
अन्नू आनंद
हकीकत तो यह है कि अभी तक राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कोई सर्वे नहीं हुआ जिसमें देश के 76 प्रतिशत लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों की इच्छाओं और आकंक्षाओं को भी शामिल किया गया हो और जो ये बताए कि मीडिया में जो दिखाया जा रहा है वे उनकी पसन्द और इच्छाओं के अनुरूप है। पिछले दिनों एक चैनल के राजनीतिक संपादक ने मीडिया के मौजूदा चरित्र को सही ठहराने की कोशिश में लिखा कि जनता की पसन्द दिल्ली के बड़े सेमिनारों में आए लोगों से तय नहीं की जा सकती उसके लिए ‘जमीं पर जाना होगा।’ बिल्कुल सही कहा। लेकिन उसके साथ ही यह जानना भी जरूरी है कि जमीन पर जाने का अभिप्राय केवल कुछ चुनिन्दा और मध्यवर्गीय लोगों की पसन्द नहीं बल्कि देश की बहुसंख्यक जनता की रुचियों से है जो अक्सर मीडिया से गायब रहती है। अफसोस तो इसी बात का है कि शहरों से बाहर निकलकर कभी इस बात का पता लगाने की कोई सार्थक कोशिश ही नहीं की गई कि गावों के लोग जो देश की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा हैं, क्या चाहते हैं— ‘जमीन’ पर जाकर गांवों के उन सभी लोगों को शामिल करके देखिए जो देश की अधिकतर जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन फिर भी ‘टैम’ से बाहर हैं, तो पता चलेगा कि लोगों की सोच अभी भी कुंठित नहीं हुई।
शहरों से बाहर ग्रामीण लोगों की राय जानने के एक प्रयास से यह सबक मिल जाएगा कि गावों के लोग समाचारों में शेयर-मार्केट, फिल्मी सितारे, भूत-प्रेत, फैशन या खान-पान से कहीं अधिक ऐसे प्रयासों, सरोकारों को देखना चाहतें हैं जिससे उनके रोजमर्रा के जीवन में सुधार हो सके। कम से कम समाचार चैनलों से तो वे सच और वास्तविक जीवन से जुड़ी घटनाओं और समस्याओं की खबरों की ही उम्मीद करते हैं। असली भारत का यह बहुसंख्यक समाज इस बात को अच्छी तरह समझता है कि बड़ी हस्तियों को जानने या फिर चमत्कारों और भविष्य को जानने-समझने की भूख मनोरंजन चैनलों से भी पूरी हो सकती है। लेकिन पेट की भूख को शांत करना है तो उनके लिए नए रेस्त्रां या किसी नए प्रोडेक्ट के लांच (जो अक्सर न्यूज का हिस्सा बनते जा रहे हैं) से कहीं अधिक यह जानना जरूरी है कि गावों की राशन की दुकानों में राशन क्यों नहीं पहुंच रहा। कुपोषण आखिर कौन सी बला है जो चैनलों पर दिखाई जाने वाली ‘प्रलय’ या ‘स्वाइन फ्लू’ से भी अधिक बच्चों की जानें ले रही है। गावों और कस्बों में यह सोच निरन्तर फैल रही है कि मीडिया में आम आदमी और उसके सरोकार गायब क्यों है? अखबार और टीवी केवल बड़े लोगों और सनसनीखेज घटनाओं तक ही सिमटता क्यों जा रहा है? अपने तर्क के सन्दर्भ में यह बताना जरूरी होगा कि पिछले कुछ वर्षों में ग्रासरूट पत्रिका के संपादक होने के नाते मुझे करीब 15 राज्यों के छोटे कस्बों से लेकर दूर-दराज के असंख्य गावों का दौरा करने का मौका मिला। हर दौरे में गावों के चबूतरों पर हुई ग्रामीणों के साथ बैठकों, स्थानीय कार्यकर्ताओं से लेकर कसबों के आम लोगों और लोकल पत्रकार बिरादरी के साथ हुईं सभी बैठकों में मीडिया का कंटेंट खास चर्चा का विषय रहा। एक ही सवाल मुझे बार-बार मीडिया का नुमाइन्दा होने पर शर्मसार कर देता कि मीडिया में आम आदमी गायब क्यों है। मैं थोड़ा झेंपते हुए उन्हें भरोसा दिलाने की कोशिश करती कि जब महज एक प्रतिशत लोगों से जुड़े शेयर मार्केट की खबरें अखबारों और चैनलों की हेडलाइन्स बन सकती हैं तो फिर आम आदमी से जुड़े सरोकार और विकास की खबरें क्यों नहीं। मीडिया पर हुई हर चर्चा इस तर्क को और मजबूत करती कि दर्शक या पाठक बेवकूफ नहीं।
ऐसा नहीं कि गांव और विकास की खबरें मीडिया का हिस्सा बिल्कुल नहीं है लेकिन मुझे गुस्सा इस बात की है कि अधिक लोगों के मसले अखबारों में केवल कुछ सेंटीमीटरों में और चैनलों में कुछ मिनटों तक ही सिमट कर क्यों रह जातें हैं? लाइफस्टाइल, भूत-प्रेत, भगवानों, चमत्कारों ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों से लेकर शेयर मार्केट तक के लिए या तो अलग चैनल और पन्ने हैं या उनके लिए निर्धारित स्लॉट हैं। लेकिन शिक्षा, भुखमरी, कृषि, कुपोषण, रोजगार जैसे मसले जो हमारे समाज का बड़ा सच है उसे हम नज़रअदांज कर यह मानकर चल रहे हैं कि लोग यही देखना चाहते हैं। अरे, अगर आप प्रोडेक्ट बेच रहे हैं तो उपभोक्ता को नासमझ भी मत समझें।
