारत में राजेन्द्र गोयल रहते थे। वहां वे गुलाबी रंग में भीगे कुर्सी पर बैठे थे। रसरंजन का दौर चल रहा था। उनके बेटे दिनेश और अरविंद अपनी-अपनी मंडली के साथ रंग खेल रहे थे। नौनिहाल ने और मैंने बाबूजी (राजेन्द्र गोयल) के पैर छुए। उन्होंने अरविंद को आवाज दी, ‘अरे सुन। इन्हें भी गिलास दे।’ हमने हाथ जोड़ दिये। वे बोले, ‘तुम कई साल से पत्रकारिता कर रहे हो। पर अभी तक पक्के पत्रकार नहीं बने।’ हमने फिर हाथ जोड़ दिये। वे बोले, ‘चल अरविंद इन्हें गुंझिये तो खिला।’
और हम कई गुंझिये खाकर वहां से निकले। अगला पड़ाव था गली नंबर सात। ‘जागरण’ के फोटोग्राफर गजेन्द्र का घर। गजेन्द्र और उसका बड़ा भाई पवन घर के बाहर ही मिल गये। पहले गुलाल मला गया। फिर पानी के पाइप की ही बौछार कर दी गयी। अभी हम पानी पोंछ ही रहे थे कि पीछे से आकर गजेन्द्र के पिताजी ने हमारे बालों में गुलाल मल दिया। हमने उनके भी पैर छुए। गजेन्द्र कुछ खाने का आग्रह कर ही रहा था कि उसकी गली में रहने वाले मेरे कुछ दोस्त वहां पहुंच गये और गजेन्द्र सहित हमें खींचकर गली के बीचोंबीच ले गये।
छतों के ऊपर से पहले रंग और फिर पानी फेंका गया। गाने तो बज ही रहे थे। डांस भी शुरू हो गया। हमने नौनिहाल को पहली बार नाचते देखा। कमर मटकाकर और गोल-गोल घूमते हुए वे गाना न सुन पाकर भी दूसरों को नाचते देखकर नाच रहे थे। फिर वे जमीन पर लेट गये। और शुरू हो गया नागिन डांस। ये सिलसिला करीब एक घंटे चला। हमारे कपड़ों के ऊपर पानी और अंदर पसीना। कई जगह खूब खा चुकने के बावजूद फिर जोर की भूख लग गयी थी। गजेन्द्र हमें अपने घर ले गया। वहां हमने भरपेट नमकीन और जलेबी खायीं।
अब किधर? नौनिहाल ने इशारे से पूछा। मैंने कहा, जिमखाना मैदान। गजेन्द्र भी हमारे साथ हो लिया। हम तो साइकिलों पर थे, उसके पास मोपेड थी। वह हमारी गति से साथ-साथ चला। हम जिमखाना पहुंचे। वहां पूरे मैदान पर कपड़ा-फाड़ होली चल रही थी। वहां से हम चुपचाप खिसक लिये। नौनिहाल साइकिल पर सवार होकर सरपट भागे। गजेन्द्र ने कहा कि मंगलजी के घर चलते हैं। हमने साकेत की सड़क पकड़ी। रास्ते में जगह-जगह होली का मजा लेते हुए मंगलजी के घर पहुंचे। घर के बाहर लॉन में विश्वेश्वर गिलास लिये झूम रहा था। हमें देखते ही दौड़कर आया। बोला, आज नहीं बचोगे। बहुत दिनों से ताक में था। आज तो तुम्हें चखाकर छोडूंगा।
