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श्रवण गर्ग ‘राष्ट्रीय क्रांतिवीर एवार्ड’ से सम्मानित

श्रवण गर्गभास्कर समूह के ग्रुप एडिटर और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग को वर्ष 2009 के ‘राष्ट्रीय क्रांतिवीर अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। उज्जैन में 4 अप्रैल को आयोजित एक समारोह में उन्हें इस पुरस्कार से नवाजा गया। पुरस्कार स्वरूप उन्हें 21 हजार रुपये, रजत मशाल, शॉल, श्रीफल व अभिनंदन पत्र भेट किया गया। यह अवार्ड समाजसेवी व स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र रघुवंशी ‘काकाजी’ की स्मृति में हर साल आयोजित किया जाता है। इस बार एवार्ड का ग्यारहवां साल था। पुरस्कार की शुरुआत 1999 में की गई थी।

श्रवण गर्गभास्कर समूह के ग्रुप एडिटर और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग को वर्ष 2009 के ‘राष्ट्रीय क्रांतिवीर अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। उज्जैन में 4 अप्रैल को आयोजित एक समारोह में उन्हें इस पुरस्कार से नवाजा गया। पुरस्कार स्वरूप उन्हें 21 हजार रुपये, रजत मशाल, शॉल, श्रीफल व अभिनंदन पत्र भेट किया गया। यह अवार्ड समाजसेवी व स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र रघुवंशी ‘काकाजी’ की स्मृति में हर साल आयोजित किया जाता है। इस बार एवार्ड का ग्यारहवां साल था। पुरस्कार की शुरुआत 1999 में की गई थी।

इसे शुरू स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र रघुवंशी ‘काकाजी’ के निधन के बाद उनके इकलौते पुत्र प्रकाश रघुवंशी ने शुरू किया था। यह सम्मान अब तक तरुण तेजपाल, अनिरुद्ध बहल, सुनील दत्त, मनोज कुमार, मेधा पाटकर, किरण बेदी,  राजेंद्र सिंह एवं रामानंद सागर को भी दिया जा चुका है। श्रवण गर्ग को ‘अर्पित विजयवर्गीय स्मृति सम्मान’ से भी सम्मानित किया गया। 4 अप्रैल को उज्जैन में आयोजित सम्मान समारोह में कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति डा. मोहन गुप्त ने की। विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति डा. शिवपाल सिंह अहलावत, समाजसेवी और उद्योगपित ओम खत्री, संत सुमन भाई, आचार्य श्रीनिवास रथ, स्वतंत्रता सेनानी अवंतिलाल जैन, पवन जैन आदि गणमान्य जन इस समारोह में मौजूद थे।

इस मौके पर अपने संबोधन में श्रवण गर्ग ने बदलते समय-समाज और पत्रकारिता के परिदृश्य पर प्रकाश डाला। भास्कर समूह के ग्रुप एडिटर श्रवण गर्ग ने जो कुछ कहा, उसका सार इस प्रकार है- ”…लोग आज के जमाने की पत्रकारिता पर अफसोस जताते हैं लेकिन वे चीजों को संपूर्णता में नहीं देखते। पहले नदियां पानी से लबालब भरी रहती थीं, अब उनमें पानी नहीं रह गया है। पहले शहरों में पेड़ों की हरियाली हुआ करती थी, अब पेड़ नहीं दिखते हैं। समाज बदला है। चेहरे बदले हैं। खानपान, पहनावा व शिक्षा-दीक्षा बदली है। लोगबाग अतीत में झांकते हुए कुछ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसे कोई आदमी सिर पीछे कर ले और आगे की ओर चले। ऐसे लोग गिर जाते हैं। अतीतजीवी होने से बेहतर है हम लोग भविष्य की ओर देखें। पहले आदमी सुबह 10 बजे खा-पीकर घर से नौकरी पर निकलता था और शाम पांच बजे घर पहुंचता था तो पत्नी गेट पर इंतजार करती मिलती थीं। अब सुबह होते ही बच्चे लैपटाप लेकर घर से निकल जाते हैं और देर रात घर पहुंचते हैं। नए दौर में जीवनशैली बदली है। युवा तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत में युवा बहुतायत हैं। युवाओं की इस सक्रियता से देश तरक्की की ओर पढ़ चला है। भारत जिस गति से तरक्की कर रहा है, वो तरक्की भी देखनी चाहिए न कि अतीतजीवी होना चाहिए…”

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