अभी गावों ओर कस्बों से निकले और ऐसी समस्याओं को उठाने का मिशन लिए पत्रकारिता में आने वाले मेरे वे साथी जो आज चैनलों और अखबारों के शीर्ष पदों पर बैठे हैं, ऐसे सवाल पर झट ‘टीआरपी’ ओर विज्ञापनों की कमी का रोना लेकर बैठ जाएंगे। कैरियर और मीडिया की आर्थिक मजबूरी का दम भरते हुए इन बातों की आलोचना करते हुए कहेंगे कि नैतिकता का पाठ पढ़ाना आसान है लेकिन मीडिया की आर्थिक व्यवस्था को सही रखने का गणित और है। ठीक है भई, अगर व्यापार ही करना है तो फिर मीडिया का क्यों? यह नहीं भूलना होगा कि कई प्रकार की सहूलियतों और विशेषाधिकारों से खड़े किए गए इस मीडिया (जिसे व्यापार मान रहे हैं) से लाखों लोगों के हित जुड़े हैं। इस धंधे में तो भले ही ‘प्रोडेक्ट’ कितना भी खराब हो, किसी कंज्यूमर कोर्ट में सुनवाई भी नहीं होती।
अजीब बात यह है कि अधिकतर मेरे हमपेशी विचार गोष्ठियों और सेमीनारों में अपनी व्यावसायिक मजबूरियों को स्वीकारने और कोई रास्ता निकालने की बजाय यह कहते नहीं थकते कि मीडिया तो समाज का आईना है और वह वही दिखाता है जो समाज में होता है और यही पत्रकार का धर्म है। कुछ समय पहले मीडिया पर हुई एक ऐसी ही गोष्ठी में एक दैनिक समाचार पत्र के प्रबंध संपादक ने ऐसे ही विचार रखे। लेकिन यह धर्म केवल एक विशिष्ट यानी इलीट वर्ग के प्रति क्यों निभाया जाता है। एनडीटीवी सहित कई अन्य चैनल कोहरे के कारण केवल फ्लाइटों के कैंसल होने से यात्रियों को होने वाली कठिनाइयों की खबर देता है। लेकिन 200 के करीब रेलगाड़ियों के प्रभवित होने और यात्रियों के प्लेटफार्मों पर बैठने की खबरें दूरदर्शन दिखाता है। अगर मीडिया समाज का आईना होने का दावा करता है तो माफ कीजिए हमारा देश केवल सांप बिच्छू स्वयंवर, उत्सवों, आयोजनों से भरा नहीं।
पिछले दिनों एक चैनल के संपादक ने हिम्मत दिखाते हुए इस बात को स्वीकारा कि टीवी ने पत्रकारों को ‘टीआरपीबाज’ बना दिया है और संपादकों को ‘ब्राण्ड मैनेजर’, इसलिए पत्रकारिता के सही मायने खो गए हैं। सम्भव है इससे बहुत से अन्य संपादकों को भी अपने छोटे होते कदों का अहसास हो और वे टीआरपी के भम्रजाल से बाहर निकल समाज का वास्तविक आईना बनने के प्रयासों को तेज करें।
लेखिका अन्नू आनंद वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे अनसुनी आवाज नामक अपने ब्लाग पर भी गाहे-बगाहे लिखती रहती हैं.












Rajesh Ravi
February 6, 2010 at 8:59 am
chalo annu ji ne kuch soch to sahi.kuch dusare sathi soche to rah badal sakti he.Rajesh Ravi
JABALPUR
February 6, 2010 at 9:09 am
ये सही है की अख़बारों और इलेक्ट्रोनिक मिडिया से आम आदमी का दूर दूर तक नामोनिशान नहीं है | मीडिया अपनी पहचान खोता जा रहा है दिन प्रतिदिन नए नए मीडिया आ आगाज होता जा रहा है | लेकिन मीडिया में समाज में रहने वाले एक आम आदमी की खबर छापने और दिखने को नहीं मिलती | ऐसा लगता है की मीडिया केवल उन्ही लोगों को महत्व देना चाहता है जिनसे उसे फायदा हो | आज अख़बारों को जनता के बीच में पहचान और वजनदारी बनाने के लिए लालच का सहारा लेना पद रहा है | अख़बार को बेचने के लिए अनेक वस्तुओं को गिफ्ट के रूप में जनता को दिया जा रहा है | आज अखबार प्रोडक्ट हो गए है जिस अखबार में जितना बड़ा गिफ्ट जनता को दिया जायेगा जनता उसे ही खरीदेगी | इस प्रकार अखबार पत्रकारिता के मिशन से भटक गए है इसलिए आज एक आम आदमी को मीडिया में जगह नहीं मिल पा रही है |
hiralalkashya, Bilaspur
May 9, 2010 at 12:40 pm
hum bachpan me padte the ki media prajatanta ki chautha khambha hai/ media samaj ka darpan hai tab hame ya nahi pata tha ki koi bhi news sampadak ya kahe media malik ke sahmati ke bina news nahi ban sakta / isse news banane ke liye kafi mota sauda kiya jata hai. piChhle dino yah khabar aayi thi ki – sarkar bachane hetu sasand kharidne hetu kiya gya sting operation ko media me nahi chalaya ja ska kyoki unhe iska paryapt bhugtan nahi mila tha . phir media ke kis baat per aur kyo bharosa kare .ok