‘लोग बढ़ते ही गए जब सीढ़ियां दर सीढ़ियां’

भोलानाथ कुशवाहा को उनके एकमात्र कविता संग्रह के लिए ‘राजेंद्र बोहरा स्मृति काव्य पुरस्कार‘ मिलना इस बात का सूचक है कि गुमनाम रचनाधर्मियों की तलाश अब भी जारी है। यह सम्मान उम्मीद जगाता है कि जमीन से जुड़ा लेखन जिंदा रहेगा। भोलानाथ जी ने पत्रकारिता के साथ आम लोगों की पीड़ा को अपनी कविताओं में जगह दी है।

मैं उन्हें संपादकजी कहता रहा हूं, पर उनकी कविताओं का कायल अधिक हूं। इस सम्मान ने मेरे साथ दूसरे लोगों के भी इस भरोसे को पुख्ता किया है कि वे आम जन के ही कवि हैं। इस पर विस्तार से बातचीत हो सकती है। अभी तो उन्हीं की यह पंक्ति देखें-

लोग बढ़ते ही गए जब सीढ़ियां दर सीढ़ियां

हम बनाने में लगे थे सीढ़ियां

-प्रभात ओझा

सीनियर प्रोड्यूसर, एमएच1 न्यूज

दिल्ली

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