दूसरे अखबारों ने इन पर टिकाई आंखें : दैनिक भास्कर का दूसरा नेशनल टैलेंट पूल खत्म होने की ओर है. भास्कर ने इस टैलेंट पूल के लिए 5 महीने की लम्बी चौड़ी प्रक्रिया के बाद देशभर से 17 प्रतिभावान पत्रकारों को चुना और उन्हें करीब तीन माह तक भोपाल में ट्रेनिंग दी. ट्रेनिंग के लिए बाकायदा हिन्दुस्तान से धर्मेंद्र पाल सिंह, अजित गांधी और अमर उजाला से आलोक भदोरिया को तैनात किया था. 4 मार्च को शुरू हुई टैलेंट पूल की ट्रेनिंग लगभग पूरी हो चुकी है.
आज कल भास्कर के नेशनल एडिटर कल्पेश याग्निक इन लोगों को अलग अलग स्टेशनों पर भेज रहे हैं. ट्रेनिंग के अंतिम दौर में इन पत्रकारों के पद तय हो गए थे लेकिन उन्हें इसके बिलकुल उल्ट जगह जाने को कहा जा रहा है. इससे इन लोगों में रोष है और ऐसे में दूसरे अखबार इन टैलेंटेड पत्रकारों पर अपनी नज़र टिकाये हैं. इस बार का टैलेंट पूल पिछली बार से काफी अलग रहा. पिछली बार जहां 13 लोगों को कल्पेश याग्निक ने खुद चुना था और उन्हें अच्छी पोस्टों पर तैनात किया था लेकिन इस बार टैलेंट पूल के लिए लोगों से बाकायदा आवेदन मांगे गये और फिर उनके इंटरव्यू लिए गए. यानी इस बार का तरीका ज्यादा प्रोफेशनल था.
पिछली बार का टैलेंट पूल जहाँ कल्पेश याग्निक के अंडर चला था वहीँ इस बार यह पूरी तरह भास्कर के मैनेजिंग एडिटर यतीश राजावत की देखरेख में चला. सबसे बड़ी बात ये है कि इस बार जहां टैलेंट पूल के लोगों को पोस्टिंग के समय न तो पद के बारे कुछ बताया जा रहा है और न ही पैसों के बारे में. जबकि पिछली बार टैलेंट पूल में आये लोगों को केवल 15 दिनों की ट्रेनिंग के बाद मोटी सेलरी के साथ अच्छे पद दे दिए गए थे. इस बार ऐसा न होने से टैलेंट पूल में आये प्रतिभावान पत्रकार अपने आप को ठगा महसूस कर रहे हैं.
इस बार टैलेंट पूल में शामिल भोपाल के राजेश माली को स्टेट ब्यूरो से भोपाल में ही सिटी चीफ़ और डीएनई ए. जयजीत को स्टेट ब्यूरो में लगा दिया गया है. इन दोनों को पुरानी सलेरी पर ही पोस्टिंग दी गयी है जबकि भोपाल के ही सतीश अलिया को अभी तक कोई पोस्टिंग नहीं मिली है. नीमच से आये राकेश से पहले 10 दिन भोपाल सिटी में काम करवाया गया और अब उन्हें ग्वालियर जाने को कह दिया गया है. बताया जाता है कि राकेश भोपाल में रह कर स्टेट ब्यूरो में काम करना चाहते थे. इंदौर की दक्षा से पहले भोपाल सिटी भास्कर में 7 दिन तक काम लिया गया और फिर उन्हें 15 दिन के लिए ग्वालिअर सिटी भास्कर में काम करने को कहा गया. एक दिन ग्वालिअर सिटी भास्कर में काम करने के बाद अब दक्षा को ग्वालिअर डीबी स्टार में काम करने को कहा गया है. रायपुर के अमित स्वप्निल फीचर डेस्क पर काम करना चाहते थे लेकिन अभी तक उन्हें यह काम नहीं मिल पाया है. मध्य प्रदेश और बिहार में काम करने के इच्छुक ग्वालियर के संजय सिंह से दो हफ्ते तक राजस्थान के अखबार की समीक्षा करवाने के बाद उन्हें रांची जाने को कह दिया है. फ्रंट पेज में काम करने की इच्छा जताने वाले गुना के अतुल गुप्ता को डीबी स्टार इंदौर भेजा गया है.
राजस्थान के उदयपुर से आये निरंजन शुक्ला से पहले कहा गया कि उन्हें रांची जाना है. इसके लिए उनसे एक हफ्ते तक रांची के अखबारों क़ी समीक्षा भी करवाई गयी लेकिन बाद में अचानक निरंजन को भोपाल डीबी स्टार में लगा दिया. बीकानेर से आये हरीश बी. शर्मा से 10 दिन तक मैग्जीन की समीक्षा करवाने के बाद बिना कोई पोस्ट और पैसे बढ़ाए जयपुर भेज दिया गया है. उनसे कहा गया है कि उनके बारे में फैसला राजस्थान के स्टेट हेड नवनीत गुर्जर करेंगे. कुछ ऐसा ही सूरत के राजा शैख़ और शिमला के प्रकाश पालीवाल के साथ हुआ. राजा शैख़ को बिना कोई पोस्ट और पैसे बढाए गुजरात के स्टेट हेड अजय उमट के पास भेज दिया गया है. राजा सूरत में ही डीबी गोल्ड को हेड करना चाहते थे. प्रकाश पालीवाल को पहले चंडीगढ़ भेज कर 10 दिन बाद वापस भोपाल में बुलाया गया. अम्बाला में काम करने क़ी उम्मीद से गए प्रकाश इससे बेहद दुखी हैं.
