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‘द डेली मेल’ और ‘द सन’ पर भी थू-थू

ऐसा नहीं है कि अपने देश के ही अखबार सनसनीखेज खबरें प्रकाशित करने के चक्कर में लोगों के जीवन की ऐसी-तैसी करते हैं. दरअसल ज्यादा प्रसार और ज्यादा बिजनेस पाने के लिए अखबार नंबर वन बनने की होड़ में लग जाते हैं और बिना जांचे-पड़ताले कई खबरें छाप देते हैं ताकि वे खुद को सबसे आगे दिखा सकें. पर इसी चक्कर में कई बार मुसीबत भी खड़ी हो जाती है. आगरा में दैनिक जागरण अखबार ने एक रेलवे अधिकारी को बिना जांच पड़ताल के एड्स पीड़ित घोषित कर दिया और बाद में छोटा सा खंडन छाप दिया. इसी तरह का मामला ब्रिटेन में हुआ है. दो अखबारों ने एक शरणार्थी तमिल आंदोलनकारी पर भूख हड़ताल के समय बर्गर खाने का आरोप लगाया है.

ऐसा नहीं है कि अपने देश के ही अखबार सनसनीखेज खबरें प्रकाशित करने के चक्कर में लोगों के जीवन की ऐसी-तैसी करते हैं. दरअसल ज्यादा प्रसार और ज्यादा बिजनेस पाने के लिए अखबार नंबर वन बनने की होड़ में लग जाते हैं और बिना जांचे-पड़ताले कई खबरें छाप देते हैं ताकि वे खुद को सबसे आगे दिखा सकें. पर इसी चक्कर में कई बार मुसीबत भी खड़ी हो जाती है. आगरा में दैनिक जागरण अखबार ने एक रेलवे अधिकारी को बिना जांच पड़ताल के एड्स पीड़ित घोषित कर दिया और बाद में छोटा सा खंडन छाप दिया. इसी तरह का मामला ब्रिटेन में हुआ है. दो अखबारों ने एक शरणार्थी तमिल आंदोलनकारी पर भूख हड़ताल के समय बर्गर खाने का आरोप लगाया है.

इन दोनों अख़बारों के नाम हैं ‘द डेली मेल’ और ‘द सन’. तमिल आंदोलनकारी का नाम है परमेश्वरम सुब्रह्मण्यम. पर ब्रिटेन के इन दोनों अखबारों ने यह खबर प्रकाशित की थी कि इस शरणार्थी ने अपने भूख हड़ताल के दौरान बर्गर खाया था. इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि ‘द डेली मेल’ और ‘द सन’ अखबार में प्रकाशित लेखों से पी सुब्रह्मण्यम की अखंडता व उपलब्धियों को नुकसान पहुंचा है.

अदालत के फैसले के बाद सुब्रह्मण्यम खुश हैं. उन्होंने कहा कि- पिछले आठ महीने उनके जीवन के काफी तनाव भरे दिन थे. अखबारों में मेरे बारे में प्रकाशित इस झूठ की वजह से, जिसमें मेरी कोई ग़लती नहीं थी, मैंने अपने दोस्तों को खो दिया, परिवार ने किनारा कर लिया और तमिल समुदाय ने पूरी तरह से मेरा बहिष्कार कर दिया. इस दौरान उनके मन में आत्महत्या का भी विचार आया.

न्यूज ग्रुप न्यूजपेपर और एसोसिएटेड न्यूजपेपर की वकील विक्टोरिया जोलिफ़ी ने कहा कि सभी आरोपों को वापस ले लिए गए हैं और इससे सुब्रह्मण्यम की छवि को जो नुक़सान पहुँची है उसके लिए माफ़ी मांगी है. इसके लिए वे सुब्रह्मण्यम को हर्जाने का भुगतान करने पर सहमत हो गए हैं.

ज्ञात हो कि श्रीलंकाई तमिलों के पलायन की समस्या को लोगों के सामने लाने के लिए परमेश्वरन ने हाउस ऑफ़ पार्लियामेंट के बाहर सात अप्रैल 2009 से भूख हड़ताल शुरू किया था जो 23 दिन तक चला था. भूख हड़ताल के बाद पांच दिन तक पी सुब्रह्मण्यम का अस्पताल में इलाज हुआ. इसके छह महीने बाद ‘द डेली मेल’ और ‘द सन’ ने ख़बर प्रकाशित की. खबर में कहा गया कि निगरानी करने वाले विशेष उपकरणों ने सुब्रह्मण्यम को मैक डोनाल्ड का बर्गर खाते हुए पकड़ा था.

सुब्रह्मण्यम के वकील मैगनस ब्यॉड के मुताबिक- जज इडे ने कहा कि आरोप पूरी तरह निराधार थे, इस बात को अख़बारों ने भी स्वीकार किया है. उधर, पार्लियामेंट चौराहे पर पुलिस ऑपरेशन के प्रभारी मेट्रोपोलिटिन पुलिस अधीक्षक ने कहा- वहां कोई भी टीम निगरानी रखने वाले विशेष उपकरणों का उपयोग नहीं कर रही थी और इसका कोई वीडियो भी उपलब्ध नहीं है.

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0 Comments

  1. winit

    July 30, 2010 at 2:42 pm

    काश अपने मुल्क के अखबारों में भी अपनी गलती को स्वीकारने का ऐसा साहस पैदा हो सके …
    —विनीत—
    [email protected]

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