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ग्लोबल और यंग होने में उम्र कोई बंधन नहीं

पत्रकार प्रतीक्षा सक्सेना ने क्या ‘बूढ़े’ बसा पाएंगे ‘नई’ दुनिया? विषय पर चल रही बहस में मार्केट में टिकना है तो ग्लोबल और यंग होना ही पड़ेगा शीर्षक से अपनी बात रखी। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार संजय द्विवेदी प्रतीक्षा जी की बातों से सहमत नहीं हैं। उन्होंने अपना पक्ष, अपनी सोच, अपने विचार भड़ास4मीडिया के पास भेजा है। उसे यहां दिया जा रहा है। अगर आपको भी बहस में शरीक होना है तो अपनी बात लिख [email protected] पर मेल करें।

संपादक, भड़ास4मीडिया


प्रतीक्षा जी, भड़ास4मीडिया  पर छपी आपकी टिप्पणी से सहमत नहीं हुआ जा सकता।

पत्रकार प्रतीक्षा सक्सेना ने क्या ‘बूढ़े’ बसा पाएंगे ‘नई’ दुनिया? विषय पर चल रही बहस में मार्केट में टिकना है तो ग्लोबल और यंग होना ही पड़ेगा शीर्षक से अपनी बात रखी। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार संजय द्विवेदी प्रतीक्षा जी की बातों से सहमत नहीं हैं। उन्होंने अपना पक्ष, अपनी सोच, अपने विचार भड़ास4मीडिया के पास भेजा है। उसे यहां दिया जा रहा है। अगर आपको भी बहस में शरीक होना है तो अपनी बात लिख [email protected] पर मेल करें।

संपादक, भड़ास4मीडिया


प्रतीक्षा जी, भड़ास4मीडिया  पर छपी आपकी टिप्पणी से सहमत नहीं हुआ जा सकता।

यह चीजों को अतिसरलीकृत करके देखना है। ग्लोबल और यंग होने का मतलब हमें समझना होगा। आयु इसमें कहीं बाधा नहीं है, बशर्ते आदमी अपने आपको नए विचारों के साथ ढाल सके। मीडिया का क्षेत्र आज बहुत ग्लैमर का भले मना जा रहा हो लेकिन अनुभव और उत्साह के संयोग से ही कोई टीम मैदान  जीत सकती है। नई दुनिया के संदर्भ में यह टिप्पणी बहुत मायने इसलिए नहीं रखती क्योंकि वह एक अखबार है। अखबार एक बौद्धिक उपक्रम होता है जहां सूचनाओं के साथ विचारों को भी जगह मिलती है। सूचनाओं के संग्रहण के लिए युवा और तेज चेहरों की जरूरत तो होती है लेकिन खबरों के विश्लेषण और खबरों के पीछे छिपे अर्थ की तलाश के लिए हमें उन लोगों का साथ लेना होता है जो इस क्षेत्र के मर्मज्ञ हैं। अखबार से बौद्धिक तबका दूरी बना ले तो अखबार एकांगी हो जाएंगें। अनुभव की जगह उत्साह नहीं ले सकता, इसका उल्टा भी उतना ही सच है। दोनों का संयोग ही चीजों को महत्वपूर्ण बनाता है। 

आप युवा किसे मानेंगें। यह भी तय होना चाहिए। मैने तमाम थके हुए, चुके हुए युवा देखें हैं तो तेजस्वी बुजुर्ग भी देखे हैं। हर क्षेत्र में ऐसे उदाहरण हैं, 40 के बाद क्या अनुभव से भरे पूरे व्यकित को दुनिया में रहने का हक नहीं है। उसने अपनी जवानी मीडिया को दी फिर वो अपना बाकी जीवन क्या वानप्रस्थी बन जाए। क्या हम उन विदेश से पढ़कर लौटे मीडिया घरानों के प्रमुखों और प्रबंधकों की तरह सोचना शुरू कर दें और चालीस पार के सभी पत्रकारों को हिंद महासागर में डाल दें।

आप चालीस पार की बात कह रही  हैं मैं साठ पार के बहुत से युवाओं का नाम हर क्षेत्र से गिना सकता हूं। जिसमें डा. अब्दुल कलाम, अमिताभ बच्चन, अलीक पद्मसी, देवानंद, जितेंद्र जैसे सैकड़ों नाम गिनाए जा सकते हैं। मीडिया की दुनिया में भी ऐसे तमाम नाम हैं जो चालीस पार के बाद भी अपनी बेहतर भूमिका का न सिर्फ निर्वाह कर रहे हैं वरन नई पीढ़ी के रोल माडल भी बने हुए हैं।

प्रभु चावला, विनोद दुआ, डा. प्रणव राय, राजदीप सरदेसाई, संजय पुगलिया, बरखा दत्त, मृणाल पाण्डेय, राहुल देव, शेखर गुप्ता, रजत शर्मा, उदय शंकर, आलोक मेहता, कमर वहीद नकवी, शशिशेखर आदि जैसे तमाम नाम मैं गिना सकता हूं। इनके अनुभवों और आज की ताजातरीन पीढ़ी के उत्साह ने एक ऐसा परिवेश रचा जिससे मीडिया की दुनिया इतनी रंगीन हो सकी। 

नई पीढ़ी के पास निश्चय ही ज्यादा नए विचार और ताकत है। जोश है, यह पीढ़ी आईफोन के दौर की है। लेकिन पत्रकार सिर्फ आज का प्रवक्ता नहीं होता, वह अपने परिवेश, सामाजिकता, इतिहास, भाषा और ज्ञान-विज्ञान के तमाम अनुशासनों की समझ रखने वाला भी होता है। इसके लिए अनुभव औऱ अध्ययन की भी दरकार होती है। चमकते चेहरे खबरें पढ़ सकते हैं, पर पढ़े जा रहे शब्दों के साथ व्यवहार की तमीज हमारे अनुभवी पत्रकार ही सिखाते हैं। मुझे उम्मीद है आप लोग मेरी भावनाओं को समझने का प्रयास करेंगें।


संजय द्विवेदी

(एडीटर, इनपुट, जी 24 घंटे छत्तीसगढ़, रायपुर)

[email protected]

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