जालंधर से आई वंदना खन्ना को पहले चंडीगढ़ सिटी लाइफ में काम करने को कहा गया और फिर अचानक उन्हें भोपाल में ही नेशनल न्यूज़ रूम में लगा दिया गया. हिसार के मधुरेंद्र श्रीवास्तव को 3 दिन के लिए ग्वालियर भेजा गया था. उनकी भूमिका भी संस्थान अभी तक तय नहीं कर पाया है.
सीपीएच में काम करने क़ी इच्छा जताने वाले चंडीगढ़ के रणदीप वशिष्ट को अभी कोई स्टेशन नहीं मिला है. हालाँकि उन्हें 10 दिन के लिए उज्जैन भेजा गया था. राजस्थान जाने के इच्छुक चंडीगढ़ के रोहित चौधरी को रांची जाने को कहा गया है. उन्हें भी अभी तक पोस्ट और पैसे के बारे में कुछ नहीं बताया गया है. शिमला के हेम सिंह ठाकुर को भी यह कहते हुए रांची भेज दिया गया है कि वहां जाकर शहर कि स्टडी करो. हेम सिंह ठाकुर के पद और पैसों के बारे में भी भास्कर ने अभी तक कुछ साफ़ नहीं किया है.
पोस्ट और पैसे के बारे में कुछ भी नहीं बताये जाने से आहत टैलेंट पूल के कई मेम्बर दूसरे अखबारों के संपर्क में हैं और अच्छा ऑफर मिलते ही भास्कर को बाय बाय कह सकते हैं. दूसरे अखबार भी इन लोगों को अपने साथ जोड़ने का यह मौका चूकना नहीं चाहते क्योंकि बिना कोई मेहनत किये अगर ट्रेंड लोग उन्हें मिल जाएँ तो उनके लिए सोने पर सुहागा. तेजी से बढ रहे दैनिक भास्कर ने इन लोगों की ट्रेनिंग पर लाखों रुपये खर्च किये हैं और भास्कर की रफ़्तार से दूसरे अखबार सहमे हुए हैं. ऐसे में वह भास्कर को नुकसानन पहुंचाने का यह अवसर छोड़ना नहीं चाहते.












BIJAY SINGH
May 13, 2010 at 5:43 pm
YE REGUALAR ROUTINE HAI .
JOIN KARNE KE PAHLE CLEAR KAR KE HI JOIN KARO BHAIYON BAHNO.
नरेश कुमार गुप्ता
May 13, 2010 at 5:43 pm
हिन्दी अखबारों में नौकरी चाहने वालों को मालिकान ही नहीं, संपादक भी गुलाम समझते हैं। प्रोफसनलिज्म तो हिन्दी अखबारों में है ही नहीं और अगर टैलेंट पूल के पत्रकारों का ये हाल है तो छोटे शहरों के फटीचर अखबारों में काम करने वाले मामूली पत्रकारों की दशा का अंदाजा लगाया जा सकता है। दुख की बात ये है कि दुनिया की लड़ाई लड़ने वाले ये पत्रकार अपनी लड़ाई नहीं लड़ पाते हैं और भड़ास जैसी साइटें जब नहीं थीं तो इसकी जानकारी सिर्फ भोगने वालों को ही थी। सरकार का कोई नियम कानून इन अखबार वालों पर नहीं चलता ऊपर से ऊल्लू बनाकर अपना ऊल्लू सीधा करने से भी इन्हें कोई रोक नहीं पा रहा है। धन्य है हिन्दी अखबारों की दुनिया। अच्छी नौकरी का सब्जबाग दिखाकर टैलेंट पूल बनाने वालों को काम के कुछ लोग मिल ही जाएंगे और जब तक इनलोगों को समझ आएगा कि यह नौकरी गुलामी से भी गई बीती है तब तक बहुत देर हो गई रहेगी।
Rishi Naagar
May 13, 2010 at 7:31 pm
Bhaskar aur Jagran dono maansik deewaliye hain…apne talent ke saath khilwaad karna inki aadat hai…rishtedaari nahi to kuchh nahi…Lekin talent ko koi fark nahi padta…in bhai logo ko zaroor behtar kaam mil jayega…Bhaskar ko hi reporter nahi milenge…
SUBHASHSISH ROY
May 17, 2010 at 3:28 am
Good Report Yashwantji.Keep it up.
Subhashish Roy, Jharkhand.