हमने उससे भी हाथ जोड़ लिये। तब तक गजेन्द्र उसका गिलास झपटकर बचा हुआ रस-सेवन कर चुका था। इतने में मंगलजी अंदर से निकले। वे भी झूम रहे थे। गजेन्द्र से कहा, कमरे में रखी है। यहीं ले आओ। गजेन्द्र फुर्ती से गया। बोतल, गिलास और समोसों का झब्बा उठा लाया। बोला, ये तो अमृतपान ना करने वाले दैत्य हैं। हम देवता तो पान कर लें। लॉन में ही उनका रसपान शुरू हो गया। विश्वेश्वर अपनी धुन में था। लोकगीत जैसी कुछ चीज गाये जा रहा था। पर स्पष्ट सुनायी नहीं दे रहा था। दरअसल वह कुछ ज्यादा ही तरंग में था। शायद सुबह से ही मंगलजी के यहां जमा था। और अब एक से ज्यादा का वक्त हो रहा था। गजेन्द्र उसके बराबर में बैठ गया। बोला, अबे जोर से गा। कुछ सुनायी तो पड़े, क्या गा रहा है।
विश्वेश्वर ने फिर गाया। पर अब भी हमारे पल्ले कुछ नहीं पड़ा। नौनिहाल ने हाथ से इशारा किया कि क्या माजरा है। मैंने बताया कि विश्वेश्वर कुछ गा रहा है, पर कुछ समझ नहीं आ रहा है। नौनिहाल ने कहा, फिर तो मैं गाता हूं। वह भी समझ में नहीं आयेगा। और वे सचमुच घास पर पालथी मारकर बैठ गये। एक हाथ कान पर लगाया, दूसरा आसमान की तरफ उठाया। किसी शास्त्रीय गायक की तरह ‘आ …आ …आ …’ किया, मानो सुर मिलाया जा रहा हो। और फिर उन्होंने एक के बाद एक कई लोकगीत गाये।
आवाज जरूर अस्पष्ट थी, पर ध्यान से सुनने पर कुछ-कुछ शब्द पकड़ में आ रहे थे। भाभी… गाल… बरजोरी… होरी… गुलाल… लाल… फागुन… मनरसिया… चितबसिया…पूरी धुन में थे नौनिहाल। फिर उठकर नाचने लगे। विश्वेश्वर बैठे-बैठे ठुमकने लगा। मंगलजी को भी रस आ गया। होली है, होली, होली, होली… वे भी लय में बोलने लगे। इस बीच, ‘जागरण’ के कुछ कंपोजिटर और प्रेसमैन भी आ गये। एक थे पहलवान। खूब हट्टे-कट्टे। भांग की तरंग में वे भी गाते हुए आये। फिर क्या था? और भी रंग जम गया।
घर के अंदर से गजेन्द्र खाने के लिए थाली में भरकर जो भी लाता गया, वह चुटकियों में साफ होता गया। फिर सबके नाम धरे गये। यह सब एकदम त्वरित था। कागज-कलम तो साथ था नहीं कि लिख लिया जाता। कहने वालों ने भी कह दिया और फिर भूल गये। इसका सचमुच आज भी दुख है कि वे रचनात्मक टाइटल आज किसी को भी याद नहीं हैं। पर उस समय तो सबका सुन-सुनकर हंसी के मारे बुरा हाल हो गया था। मंगलजी लॉन में लेटे पेट पकड़े हंस रहे थे। आखिरी थाली खाली करके मंडली मंगलजी को नमस्कार करके चली, तो मंगलजी ने कहा, मने मजा आ गया। ऐसी होली तो हमारी कभी बनारस में हुई ना कानपुर में। सच में मजा आ गया।
साकेत से स्टेडियम तक आकर सबने अपनी-अपनी राह ली। सुभाष नगर में गजेन्द्र ने हमसे विदा ली। नौनिहाल को मैंने हनुमानपुरी में उनकी गली के बाहर छोड़ा। साढ़े तीन बजे घर पहुंचा, तो सब नहा-धोकर मेरा इंतजार कर रहे थे। डांट भी पड़ी। लेकिन पूरा किस्सा सुनकर घरवाले मान गये कि ऐसी जोरदार होली मैंने पहले भी नहीं खेली थी। तन से वह रंग उतारने में कई हफ्ते लग गये… मन से तो आज तक नहीं उतरा है!
लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.











