पिछले दिनों साहित्य अकादमी, दिल्ली के रबीन्द्र भवन में प्रणय कृष्ण को ‘देवीशंकर अवस्थी सम्मान’ से सम्मानित किया गया। ये पुरस्कार उन्हें उनकी किताब ‘उत्तर औपनिवेशिकता के स्रोत’ पर दिया गया। पुरस्कार कृष्णा सोबती ने प्रदान किया। इस सम्मान के तहत प्रशस्ति-पत्र, स्मृति-चिह्न, 11000/- की सम्मान राशि और कागज- कलम प्रदान किया जाता है। पुरस्कार के निर्णायक मंडल में मंगलेश डबराल, कृष्णा सोबती, अशोक वाजपेयी, विश्वनाथ त्रिपाठी और चंद्रकांत देवताले हैं। इस मौके पर निर्णायक मंडल की तरफ से जारी प्रशस्ति पत्र का पाठ किया गया। इसमें कहा गया है…
“अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ प्रणय कृष्ण मार्क्सवाद और उत्तर आधुनिकता के बीच चलने वाली जिरहॊं को भी अपनी पड़ताल में शामिल करते हुए औपनिवेशिकता, नस्लवाद, अश्वेतवाद, निम्नवर्गीयता, नवजागरण, स्त्री और दलित अस्मिताओं की भी एक बड़ी अंतर्दृष्टि के साथ पड़ताल करते हैं। शोधग्रंथ के रूप में लिखी गई यह कृति हिंदी में इस विषय पर उपलब्ध सामग्री के अभाव को बहुत हद तक पूरा करती है और इसकी रचना में जितना श्रम लगा है वह भी अलग से रेखांकित करने योग्य है। उत्तर आधुनिक साहित्यिक और साहित्येतर वैचारिकी को भारतीय यथार्थ के संदर्भ में जांचने की दृष्टि से यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है।”
सम्मान समारोह के बाद “साहित्य का दिक्काल” विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस मौके पर स्वर्गीय देवीशंकर अवस्थी की याद में संस्मरण की किताब “आत्मीयता के विविध रंग” का विमोचन अजित कुमार ने किया। कार्यक्रम का संचालन युवा आलोचक संजीव ने किया। इस अवसर पर साहित्य, पत्रकारिता और कला जगत के कई जाने-माने लोग मौजूद थे।











