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‘सेक्स को मुद्दा बनाइए, महिला को न घसीटिए’

विनय बिहारी सिंहखुशवंत सिंह की निजी राय इतनी अशोभनीय है कि इस पर बहस होनी ही थी। कोई स्त्री अगर खूबसूरत है, अविवाहित है और आक्रामक या तेज तर्रार है तो वह सेक्स की कुंठा की शिकार है, यह कैसे कह दिया खुशवंत सिंह ने? यह कौन सा पैमाना है उनका? कई बार तो लगता है कि वे अपने कालम को रोचक और मसालेदार बनाने के लिए सेक्स का छौंक लगा देते हैं। संभव है कि ये महिलाएं, जन्मजात आक्रामक हों या इन्हें ऐसा माहौल मिला हो जिससे इनके मन में एक खास तरह का आक्रोश हो। दरअसल वातानुकूलित कक्ष में बैठ कर सुख- सुविधाओं के साथ कालम लिखने की यही दिक्कत है। यह हिंदी में ही नहीं, अंग्रेजी में भी होता है। फैंटेसी यानी जिसे हम हिंदी में स्वैर कल्पना कहते हैं, वह ऐसे स्तंभकारों का आधार होती है। लगता है खुशवंत सिंह ने एक फ्रेम बना लिया है।

विनय बिहारी सिंहखुशवंत सिंह की निजी राय इतनी अशोभनीय है कि इस पर बहस होनी ही थी। कोई स्त्री अगर खूबसूरत है, अविवाहित है और आक्रामक या तेज तर्रार है तो वह सेक्स की कुंठा की शिकार है, यह कैसे कह दिया खुशवंत सिंह ने? यह कौन सा पैमाना है उनका? कई बार तो लगता है कि वे अपने कालम को रोचक और मसालेदार बनाने के लिए सेक्स का छौंक लगा देते हैं। संभव है कि ये महिलाएं, जन्मजात आक्रामक हों या इन्हें ऐसा माहौल मिला हो जिससे इनके मन में एक खास तरह का आक्रोश हो। दरअसल वातानुकूलित कक्ष में बैठ कर सुख- सुविधाओं के साथ कालम लिखने की यही दिक्कत है। यह हिंदी में ही नहीं, अंग्रेजी में भी होता है। फैंटेसी यानी जिसे हम हिंदी में स्वैर कल्पना कहते हैं, वह ऐसे स्तंभकारों का आधार होती है। लगता है खुशवंत सिंह ने एक फ्रेम बना लिया है।

उस फ्रेम में जो फिट बैठता है, वह तो ठीक वरना उसे सेक्स कुंठा है। विचारधारा, भीतर की आग या बहस ऐसे लेखकों को कतई नहीं भाते। उनका आधार है- सेक्स, स्त्री- पुरुष संबंध और फैंटेसी। खुशवंत सिंह जैसे लोग जिनकी काफी ख्याति है- कुछ भी लिख कर चर्चा में रहते हैं और पैसा भी कमाते हैं। लेकिन खुशवंत सिंह जी, अब नई पीढ़ी का जमाना है। आप अपनी डफली का पुराना राग बदलिए। अगर सेक्स पर ही बहस करनी है तो उसे ही मुख्य मुद्दा बनाइए। किसी महिला को क्यों घसीट रहे हैं। सेक्स बिल्कुल अलग मुद्दा है। इन महिलाओं का मुद्दा बिल्कुल अलग है।

विनय बिहारी सिंह

कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार और हिंदी ब्लाग दिव्य प्रकाश के माडरेटर

संपर्क : [email protected]


महोदय

मैंने अतुल अग्रवाल और आपका लिखा पढ़ा। बहुत साफ बात है कि अतुल ने टीआरपी के लिए इसको मुद्दा बनाया। टीआरपी बटोरने के लिए सेक्स या फिर देवी-देवता जैसे मसाले इन टीवी वालों को चाहिए। हो सकता है अतुल अग्रवाल ने टीआरपी के लिए इसे खबर बनाया और खेला हो। मैं करीब दस साल से खुशवंत सिंह को पढ़ता रहा हूं। पढ़ने के बाद कई बार बहुत क्रोध और निराशा होती है कि कैसे सेक्स और दारू के अलावा खुशवंत सिंह के पास कुछ नहीं है। साफ करना, आज तक शायद मैंने हिंदू धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म के बारे में कहीं कोई टिप्पणी नहीं होती।

दारू के बारे में जब खुशवंत जी लिखते हैं तो जैसे लंपटता की सारी हद ही तोड़ देना चाहते हैं। कोई भी चीज जब सीमाएं तोड़ती हैं तो असामान्य रूप लेती हैं।

जब कोई पत्रकार अखबार में लिखता है तो वह उसके निजी विचार कहने से अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकता है।

अगर हजरत पैगंबर का कार्टून विदेश में छपने के बाद हिंदुस्तान में दंगे भड़क सकते हैं तो टीवी पत्रकार लाखों हिंदुओं के मन की कसक को नहीं दिखाएंगे तो कौन दिखाएगा?

लेकिन पत्रकार होने के नाते अतुल जी को वाणी पर संयम रखना चाहिए।

आज्ञा राम पांडेय

संपर्क : [email protected]


उपरोक्त विचार हिंदी टीवी जर्नलिस्ट, फतवेबाजी और खुशवंत सिंह शीर्षक से भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित पोस्ट पर है। इस मुद्दे पर आप भी अपनी टिप्पणी [email protected] पर मेल कर सकते हैं।

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